चंडीगढ़: पंजाब की सभी जिला अदालतों के वकील पिछले एक महीने से “काम बंद” हड़ताल पर हैं. उनकी मांग है कि लीगल एड डिफेंस काउंसिल (LADC) सिस्टम को वापस लिया जाए. यह सिस्टम उन आपराधिक मामलों के आरोपियों को मुफ्त कानूनी मदद देता है जो निजी वकील रखने में सक्षम नहीं हैं.
सोमवार को हरियाणा और चंडीगढ़ की जिला अदालतों के कई वकील भी इस हड़ताल में शामिल हो गए, जो अब तक सिर्फ पंजाब तक सीमित थी. इसके एक दिन बाद पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी जिला बार एसोसिएशनों के समर्थन में 30 जुलाई तक हाई कोर्ट में काम बंद रखने का फैसला किया. गुरुवार को बार एसोसिएशन ने हड़ताल को बढ़ाकर सोमवार, 3 अगस्त तक कर दिया.
पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ की बार एसोसिएशनों की जॉइंट एक्शन कमेटी की अगुवाई में प्रदर्शन कर रहे वकीलों की मांग है कि LADC सिस्टम खत्म किया जाए और पहले वाला पैनल आधारित लीगल एड सिस्टम फिर से लागू किया जाए.
जॉइंट एक्शन कमेटी के अध्यक्ष और वकील एस.एस. सिद्धू ने केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को दिए गए ज्ञापन में नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA) के बनाए LADC सिस्टम पर 16 आपत्तियां दर्ज कराई हैं.
ज्ञापन में कहा गया है कि LADC सिस्टम की नीति मौजूदा कानून के खिलाफ है और इससे वकालत पेशे की स्वतंत्रता कमजोर होगी.
इसमें यह भी कहा गया है कि यह बार काउंसिल ऑफ इंडिया के तय पेशेवर आचार नियमों के खिलाफ है और इससे आपराधिक मामलों के लिए एक समानांतर वकीलों का ढांचा तैयार हो जाएगा.
ज्ञापन में यह भी कहा गया कि इससे प्रैक्टिस कर रहे वकीलों की रोजी-रोटी पर असर पड़ेगा और मुकदमा लड़ने वाले लोगों का अपनी पसंद का वकील चुनने का अधिकार भी सीमित हो जाएगा.
प्रदर्शन कर रहे वकीलों का कहना है कि इस सिस्टम से स्वतंत्र वकीलों और LADC पर प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ जाएगा.
ज्ञापन में आगे कहा गया, “यह सिस्टम मौजूदा लीगल एड पैनल सिस्टम को खत्म कर देगा. साथ ही इसका गलत इस्तेमाल कर ऐसे लोगों को भी मुफ्त कानूनी मदद दी जा सकती है जो इसके हकदार नहीं हैं.”
प्रदर्शन कर रहे वकीलों ने यह भी आरोप लगाया कि इस सिस्टम से अवैध तरीके से फीस वसूली, मुवक्किलों को लालच देकर जोड़ने और प्रभावित करने जैसी बातें हो सकती हैं. उनका कहना है कि इससे मुकदमा लड़ने वाले लोगों पर दबाव बढ़ेगा और मामलों को रेफर करने में गड़बड़ी हो सकती है. साथ ही वेतन पाने वाले LADC वकील मुवक्किलों को पूरी तरह स्वतंत्र सेवा नहीं दे पाएंगे.
LADC सिस्टम में सुधार के लिए सुझाव
पंजाब के वकीलों की इसी तरह की शिकायत पर NALSA ने मार्च में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के जजों की एक कमेटी बनाई थी, ताकि LADC योजना की फिर से समीक्षा की जा सके.
बुधवार को कमेटी के सदस्यों ने प्रदर्शन कर रहे वकीलों से मुलाकात की और उनकी शंकाएं दूर करने की कोशिश की.
सूत्रों के मुताबिक, कमेटी ने बार के सदस्यों से कहा कि वकीलों की आपत्तियों को देखते हुए हाई कोर्ट स्तर पर जो भी संभव है, वह किया जा रहा है. हालांकि, जो समाधान हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं हैं, वे नहीं दिए जा सकते हैं.
कमेटी के सदस्यों ने कहा कि हड़ताल इसका समाधान नहीं है. इससे वकीलों और मुकदमे लड़ने वाले लोगों दोनों का नुकसान हो रहा है. उन्होंने कहा कि बार और कमेटी के बीच बातचीत जारी रहनी चाहिए और आगे आने वाले सुझावों पर भी विचार किया जा सकता है.
प्रदर्शन कर रहे वकीलों के ज्ञापन पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने LADC सिस्टम को बेहतर तरीके से लागू करने के लिए कमेटी की कई सिफारिशें जारी कीं.
सर्कुलर में बताया गया कि LADC की नियुक्ति किस प्रक्रिया के तहत होगी.
इसमें सिफारिश की गई कि अगर कोई बचाव पक्ष का वकील किसी मामले में पेश नहीं होता, तो अदालत के पीठासीन अधिकारी सीधे LADC नियुक्त नहीं करेंगे.
इसके बजाय, पीठासीन अधिकारी पहले वकील की गैरहाजिरी दर्ज करेंगे और इसकी जानकारी आरोपी या उसके वकील को देंगे.
अगर इसके बाद भी अगली सुनवाई पर आरोपी या उसका वकील पेश नहीं होता, तब पीठासीन अधिकारी LADC नियुक्त करने की प्रक्रिया शुरू करेंगे.
हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने इन सिफारिशों को हाई कोर्ट के साथ-साथ पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को भेजा. उनसे कहा गया कि वे इन्हें सभी न्यायिक अधिकारियों और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के सचिवों तक भी पहुंचाएं.
हड़ताल खत्म कराने के लिए PIL
यह मामला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में भी विचाराधीन है. पिछले हफ्ते एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई थी, जिसमें राज्यभर में चल रही हड़ताल खत्म कराने की मांग की गई क्योंकि इससे मुकदमा लड़ने वाले लोगों को परेशानी हो रही है.
20 जुलाई को वकील अरविंद सेठ ने यह PIL दाखिल की थी. इसमें अदालत से मांग की गई कि अदालतों का सामान्य कामकाज बहाल कराया जाए और जो लोग अदालत के रोजमर्रा के काम में बाधा डाल रहे हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए.
याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की बेंच ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि “समझदारी से समाधान निकलेगा” और अदालत को इस मामले में दखल नहीं देना पड़ेगा.
बेंच ने कहा कि पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट बार एसोसिएशन और बार काउंसिल के कुछ सदस्यों का मानना है कि ऐसे मामलों का समाधान बार के स्तर पर ही होना चाहिए.
23 जुलाई को फिर सुनवाई हुई. बेंच ने कहा कि बातचीत अभी भी जारी है और सुनवाई 27 जुलाई तक टाल दी.
सोमवार को जब फिर सुनवाई हुई तो बेंच ने लगातार जारी हड़ताल पर नाराजगी जताई.
मामला तब और बढ़ गया जब हाई कोर्ट के वकील मुख्य न्यायाधीश की अदालत के बाहर इकट्ठा हो गए और LADC सिस्टम वापस लेने की मांग करते हुए नारेबाजी की. कुछ वकीलों ने यह भी दावा किया कि मुख्य न्यायाधीश ने प्रदर्शन कर रहे वकीलों के खिलाफ मौखिक टिप्पणी की थी.
इसके बाद बार एसोसिएशन की कार्यकारिणी की आपात बैठक हुई. इसमें तय किया गया कि मंगलवार को जनरल हाउस की बैठक बुलाई जाएगी, जिसमें आगे की रणनीति तय होगी.
मंगलवार की जनरल हाउस बैठक में तीन प्रस्ताव पारित किए गए.
पहला, वकील अरविंद सेठ को कानूनी बिरादरी के खिलाफ PIL दायर करने पर कारण बताओ नोटिस जारी किया जाए.
दूसरा, बार काउंसिल से कहा जाए कि पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में सभी LADC वकीलों के लाइसेंस निलंबित किए जाएं और निलंबन आदेश जनरल हाउस के सामने रखे जाएं.
तीसरा, 30 जुलाई तक हाई कोर्ट का काम बंद रहेगा और उसी दिन फिर जनरल हाउस की बैठक होगी.
हालांकि, गुरुवार को बार एसोसिएशन ने हड़ताल सोमवार तक बढ़ाने और सोमवार सुबह जनरल हाउस की बैठक करने का फैसला किया.
मंगलवार को जब PIL पर फिर सुनवाई हुई तो मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की बेंच ने हड़ताल खत्म करने पर जोर दिया. बेंच ने कहा कि आम लोगों को न्याय मिलने से रोका जा रहा है.
LADC सिस्टम को बेहतर तरीके से लागू करने के लिए हाई कोर्ट की ओर से जारी सिफारिशों का जिक्र करते हुए बेंच ने कहा कि 27 जुलाई की सुनवाई के दौरान बार एसोसिएशन और बार काउंसिल के सदस्यों ने माना था कि LADC सिस्टम के कथित गलत इस्तेमाल को लेकर लगभग सभी चिंताओं का समाधान कर दिया गया है.
बेंच ने कहा कि उसने पिछले 27 दिनों से पंजाब में आम लोगों को न्याय मिलने में हो रही रुकावट पर अपना “दुख और पीड़ा” भी जताई थी. बेंच ने कहा कि यह “न्याय व्यवस्था के लिए शर्मनाक” होगा.
बेंच ने यह भी कहा कि 27 जुलाई की सुनवाई के दौरान भरोसा दिया गया था कि आपसी सहमति से समाधान निकलने की संभावना है. इसी वजह से मामला 28 जुलाई तक टाल दिया गया था.
लेकिन बेंच ने कहा कि 28 जुलाई को सुनवाई के दौरान उसे बताया गया कि आम लोगों को न्याय मिलने में लगातार रुकावट पर अदालत की मौखिक टिप्पणियों को गलत तरीके से पेश किया गया.
28 जुलाई के आदेश में बेंच ने कहा, “हमें खेद है कि LADC योजना को लागू करने को लेकर बार के सदस्यों की आशंकाएं दूर करने के लिए विस्तृत निर्देश जारी किए जाने के बावजूद इस तरह की मनगढ़ंत बातें पेश की जा रही हैं.”
आदेश में आगे कहा गया, “हमने बार के सम्मानित सदस्यों के सामने फिर दोहराया है कि आम मुकदमा लड़ने वाले व्यक्ति को न्याय से वंचित करना पूरी न्याय व्यवस्था की विफलता होगी और इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती.”
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