नई दिल्ली: भारत के पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने शनिवार को चुनाव आयोग की ओर से देशभर में कराए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान को लेकर कई सवाल उठाए.
लवासा ने कहा, “क्या यह डेटा सार्वजनिक किया जाएगा कि संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत कितने अयोग्य लोगों की पहचान हुई और उनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए? क्योंकि ध्यान रहे, अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसे लोगों के नाम हटाने के चार हफ्तों के भीतर उनके मामलों को विदेशी न्यायाधिकरण (Foreigners’ Tribunal) के पास भेजा जाना चाहिए.”
उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि चार हफ्ते पहले ही पूरे हो चुके हैं. इसलिए हमें बताया जाए कि कितने लोगों के मामले विदेशी न्यायाधिकरणों को भेजे गए.”
मई में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले में SIR की वैधता को बरकरार रखा गया था और चुनाव आयोग को यह प्रक्रिया चलाने का अधिकार दिया गया था. अदालत ने यह भी कहा था कि अगर चुनाव आयोग को किसी व्यक्ति के मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता पर संतोष नहीं होता, तो वह मामला नागरिकता कानून के तहत सक्षम प्राधिकरण के पास फैसला करने के लिए भेजे.
लवासा ने कहा कि इस फैसले से कई सवाल खड़े होते हैं.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि बिहार में पिछले साल जून से शुरू हुआ SIR अभियान मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए किया गया था, जो भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बुनियाद है.
लवासा ने याद किया कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से यह साबित होता है कि कानून के तहत होने वाला सामान्य और चरणबद्ध संशोधन इस उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकता था. उस सामग्री से यह भी पता चलता था कि शायद मतदाता सूची में बड़े स्तर पर संशोधन की जरूरत थी.
उन्होंने पूछा, “रिकॉर्ड पर वह सामग्री क्या है? हमें नहीं पता. किसी को नहीं पता. कम से कम वह सार्वजनिक नहीं है. मुझे तो नहीं लगता कि वह अदालत के रिकॉर्ड का भी हिस्सा है. तो फिर उस निष्कर्ष का आधार क्या है?”
लवासा शनिवार को दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित ‘वन नेशन-वन इलेक्शन, संघवाद और नागरिकता’ विषय पर आयोजित सम्मेलन में बोल रहे थे.
इस सम्मेलन का आयोजन कॉन्स्टिट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप और ग्रुप ऑन फेडरलिज्म एंड इलेक्शंस ने संयुक्त रूप से किया था. इसमें पूर्व गृह सचिव गोपाल पिल्लई, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी, पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा, भारत के विधि आयोग के पूर्व अध्यक्ष न्यायमूर्ति ए.पी. शाह, राजनीतिक वैज्ञानिक निरजा गोपाल जायल और पारदर्शिता कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज समेत कई लोग मौजूद थे.
अपने संबोधन के अंत में लवासा ने कृष्ण बिहारी ‘नूर’ की एक नज्म सुनाई.
“जिंदगी से बड़ी सजा ही नहीं, और क्या जुर्म है पता ही नहीं. इतने हिस्सों में बंट गया हूं मैं, मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं.”
सवाल
लवासा ने कहा कि जून 2025 में SIR अभियान की घोषणा करने वाला नोटिफिकेशन “तर्क के आधार पर समझ से बाहर है.”
इसके बाद उन्होंने SIR कराने के लिए बताए गए दूसरे उद्देश्यों का जिक्र किया.
इनमें से एक उद्देश्य यह था कि मतदाता सूची में कोई भी अयोग्य व्यक्ति न रहे और चुनाव आयोग मतदाता सूची को शुद्ध बनाना चाहता है.
उन्होंने कहा, “तो अब आइए SIR के नतीजों को इन्हीं दो उद्देश्यों के आधार पर परखें और यह सबूत मांगे कि इस पूरी प्रक्रिया का नतीजा वास्तव में इन उद्देश्यों को पूरा करता है.”
अनुच्छेद 326 पात्रता तय करता है. इसके तहत मतदाता की उम्र 18 साल या उससे ज्यादा होनी चाहिए, वह भारत का नागरिक हो, उसका मानसिक संतुलन ठीक हो और किसी कानून के तहत अयोग्य घोषित न किया गया हो.
उन्होंने पूछा, “तो इस आधार पर कितने लोगों के नाम हटाए गए?”
उन्होंने कहा, “सार्वजनिक तौर पर ऐसा कोई डेटा उपलब्ध नहीं है, जिससे पता चले कि कितने लोगों के नाम इसलिए हटाए गए क्योंकि वे अयोग्य थे. हां, यह डेटा जरूर था कि जिन लोगों ने एक जगह से दूसरी जगह निवास बदल लिया था, उनके नाम हटाए गए. लेकिन इससे कोई व्यक्ति अयोग्य नहीं हो जाता. इसका सिर्फ इतना मतलब है कि उसका नाम किसी दूसरी जगह की मतदाता सूची में दर्ज होना चाहिए.”
लवासा ने यह सवाल भी उठाया कि चुनाव आयोग ने इस अभियान से क्या सीखा और नई ‘शुद्ध’ मतदाता सूची की शुद्धता को कैसे परखा जाएगा.
उन्होंने कहा, “तो शुद्धता का स्तर क्या है? पहले की तुलना में अब मतदाता सूची कितनी बेहतर हुई है, इसका आकलन कैसे होगा? मुझे लगता है कि इस पर चर्चा होनी चाहिए. हालांकि SIR किस तरीके से कराया गया, इस पर सवाल हैं, लेकिन चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के SIR कराने के अधिकार को बरकरार रखा है, इसलिए शायद यह प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी.”
उन्होंने आगे कहा, “कम से कम हमें यह तो समझना चाहिए कि पिछली प्रक्रिया से कोई सबक सीखा गया है या नहीं. और क्या चुनाव आयोग इसमें कोई सुधार लाने का प्रस्ताव रखता है.”
‘क्या SIR का फैसला गृह मंत्रालय में लिया गया था?’
सतर्क नागरिक संगठन की संस्थापक सदस्य और नेशनल कैंपेन फॉर पीपल्स राइट टू इन्फॉर्मेशन (NCPRI) की सह-संयोजक अंजलि भारद्वाज ने चुनाव आयोग पर पक्षपात और निष्पक्षता को लेकर उठ रहे सवालों का जिक्र किया.
उन्होंने कहा, “आज चुनाव कराने के तरीके को लेकर बेहद गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. खास तौर पर इस संदर्भ में भारत के चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका चिंता का विषय है. संविधान ने चुनाव आयोग को देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी दी है, लेकिन जिस तरह से आयोग काम कर रहा है, उससे उसकी विश्वसनीयता को काफी नुकसान पहुंचा है.” उन्होंने आगे कहा, “आज चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर एक लंबी छाया पड़ गई है.”
भारद्वाज ने कहा कि चुनाव आयोग पर आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतों पर चुनिंदा तरीके से कार्रवाई करने के आरोप लगे हैं. उन्होंने चुनाव आयोग के कामकाज में पारदर्शिता की कमी का भी मुद्दा उठाया.
उन्होंने मतदान प्रतिशत के मुद्दे और वोटिंग प्रतिशत के आंकड़ों को लेकर उठे आरोपों का भी जिक्र किया.
उन्होंने यह भी कहा कि SIR बिना कोई वजह बताए कराया गया. इस पर न तो किसी राजनीतिक दल से सलाह ली गई और न ही देश के लोगों से कोई बातचीत की गई.
SIR की वजह जानने के लिए दायर सूचना के अधिकार (RTI) आवेदनों के जवाब का जिक्र करते हुए भारद्वाज ने कहा कि चुनाव आयोग ने बताया कि उसके पास ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है जिसमें SIR कराने की वजह दर्ज हो. जवाब में यह भी कहा गया कि SIR कराने का फैसला चुनाव आयोग में नहीं लिया गया था.
उन्होंने सवाल उठाया, “तो फिर यह फैसला कहां लिया गया? क्या यह फैसला बीजेपी मुख्यालय में लिया गया था? क्या यह गृह मंत्रालय (MHA) में लिया गया था?”
खंडन योग्य धारणा
लवासा ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि जब संविधान बनाया और लागू किया गया था, तब उसके निर्माताओं ने कभी सोचा होगा कि एक दिन इतनी आसानी से नागरिकता का मुद्दा फिर से खोल दिया जाएगा और यह नागरिकों के लिए इतनी बड़ी चिंता का कारण बन जाएगा.
उन्होंने कहा कि जब संविधान अपनाया गया था, तब उसमें नागरिकता के कुछ व्यापक सिद्धांत तय किए गए थे. इनमें से एक सिद्धांत था “नागरिकता की धारणा” और दूसरा था उस धारणा का लगातार बने रहना.
उन्होंने कहा, “अब 27 मई को सुप्रीम कोर्ट का जो ताजा फैसला आया, वह संयोग से जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि के दिन आया. उसमें कहा गया है कि यह एक खंडन योग्य धारणा (rebuttable presumption) है. अगर आपका नाम मतदाता सूची में इसलिए शामिल है क्योंकि आप भारत के नागरिक हैं, तो यह मान लेना कि आप पात्र हैं, इस धारणा को चुनौती दी जा सकती है.”
उन्होंने बताया कि पहली मतदाता सूची 1950 में तैयार की गई थी, जबकि 1951 की जनगणना के आंकड़े तब उपलब्ध नहीं थे. उस समय केवल 1941 की जनगणना के आंकड़े मौजूद थे.
उन्होंने कहा, “लेकिन 1941 का दौर अलग था… उसी माहौल में चुनाव आयोग ने मतदाता सूची तैयार की.”
उन्होंने बताया कि जब बाद में मतदाता सूची की तुलना जनगणना के आंकड़ों से की गई, तो चुनाव आयोग ने 18.02 करोड़ की जनगणना के मुकाबले 17.30 करोड़ मतदाताओं का पंजीकरण करने में सफलता हासिल की थी.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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