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Thursday, 30 July, 2026
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2023 गणतंत्र दिवस के चीफ गेस्ट से लेकर G7 में मुलाकात तक: कैसे बदले भारत-मिस्र के संबंध?

2023 में, भारत और मिस्र ने अपने रिश्तों को 'रणनीतिक साझेदारी' के स्तर तक बढ़ाया. तीन साल बाद, ऐसा लगता है कि इस हाई-लेवल रिश्ते को एक और कैटलिस्ट की ज़रूरत है.

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नई दिल्ली: अप्रैल 2025 में एक फोन कॉल, पिछले महीने एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान हुई छोटी-सी मुलाकात और भारत की ओर से आधिकारिक दौरे का लंबित न्योता. पिछले डेढ़ साल में भारत और मिस्र के बीच सबसे ऊंचे स्तर पर यही संपर्क रहे हैं.

2023 में भारत और मिस्र ने अपने रिश्तों को “स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप” का दर्जा दिया था. इससे दोनों देशों के बीच बढ़ती नजदीकी को नई पहचान मिली थी. लेकिन तीन साल बाद ऐसा लग रहा है कि दोनों देशों के रिश्तों को फिर से नई रफ्तार देने की जरूरत है.

जनवरी 2023 में मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी भारत के 74वें गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि थे. इससे दोनों देशों के रिश्तों में तेजी साफ दिखी थी. इसके जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जून 2023 में मिस्र गए थे, जहां उन्हें उस देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान “ऑर्डर ऑफ द नाइल” दिया गया था.

इसके बाद सितंबर 2023 में जी20 शिखर सम्मेलन के लिए अल-सीसी फिर भारत आए थे. 2023 में लगातार हुई इन मुलाकातों से लगा था कि करीब तीन दशक से ठहरे हुए भारत-मिस्र रिश्तों को नई दिशा मिलेगी. लेकिन 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हमास के हमले और उसके बाद पश्चिम एशिया में शुरू हुए संघर्ष ने दोनों देशों के सामने नई चुनौतियां और नए मौके खड़े कर दिए.

इसके बावजूद ये मौके अभी तक दोनों देशों के बीच मजबूत रणनीतिक तालमेल में नहीं बदल पाए हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच चल रहे युद्ध के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति अल-सीसी से बात नहीं की.

पश्चिम एशिया के संघर्ष को सुलझाने की कोशिशों में मिस्र भी भूमिका निभा रहा है. इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, बहरीन के राजा हमद बिन ईसा अल खलीफा, कुवैत के अमीर मिशाल अल-अहमद अल-जाबेर अल-सबा, कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी, ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक से बात की. मई में वह संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भी गए और वहां राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से मुलाकात की.

मोदी ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के भी लगातार संपर्क में रहे. इससे पता चलता है कि उन्होंने इस संघर्ष से सीधे जुड़े लगभग सभी नेताओं से व्यक्तिगत स्तर पर बातचीत की. लेकिन मिस्र के साथ ऐसी कोई बातचीत नहीं हुई.

काउंसिल फॉर स्ट्रैटेजिक एंड डिफेंस रिसर्च के सीनियर रिसर्च एसोसिएट बशीर अली अब्बास ने दिप्रिंट से कहा, “भारत और मिस्र के रिश्तों का इतिहास काफी पुराना है. दोनों देशों के बीच स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप भी है और 2023 की शुरुआत में ही दोनों ने रिश्तों को फिर से मजबूत करने की कोशिश की थी. लेकिन ऐसा लगता है कि भारत और मिस्र के बीच भौगोलिक दूरी अब रणनीतिक दूरी भी बन गई है. दोनों देश कई बड़े वैश्विक मुद्दों और इजरायल को लेकर समान सोच रखते हैं, लेकिन रणनीतिक स्तर पर उनके रिश्ते भटक गए हैं.”

1950 और 1960 के दशक में भारत और मिस्र के रिश्तों की पहचान प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर की करीबी दोस्ती थी. दोनों नेताओं ने मिलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की स्थापना में अहम भूमिका निभाई थी. लेकिन 1990 के दशक में शीत युद्ध खत्म होने के बाद दोनों देशों के रिश्ते ठंडे पड़ गए.

दौरे का न्योता और IMEC

राजनयिक सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी को मिस्र आने का खुला न्योता दिया गया है. राष्ट्रपति अल-सीसी सत्ता संभालने के बाद चार बार भारत आ चुके हैं. इनमें दो बहुपक्षीय सम्मेलन शामिल हैं. 2015 का इंडिया-अफ्रीका फोरम समिट और 2023 का जी20 सम्मेलन. 2016 और 2023 में अल-सीसी भारत के राजकीय दौरे पर भी आए थे. वहीं मोदी जून 2023 में एक बार मिस्र गए थे.

सितंबर में नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स नेताओं के सम्मेलन में शामिल होने के लिए राष्ट्रपति अल-सीसी को भी न्योता दिया गया है. लेकिन सितंबर 2023 में अल-सीसी के आखिरी भारत दौरे के बाद से प्रधानमंत्री मोदी का मिस्र दौरा नहीं होना एक छूटा हुआ मौका माना जा रहा है. इससे यह संदेश नहीं गया कि भारत राजनीतिक रिश्तों को और मजबूत करने में खास दिलचस्पी दिखा रहा है. यह न्योता अल-सीसी के पिछले भारत दौरे के बाद दिया गया था.

भारत की पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका नीति में अहम माने जा रहे इन रिश्तों को इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) की शुरुआत से भी चुनौती मिली.

इस कॉरिडोर का मकसद भारत को यूएई, सऊदी अरब और संभावित रूप से इजरायल के जरिए जमीनी रास्ते से यूरोप से जोड़ना है. यानी स्वेज नहर का विकल्प तैयार करना. स्वेज नहर मिस्र की रणनीतिक ताकत का बड़ा आधार है क्योंकि दुनिया का लगभग 12 प्रतिशत व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है.

अब्बास ने कहा, “एक बड़ी समस्या यह है कि रणनीतिक संपर्क के मुद्दे पर भारत और मिस्र की सोच अभी तक एक जैसी नहीं हो पाई है. अगर IMEC की लॉजिस्टिक चुनौतियों और 2023 के बाद पश्चिम एशिया में हुए संघर्षों से अलग हटकर देखें, तो साफ दिखता है कि IMEC ने यह भी दिखा दिया कि भारत के पास मिस्र को इस परियोजना के मुख्य हिस्सों से जोड़ने के लिए ज्यादा प्रोत्साहन नहीं था.”

अब्बास ने आगे कहा, “मिस्र के लिए स्वेज नहर उसकी सबसे अहम आर्थिक और रणनीतिक संपत्तियों में से एक है. इसलिए वह लगातार यह सुझाव देता रहा है कि एशिया-यूरोप के नए समुद्र-जमीन-समुद्र मार्ग ऐसे बनाए जाएं जो लाल सागर के मौजूदा मार्ग के पूरक हों, उसका विकल्प नहीं.”

मिस्र ने सार्वजनिक रूप से कभी नहीं कहा कि वह इस व्यापारिक कॉरिडोर के खिलाफ है. लेकिन उसने एक दूसरा विकल्प जरूर पेश किया है. इसमें देश के भीतर मौजूद मल्टीमोडल ट्रांसपोर्ट नेटवर्क का इस्तेमाल करने की बात कही गई है.

मिस्र इस समय ग्रीन लाइन नाम का हाई स्पीड रेलवे नेटवर्क बना रहा है. इससे लाल सागर के ऐन सोखना बंदरगाह को भूमध्य सागर के मार्सा मतरूह बंदरगाह से जोड़ा जाएगा. इस रास्ते से यात्री और माल दोनों की आवाजाही होगी. यह स्वेज नहर के समानांतर दूसरा जमीनी कॉरिडोर होगा.

मिस्र ऐसे रेल कॉरिडोर पर उस समय दांव लगा रहा है जब समुद्री व्यापार कई चुनौतियों से जूझ रहा है. इनमें होर्मुज जलडमरूमध्य, बाब-अल-मंदेब और ब्लैक सी में नागरिक जहाजों पर हमले भी शामिल हैं.

पश्चिम एशिया में समुद्री क्षेत्र की अस्थिर स्थिति ने वैकल्पिक व्यापारिक रास्तों की जरूरत को और बढ़ा दिया है.

भारत और यूएई ने IMEC के तहत दोनों देशों के बीच समुद्री व्यापार मार्गों को तेजी से मजबूत करने की कोशिश शुरू की है. लेकिन इस कॉरिडोर का बाकी हिस्सा, खासकर यूरोप से जुड़ने वाला मार्ग, क्षेत्र में जारी युद्धों की वजह से अब भी अनिश्चित बना हुआ है.

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे कई संघर्षों का असर भारत और मिस्र के व्यापार पर भी पड़ा है. इससे दोनों देशों के बीच सहयोग का एक और बड़ा क्षेत्र प्रभावित हुआ है.

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार वित्त वर्ष 2021-22 में भारत और मिस्र के बीच दोतरफा वस्तु व्यापार 7.2 अरब डॉलर था.

अगले तीन वर्षों तक यह लगातार घटता रहा और 2024-25 में 4.7 अरब डॉलर रह गया.

पिछले वित्त वर्ष 2025-26 में व्यापार में फिर तेज बढ़ोतरी हुई और यह 6.5 अरब डॉलर पहुंच गया.

मौजूदा वित्त वर्ष के पहले दो महीनों यानी अप्रैल-मई में मिस्र को भारत का माल निर्यात 11.53 प्रतिशत बढ़कर 598.11 मिलियन डॉलर से 667.07 मिलियन डॉलर हो गया.

लेकिन इसी अवधि में मिस्र से भारत का आयात 45 प्रतिशत घटकर 536.29 मिलियन डॉलर से 293.7 मिलियन डॉलर रह गया.

इसके मुकाबले भारत का अपने खाड़ी देशों, खासकर यूएई के साथ व्यापार काफी ज्यादा है. पिछले वित्त वर्ष में भारत और यूएई के बीच व्यापार 101.25 अरब डॉलर रहा.

रक्षा और सुरक्षा: रिश्तों में नई उम्मीदें

राजनीतिक स्तर पर रिश्तों में सुस्ती दिखने के बावजूद, पिछले एक साल में नई दिल्ली और काहिरा के बीच कई ऐसे कदम उठे हैं जो बताते हैं कि दोनों देशों के बीच खासकर रक्षा क्षेत्र में तालमेल अब भी बना हुआ है.

अब्बास ने कहा, “भारत और मिस्र के बीच सैन्य रिश्ते मजबूत बने हुए हैं. दोनों देशों की खतरों को लेकर सोच मिलती है और सहयोग का लंबा इतिहास भी है. लेकिन इस रिश्ते से अभी तक राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर कोई बड़ा फायदा नहीं मिला है. अगर तुलना करें, तो भारत के सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देशों के साथ व्यापक रणनीतिक साझेदारी है, जबकि उन देशों के साथ भारत के रिश्ते और सैन्य सहयोग अपेक्षाकृत नए हैं.”

रियाद स्थित रसानाह इंस्टीट्यूट फॉर ईरानी स्टडीज के रिसर्च स्कॉलर नदीम अहमद मूनाकल का कहना है कि पिछले साल अक्टूबर में हुई पहली भारत-मिस्र रणनीतिक वार्ता, जिसकी अध्यक्षता विदेश मंत्री एस. जयशंकर और मिस्र के विदेश मंत्री बद्र अब्देलअत्ती ने की थी, दोनों देशों के बीच बढ़ती नजदीकियों का संकेत है.

मूनाकल ने कहा, “रणनीतिक वार्ता के अलावा, इस साल दोनों देशों ने काहिरा में संयुक्त रक्षा समिति की बैठक भी की. मई 2026 में नई दिल्ली में आतंकवाद विरोधी संयुक्त कार्य समूह की बैठक हुई. दोनों देशों की इस क्षेत्र को लेकर चिंताएं और हित काफी हद तक समान हैं.”

मूनाकल ने आगे कहा कि दोनों देशों के बीच अलग-अलग स्तर पर लगातार बातचीत हो रही है और रिश्ता आगे बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि दोनों देश व्यापार और निवेश, रक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा और शिक्षा जैसे कई अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर ध्यान दे रहे हैं.

मौजूदा भू-राजनीतिक हालात को देखते हुए ये क्षेत्र खास तौर पर मिस्र के लिए बहुत अहम हैं. फिर भी ऐसा महसूस होता है कि दुनिया में तेजी से बदलते हालात के बीच दोनों प्राचीन सभ्यताओं वाले देश रणनीतिक साझेदारी को और तेज करने का एक बड़ा मौका चूक गए.

इस साल अप्रैल में ब्रिक्स के उप विदेश मंत्रियों और मध्य पूर्व एवं उत्तर अफ्रीका (MENA) के विशेष दूतों की बैठक में फिलिस्तीन मुद्दे पर भारत का रुख भी चर्चा में रहा. ब्रिक्स के अध्यक्ष के तौर पर भारत ने संयुक्त बयान में फिलिस्तीन से जुड़ी भाषा को 2025 में इस्तेमाल किए गए करीब 16 पैराग्राफ से घटाकर सिर्फ दो पैराग्राफ के आसपास कर दिया था. इसे सभी सदस्यों ने स्वीकार नहीं किया.

भाषा में इस बड़े बदलाव का मिस्र समेत कई ब्रिक्स देशों ने कड़ा विरोध किया. इसके चलते MENA बैठक बिना किसी संयुक्त बयान के खत्म हुई और भारत ने केवल चेयर स्टेटमेंट जारी किया.

मई में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में भी ईरान और यूएई के मतभेदों की वजह से संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका. हालांकि फिलिस्तीन पर इस्तेमाल की गई भाषा ज्यादातर सदस्य देशों को स्वीकार थी. सिर्फ ईरान इससे संतुष्ट नहीं था.

अब्बास ने कहा, “भारत और मिस्र तेजी से बदलती भू-राजनीतिक व्यवस्था का सामना करने के लिए सिर्फ ऐतिहासिक रिश्तों का सहारा नहीं ले सकते. पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र में जिस तरह के बड़े बदलाव हो रहे हैं, उन्हें देखते हुए दोनों देशों के पास रणनीतिक रूप से एक-दूसरे के और करीब आने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. यही उम्मीद भी है और यही जरूरत भी.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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