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Thursday, 30 July, 2026
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UP की जौहर यूनिवर्सिटी को बुलडोजर कार्रवाई से बचाने के लिए छात्र किस तरह संघर्ष कर रहे हैं

सबसे पहले वे सेमेस्टर की छुट्टियों के दौरान वापस आए. फिर उन्होंने अपने कैंपस में प्रदर्शन किए. मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के अंदर, छात्र एक ऐसी लड़ाई लड़ रहे हैं जिसकी उन्होंने कभी उम्मीद नहीं की थी.

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रामपुर: सेमेस्टर की छुट्टियों के कारण मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी का कैंपस लगभग खाली हो गया था. तभी यूनिवर्सिटी को इमारतें गिराने का नोटिस मिला. कुछ ही दिनों में छात्र वापस कैंपस लौटने लगे, ताकि बुलडोजर उस यूनिवर्सिटी तक न पहुंच सकें, जिसे कई छात्र अपने परिवार के लिए इकलौती किफायती यूनिवर्सिटी बताते हैं.

उत्तर प्रदेश के रामपुर में यूनिवर्सिटी के मैन गेट के बाहर छात्रों ने टेंट लगा दिए. उन्होंने पुलिस बैरिकेड पर हाथ से लिखे पोस्टर बांधे और सुबह से लेकर रात तक नारे लगाए— “सेव जौहर यूनिवर्सिटी”, “स्टैंड विद जौहर यूनिवर्सिटी” और “शिक्षा हमारा अधिकार है.” करीब दो हफ्तों तक यूनिवर्सिटी का मैन गेट प्रदर्शन का केंद्र बना रहा.

15 जुलाई को रामपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) ने यूनिवर्सिटी की 40 में से 38 इमारतों को गिराने का आदेश दिया. प्राधिकरण का कहना था कि इन इमारतों का निर्माण मंजूरशुदा नक्शे के बिना किया गया है. समाजवादी पार्टी के नेता आज़म खान ने 2006 में इस यूनिवर्सिटी की स्थापना की थी. यूनिवर्सिटी ने इस आदेश को मुरादाबाद के मंडलायुक्त के सामने चुनौती दी. सोमवार को मंडलायुक्त ने फिलहाल इमारतें गिराने पर रोक लगा दी. लेकिन कुछ ही घंटों बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने प्रदर्शन स्थल हटवा दिया, छात्रों को वहां से हटा दिया और इलाके में धारा 144 लागू कर दी. मंगलवार सुबह तक टेंट गायब थे और उनकी जगह पुलिस की गाड़ियां खड़ी थीं.

यूनिवर्सिटी की अंतिम वर्ष की कानून की छात्रा 22 वर्षीय इकरा ने कहा, “जैसे ही हमें पता चला कि यूनिवर्सिटी की 40 में से 38 इमारतें गिराई जाएंगी, ऐसा लगा जैसे हमारे सिर से छत ही छीन ली जाएगी.”

लेकिन तब तक यह मामला सिर्फ इमारतों के नक्शे या निर्माण की मंजूरी तक सीमित नहीं रह गया था.

छात्र, शिक्षक, पूर्व छात्र, स्थानीय लोग और अलग-अलग धर्मों के नेता यूनिवर्सिटी के समर्थन में एकजुट हो गए. जो मामला शुरुआत में सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई था, वह अब शिक्षा, राजनीति और पहचान से जुड़े बड़े सवालों की बहस बन चुका है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह उन गिनी-चुनी निजी यूनिवर्सिटियों में से एक है, जहां कम फीस, सस्ते हॉस्टल और पूरी छात्रवृत्ति जैसी सुविधाओं के कारण साधारण परिवारों और अपने परिवार में पहली बार उच्च शिक्षा हासिल करने वाले हजारों छात्र पढ़ने आते हैं. दूसरी ओर, प्रशासन का कहना है कि दो इमारतों को छोड़कर बाकी पूरे कैंपस का निर्माण जरूरी मंजूरियों के बिना हुआ है, इसलिए उसे नियोजन संबंधी नियमों का पालन करना होगा.

रामपुर के जिलाधिकारी (डीएम) और रामपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) के उपाध्यक्ष अजय कुमार द्विवेदी ने कहा, “यह मामला फिलहाल अदालत में विचाराधीन है. आगे जो भी कार्रवाई होगी, वह अदालत की प्रक्रिया के अनुसार ही की जाएगी.”

Panchayat members from Amroha came to support the protest. Nikitha Arathi Naveen | ThePrint
धरने को समर्थन देने के लिए अमरोहा से क्षेत्र पंचायत सदस्य आए. निकिता आरती नवीन | दिप्रिंट

मामला अब अदालत में है, लेकिन अलग-अलग समुदायों के छात्र और स्थानीय लोगों का कहना है कि उनकी लड़ाई सिर्फ इमारतों को बचाने की नहीं, बल्कि उस संस्थान को बचाने की है जिसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी.

छात्रों के समर्थन में पहुंचे 54 वर्षीय स्थानीय निवासी प्रदीप प्रधान ने कहा, “अगर इमारतों की वैधता पर सवाल उठाने लगें, तो लगभग हर इमारत पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं. फिर कार्रवाई की शुरुआत दूसरी इमारतों से क्यों नहीं होती? यह पूरी तरह राजनीतिक मामला है. यूनिवर्सिटी को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि इसकी पहचान मुस्लिम समुदाय से जुड़ी है. आखिर में सबसे बड़ा नुकसान छात्रों के भविष्य का होगा.”

Outside the main gate, students pitched tents, tied handwritten banners to police barricades and raised slogans. Nikitha Arathi Naveen | ThePrint
मुख्य गेट के बाहर छात्रों ने टेंट लगाए, पुलिस बैरिकेड्स पर हाथ से लिखे बैनर बांधे और नारे लगाए | निकिता आरती नवीन | दिप्रिंट

‘हमारे भविष्य पर बुलडोजर’

जहां हर शाम छात्र इकट्ठा होकर नारे लगाते थे और अगले दिन के प्रदर्शन की योजना बनाते थे, वहां अब पुलिस के बैरिकेड लगे हैं.

कैंपस के अंदर ऐसा लगता है मानो जिंदगी थम गई हो, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.

सेमेस्टर की छुट्टियों के कारण कक्षाएं बंद हैं. पेड़ों से घिरी सड़कें लगभग सुनसान हैं और करीब 250 एकड़ में फैले कैंपस के बीच सफेद गुंबदों और मेहराबों वाली इमारतें अब भी खड़ी हैं.

कैंपस के बीचों-बीच मुमताज सेंट्रल लाइब्रेरी है, जिसका गुंबद अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डी.सी. स्थित यूएस कैपिटल भवन से प्रेरित है. इसके आसपास कानून, इंजीनियरिंग, फार्मेसी, मानविकी, कृषि और प्रबंधन विभाग हैं. साथ ही छात्रावास, ऑडिटोरियम, खेल सुविधाएं और खूबसूरती से विकसित बगीचे भी हैं. जिन इमारतों को अब गिराने की बात हो रही है, कभी इन्हीं के बीच से होकर छात्र हर दिन अपनी कक्षाओं तक पहुंचते थे.

Iqra is a law student at Jauhar University. She lives in the girls' hostel. Nikitha Arathi Naveen | ThePrint
इक़रा जौहर यूनिवर्सिटी में लॉ की स्टूडेंट हैं। वह गर्ल्स हॉस्टल में रहती हैं | निकिता आरती नवीन | दिप्रिंट

लाइब्रेरी की सीढ़ियों पर बैठी इकरा यूनिवर्सिटी के मैन गेट की ओर देखती हैं, जहां अब पुलिस की गाड़ियां खड़ी हैं. उन्हें वह दिन याद आता है, जब उन्होंने उत्तराखंड में अपने परिवार को रामपुर आकर पढ़ाई करने के लिए राजी किया था.

उन्होंने कहा, “मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि मैं कहीं भी पढ़ सकूं. यह इकलौती यूनिवर्सिटी थी, जिसकी फीस हम भर सकते थे. यहां कम खर्च में मिलने वाली सुविधाओं ने मेरे परिवार का भरोसा जीता. इसी वजह से मैं अपने परिवार की पहली लड़की बन सकी, जिसने कानून और उच्च शिक्षा की पढ़ाई शुरू की.”

इकरा की तरह कैंपस में पढ़ने वाले कई छात्र-छात्राएं यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में रहते हैं. उनका कहना है कि उनके परिवार ने उन्हें घर से दूर पढ़ने की अनुमति तभी दी, जब वे खुद कैंपस आए, हॉस्टल देखा और यह भरोसा हुआ कि उनकी बेटी यहां सुरक्षित रहेगी.

इकरा की कहानी यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे करीब 3,000 छात्रों से बहुत अलग नहीं है.

यूनिवर्सिटी उत्तर प्रदेश के बाहर से आने वाले छात्रों को फीस में छूट देती है. अनाथ छात्रों की पूरी ट्यूशन फीस माफ की जाती है. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, दिव्यांग छात्रों और ऐसे परिवारों के बच्चों को भी अतिरिक्त रियायत मिलती है, जिनके एक से ज्यादा बच्चे यहां पढ़ रहे हैं. हॉस्टल में रहने वाले छात्रों को भी अलग से फीस में छूट दी जाती है. छात्रों का कहना है कि इन्हीं सुविधाओं की वजह से ऐसे कई युवाओं को यहां पढ़ने का मौका मिला, जो अपने परिवार में पहली बार उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं और जिनके लिए प्रोफेशनल कोर्स करना आसान नहीं था.

हरियाणा के पानीपत के रहने वाले मुकरिम रावल यूनिवर्सिटी में कानून के पांचवें वर्ष के छात्र हैं. सेमेस्टर की छुट्टियों के दौरान वे सुप्रीम कोर्ट में इंटर्नशिप कर रहे थे. तभी उन्हें यूनिवर्सिटी की इमारतें गिराने के नोटिस की खबर मिली.

The university offers fee concessions for students from outside Uttar Pradesh. Nikitha Arathi Naveen | ThePrint
यूनिवर्सिटी उत्तर प्रदेश के बाहर के छात्रों के लिए फ़ीस में छूट देती है | निकिता आरती नवीन | दिप्रिंट

उन्होंने अपनी इंटर्नशिप बीच में ही छोड़ दी और प्रदर्शन में शामिल होने के लिए रामपुर लौट आए.

रावल को दूसरे राज्य से होने के कारण ट्यूशन फीस में 20 प्रतिशत की छूट मिली थी. उनका कहना है कि इसी रियायत और यूनिवर्सिटी से मिली छात्रवृत्ति की वजह से उनकी पढ़ाई का खर्च उठाना संभव हो सका.

रावल ने कहा, “यूनिवर्सिटी को गिराने की योजना बनाने से पहले प्रशासन और योगी आदित्यनाथ सरकार को खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या उनके पास इस जैसी कोई दूसरी यूनिवर्सिटी है? इसकी इमारतें, बुनियादी सुविधाएं, हरियाली और पढ़ाई का माहौल आज उत्तर प्रदेश की किसी दूसरी यूनिवर्सिटी से तुलना नहीं कर सकता.”

मुकरिम रावल ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी इंटर्नशिप बीच में ही छोड़ दी और विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए रामपुर लौट आए | निकिता आरती नवीन | दिप्रिंट

सरकार का पक्ष

रामपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) का कहना है कि यह मामला शिक्षा का नहीं, बल्कि निर्माण का है.

आरडीए के मुताबिक, यूनिवर्सिटी परिसर में सिर्फ दो इमारतों — मेडिकल कॉलेज और एक शैक्षणिक भवन — के पास मंजूरशुदा भवन निर्माण नक्शा है. बाकी 38 इमारतें, जिनमें अलग-अलग विभागों की इमारतें, हॉस्टल, सेंट्रल लाइब्रेरी, ऑडिटोरियम और मस्जिद शामिल हैं, कथित तौर पर बिना मंजूर नक्शे के बनाई गई हैं. इसलिए वे विकास से जुड़े नियमों का उल्लंघन करती हैं.

रामपुर के जिलाधिकारी अजय कुमार द्विवेदी ने कहा, “यूनिवर्सिटी का मैन गेट भी अवैध है, क्योंकि उसका निर्माण लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) की जमीन पर किया गया है.”

हालांकि, यूनिवर्सिटी इन आरोपों से सहमत नहीं है.

कुलपति प्रोफेसर ज़हीरुद्दीन का कहना है कि जब कैंपस की ज्यादातर इमारतें बनाई गई थीं, तब यह जमीन रामपुर विकास प्राधिकरण के नहीं, बल्कि रामपुर जिला पंचायत के अधिकार क्षेत्र में आती थी. उस समय जिस प्राधिकरण के पास अधिकार था, उससे सभी जरूरी मंजूरियां ली गई थीं. उन्होंने बताया कि सिंगन खेड़ा गांव में स्थित यह यूनिवर्सिटी वर्ष 2024 में ही रामपुर विकास प्राधिकरण के दायरे में आई है.

The Mohammad Ali Jauhar University in Uttar Pradesh's Rampur. Nikitha Arathi Naveen | ThePrint
उत्तर प्रदेश के रामपुर में मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय | निकिता आरती नवीन | दिप्रिंट

उन्होंने कहा, “हम अदालत के सामने सभी दस्तावेज पेश करने के लिए तैयार हैं. यूनिवर्सिटी को यूजीसी से मान्यता प्राप्त है.”

भवन निर्माण की मंजूरी को लेकर विवाद कोई नया मामला नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में यूनिवर्सिटी कई कानूनी मामलों का सामना कर चुकी है.

साल 2024 में राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) के मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड ने निरीक्षण के दौरान बुनियादी ढांचे, फैकल्टी और नियामकीय मानकों के पालन में कमियां मिलने के बाद मेडिकल कॉलेज का लेटर ऑफ परमिशन (एलओपी) वापस ले लिया था. तब से मेडिकल कॉलेज बंद है.

The Faculty of Law at Jauhar University. Nikitha Arathi Naveen | ThePrint
जौहर यूनिवर्सिटी का लॉ फ़ैकल्टी | निकिता आरती नवीन | दिप्रिंट

इससे पहले, 2019 में भी, यूनिवर्सिटी को औपचारिक दर्जा मिलने के सात साल बाद पुलिस ने इसके संस्थापक और कुलाधिपति आज़म खान समेत अन्य लोगों के खिलाफ 27 एफआईआर दर्ज की थीं. किसानों का आरोप था कि यूनिवर्सिटी के विस्तार के लिए उनकी जमीन अवैध तरीके से ली गई. हालांकि, यूनिवर्सिटी ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा था कि जमीन मालिकों को कानून के मुताबिक मुआवजा दिया गया था.

कुलपति ज़हीरुद्दीन का आरोप है, “हर साल जैसे ही दाखिले का समय करीब आता है, सरकार यूनिवर्सिटी की प्रक्रिया और उसकी तरक्की रोकने के लिए ऐसी कार्रवाई शुरू कर देती है.”

Parents and Rampur residents at the Jauhar University protest. Nikitha Arathi Naveen | ThePrint
जौहर यूनिवर्सिटी में हो रहे विरोध प्रदर्शन में शामिल माता-पिता और रामपुर के निवासी | निकिता आरती नवीन | दिप्रिंट

वह गांव जो अब लड़ाई नहीं लड़ना चाहता

यूनिवर्सिटी की ऊंची दीवारों के पीछे सड़क अचानक संकरी हो जाती है. चौड़ी सड़कों और शैक्षणिक इमारतों की जगह कीचड़ भरी गलियां, बारिश का जमा पानी और ईंटों से बने छोटे-छोटे घर दिखाई देते हैं. यह अलीया गंज गांव है. यहीं से वे शिकायतें शुरू हुई थीं, जो बाद में आज़म खान और अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज 27 एफआईआर का आधार बनीं.

जब टीवी चैनलों की टीमें और पत्रकार गांव पहुंचे, तो कई महिलाएं चुपचाप अपने घरों के अंदर चली गईं और दरवाजे बंद कर लिए. पुरुषों ने भी विनम्रता, लेकिन थके हुए अंदाज में बातचीत से इनकार कर दिया. उनका सिर्फ इतना कहना था, “अब यह मामला हमारा नहीं रहा. यह यूनिवर्सिटी का मामला है. हमें अकेला छोड़ दीजिए.”

गांव के कई लोग अब इस विवाद से पूरी तरह दूरी बनाना चाहते हैं.

Aliya Ganj, the village from where the complaints that later became 27 FIRs against Azam Khan and others first emerged. Nikitha Arathi Naveen | ThePrint
अलिया गंज, वह गांव जहां से सबसे पहले वे शिकायतें सामने आईं, जो बाद में आज़म खान और अन्य लोगों के ख़िलाफ़ 27 FIR में बदल गईं। निकिता आरती नवीन | दिप्रिंट

32 वर्षीय दानिश, जिनकी जमीन भी इस मामले से जुड़ी है, कहते हैं, “अगर सरकार को हमारी इतनी ही चिंता है, तो अब हमें ज्यादा मुआवजा क्यों नहीं देती? कम से कम हमारे गांव में एक सड़क ही बनवा दे. आज हमें यह तक नहीं पता कि हमारी जमीन यूनिवर्सिटी के अंदर है या बाहर. अब हम इस लड़ाई को आगे नहीं बढ़ाना चाहते.”

कुछ अन्य ग्रामीणों का दावा है कि उन्होंने वर्षों पहले मुआवजा स्वीकार कर लिया था, लेकिन बाद में वे ऐसे राजनीतिक विवाद का हिस्सा बन गए, जिसमें वे अब नहीं रहना चाहते.

एक अन्य ग्रामीण और जमीन मालिक ने आरोप लगाया, “हम पर एफआईआर दर्ज कराने का दबाव बनाया गया और हमें गुमराह किया गया. सब जानते हैं कि सरकार बदलने के बाद किस तरह चीजें बदलती हैं और इस यूनिवर्सिटी को क्यों निशाना बनाया जा रहा है.”

जिन इमारतों को गिराने का आदेश दिया गया है, उनमें मुमताज सेंट्रल लाइब्रेरी, जिम्नेजियम, इस्लामिक स्टडीज़, कानून, विज्ञान, इंजीनियरिंग और मानविकी संकाय की इमारतें, फार्मेसी विभाग, रवींद्रनाथ टैगोर ऑडिटोरियम, छात्रावास और कैंपस के भीतर स्थित मस्जिद शामिल हैं.

Many residents of Aliya Ganj want nothing more to do with the dispute. Nikitha Arathi Naveen | ThePrint
आलिया गंज के कई निवासी अब इस विवाद से कोई लेना-देना नहीं रखना चाहते | निकिता आरती नवीन | दिप्रिंट

सिर्फ आज़म खान की यूनिवर्सिटी नहीं

प्रदर्शन के दूसरे हफ्ते तक आते-आते मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी का मुद्दा कैंपस की सीमाओं से बहुत आगे निकल चुका था.

छात्र संगठनों, पंचायत प्रतिनिधियों, सिख समुदाय के लोगों और विपक्षी नेताओं ने यूनिवर्सिटी पहुंचकर अपना समर्थन जताना शुरू कर दिया. रामपुर के अलग-अलग इलाकों से भी लोग छात्रों के साथ एकजुटता दिखाने आने लगे. मैन गेट के बाहर कभी भाषण होते हैं, तो कभी नारेबाजी. हर कुछ घंटों में कोई नया प्रतिनिधिमंडल आता, छात्रों को संबोधित करता और फिर लौट जाता.

कुलपति प्रोफेसर ज़हीरुद्दीन ने कहा, “कानूनी तौर पर हमारा पक्ष मजबूत है. यूनिवर्सिटी को बचाने के लिए हम हर संभव कोशिश करेंगे.” उन्होंने बताया कि इमारतें गिराने के आदेश को चुनौती देने की तैयारी के दौरान यूनिवर्सिटी प्रशासन लगातार वकीलों और अधिकारियों के संपर्क में रहा.

With Ambedkar posters, many students, including Hindus, are protesting the demolition. Nikitha Arathi Naveen | ThePrint
आंबेडकर के पोस्टर लेकर, हिंदू छात्रों समेत कई छात्र इस तोड़-फोड़ का विरोध कर रहे हैं | निकिता आरती नवीन | दिप्रिंट

कैंपस के अंदर छात्रों का कहना था कि अदालत से मिली अंतरिम राहत ने उनके इरादे और मजबूत कर दिए हैं.

एक छात्र ने अपने आसपास जुटे दर्जनों छात्रों के बीच कहा, “अगर यूनिवर्सिटी के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई, तो इस बार आंदोलन पहले से कहीं बड़ा होगा.” वहीं दूसरे छात्र ने नारा लगाते हुए कहा, “हम अपनी यूनिवर्सिटी की एक-एक ईंट की भी रक्षा करेंगे.” इस पर वहां मौजूद छात्रों ने जोरदार तालियां बजाईं.

कई छात्रों का आरोप है कि पुलिस उनके घरों तक पहुंची और उनके परिवार वालों से पूछताछ की. परिवारों पर दबाव बनाया गया कि वे अपने बच्चों को प्रदर्शन स्थल से वापस बुला लें.

Students made pamphlets to distribute during the protest. Nikitha Arathi Naveen | ThePrint
छात्रों ने विरोध प्रदर्शन के दौरान बांटने के लिए पैम्फलेट बनाए | निकिता आरती नवीन | दिप्रिंट

अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर एक छात्र ने कहा, “पुलिस हमें धमका रही है. वे हमारे घर जाकर परिवार वालों से कह रहे हैं कि हमें हिरासत में लिया जाएगा. लेकिन अब हम पीछे हटने वाले नहीं हैं.”

हालांकि, जिलाधिकारी और पुलिस ने इन आरोपों से इनकार किया है.

छात्रों का यह भी कहना है कि यूनिवर्सिटी से जुड़ा हर मुद्दा नकारात्मक तरीके से पेश किया जाता है, जिससे लोगों के बीच इस संस्थान को लेकर गलत धारणा बन गई है.

23 वर्षीय कानून के छात्र इमरान ने कहा, “सरकार ने यूनिवर्सिटी की ऐसी छवि बना दी है कि जैसे ही हम लोगों को बताते हैं कि हम जौहर यूनिवर्सिटी में पढ़ते हैं, वे तुरंत सवाल उठाने लगते हैं. यहां तक कि नए छात्र भी दाखिला लेने से पहले कई बार सोचते हैं.”

कई लोगों के लिए अब यह विवाद भवन निर्माण की मंजूरी तक सीमित नहीं रह गया है.

इमरान ने कहा, “विकास प्राधिकरण का काम विकास करना है, शिक्षा संस्थानों को तोड़ना और छात्रों का भविष्य बर्बाद करना नहीं.”

यह भावना सिर्फ कैंपस तक सीमित नहीं है.

यूनिवर्सिटी के मुख्य गेट से कुछ सौ मीटर दूर स्थित रहबर अली टी स्टॉल इन दिनों एक तरह का गैर-सरकारी न्यूज़रूम बन गया है. यहां दिनभर पत्रकार, वकील, पुलिसकर्मी और स्थानीय लोग चाय की चुस्कियों के साथ अदालत की सुनवाई और प्रशासन की हर नई कार्रवाई पर चर्चा करते रहते हैं. पहले यहां खेती, कारोबार या स्थानीय राजनीति की बातें होती थीं, लेकिन अब लगभग हर बातचीत एक ही सवाल पर आकर खत्म होती है— यूनिवर्सिटी का आगे क्या होगा?

Police installing CCTV in front of the university on Tuesday. Nikitha Arathi Naveen | ThePrint
मंगलवार को पुलिस यूनिवर्सिटी के सामने CCTV लगा रही है | निकिता आरती नवीन | दिप्रिंट

स्थानीय निवासी नवनीत सिंह कहते हैं, “अगर सरकार को यूनिवर्सिटी से इतनी ही परेशानी है, तो इसका नाम बदल दे. चाहे संस्कृत का कोई नाम रख दे. लेकिन एक शिक्षा संस्थान को क्यों खत्म किया जा रहा है? यहां सिर्फ मुस्लिम नहीं, हर धर्म के छात्र पढ़ते हैं. उन्हें ऐसी दूसरी यूनिवर्सिटी कहां मिलेगी?”

रामपुर के किसान हाशिम खान इस पूरे मामले को अलग नजरिए से देखते हैं.

उन्होंने कहा, “यह सरकार गरीब लोगों को कोई दूसरा विकल्प देने के बाद चीजें नहीं तोड़ती. इसका मकसद एक समुदाय को निशाना बनाकर दूसरे समुदाय को खुश करना है. जब मेडिकल कॉलेज चल रहा था, तब हमें इलाज और दवाइयों की सुविधा पास में मिल जाती थी. अब वह भी बंद हो गई. क्या सरकार ने कभी आकर देखा कि यहां के लोगों पर इसका क्या असर पड़ा है?”

The masjid inside Jauhar University, marked for demolition. Nikitha Arathi Naveen | ThePrint
जौहर यूनिवर्सिटी के अंदर मौजूद मस्जिद को ढहाने के लिए चिन्हित किया गया | निकिता आरती नवीन | दिप्रिंट

राजनीति भी गरमाई

जैसे-जैसे प्रदर्शन तेज होता गया, वैसे-वैसे इस मामले पर राजनीतिक बयानबाजी भी बढ़ने लगी.

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में आरोप लगाया कि भाजपा सरकार शिक्षा को भी सांप्रदायिक नजरिए से देख रही है. वहीं, पार्टी की सांसद इकरा हसन यूनिवर्सिटी पहुंचीं और प्रशासन से अपील की कि रामपुर की इस शैक्षणिक धरोहर को नष्ट न किया जाए.

उन्होंने कहा, “हमारी सरकार तो अनपढ़ है, लेकिन अधिकारी तो पढ़े-लिखे हैं. उन्हें किसी के दबाव में आकर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए. यूनिवर्सिटी में हर धर्म, हर वर्ग और हर जाति के बच्चे पढ़ते हैं. रामपुर की इस धरोहर को नहीं तोड़ा जाना चाहिए.”

हालांकि, भाजपा का कहना है कि यह कार्रवाई पूरी तरह भवन निर्माण और नियोजन संबंधी नियमों के उल्लंघन से जुड़ी है, न कि यूनिवर्सिटी की पहचान से.

इस विवाद ने एक बार फिर उस शख्स की भी यादें ताजा कर दीं, जिसने इस यूनिवर्सिटी की स्थापना की थी.

A map of the Jauhar University. Nikitha Arathi Naveen | ThePrint
जौहर विश्वविद्यालय का नक्शा. निकिता आरती नवीन | दिप्रिंट

साल 2019 में संसद में दिए गए आज़म खान के एक पुराने भाषण का वीडियो सोशल मीडिया पर फिर से वायरल होने लगा. उस भाषण में उन्होंने जौहर यूनिवर्सिटी को “एशिया की सबसे खूबसूरत यूनिवर्सिटियों में से एक” बताया था. उन्होंने यह भी कहा था कि इसकी मेडिकल कॉलेज की इमारत भव्यता के मामले में राष्ट्रपति भवन को भी टक्कर देती है.

सात साल बाद वही सपना एक बार फिर राजनीतिक संघर्ष के केंद्र में है. लेकिन यूनिवर्सिटी के मुख्य गेट पर जुटे कई छात्रों के लिए यह अब सिर्फ आज़म खान की विरासत नहीं रह गई है. यह वह जगह है, जहां उनके परिवार में पहली बार किसी ने कॉलेज की पढ़ाई की, जहां उन्हें कम खर्च में उच्च शिक्षा का मौका मिला और जहां आज उन्हें लगता है कि उनकी लड़ाई सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि अपने भविष्य और शिक्षा के अधिकार की है.

‘हमारा भविष्य बचाइए’

करीब दो दशकों से मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की पहचान उसके संस्थापक आज़म खान के नाम से जुड़ी रही है.

छात्र मानते हैं कि यूनिवर्सिटी पर आज़म खान की राजनीतिक छाप है. लेकिन उनका कहना है कि इस संस्थान को सिर्फ उसके संस्थापक के नजरिए से देखना, उन बदलावों और उपलब्धियों को नजरअंदाज करना है, जो वर्षों में यहां बनी हैं.

32 वर्षीय ईमान अली अपनी पत्नी और 13 साल के बेटे अयान के साथ करीब 15 किलोमीटर का सफर तय कर प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचे.

A student holds up a placard at Jauhar University. Nikitha Arathi Naveen | ThePrint
जौहर यूनिवर्सिटी में एक छात्र प्लेकार्ड उठाए हुए है. निकिता आरती नवीन | दिप्रिंट

ईमान अली ने कहा, “मैं यहां पढ़ नहीं सका, लेकिन चाहता हूं कि मेरा बेटा यहां पढ़े. इसलिए हम इस यूनिवर्सिटी को बचाने आए हैं. दिल्ली में हुए आंदोलनों को देखने के बाद हम भी लोगों से अपील करने आए हैं कि वे आगे आएं और इस मुहिम का समर्थन करें.”

उनके पास खड़ा अयान यूनिवर्सिटी के छात्रों को कैंपस बचाने के नारे लगाते हुए देख रहा था. उसका सपना भी कानून की पढ़ाई कर वकील बनने का है, ठीक वैसे ही जैसे प्रदर्शन में शामिल कई छात्रों का.

अयान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शिक्षा से जुड़े नारे का जिक्र करते हुए कहा, “मोदी जी कहते हैं, ‘पढ़ेगा इंडिया, तभी तो बढ़ेगा इंडिया.’ लेकिन जब यूनिवर्सिटी ही नहीं रहेगी, तो इंडिया पढ़ेगा कहां?”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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