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Sunday, 16 August, 2026
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एयर इंडिया का सफर: JRD की पहली उड़ान से टाटा की मौजूदा चुनौती तक

यह कहानी है भारत की सबसे मशहूर एयरलाइन की, जो प्राइवेट कंपनी से सरकारी कंट्रोल में आई, दशकों तक सरकारी कामकाज की पेचीदगियों से गुज़री और अब घर वापसी के बाद भी स्थिरता की तलाश में है.

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एक शांत सुबह, कराची के व्यस्त बंदरगाह शहर में ड्रिग रोड एयरपोर्ट पर लोगों की एक भीड़ जमा थी.

एयरोड्रोम पर लाल और सफेद रंग का खूबसूरती से डिजाइन किया गया डी हैविलैंड पस मोथ खड़ा था. यह एक ऐसा मोनोप्लेन था, जो एक मध्यम आकार की कार से बड़ा नहीं था. उसके अंदर करीब 55 पाउंड डाक और उसका पायलट था.

ठीक सुबह 6:30 बजे इंजन गरजते हुए शुरू हुआ और वह शानदार विमान हवा में उड़ गया. तारीख थी 15 अक्टूबर 1932.

और उसे उड़ाने वाला कोई और नहीं, बल्कि जे.आर.डी. टाटा थे, जिन्हें आज भारतीय नागरिक विमानन का जनक कहा जाता है.

कई साल बाद उस सुबह को याद करते हुए जे.आर.डी. टाटा ने कहा, “जब हम अपने मंजिल की ओर ‘चमकदार’ 100 मील प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ रहे थे, तब मैंने अपनी इस कोशिश की सफलता और उन लोगों की सुरक्षा के लिए मन ही मन प्रार्थना की, जो इसे आगे बढ़ाने के लिए काम करने वाले थे.”

आखिर उस समय कोई बड़ी एयरलाइन थी ही नहीं.

सिर्फ दो विमान, तीन पायलट, जिनमें से एक खुद जे.आर.डी. टाटा थे, तीन मैकेनिक और एक ऐसा सपना था, जिसने अभी-अभी अपनी अनिश्चित पहली उड़ान शुरू की थी.

इसी तरह एयर इंडिया की कहानी शुरू हुई.

करीब एक सदी बाद, एयर इंडिया कई बदलावों से गुजर चुकी है. निजी स्वामित्व, राष्ट्रीयकरण, सरकारी नियंत्रण, आर्थिक मदद और फिर से शुरुआत, और आखिरकार लंबे समय के बाद टाटा के पास उसकी वापसी.

फिर भी किसी तरह महाराजा आज भी मौजूद है. पुराने आकर्षण और पुरानी चमक का थोड़ा हिस्सा अभी भी बचा हुआ है. दुर्भाग्य से, यह इस बात का प्रतीक भी बन गया है कि पुरानी दुनिया समय के साथ कदम मिलाने से इनकार कर रही है.

और एयर इंडिया कभी खबरों से बाहर नहीं रहती.

पिछले साल हुए भयानक अहमदाबाद हादसे से लेकर उसके एक पायलट के मारिजुआना टेस्ट में पॉजिटिव पाए जाने तक, और शीर्ष स्तर पर लगातार चल रहे कॉरपोरेट “गेम ऑफ थ्रोन्स” तक. नए विदेशी CEO से लेकर पूर्व चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के पद छोड़ने की घोषणा तक, एयरलाइन का सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है.

जब सपना हकीकत बना

भारत में नागरिक विमानन की शुरुआत एक नाम से जुड़ी है. जे.आर.डी. टाटा. लेकिन इस क्रांति की पहली चिंगारी नेविल विंसेंट ने जलाई थी, जिन्हें बी.एम. लाला ने अपनी किताब बियॉन्ड द लास्ट ब्लू माउंटेन में “भारतीय जे.आर.डी. टाटा” बताया है.

विंसेंट रॉयल एयर फोर्स के पूर्व अधिकारी थे और 1920 के दशक के आखिर में भारत आए थे. लगभग उसी समय, ब्रिटेन की इम्पीरियल एयरवेज अप्रैल 1929 से लंदन से कराची तक हवाई सेवा शुरू करने की योजना बना रही थी.

तभी उन्होंने कराची और बॉम्बे के बीच हवाई संपर्क बढ़ाने की योजना बनाई.

हैरानी की बात है कि जे.आर.डी. टाटा उनकी पहली पसंद नहीं थे. विंसेंट ने शुरुआत में कपड़ा कारोबारी सर होमी मेहता के बेटे रुसा मेहता से संपर्क किया. जब उस मुलाकात से कुछ फायदा नहीं हुआ, तो उन्होंने जे.आर.डी. का रुख किया. 1929 में दोनों की मुलाकात हुई. यह जैसे स्वर्ग में बनी जोड़ी थी. विंसेंट के पास विचार था, जबकि जे.आर.डी. के पास जुनून, नाम और इसे हकीकत बनाने की इच्छा थी.

लेकिन सिर्फ उत्साह से एयरलाइन को उड़ान नहीं दी जा सकती थी. ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय उद्योगों पर कई तरह की पाबंदियां थीं और बिल्कुल शुरुआत से एयरलाइन शुरू करना लगभग असंभव सपना लगता था.

हालांकि, पहला काम टाटा ग्रुप के चेयरमैन सर दोराबजी टाटा को मनाना था. यह वही समय था जब महामंदी चल रही थी और टाटा परिवार भी आर्थिक दबाव महसूस कर रहा था.

कई तरह के फैसले लेने थे. रूट तय करने थे. सामान्य विमान लेना है या सीप्लेन? डाक ले जानी है या यात्री? या दोनों?

और फिर सरकार थी. तीन लंबे वर्षों तक ब्रिटिश शासन वाली भारत सरकार टालमटोल करती रही. ऐसा लगता था कि वह किसी भारतीय कंपनी को एयरलाइन कारोबार में आने की अनुमति देने को लेकर हिचक रही थी, जैसा कि हर्ष भट्ट ने #TataStories: 40 Timeless Tales to Inspire You (आपको प्रेरित करने वाली 40 कालजयी कहानियां) में लिखा है.

आखिरकार, 24 अप्रैल 1932 को सफलता मिली. समझौता हो गया.

लेकिन इस जीत के साथ कुछ शर्तें भी थीं. यह पूरी तरह “मेड इन इंडिया” भावना वाला काम नहीं हो सकता था. सरकारी एयरोड्रोम, जो भारतीय जमीन पर बने थे, बिना किसी रोक के इस्तेमाल किए जा सकते थे. विमान और कर्मचारियों का ब्रिटिश होना जरूरी था.

जे.आर.डी. आगे बढ़े. उन्होंने इंग्लैंड की यात्रा की और दो पस मॉथ खरीदे. रूट तय हुआ. कराची-अहमदाबाद-बॉम्बे. बाद में इसे बेल्लारी के रास्ते मद्रास तक बढ़ाया गया.

15 अक्टूबर 1932 की सुबह, जब छोटा पुस मॉथ आसमान में उठा, उसी के साथ एक नई कहानी की शुरुआत भी हुई. यह आधुनिक भारत के शुरुआती संकेतों में से एक था.

टाटा एयर मेल का जन्म हुआ. यह भारत की पहली व्यावसायिक उड़ान थी और उस एक इंजन की गड़गड़ाहट के साथ देश की प्यारी महाराजा एयरलाइंस का जन्म हुआ.

अहमदाबाद में विमान ईंधन भरने के लिए रुका. चार गैलन पेट्रोल लेकर एक अकेली बैलगाड़ी मुश्किल से रनवे तक पहुंची. गर्मी और तेज हवा के बीच घंटों उड़ान भरने के बाद एक पक्षी विमान के केबिन में आ गया, जिसे जे.आर.डी. को मारना पड़ा. आखिरकार दोपहर 1:50 बजे पुस मॉथ बॉम्बे में उतरा.

1933-34 की अपनी रिपोर्ट में डायरेक्टरेट ऑफ सिविल एविएशन ने टाटा सर्विसेज की तारीफ की और कहा कि उसने मानसून के मुश्किल महीनों के दौरान भी अपना पहला साल “100 प्रतिशत समय की पाबंदी” के साथ पूरा किया.

धीरे-धीरे नए रूट खुले, विमान बड़े होते गए और एयरलाइन ने अपने पहले यात्री का भी स्वागत किया.

मुनाफा भी आने लगा, हालांकि वह बहुत ज्यादा नहीं था. 1946 तक टाटा एयर लाइंस भारत में हर तीन हवाई यात्रियों में से करीब एक यात्री को ले जा रही थी.

उसी साल, अपनी बड़ी नाक, हैंडलबार मूंछों और खास धारीदार पगड़ी के साथ महाराजा ने शाही अंदाज में पहली बार कदम रखा.

एयर इंडिया के कमर्शियल डायरेक्टर बॉबी कूका की सोच से बना महाराजा “मजेदार, बेपरवाह और शरारतों से भरा हुआ” था, हर्ष भट्ट लिखते हैं, “लेकिन हमेशा अपने गर्वीले देश भारत से पूरी तरह जुड़ा हुआ था.”

भट्ट ने लिखा कि कूका लगातार महाराजा को नए रूप में पेश करते रहते थे. “कभी पेरिस में प्रेमी, टोक्यो में सूमो पहलवान, रोम में रोमियो और ऋषिकेश में ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन के गुरु के रूप में.”

गहरी जेब वाली एयरलाइंस से अलग पहचान बनाने के लिए एयर इंडिया ने अलग तरह के विज्ञापन का सहारा लिया. ऐसे होर्डिंग लगाए गए जो इतने बेबाक और व्यंग्यपूर्ण थे कि अक्सर विवाद खड़ा हो जाता था. भट्ट लिखते हैं कि बाद में जे.आर.डी. ने माना कि इन होर्डिंग्स ने “अनगिनत लोगों के अहंकार को तोड़ा और चोट पहुंचाई” और कई सांसदों को नाराज कर दिया.

पेरिस के लिए बिना रुके उड़ान शुरू करने वाले एक और होर्डिंग पर लिखा था, “रोमांसिंग पेरिस, नॉन-स्टॉप”, जिसमें मोनालिसा की तस्वीर थी और उसकी मूंछें महाराजा की मशहूर मूंछों जैसी थीं.

ये होर्डिंग इतने विवादित साबित हुए कि उनका विवाद आखिरकार संसद तक पहुंच गया.

महाराजा को विदेशी आसमानों तक ले जाना

इस सब के बीच जे.आर.डी. ने सरकार के सामने एक अंतरराष्ट्रीय एयरलाइन का प्रस्ताव रखा. इसका नाम एयर इंडिया इंटरनेशनल था. कुछ ही हफ्तों में सरकार ने इसे मंजूरी दे दी.

यह प्रस्ताव जल्द ही संविधान सभा के सामने आया. 12 दिसंबर 1947 को भारत के पहले संचार मंत्री रफी अहमद किदवई ने बताया कि सरकार कंपनी में 49 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदेगी.

इस पर संविधान सभा के सदस्य और स्वतंत्रता सेनानी अनंतशयनम अयंगार ने पूछा, सिर्फ 49 प्रतिशत क्यों?

यह सरकारी दखल की पहली ऐसी शुरुआत थी, जो आने वाले दशकों में बहुत बड़ी होने वाली थी. लेकिन फिलहाल एयर इंडिया विदेशी आसमानों पर छाने के लिए तैयार थी.

एयर इंडिया इंटरनेशनल को 8 मार्च 1948 को औपचारिक रूप से शुरू किया गया.

ठीक तीन महीने बाद, 8 जून को एक चमकदार लॉकहीड कॉन्स्टेलेशन विमान, मालाबार प्रिंसेस, बॉम्बे के रनवे पर खड़ा था. वह लंदन के लिए अपनी पहली उड़ान भरने के लिए तैयार था.

जे.आर.डी. ने बाद में याद किया कि उन्हें सबसे ज्यादा जिस दृश्य ने प्रभावित किया, वह था “मालाबार प्रिंसेस के दोनों तरफ भारतीय झंडे को देखना, जब वह काहिरा, जिनेवा और लंदन के एयरपोर्ट पर गर्व से खड़ी थी.”

हर उड़ान में वह बहुत ध्यान से यात्रियों के बीच चलते थे. चाय का रंग कैसा था, खाने का तापमान कितना था, कौन सी बीयर दी जा रही थी और यहां तक कि एयर होस्टेस के बालों का स्टाइल कैसा था, इन सबके बारे में नोट लिखते थे.

राष्ट्रीयकरण की ओर रास्ता

लेकिन धीमी आवाज़ में असहमति धीरे-धीरे शुरू हो रही थी. इसके शुरुआती संकेत 1949 में दिखाई दिए.

जे.आर.डी. और संचार मंत्री रफी अहमद किदवई प्रस्तावित नाइट मेल सर्विस को लेकर अलग-अलग राय रखते थे. 24 सितंबर 1949 को इंडियन एक्सप्रेस की हेडलाइन थी, “टाटा नाइट एयर सर्विस फिर शुरू करने के खिलाफ”, और जे.आर.डी. ने इस प्रस्ताव को “गलत सलाह वाला” बताया था.

किदवई ने अपनी बात साफ तौर पर रखी. 29 सितंबर 1949 को जे.आर.डी. को लिखे एक पत्र में उन्होंने कहा, “मैं नाइट सर्विस के लिए इसलिए भी चिंतित हूं क्योंकि इससे शहरों के बीच डाक के तेजी से आदान-प्रदान की सुविधा मिलेगी और हवाई परिवहन में ज्यादा यातायात भी आएगा.”

लेकिन जे.आर.डी. अपनी बात पर कायम रहे. विमानन के महाराजा और सरकार के बीच इस पहली टक्कर में, जैसा कि बी.एम. लाला ने लिखा, मंत्री की जीत हुई. शायद यह आने वाले समय की एक शुरुआती चेतावनी थी.

कुछ ही साल बाद ऐसी स्थिति फिर सामने आई. जे.आर.डी. एक बार फिर मंत्रालय से टकराव की स्थिति में थे.

भारत का विमानन क्षेत्र संघर्ष कर रहा था. भारी सरकारी सब्सिडी और युद्ध के बाद बचे डकोटा विमानों के सहारे इसे चलाया जा रहा था. जैसे-जैसे केंद्रीयकरण बढ़ा, मंत्रिमंडल ने एक बड़ा फैसला लेते हुए देश की संघर्ष कर रही निजी एयरलाइनों का राष्ट्रीयकरण करने का फैसला किया.

20 अप्रैल 1953 को संसद में एयर कॉरपोरेशंस बिल पेश किया गया. प्रस्ताव क्या था?

निजी एयरलाइनों का अधिग्रहण करना और उनकी जगह दो सरकारी संस्थाएं बनाना. एयर इंडिया इंटरनेशनल और इंडियन एयरलाइंस कॉरपोरेशन. इसके बाद जो हुआ वह सिर्फ एयरलाइनों पर बहस नहीं थी. यह इस बात की लड़ाई थी कि भारत के आसमान पर किसका नियंत्रण होना चाहिए. सरकार का या निजी कारोबार का? और आखिर इसका खर्च कौन उठाएगा. टैक्स देने वाला, कर्मचारी, यात्री या एयरलाइन मालिक?

उस समय के नागरिक विमानन मंत्री जगजीवन राम ने बिल पेश करते हुए कहा, “हवाई परिवहन एक सार्वजनिक सेवा है और इसे राष्ट्रीय हित में विकसित किया जाना चाहिए, जिस पर मुनाफा कमाने की सबसे बड़ी जरूरत का दबाव न हो.”

फिर भी एयरलाइनों के राष्ट्रीयकरण के दौरान सरकार एयर इंडिया नाम से जुड़े खास आकर्षण को नजरअंदाज नहीं कर रही थी. जगजीवन राम ने “एयर इंडिया” नाम को बनाए रखने का बचाव किया, क्योंकि विदेशों में उसने “बहुत अच्छी प्रतिष्ठा” बनाई थी. उनके समर्थन में कांग्रेस सांसद डॉ. एस.एन. सिन्हा ने एयरलाइन की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा की तारीफ की. उन्होंने कहा कि इसकी उड़ानों ने विदेशों में भारत की छवि के लिए “मध्य यूरोप में हमारे दूतावासों के काम” से भी ज्यादा किया है.

लेकिन हर कोई इससे सहमत नहीं था. केरल कांग्रेस के सांसद के. केलप्पन ने शेक्सपियर के अंदाज में तीखा सवाल किया, “मैं पूछता हूं, नाम में आखिर क्या रखा है?”

संसद के अंदर माहौल जल्द ही कड़वा हो गया.

विपक्ष की तरफ से सबसे आगे आकर सांसद रेणु चक्रवर्ती ने सरकार पर सबसे तीखा हमला किया. उन्होंने सरकार पर दिखावटी राष्ट्रीयकरण करने का आरोप लगाया, जिससे गलत तरीके से चल रही निजी कंपनियों के मालिकों को फायदा मिल रहा था और इसका खर्च टैक्स देने वालों को उठाना पड़ रहा था.

उन्होंने कहा, “जब हमने एयर कॉरपोरेशंस बिल को पढ़ा, तो हमें लगा कि यह बहुत बड़ा धोखा है. एक छलावा…” उन्होंने कहा, “भगवान हमें देश को लूटने वालों से बचाए, क्योंकि उनका रिकॉर्ड बेहद खराब रहा है.”

उनकी आखिरी बात और भी सीधी थी: “ऐसा नहीं कहा जाना चाहिए कि सरकार टाटा और बिड़ला की सरकार है और उनके मुनाफे बचाने आई है.”

हालांकि केलप्पन ने सरकारी नियंत्रण का स्वागत किया. उनका कहना था कि हवाई मार्ग “रक्षा की दूसरी लाइन” हैं. लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि “एकता, तालमेल, बचत और कार्यकुशलता” के लिए एक ही कॉरपोरेशन ज्यादा बेहतर होगा.

मुंबई में जे.आर.डी. इस पूरी कार्यवाही को बहुत दुख के साथ देख रहे थे. उनका सबसे बड़ा डर यह था कि एयर इंडिया इंटरनेशनल, जिसमें उन्होंने 20 साल का काम लगाया था, को कम कुशल घरेलू एयरलाइनों के साथ मिला देने से उसकी वह प्रतिष्ठा खराब हो जाएगी, जिसे बनाने में उन्होंने दो दशक लगाए थे.

जब दिल्ली में लंच के दौरान उनकी मुलाकात जवाहरलाल नेहरू से हुई, तो उनका दुख साफ दिखाई दे रहा था. कुछ ही दिनों बाद नेहरू ने उन्हें पत्र लिखा. उन्होंने शुरुआत की, “मेरे प्रिय जहांगीर, तुम्हारे मन की परेशानी देखकर मुझे बहुत दुख हुआ…” नेहरू खास तौर पर जे.आर.डी. की इस बात से दुखी थे कि निजी नागरिक विमानन को दबाने के लिए कोई साजिश की जा रही थी.

अंत में उन्होंने व्यक्तिगत अंदाज में लिखा, “हमें इसमें और दूसरी चीजों में आपकी मदद चाहिए.”

बाद में नेहरू ने जे.आर.डी. से चेयरमैन के रूप में बने रहने को कहा. जे.आर.डी. मान गए और उन्होंने बिना वेतन के यह जिम्मेदारी निभाई.

राष्ट्रपति की मंजूरी के साथ एयर कॉरपोरेशन एक्ट लागू हो गया. अब एयर इंडिया सरकार के हाथों में थी. और इसी के साथ जे.आर.डी. ने अपनी बनाई हुई कंपनी का नियंत्रण खो दिया.

टेकओवर से एक दिन पहले, 31 जुलाई 1953 को जे.आर.डी. ने एयर इंडिया और एयर इंडिया इंटरनेशनल के कर्मचारियों को एक संदेश भेजा.

“और अब अलविदा कहने का समय आ गया है.”

उनके विदाई संदेश में कोई कड़वाहट नहीं थी. उन्होंने लिखा कि वे इस बात से संतोष कर सकते हैं कि “हमने जो किया, वह करने लायक था, हमने अपने मानक ऊंचे रखे और उन्हें नीचे नहीं आने दिया…”

इस आम धारणा के उलट कि राष्ट्रीयकरण सिर्फ एक कट्टर मार्क्सवादी तरीके से सत्ता पर कब्जा करने की कोशिश थी, पत्रकार वीर सांघवी ने दिप्रिंट से कहा कि उस समय एयरलाइंस का सरकारी स्वामित्व कोई असामान्य बात नहीं थी. अमेरिका के बाहर कई बड़ी अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस, जिनमें ब्रिटिश एयरवेज और एयर फ्रांस भी शामिल थीं, सरकार के स्वामित्व में थीं. इसका तर्क सीधा था. बड़े स्तर पर काम करने से फायदा होता है. सरकार के समर्थन वाली एक या दो बड़ी एयरलाइंस ज्यादा समझदारी वाली व्यवस्था थी.

सांघवी कहते हैं, “जिसे हम एयर इंडिया का ‘गौरवशाली दौर’ मानते हैं, वह उसके राष्ट्रीयकरण के बाद आया.” उनका कहना है कि सेवा और मार्केटिंग के मामले में एयर इंडिया की मशहूर प्रतिष्ठा काफी हद तक सरकार के स्वामित्व वाले वर्षों में बनी.

तो फिर ऐसे समय में जब सरकारी कंपनियों को बेहतरीन काम के लिए नहीं जाना जाता था, एक सरकारी एयरलाइन ने इतनी अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा कैसे हासिल की?

सांघवी इसका जवाब देते हैं, “क्योंकि सरकार ने उसे अपने हाल पर छोड़ दिया.”

एक दौर का अंत

फिर 1978 में एक हादसा हुआ. “213 लोगों को ले जा रहा भारतीय विमान समुद्र में गिरा,” 2 जनवरी 1978 को न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक खबर की हेडलाइन थी. यह एयर इंडिया का बोइंग 747 “एम्परर अशोक” था, जो उसका पहला जंबो जेट था. बॉम्बे से उड़ान भरने के कुछ ही समय बाद यह अरब सागर में जा गिरा.

इस हादसे के एक महीने के अंदर चेयरमैन के रूप में जे.आर.डी. का 25 साल का सफर अचानक और बिना किसी सम्मानजनक विदाई के खत्म हो गया.

क्या यह राजनीति थी, प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के साथ उनके खराब रिश्ते थे, या हादसे के बाद एक साल पुरानी सरकार किसी को जिम्मेदार ठहराने के लिए तलाश रही थी. उनके हटाए जाने की वजह समझना मुश्किल है. लेकिन समय बहुत कुछ कहता था.

देसाई का आधिकारिक पत्र उनके पास पहुंचने से पहले ही जे.आर.डी. को पी.सी. लाल का फोन आ गया. लाल ही उनकी जगह लेने वाले थे. उन्होंने जे.आर.डी. को फैसले की जानकारी दी. उसी शाम ऑल इंडिया रेडियो ने इसकी घोषणा कर दी.

अगले दिन द इंडियन एक्सप्रेस ने हेडलाइन लगाई, “टाटा को चुपचाप एयर-इंडिया से बाहर किया गया.” समुद्र पार लंदन के डेली टेलीग्राफ ने इसे और भी सीधे शब्दों में लिखा. उसने उन्हें “अनपेड एयर-इंडिया चीफ” कहा, जिन्हें देसाई ने हटा दिया था. अखबार ने लिखा कि दुनिया की सबसे बड़ी एयरलाइनों में से एक बनाने वाले व्यक्ति को बेरहमी से निकाल दिया गया.

14 फरवरी 1978 को इंदिरा गांधी ने जे.आर.डी. को एक निजी पत्र लिखा. उन्होंने लिखा, “प्रिय जेह, छोटी से छोटी चीज पर भी आपने जिस बारीकी से ध्यान दिया, उसी ने एयर इंडिया को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक और वास्तव में सबसे ऊंचे स्थान तक पहुंचाया था.”

उन्होंने आगे लिखा, “हमें आप पर और एयरलाइन पर गर्व था.”

सरकारी एकाधिकार से खुले आसमान तक

डर बढ़ने लगा कि जे.आर.डी. के जाने के बाद एयरलाइन लालफीताशाही, सरकारी दखल और लगातार चलने वाली राजनीति में फंस जाएगी. लेकिन 1980 के दशक के ज्यादातर वर्षों में यह काफी हद तक मुनाफे में रही.

कुछ साल मुश्किल रहे. 1980-81 और 1987-88 में नुकसान हुआ, लेकिन एयर इंडिया जल्दी संभल गई, ऐसा अरिजीत मजूमदार ने अपने 2009 के पेपर Deregulation of the Airline Industry in India में लिखा. 1991 और 1992 में एयर इंडिया का मुनाफा तीन अंकों तक पहुंच गया था. लेकिन मजूमदार का कहना है कि ये आंकड़े पूरी कहानी नहीं बताते.

एयर इंडिया को दुनिया की बड़ी एयरलाइनों के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला करना पड़ता था. इसे उड़ता रखने के लिए लगातार सरकारी सब्सिडी की जरूरत थी. सरकार की खराब भुगतान संतुलन की स्थिति को देखते हुए, मजूमदार का कहना है कि वह “निवेश करने के लिए इच्छुक नहीं थी.”

कम विमान का मतलब था कम सेवाएं.

फिर आया 1991. और इसके साथ भारत खुद को आर्थिक संकट के कगार पर खड़ा पा रहा था. देश के पास सिर्फ करीब एक हफ्ते का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था. इसके बाद IMF से मदद मिली और इसके साथ भारत ने लाइसेंस-कोटा राज के लंबे और परेशान करने वाले दौर को अलविदा कहा.

भारतीय अर्थव्यवस्था खुल गई. आसमान भी खुल गया.

और फिर 1994 में एक बहुत बड़ा बदलाव आया. 29 जनवरी 1994 को राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने एयर कॉर्पोरेशन्स (उपक्रमों का हस्तांतरण और निरसन) अध्यादेश, 1994 जारी किया.

एक ही फैसले से भारत के आसमान पर चार दशक से चला आ रहा सरकारी एकाधिकार खत्म कर दिया गया. पहले की दो सरकारी कंपनियों को नई कॉरपोरेट संस्थाओं में बदल दिया गया. इंडियन एयरलाइंस लिमिटेड और एयर इंडिया लिमिटेड.

एक महीने बाद जब संसद दोबारा बैठी, तो सरकार को भारी विरोध का सामना करना पड़ा.

1994 का बिल

बिल पेश करते हुए नागरिक विमानन मंत्री गुलाम नबी आजाद ने जोर देकर कहा कि “इरादा न तो निजीकरण का है और न विनिवेश का, बल्कि दोनों एयरलाइनों में नई पूंजी और प्रतिस्पर्धा लाने का है.”

लेकिन सरकार की कोई भी सफाई सदन को संतुष्ट नहीं कर सकी. CPI सांसद रूपचंद पाल ने खास तौर पर तीखा हमला किया.

“निजी क्षेत्र हमारे उद्योग में तबाही मचा रहा है. वे अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर रहे हैं.” उन्होंने आरोप लगाया कि निजी एयरलाइंस पश्चिमी देशों द्वारा खारिज किए गए विमान और ऐसे इंजन ला रही थीं जो बहुत शोर करते थे और प्रदूषण फैलाते थे.

पाल ने कहा कि एयरलाइनों को हुए नुकसान के पीछे सरकार के गलत फैसले थे.

उन्होंने चेतावनी दी कि प्रतिस्पर्धा के कारण “हवाई सुरक्षा… सबसे पहली शिकार” बन सकती है.

ऑर्डिनेंस के रास्ते को चुनने से सांसदों के मन में शक पैदा हुआ. आखिर संसद का सत्र कुछ ही हफ्तों बाद शुरू होने वाला था. इतनी जल्दी क्यों?

CPI के बासुदेब आचार्य ने कहा, “29 जनवरी 1994 को ऑर्डिनेंस जारी करने की इतनी गलत जल्दी क्यों थी, जबकि संसद का सत्र कुछ ही हफ्ते दूर था? कानून बनाने वाली संस्था को पीछे के दरवाजे से बायपास करना दिखाता है कि सरकार का असली इरादा चोरी-छिपे निजीकरण करना है.”

जल्द ही जरूरी सेवाओं और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के सवाल सदन में उठने लगे. CPI के इंद्रजीत गुप्ता ने इसका नेतृत्व किया.

गुप्ता ने कहा, “राष्ट्रीय एयरलाइंस सिर्फ व्यावसायिक संस्थाएं नहीं हैं. युद्ध, प्राकृतिक आपदाओं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोगों को निकालने के समय वे राष्ट्रीय सेवा के साधन हैं.” गुप्ता ने कहा कि मुनाफे के मकसद से चलने वाले निजी ऑपरेटर “कभी भी संघर्ष वाले इलाकों में उड़ान नहीं भरेंगे या बिना मुनाफे वाले राहत अभियानों को नहीं करेंगे.”

तेजी से किए जा रहे निजीकरण के साथ सुरक्षा मानकों के कमजोर होने का खतरा भी था. ज्यादा पैसे वाली निजी कंपनियां प्रशिक्षित पायलटों को अपने साथ ले जातीं और इससे राष्ट्रीय एयरलाइंस “कर्मचारियों की कमी और कमजोर स्थिति” में आ जातीं.

आखिरकार, विपक्ष की कड़ी बहस के बावजूद, बिल 21 मार्च को पास हो गया.

हवा में बने रहने की लड़ाई

उदारीकरण के साथ निजी एयरलाइनों की एक नई लहर आई. मोदीलुफ्ट, दमानिया एयरवेज, एयर सहारा और ईस्ट-वेस्ट एयरलाइंस जल्द ही भारतीय आसमान में दिखाई देने लगीं. कम किराए और ज्यादा लचीली सेवाएं देकर उन्होंने शुरुआत में पहले की सरकारी एयरलाइनों से यात्रियों को अपनी तरफ खींचना शुरू कर दिया. हालांकि, इनमें से कई एयरलाइंस जल्द ही बंद हो गईं या दूसरी कंपनियों में मिल गईं.

फिर भी उदारीकरण का एयर इंडिया पर वैसा असर नहीं पड़ा. सांघवी कहते हैं, “इंडियन एयरलाइंस के उलट, एयर इंडिया हमेशा से प्रतिस्पर्धा वाले माहौल में रही थी. इसलिए सुरक्षा का पूरा सरकारी संरक्षण वाला मॉडल एयर इंडिया पर असल में लागू नहीं होता.”

तो महाराजा के साथ आखिर गलत क्या हुआ?

इसमें कुछ हिस्सा राजनीति का था, कुछ हिस्सा सरकार की बेरुखी का और एक बड़ा हिस्सा नौकरशाहों के हाथ में कमान होने का था. मैनेजमेंट के फैसलों में लगातार दखल और पुराने हो चुके विमान बेड़े का असर धीरे-धीरे दिखने लगा.

फिर भी, जे.आर.डी. के बाद एयर इंडिया अपने आप में खराब तरीके से चलने वाली एयरलाइन नहीं थी, “जब तक उसके जिम्मेदार पदों पर अच्छे लोग थे,” सांघवी कहते हैं.

मुनाफे से समस्याओं तक

राजीव गांधी ने मैनेजमेंट को असली स्वतंत्रता दी. उन्होंने राजन जेटली को नियुक्त किया और उनके साथ रतन टाटा वाला एक शानदार बोर्ड बनाया. बाद में नागरिक विमानन मंत्री माधवराव सिंधिया ने ITC से वाई.सी. देवेश्वर को लाया. देवेश्वर ने ITC छोड़ दिया, जबकि वहां उन्हें मिलने वाली सैलरी का एक छोटा हिस्सा ही एयर इंडिया में मिलता था. सांघवी के मुताबिक, उनके नेतृत्व में एयर इंडिया की ऐसी प्रतिष्ठा बन गई थी कि वह “हर दिन एक करोड़ रुपये” का मुनाफा कमाती थी.

लेकिन फिर सरकार का दखल न देने वाला रवैया बदल गया.

मंत्री खुद दखल देना और चीजें चलाना चाहते थे. सांघवी कहते हैं, “इसलिए उनके हित में यह नहीं था कि बहुत मजबूत MD हों.” और मुनाफा गिर रहा है या नहीं, इसकी चिंता क्यों करें? वे जानते थे कि वे सिर्फ एक या दो साल के लिए नागरिक विमानन मंत्री रहेंगे और एयरलाइन की लंबे समय की मजबूती में उनकी ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी.

एयर इंडिया के पूर्व कार्यकारी निदेशक जितेंद्र भार्गव कहते हैं, “विडंबना यह थी कि जैसे-जैसे प्रतिस्पर्धा बढ़ रही थी, एयर इंडिया को प्रोफेशनल मैनेजमेंट की जरूरत थी. भारत सरकार ने उलटी दिशा में कदम उठाया और एक के बाद एक नौकरशाहों को नियुक्त करना शुरू कर दिया, जिन्हें विमानन उद्योग की कोई जानकारी नहीं थी.”

यहां तक कि एयर इंडिया के बोर्ड में शामिल बड़े उद्योगपति भी उसकी दिशा नहीं बदल सके.

भार्गव ने कहा, “बड़ा सवाल यह है कि क्या उन्होंने एयर इंडिया को नाकाम किया या एयर इंडिया ने उन्हें नाकाम किया?” उन्होंने कहा, “मैं दूसरी बात को चुनूंगा क्योंकि वहां मौजूद नौकरशाहों ने उन्हें काम करने ही नहीं दिया.”

फिर 2004 में प्रफुल्ल पटेल ने मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली. उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी “एयर इंडिया की बिगड़ती हालत.” दशकों की अनदेखी के कारण विमान बेड़ा बहुत पुराना हो चुका था. पटेल ने दिप्रिंट से कहा, “हमने, मैं कहूंगा, करीब 20 साल से कोई ऑर्डर नहीं दिया था.”

पटेल के लिए एयर इंडिया लगातार बनी रहने वाली “समस्या” बन चुकी थी. उनका पहला विचार सीधा था. निजीकरण. उन्होंने अपना प्रस्ताव सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने रखा.

पटेल कहते हैं, “उस समय की राजनीति इसकी इजाजत नहीं देती थी. हमारी सरकार बहुत ज्यादा गठबंधन पर निर्भर थी.”

पटेल कहते हैं, “हमें फैसला करना था. या तो उस समय इसका निजीकरण करते, या नए विमान खरीदने और विमान बेड़े को बेहतर बनाने के लिए बहुत बड़ी पूंजी लगाते.” सरकार ने दूसरा रास्ता चुना और 111 नए विमानों का ऑर्डर दिया.

लेकिन इन विमानों की डिलीवरी आने में कई साल लग गए. इस दौरान एयर इंडिया अपने पुराने विमानों से काम करती रही और साथ ही नए विमानों की लागत भी उठाने लगी. फिर जैसे ही विमानों की पहली खेप भारत पहुंचने लगी, 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट आ गया. इससे अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ गईं.

बुरे समय की बात करें तो इससे बुरा समय क्या हो सकता था.

पटेल कहते हैं, “एक तरफ आपको नए विमान मिल गए, लेकिन दूसरी तरफ आपको ईंधन के लिए इतनी ज्यादा कीमत चुकानी पड़ी.”

इसके बाद आधुनिकीकरण की एक और कोशिश हुई. एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस का विलय. बड़े स्तर पर काम करने से होने वाली बचत इसके पीछे सबसे बड़ा तर्क था. पटेल कहते हैं कि “मंत्रियों के एक समूह ने फैसला किया कि दोनों के एक-दूसरे से मुकाबला करने के बजाय एक-दूसरे का साथ देना ज्यादा अच्छा होता.”

सांघवी कहते हैं, “विलय सिद्धांत के हिसाब से एक अच्छा विचार था.” लेकिन दोनों एयरलाइनों की कॉरपोरेट संस्कृति बहुत अलग थी और मंत्रालय ने इसे बहुत जल्दी में किया, उन्होंने कहा. एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनी बनाने के बजाय, इससे एक बंटी हुई एयरलाइन बनी, जिसे ठीक से चलाया नहीं जा रहा था.

लेकिन तब तक एयर इंडिया को सिर्फ सुधार की जरूरत नहीं थी. उसे बचाने की जरूरत थी.

और इसी के साथ 2022 में उसकी टाटा के पास नाटकीय वापसी का मंच तैयार हो चुका था.

महाराजा की घर वापसी

2022 में महाराजा के आखिरकार घर लौटने से बहुत पहले, करीब तीन दशकों तक एक ही नारा गूंजता रहा: निजीकरण, निजीकरण, निजीकरण.

इस कोशिश की शुरुआत 1990 के दशक में माधवराव सिंधिया के समय हुई. उन्होंने सीधे मार्गरेट थैचर के ब्रिटिश एयरवेज वाले तरीके को अपनाया. कंपनी के शेयरों का कुछ हिस्सा जनता को बेचो, एक ही बड़े मालिक का दबदबा खत्म करो और बाजार को उसका भविष्य तय करने दो.

वीर सांघवी कहते हैं, “एयर इंडिया हर दिन एक करोड़ रुपये कमा रही थी, इसलिए यह एक बहुत अच्छा विचार लगा.”

लेकिन जब ऐसा लगा कि यह योजना अब पूरी होने वाली है, तो पुरानी समस्या वापस आ गई. राजनीति.

सांघवी कहते हैं, “नरसिम्हा राव आखिरी चरण में पीछे हट गए.” इसके बाद हर्षद मेहता घोटाले ने शेयर बाजार को गिरा दिया और योजना छोड़ दी गई.

कई साल बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने फिर कोशिश की. उन्होंने अरुण शौरी को विनिवेश मंत्री बनाया और प्रतिस्पर्धी बोली की प्रक्रिया शुरू की. लेकिन तब तक एयर इंडिया की हालत खराब हो चुकी थी. बहुत कम बोली लगाने वाले आगे आए.

आखिर में कौन बचा? टाटा. सांघवी कहते हैं, “सरकार ने फैसला किया कि अगर सिर्फ एक ही बोली लगाने वाला है, तो किसी चीज का निजीकरण नहीं किया जा सकता.”

जब नरेंद्र मोदी की सरकार ने बिक्री की प्रक्रिया फिर शुरू की, तो वही सवाल दोबारा सामने आया. वास्तव में बोली कौन लगाएगा? तभी टाटा के साथ स्पाइसजेट भी इस दौड़ में शामिल हो गई. और इस तरह, 2021 में, एयरलाइन को अपने हाथ से जाने के सात दशक बाद, महाराजा को जे.आर.डी. टाटा के घर वापस सौंप दिया गया.

कहानी पूरी तरह घूमकर वहीं आ गई थी जहां से शुरू हुई थी. लेकिन घर वापसी वह परीकथा जैसा अंत नहीं था, जिसकी सभी को उम्मीद थी.

इस एयरलाइन को फिर से खड़ा करने के लिए टाटा ने एक नए CEO को लाया है. वह पूर्व इथियोपियन एयरलाइंस प्रमुख टेवोल्डे गेब्रेमरियम हैं. इससे पहले के CEO कैंपबेल विल्सन ने चार साल पद पर रहने के बाद इस्तीफा दे दिया था. लेकिन लगता है कि किस्मत अभी भी टाटा के साथ नहीं है. गेब्रेमरियम की नियुक्ति के एक हफ्ते के अंदर ही टाटा ग्रुप के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने अचानक अपने पद से हटने की घोषणा कर दी, जिससे एयरलाइन एक बार फिर उथल-पुथल में चली गई.

हालांकि, पटेल का कहना है, “वे एयर इंडिया की जटिलता को समझ नहीं पाए.” वे कहते हैं, “वे एयर इंडिया की जटिलता को समझ नहीं पाए.” उनका कहना है कि सिर्फ इसलिए कि टाटा ने एयरलाइन की शुरुआत की थी, इसका मतलब यह नहीं था कि वे अब भी इस कारोबार को समझते थे.

कई दशकों तक एयर इंडिया की सबसे बड़ी ताकत उसकी शैंपेन या कैवियार नहीं थी, बल्कि उसके सख्त सुरक्षा मानक और बहुत अनुभवी पायलट थे. 1985 में कनिष्क विमान बम विस्फोट के 40 साल बाद, जून 2025 में अहमदाबाद में हुए भयानक AI171 हादसे ने इस विरासत को एक और बड़ा झटका दिया.

गेब्रेमरियम को अब ऐसी एयरलाइन की जिम्मेदारी मिली है, जो अभी भी मुश्किलों से जूझ रही है. एयर इंडिया के सामने परिचालन और सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं और आर्थिक स्थिति भी ज्यादा भरोसा नहीं देती.

भार्गव कहते हैं, “एयर इंडिया कभी टाटा का प्रोडक्ट नहीं थी. यह हमेशा जे.आर.डी. टाटा की एयरलाइन थी.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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