नई दिल्ली: पहली नजर में लखनऊ के विभूति खंड स्थित समिट बिल्डिंग की 11वीं मंजिल पर सोलारिस सॉल्यूशंस द्वारा किराये पर लिया गया दफ्तर किसी आम कॉल सेंटर जैसा ही लगता था. लेकिन अंदर पूर्वोत्तर राज्यों के टेलीकॉलर अमेरिकी लहजे में अंग्रेजी बोलते हुए शाम 7 बजे से सुबह 3 बजे तक की शिफ्ट में काम करते थे. पुलिस के मुताबिक, ये लोग नामी कंपनियों और सरकारी एजेंसियों के प्रतिनिधि बनकर अमेरिकी नागरिकों से कथित तौर पर ठगी कर रहे थे.
लखनऊ पुलिस का कहना है कि यह साइबर ठगी गिफ्ट कार्ड, क्रिप्टोकरेंसी और इंटरनेट के जरिए कॉल करने वाले प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके की जा रही थी. पुलिस सूत्रों के मुताबिक, फर्जी कॉल सेंटर चलाने वाले लोग अलग-अलग राज्यों से ऐसे युवक-युवतियों को नौकरी पर रखते थे, जिन्हें पहले से BPO या इंटरनेशनल कॉलिंग का अनुभव था.
जानकारी के मुताबिक, यह फर्जी कॉल सेंटर हर दिन 30 से 40 लाख रुपये के लेनदेन करता था. इससे हर महीने करीब 12 करोड़ रुपये और सालाना 150 से 200 करोड़ रुपये की कमाई होती थी.

1 जुलाई को धोखाधड़ी की शिकायत मिलने के बाद लखनऊ पुलिस ने समिट बिल्डिंग की 11वीं मंजिल पर छापा मारा और 119 लोगों को गिरफ्तार किया. इनमें ज्यादातर टेलीकॉलर थे. पुलिस ने 103 लैपटॉप, कॉलिंग में इस्तेमाल होने वाले 177 मोबाइल फोन, दूसरे डिजिटल उपकरण, अहम दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक सबूत भी बरामद किए.
गिरफ्तार लोगों में ऑपरेशन मैनेजर ललित खैराजानी और विक्रम सिंह परमार भी शामिल हैं. अब लखनऊ पुलिस अहमदाबाद के रहने वाले “चार्ल्स” उर्फ एक व्यक्ति की तलाश कर रही है, जिसके खिलाफ I4C में शिकायतें दर्ज हैं.
ठगी करने वाले टेलीकॉलर
जो भी बिना हिचकिचाए अंग्रेजी बोल सकता था, उसे सोलारिस सॉल्यूशंस में नौकरी मिल जाती थी. उम्मीदवार ने सिर्फ आठवीं तक ही पढ़ाई की हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था.
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि यह गिरोह पिछले छह महीने से सक्रिय था और सभी टेलीकॉलर मुंहजबानी प्रचार के जरिए नौकरी पर रखे गए थे.
ज्यादातर टेलीकॉलर असम, नागालैंड, मेघालय जैसे पूर्वोत्तर राज्यों से थे. कुछ गुजरात और महाराष्ट्र से भी थे. पहले बताए गए अधिकारी ने कहा, “इनमें ज्यादातर 10वीं और 12वीं पास थे.”
लखनऊ पुलिस द्वारा फर्जी कॉल सेंटर से बरामद इलेक्ट्रॉनिक उपकरण. विशेष व्यवस्था से.
अधिकारी ने यह भी बताया कि शक से बचने के लिए भारतीय कर्मचारियों को अमेरिकी लहजे में अंग्रेजी बोलना सिखाया जाता था. वे अपने नाम भी अमेरिकी नामों में बदल लेते थे. जैसे कोई पुरुष कैल्विन बन जाता था और कोई महिला जूली.
अधिकारी ने कहा, “नौकरी के विज्ञापनलिंक्डइन और इंस्टाग्राम पर दिए जाते थे. सिर्फ एक ही योग्यता थी, अंग्रेजी बोलना आना चाहिए.”
टेलीकॉलरों को रहने और खाने की सुविधा भी दी जाती थी. उनकी तनख्वाह करीब 40 हजार रुपये थी. इसके अलावा लक्ष्य पूरा करने पर इंसेंटिव भी मिलता था.
कर्मचारियों के रहने का इंतजाम Solaris Solutions नाम की एक फर्जी कंपनी करती थी. लेकिन किसी भी कर्मचारी को नियुक्ति पत्र, अनुबंध या कानून के तहत जरूरी दस्तावेज नहीं दिए गए थे.
पुलिस का कहना है कि यह फर्जी कॉल सेंटर विदेशी नागरिकों, खासकर अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाकर साइबर ठगी कर रहा था.
मौजूद सबूतों के आधार पर साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 3(5), 61(2), 318(4), 319(2), 336(3), 337, 338 और 340(2), आईटी एक्ट और टेलीकम्युनिकेशन एक्ट, 2023 की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है.
बिल्कुल कॉरपोरेट जैसा काम करने का तरीका
पुलिस की शुरुआती जांच और पूछताछ में पता चला कि फर्जी कॉल सेंटर के लोग अमेरिकी नागरिकों के साथ “बहुत ही योजनाबद्ध, तकनीकी रूप से दक्ष और संगठित तरीके” से साइबर ठगी करते थे.
क्राइम ब्रांच के एक अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि आरोपी VoIP कॉलिंग सिस्टम, Eyebeam डायलर, इंटरनेट आधारित कॉलिंग सॉफ्टवेयर और दूसरी आधुनिक डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल करके अमेरिकी नागरिकों से संपर्क करते थे.
अधिकारी ने ठगी का तरीका बताते हुए कहा कि आरोपी खुद को अमेज़न, माइक्रोसॉफ्ट, एप्पल, पेपाल, नेटफ्लिक्स और फेसबुक जैसी कंपनियों के अधिकृत प्रतिनिधि या कस्टमर सपोर्ट अधिकारी बताकर बात करते थे.
इसके बाद वे लोगों को विश्वास दिलाते थे कि उनके बैंक खाते, डिजिटल वॉलेट या निजी पहचान से जुड़ी “गंभीर समस्या” है. वे कहते थे कि अगर तुरंत कार्रवाई नहीं की गई तो उन्हें आर्थिक नुकसान या कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है.
पुलिस के मुताबिक, जब सामने वाला व्यक्ति डर जाता था, तो कॉल अगले स्तर पर भेज दी जाती थी. वहां दूसरा कॉलर खुद को फ़ेडरल ट्रेड कमीशन (FTC), फ़ेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (FBI), US मार्शल सर्विस, US ट्रेज़री डिपार्टमेंट या US डिस्ट्रिक्ट कोर्ट का अधिकारी बताता था. पहले बताए गए अधिकारी ने कहा, “इस तरह उन्हें कानूनी कार्रवाई और गिरफ्तारी का डर और ज्यादा दिखाया जाता था.”
अतिरिक्त DCP किरण यादव ने दिप्रिंट को बताया कि लोगों का भरोसा जीतने के लिए “आरोपी उन्हें ईमेल के जरिए फर्जी सरकारी दस्तावेज भेजते थे. इनमें कोर्ट के आदेश, पहचान चोरी की रिपोर्ट, FTC के पत्र, जांच रिपोर्ट और नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट (NDA) जैसे दस्तावेज शामिल होते थे. इन्हें बिल्कुल असली सरकारी रिकॉर्ड जैसा बनाया जाता था, जिससे लोग आसानी से धोखा खा जाते थे.”
ऐसे चलता था पूरा खेल
लखनऊ पुलिस की जांच में सामने आया कि पूरा कॉल सेंटर “एक कॉरपोरेट कंपनी की तरह” काम करता था. इसमें हर कर्मचारी की अलग-अलग जिम्मेदारी तय थी.
लखनऊ साइबर सेल के एक अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि ठगी के पहले चरण को “बेटिंग (Baiting)” कहा जाता था.
इस चरण में लोगों को फर्जी टेक्स्ट मैसेज भेजे जाते थे. इनमें दावा किया जाता था कि उनके अमेज़न, एप्पल या सैमसंग अकाउंट का इस्तेमाल बाल यौन शोषण सामग्री, ड्रग तस्करी या आतंकवाद जैसी गतिविधियों में हुआ है. इसके बाद उन्हें अपनी “बेगुनाही साबित करने” के लिए मैसेज में दिए गए टोल-फ्री नंबर पर कॉल करने को कहा जाता था.

लखनऊ के विभूति खंड स्थित समिट बिल्डिंग की 11वीं मंजिल के दफ्तर से पुलिस द्वारा जब्त किए गए सबूत. विशेष व्यवस्था से.
दूसरे चरण में दूसरी टीम काम करती थी. डायलर टीम टोल-फ्री नंबर पर आने वाली कॉल उठाती थी. वह शुरुआत में पीड़ित से बातचीत कर उसका भरोसा जीतती थी और झूठा दावा करती थी कि उसके नाम पर कई बैंक खातों का इस्तेमाल आपराधिक गतिविधियों में हुआ है.
इसके बाद तीसरी टीम, यानी बैंकर टीम, काम संभालती थी. क्राइम ब्रांच के अधिकारी ने कहा, “कॉल बैंकर टीम को ट्रांसफर कर दी जाती थी. यहां पीड़ित के बैंक खातों, उनमें मौजूद रकम, कार्ड और दूसरी वित्तीय जानकारी ली जाती थी. फिर उन्हें बताया जाता था कि जांच पूरी होने तक उनका सोशल सिक्योरिटी नंबर (SSN) और बैंक खाते फ्रीज कर दिए जाएंगे. साथ ही यह भी कहा जाता था कि अपने पैसे सुरक्षित रखने के लिए उन्हें रकम को गिफ्ट कार्ड, क्रिप्टोकरेंसी या नकद में बदलना होगा.”
आखिर में क्लोजर टीम की बारी आती थी. अंतिम चरण में कॉल इस टीम को ट्रांसफर कर दी जाती थी. इस टीम के सदस्य खुद को बड़े अधिकारी बताकर पीड़ित पर मानसिक दबाव बनाते थे.
अधिकारी ने कहा, “वे दबाव बनाते थे कि बैंक खाते फ्रीज हो जाएंगे. इसलिए पीड़ितों को अपना पैसा गिफ्ट कार्ड में बदल देना चाहिए.”
इसके बाद ठग अमेज़न, सेफ़ोरा, वॉलमार्ट जैसे गिफ्ट कार्ड के नंबर और PIN हासिल कर लेते थे. फिर QR कोड के जरिए रकम को क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट में ट्रांसफर कराया जाता था.
इसके बाद वे अमेरिका में तय पते पर पार्सल भेजने का इंतजाम करते थे या फिर सीधे नकदी या सोना उठवा लेते थे.
अधिकारी ने कहा, “यह गिरोह पीड़ितों से सीधे बैंक खातों में पैसा नहीं लेता था. इसके बजाय गिफ्ट कार्ड, डिजिटल वाउचर और क्रिप्टोकरेंसी के जरिए रकम हासिल करता था. इसका मकसद पैसों के असली स्रोत और आखिर में पैसा किसके पास पहुंचा, इसे छिपाना था.”
‘2.9 अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान’
6 अप्रैल को जारी फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (FBI) के इंटरनेट क्राइम कंप्लेंट सेंटर (IC3) की 2025 इंटरनेट क्राइम में दुनिया भर में साइबर अपराध के बड़े पैमाने का जिक्र किया गया है. इस वैश्विक संकट का एक बड़ा हिस्सा ऐसे अवैध कॉल सेंटर हैं, जिनमें से कई भारत से चलाए जाते हैं और विदेशों में लोगों को निशाना बनाते हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है, “IC3 को कॉल सेंटर से जुड़ी धोखाधड़ी की दो प्रमुख श्रेणियों की शिकायतें मिलीं. इनमें टेक्नोलॉजी/कस्टमर सपोर्ट और सरकारी अधिकारी बनकर की जाने वाली ठगी शामिल है. 2025 में ऐसी 80,000 से ज्यादा शिकायतें मिलीं और इससे 2.9 अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान हुआ.”
इस बढ़ते खतरे से निपटने के लिए अमेरिकी एजेंसियों, जिनमें डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस और FBI शामिल हैं, ने भारत की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और स्थानीय पुलिस एजेंसियों के साथ सहयोग काफी बढ़ा दिया है.
2025 इंटरनेट क्राइम रिपोर्ट में कहा गया है, “2025 में FBI ने CBI और दूसरी स्थानीय कानून लागू करने वाली एजेंसियों के साथ 13 संयुक्त अभियानों के जरिए लगभग 175 गिरफ्तारियां कराने में मदद की.”
रिपोर्ट में आगे कहा गया है, “2022 से अब तक FBI और CBI के बीच आपराधिक जांच में मदद के लिए 1,200 से ज्यादा बार सूचनाओं का आदान-प्रदान हुआ है. 27 संयुक्त अभियानों में 475 से ज्यादा गिरफ्तारियां हुई हैं. FBI ने सैकड़ों लोगों से पूछताछ की है और भारत में फर्जी कॉल सेंटरों को खत्म करने तथा इन धोखाधड़ी में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई में भारतीय कानून लागू करने वाली एजेंसियों की लगातार मदद कर रही है.”