जब संयुक्त राज्य अमेरिका अपनी आज़ादी के 250 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है, तब वह एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे न सिर्फ खुद को नए तरीके से समझने की जरूरत है, बल्कि दुनिया के बाकी देशों के साथ अपने रिश्तों पर भी दोबारा विचार करना होगा. आप्रवासन, राष्ट्रवाद और विदेश नीति को लेकर चल रही बहसों ने उस लंबे समय से चली आ रही सोच को चुनौती दी है, जिसके अनुसार अमेरिका खुद को लगातार आगे बढ़ने वाला राष्ट्र और दूसरे विश्व युद्ध के बाद बने उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था (लिबरल ऑर्डर) का सबसे बड़ा निर्माता मानता रहा है. फिर भी, अमेरिका के कमजोर पड़ने की भविष्यवाणियां बार-बार होने के बावजूद, आज तक कोई दूसरा देश ऐसा नहीं रहा जिसने आधुनिक भू-राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को अमेरिका जितना गहराई से प्रभावित किया हो. अमेरिका ने अपनी ताकत बढ़ाकर और उसका प्रभाव दुनिया भर में फैलाकर वैश्विक राजनीति की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाई है. डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति को देखते हुए अमेरिका के सहयोगी, प्रतिद्वंद्वी और साझेदार देश अपनी-अपनी रणनीतियों में बदलाव कर रहे हैं. ऐसे समय में यह समझना ज़रूरी है कि अमेरिका कैसे आधुनिक दौर की सबसे प्रभावशाली महाशक्ति बना और किस तरह उसने दुनिया की राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों की दिशा पर गहरा असर डाला.
कई दशकों से यह कहा जाता रहा है कि अमेरिका का दौर खत्म हो रहा है. लेकिन इन दावों के बावजूद आज भी अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक ताकत बना हुआ है, भले ही नई तकनीक वैश्विक प्रतिस्पर्धा का स्वरूप तेजी से बदल रही हो. हालांकि, पिछले 250 वर्षों से अमेरिका जिस ‘अमेरिकी असाधारणता’ (American Exceptionalism) की बात करता आया है, वह एक अहम सच्चाई भी याद दिलाती है—जितनी ज्यादा ताकत होती है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारियां और उतने ही कठिन रणनीतिक फैसले लेने पड़ते हैं. 21वीं सदी में उभरने वाली हर नई ताकत के लिए अमेरिका एक महत्वपूर्ण पैमाना, प्रतिस्पर्धी, साझेदार और कई बार प्रतिद्वंद्वी बना रहेगा. यही वजह है कि अमेरिका की आगे की दिशा आने वाले समय में भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के भविष्य को प्रभावित करती रहेगी.
अमेरिका की नई शुरुआत
अमेरिका के उभार की कहानी लगातार खुद को बदलने और नई परिस्थितियों के अनुसार ढलने की रही है. अलग-अलग समय में बड़ी संख्या में आए प्रवासियों ने न सिर्फ अमेरिका की प्रतिभा को लगातार बढ़ाया, बल्कि राष्ट्रीय पहचान और “अमेरिकी” होने के मतलब को लेकर राजनीति को भी बदल दिया. आज “अमेरिका फर्स्ट” और “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (MAGA)” जैसे नारे भी इसी बहस का हिस्सा हैं. यह भौगोलिक विस्तार की भी कहानी है. अमेरिका ने अटलांटिक तट पर बसे 13 उपनिवेशों से शुरुआत की और फिर पश्चिम तथा दक्षिण की ओर बढ़ते हुए आज के 50 राज्यों वाला देश बना. इस विस्तार ने अमेरिका को रणनीतिक बढ़त, विशाल प्राकृतिक संसाधन, अटलांटिक और प्रशांत—दोनों महासागरों तक पहुंच और पूरे उत्तरी अमेरिका में मजबूत स्थिति दी. साथ ही, वह एक बड़ी प्रशांत शक्ति भी बन गया. गृहयुद्ध के बाद तेज़ औद्योगिकीकरण ने इन भौगोलिक फायदों को आर्थिक ताकत में बदल दिया. रेलवे, इस्पात उद्योग, विनिर्माण, वित्तीय क्षेत्र और तकनीकी नवाचार ने ऐसी अर्थव्यवस्था तैयार की, जिसने अमेरिका को अपनी सीमाओं से बहुत दूर तक प्रभाव डालने की क्षमता दी.
आर्थिक ताकत जल्द ही भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षा में बदल गई. 19वीं सदी के आखिर तक स्पेन-अमेरिका युद्ध और अमेरिकी नौसैनिक शक्ति के बढ़ते प्रभाव ने यह दिखा दिया कि अमेरिका को अब यह विश्वास हो गया था कि उसकी सुरक्षा और समृद्धि सिर्फ उसकी सीमाओं के भीतर नहीं, बल्कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में होने वाली घटनाओं पर भी निर्भर करती है. 1823 का मोनरो सिद्धांत (Monroe Doctrine) शुरुआत में एक इच्छा या लक्ष्य जैसा था, जिसे पूरी तरह लागू करना आसान नहीं था. लेकिन 1904 में रूजवेल्ट कोरोलरी (Roosevelt Corollary) ने इसे पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिका के मजबूत नेतृत्व की नीति में बदल दिया. इससे यह साफ हो गया कि अमेरिका अब सिर्फ अपनी रक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि अपने आसपास के रणनीतिक क्षेत्र की दिशा भी तय करना चाहता है.
द्वितीय विश्व युद्ध ने अमेरिका की महत्वाकांक्षा को वैश्विक नेतृत्व में बदल दिया. वॉशिंगटन सिर्फ युद्ध जीतने वाला देश नहीं बना, बल्कि उसने नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई. अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों का एक मजबूत नेटवर्क बनाया और ऐसी आर्थिक व्यवस्था खड़ी की, जिसने न सिर्फ उसकी वैश्विक ताकत को मजबूत किया, बल्कि दूसरे देशों की आर्थिक प्रगति में भी मदद की. संयुक्त राष्ट्र (UN), ब्रेटन वुड्स संस्थान, नाटो (NATO), मार्शल प्लान और अमेरिकी डॉलर पर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था—ये सभी उस युद्ध के बाद बने अमेरिकी मॉडल के प्रमुख स्तंभ थे. इस व्यवस्था ने वैश्विक स्थिरता बनाए रखने के लिए सिर्फ सैन्य शक्ति पर नहीं, बल्कि मजबूत अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर भी भरोसा किया. बाद में इसी व्यवस्था को ‘उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ कहा गया.
महाशक्तियों की ‘कैच-22’ स्थिति
हालांकि, नेतृत्व के साथ एक ऐसी चीज भी हमेशा जुड़ी रहती है जिससे बचा नहीं जा सकता—जिम्मेदारी का बोझ. जैसे-जैसे अमेरिका की ताकत बढ़ी, वैसे-वैसे उससे उम्मीदें भी बढ़ती गईं. उससे उम्मीद की जाने लगी कि वह व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा करेगा, अपने सहयोगी देशों की रक्षा करेगा, बाजारों को स्थिर रखेगा, संकट के समय आगे आएगा, विरोधियों को रोकेगा और नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बनाए रखेगा. महाशक्ति बनने का मतलब धीरे-धीरे यह हो गया कि दुनिया में किसी भी संकट के समय सबसे पहले अमेरिका ही आगे आए, जबकि उसे पहले से कहीं ज्यादा जटिल साझेदारियों और जिम्मेदारियों को भी संभालना पड़े.
शीत युद्ध ने अमेरिका के नेतृत्व की ताकत और उसकी सीमाएं—दोनों को सामने ला दिया. परमाणु हथियारों के कारण अमेरिका और सोवियत संघ के बीच सीधा युद्ध नहीं हुआ, लेकिन मुकाबला विचारधारा, तकनीक, अंतरिक्ष और दूसरे देशों में लड़े गए प्रॉक्सी युद्धों के जरिए जारी रहा. कोरिया और वियतनाम के युद्धों ने दिखा दिया कि सिर्फ सैन्य ताकत काफी नहीं होती. युद्ध जीतना आसान हो सकता है, लेकिन लंबे समय तक टिकने वाली राजनीतिक स्थिरता कायम करना कहीं ज्यादा मुश्किल होता है. सोवियत संघ के टूटने के बाद कुछ समय के लिए दुनिया एकध्रुवीय (Unipolar) हो गई. उस दौर में उदार लोकतंत्र मजबूत हुआ, वैश्वीकरण तेज़ी से बढ़ा और ऐसा लगा कि अमेरिका की वैश्विक ताकत का कोई मुकाबला नहीं है. लेकिन इतिहास बार-बार यह साबित करता रहा है कि कोई भी स्थिति हमेशा के लिए नहीं रहती.
11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद अमेरिका की रणनीति का केंद्र आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई बन गया. इसके बाद अफगानिस्तान और इराक में लंबे समय तक सैन्य अभियान चले. इन युद्धों ने एक तरफ यह दिखाया कि अमेरिका दुनिया में कहीं भी अपनी सैन्य ताकत पहुंचाने में सबसे सक्षम है, लेकिन दूसरी तरफ यह भी साफ कर दिया कि किसी देश का पुनर्निर्माण (Nation Building) करना कितना मुश्किल और महंगा काम है. सिर्फ सैन्य ताकत के दम पर किसी सरकार को गिराया जा सकता है, लेकिन उससे एक स्थिर राजनीतिक व्यवस्था बनाना जरूरी नहीं है. पश्चिम एशिया में जारी संकट भी यह दिखाता है कि भारी सैन्य ताकत होने का मतलब यह नहीं कि किसी देश की सत्ता को आसानी से बदला जा सके. 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी ने अमेरिका की एक और कमजोरी उजागर की. जिस वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को बनाने में अमेरिका की बड़ी भूमिका थी, उसी व्यवस्था के जरिए आर्थिक अस्थिरता भी बहुत तेज़ी से पूरी दुनिया में फैल गई. इससे यह सवाल उठे कि वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी मजबूत है और उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कितने समय तक टिक पाएगी. इन सभी संकटों ने अमेरिका की ताकत की बुनियाद को चुनौती दी. इसी दौरान एक और बड़ा बदलाव भी धीरे-धीरे सामने आया—दुनिया में ताकत का बंटवारा पहले की तुलना में ज्यादा देशों के बीच होने लगा और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पहले से कहीं ज्यादा प्रतिस्पर्धी और चुनौतीपूर्ण बनती चली गई.
महाशक्तियां अपने बराबर की दूसरी ताकत को पसंद नहीं करतीं
चीन के उभार ने दुनिया में ताकत के संतुलन को पूरी तरह बदल दिया है, लेकिन शीत युद्ध के दौर से अलग, आज अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा सिर्फ टकराव की नहीं, बल्कि आपसी निर्भरता की भी है. दोनों देश महत्वपूर्ण तकनीकों, सप्लाई चेन और वैश्विक बुनियादी ढांचे में नेतृत्व के लिए मुकाबला कर रहे हैं, लेकिन साथ ही व्यापार और वित्त के जरिए एक-दूसरे से गहराई से जुड़े भी हैं. 250 साल पूरे कर चुका अमेरिका आज शायद अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती का सामना कर रहा है. चीन की बढ़ती राष्ट्रीय ताकत को पूरी तरह रोकना अमेरिका के लिए आसान नहीं है, क्योंकि ऐसा करने की कीमत उसे खुद, उसके सहयोगी देशों और पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ सकती है. 21वीं सदी की भू-राजनीति की सबसे बड़ी पहचान अब सिर्फ किसी देश को रोकना (Containment) नहीं है, बल्कि रोकथाम (Deterrence), मजबूती (Resilience), सीमित दूरी (Selective Decoupling) और जरूरत पड़ने पर संवाद व सहयोग (Continued Engagement)—इन सबका मिला-जुला तरीका है.
आज ताकत की परिभाषा भी बदल गई है. विमानवाहक पोत और परमाणु हथियार अब भी जरूरी हैं, लेकिन 21वीं सदी में किसी देश का प्रभाव अब तकनीकी नेतृत्व, औद्योगिक क्षमता, उन्नत विनिर्माण (Advanced Manufacturing), डिजिटल बुनियादी ढांचे और मजबूत सप्लाई चेन पर ज्यादा निर्भर करता है. इसलिए आर्थिक प्रतिस्पर्धा अब राष्ट्रीय सुरक्षा से अलग नहीं रही. अमेरिका के पास आज भी यूरोप और हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में दुनिया का सबसे मजबूत सहयोगी नेटवर्क है, लेकिन इन रिश्तों की प्रकृति बदल रही है. सहयोगी देश अब संरक्षण (Patronage) नहीं, बल्कि बराबरी की साझेदारी चाहते हैं. वहीं, वैश्विक और क्षेत्रीय व्यवस्था के प्रमुख देश अब अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता (Strategic Autonomy) को और मजबूत करना चाहते हैं. विकासशील देशों की भी अपेक्षाएं बदल गई हैं. अब वे सिर्फ सुरक्षा की गारंटी नहीं, बल्कि निवेश, तकनीक, बुनियादी ढांचे और जलवायु वित्त (Climate Finance) की भी उम्मीद करते हैं. इसलिए अब किसी देश का नेतृत्व सिर्फ उसकी सैन्य ताकत से नहीं मापा जाता, बल्कि इस बात से भी आंका जाता है कि वह दुनिया को कितनी सार्वजनिक सुविधाएं और वैश्विक सहयोग उपलब्ध करा सकता है.
यह बदलाव सबसे साफ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दिखाई देता है, जहां क्वाड (Quad) और AUKUS जैसे छोटे बहुपक्षीय समूह (Minilateral Frameworks) पारंपरिक सैन्य गठबंधनों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. इससे अमेरिका अब अकेले सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाले देश के बजाय, कई देशों को साथ लेकर चलने वाले समन्वयक (Orchestrator of Coalitions) की भूमिका में नजर आ रहा है. इतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि अमेरिका के भीतर क्या हो रहा है. दुनिया में उसका प्रभाव सिर्फ सैन्य ताकत की वजह से नहीं रहा. उसकी आर्थिक मजबूती, नवाचार, प्रवासियों का योगदान, उच्च शिक्षा, मजबूत संस्थाएं और लोकतांत्रिक व्यवस्था भी उसकी ताकत के बड़े आधार रहे हैं. इन सभी चीजों ने न सिर्फ अमेरिका को भीतर से मजबूत बनाया, बल्कि लंबे समय तक दुनिया की राजनीति को भी प्रभावित किया.
संभावना है कि अमेरिका आगे भी दुनिया की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में बना रहेगा. लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह खुद को ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अनुसार ढाले, जहां ताकत अब ज्यादा देशों में बंटी हुई है, तकनीक संस्थाओं से कहीं तेज़ी से आगे बढ़ रही है, सहयोगी देश आदेश नहीं बल्कि सलाह-मशविरा चाहते हैं और वैश्विक समस्याओं का समाधान कोई एक देश अकेले नहीं कर सकता. अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उसकी सैन्य या आर्थिक शक्ति नहीं रही है, बल्कि बदलते समय के अनुसार खुद को दोबारा खड़ा करने और नए रूप में ढालने की उसकी असाधारण क्षमता रही है. 250 साल पूरे होने पर अमेरिका एक ऐसी चुनौती का सामना कर रहा है, जिसका सामना हर महाशक्ति को करना पड़ता है—जितनी बड़ी ताकत, उतनी बड़ी जिम्मेदारी और उतनी ही कठिन रणनीतिक चुनौतियां.
मोनीष तौरंगबाम, चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (CRF), नई दिल्ली में फेलो हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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