नई दिल्ली: राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की एक स्पेशल कोर्ट ने छत्तीसगढ़ में 2013 में हुए नक्सली हमले की योजना बनाने और उसे अंजाम देने के मामले में सभी 10 आरोपियों को दोषी ठहराया है. इस हमले में राज्य के लगभग पूरे कांग्रेस नेतृत्व का सफाया हो गया था.
छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में बचाव पक्ष के वकील अरविंद चौधरी ने दिप्रिंट को फैसले की पुष्टि की. उन्होंने कहा कि सजा कितनी होगी, इसका ऐलान 16 सितंबर को किया जाएगा.
दोषी ठहराए गए लोगों में प्रमिला मोडियाम, चैतु लेकाम उर्फ मुन्ना, सुमित्रा उर्फ सुमित्रा पुनेम मोडियाम, मुक्का मंडवी, कोसा कवासी उर्फ कोसराम, आयता मरकाम, मड़कमि देवा, जोगा मड़कमि, बंजामी अन्ना उर्फ चमरा उर्फ डेंगा और महादेव नाग शामिल हैं.
यह घटना 25 मई 2013 को बस्तर की झीरम घाटी में हुई थी. उस समय कांग्रेस नेता 2013 के विधानसभा चुनाव से पहले ‘परिवर्तन रैली’ कर रहे थे. उस समय की रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 250 नक्सलियों ने आम कपड़ों में इस हमले को अंजाम दिया था. कांग्रेस के 11 बड़े नेताओं की हत्या कर दी गई थी. इनमें उस समय के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश पटेल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री वी.सी. शुक्ला, पूर्व विधायक उदय मुदलियार और स्थानीय कांग्रेस नेता योगेंद्र शर्मा शामिल थे. कई सुरक्षाकर्मी भी मारे गए थे.
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, जब काफिला झीरम घाटी के पास पहुंचा, तो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के कैडरों ने सबसे पहले बारूदी सुरंग में विस्फोट किया, जिससे सड़क पर बड़ा गड्ढा बन गया. विस्फोट के कारण ‘यात्रा’ में शामिल गाड़ियां आगे नहीं बढ़ सकीं और एक-दूसरे के पीछे फंस गईं.
बारूदी सुरंग के विस्फोट के बाद बिना किसी भेदभाव के गोलियां चलाई गईं, ग्रेनेड फेंके गए और लोगों की हत्या की गई. इसमें मौके पर ही 24 लोगों की मौत हो गई और 35 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए. इनमें से कुछ की बाद में मौत हो गई.
मुख्य निशाना महेंद्र कर्मा थे, जो सलवा जुडूम का नेतृत्व कर रहे थे. यह माओवादी विद्रोह के खिलाफ राज्य के समर्थन से चलाया गया एक आंदोलन था, जिसमें स्थानीय युवाओं को हथियार दिए गए थे. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसे गैरकानूनी और असंवैधानिक घोषित कर दिया था.
यह हमला राज्य में कांग्रेस और बीजेपी के बीच अक्सर राजनीतिक टकराव का मुद्दा रहा है.
कांग्रेस ने उस समय की BJP सरकार पर इस घटना में शामिल होने का आरोप लगाया था. वहीं BJP ने आरोप लगाया था कि कांग्रेस हमले में मारे गए अपने पार्टी नेताओं के परिवारों को “गुमराह” कर रही है और इस मुद्दे का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रही है.
जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंप दी गई थी. NIA ने सितंबर 2014 में 34 माओवादियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी. तब से इस मामले की सुनवाई चल रही थी.
NIA ने मामले की जांच अपने हाथ में लेने के बाद प्रतिबंधित संगठन के कुल 39 कैडरों के खिलाफ आरोप लगाए थे. इनमें बरसे सुक्का उर्फ देवा भी शामिल था. जांचकर्ताओं के मुताबिक, देवा उस समय दरभा डिविजनल कमेटी का प्रभारी था और प्रतिबंधित संगठन के शीर्ष नेतृत्व ने उसे इस हमले को अंजाम देने के लिए कुल कमांडर बनाया था. अब मारे जा चुके माओवादी कमांडर मदवी हिडमा का बचपन का दोस्त और उसके साथ काम करने वाला बताया जाने वाला देवा इस साल जनवरी में तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर चुका है.
मई 2013 में राज्य की तत्कालीन BJP सरकार ने भी हमले की जांच के लिए एक विशेष न्यायिक जांच आयोग बनाया था.
हाई कोर्ट के मौजूदा जज जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था. आयोग को तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट देनी थी. लेकिन आयोग का कार्यकाल कई बार बढ़ाया गया. आखिरकार 2019 में आयोग ने उसी साल जनवरी में अपनी कार्यवाही बंद कर दी.
हालांकि, 2018 में राज्य में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस सरकार ने न्यायिक आयोग का कार्यकाल बढ़ा दिया. साथ ही पहले से चल रही जांच के लिए नए नियम और जिम्मेदारियां तय की गईं.
आयोग ने 6 नवंबर 2021 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी, लेकिन कुछ दिनों बाद राज्य सरकार ने एक नए अध्यक्ष और सदस्य को नियुक्त कर दिया. साथ ही आयोग के दायरे को बढ़ाया गया और जांच के लिए नई समय सीमा तय की गई.
BJP नेता धरमलाल कौशिक ने हाई कोर्ट में इसे चुनौती दी. हाई कोर्ट ने 2022 में इस अधिसूचना पर रोक लगा दी. तब से यह अधिसूचना रोक के तहत ही है.
कांग्रेस सरकार ने 2019 में हमले की जांच के लिए 10 सदस्यों वाली विशेष जांच टीम (SIT) भी बनाई थी. पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उस समय आरोप लगाया था कि BJP सरकार ने झीरम घाटी नक्सली हमले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित नहीं की थी.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)