नई दिल्ली: भारत की सबसे बड़ी मेडिकल रिसर्च संस्था ICMR (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) ने सिफारिश की है कि नॉनट्यूबरकुलस माइकोबैक्टीरियल (NTM) बीमारी की जांच और इलाज को भी नेशनल ट्यूबरकुलोसिस एलिमिनेशन प्रोग्राम (NTEP) में शामिल किया जाए. यह केंद्र सरकार का टीबी खत्म करने का कार्यक्रम है.
NTM फेफड़ों का एक इन्फेक्शन है, जिसे अक्सर टीबी समझ लिया जाता है. अभी भारत के टीबी जांच नेटवर्क में इस बीमारी की पहचान नहीं हो पाती.
यह सिफारिश ICMR की फंडिंग से हुई एक नई मल्टी-सेंटर स्टडी के आधार पर की गई है. यह स्टडी द लैंसेट रीजनल हेल्थ – साउथईस्ट एशिया में प्रकाशित हुई है. इसमें कहा गया है कि NTM बीमारी अब एक उभरती हुई सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, क्योंकि इसके लक्षण टीबी जैसे ही होते हैं.
टीबी माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नाम के बैक्टीरिया से होती है. यह ज्यादातर फेफड़ों को प्रभावित करती है. हालांकि, शरीर के दूसरे अंग भी प्रभावित हो सकते हैं. यह बीमारी तब फैलती है, जब टीबी का मरीज खांसता, छींकता या बात करता है.
वहीं, NTM बीमारी नॉनट्यूबरकुलस माइकोबैक्टीरिया से होती है. ये बैक्टीरिया मिट्टी, पानी और धूल में पाए जाते हैं और टीबी जैसी फेफड़ों की बीमारी पैदा कर सकते हैं. अगर इसका इलाज न हो या इसे गलती से टीबी मान लिया जाए, तो यह धीरे-धीरे फेफड़ों के ऊतकों को नुकसान पहुंचा सकती है. इससे सांस लेने में दिक्कत हो सकती है और मरीज की मौत भी हो सकती है.
यह स्टडी 2021 से 2025 के बीच नई दिल्ली, चंडीगढ़, अहमदाबाद, वर्धा, तिरुपति और नोएडा के सात केंद्रों पर की गई. इसका समन्वय नई दिल्ली के जामिया हमदर्द ने किया. वहीं, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ट्यूबरकुलोसिस एंड रेस्पिरेटरी डिजीज़ और शारदा यूनिवर्सिटी में मॉलिक्यूलर टेस्ट किए गए.
शोधकर्ताओं ने 71,143 ऐसे लोगों की जांच की, जिनमें टीबी होने का शक था. यानी ऐसे लोग, जिन्हें लंबे समय से खांसी, बुखार या वजन कम होने जैसे लक्षण थे और जिनकी टीबी की जांच की जा रही थी.
इनमें से 230 लोगों (0.32 प्रतिशत) में वास्तव में NTM बीमारी पाई गई. इनमें 191 मरीजों के फेफड़े प्रभावित थे, जबकि 39 मरीजों में यह बीमारी फेफड़ों के बाहर थी.
स्टडी के प्रमुख लेखकों में शामिल एम्स, नई दिल्ली के मेडिसिन विभाग के पूर्व प्रमुख डॉ. एस.के. शर्मा ने कहा, “NTM बीमारी की जल्दी पहचान और इलाज बहुत जरूरी है, क्योंकि अगर इसका इलाज न हो, तो यह धीरे-धीरे फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकती है, सांस लेने में दिक्कत पैदा कर सकती है और मौत का कारण भी बन सकती है.”
उन्होंने कहा कि NTM का इलाज टीबी से पूरी तरह अलग होता है, इसलिए सही बीमारी की पहचान करना बहुत जरूरी है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की ग्लोबल ट्यूबरकुलोसिस रिपोर्ट 2025 के मुताबिक, दुनिया में टीबी के करीब एक-चौथाई मरीज भारत में हैं.
साल 1998 में मेडिकल कॉलेजों में टीबी नियंत्रण के लिए बनी राष्ट्रीय टास्क फोर्स के अध्यक्ष रह चुके डॉ. शर्मा ने कहा कि पिछले कई दशकों में भारत में टीबी के मामले काफी कम हुए हैं, लेकिन पहले टीबी हो चुके कई लोगों के फेफड़ों में स्थायी नुकसान रह गया है.
उन्होंने कहा, “भारत सहित दक्षिण एशिया के वे देश, जहां टीबी का बोझ ज्यादा है, वहां NTM के मामले भी बढ़ सकते हैं. इसकी वजह यह है कि ठीक हो चुकी टीबी अक्सर फेफड़ों में स्थायी निशान छोड़ देती है, जिससे लोगों में इस संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है.”
टीबी नहीं, लेकिन अक्सर इसे TB समझ लिया जाता है
NTM 200 से ज़्यादा बैक्टीरिया का एक ग्रुप है जो मिट्टी, पानी और धूल में नैचुरली पाए जाते हैं. ये टीबी पैदा करने वाले बैक्टीरिया माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस के दूर के रिश्तेदार हैं लेकिन बहुत अलग तरह से काम करते हैं.
टीबी से अलग, जो एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलती है, NTM बीमारी आम तौर पर एनवायरनमेंट से फैलती है और आमतौर पर उन लोगों को होती है जिनकी इम्यूनिटी कमज़ोर होती है, फेफड़े खराब होते हैं या कोई और हेल्थ प्रॉब्लम होती है.
नई दिल्ली में जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी के मॉलिक्यूलर मेडिसिन डिपार्टमेंट के रिसर्चर और स्टडी के को-ऑथर विश्वनाथ उपाध्याय ने कहा, “लगभग 75-80 परसेंट NTM इन्फेक्शन फेफड़ों पर असर डालते हैं और टीबी जैसे ही होते हैं, जिसमें लगातार खांसी, बुखार, वज़न कम होना और छाती के एक्स-रे में भी ऐसे ही लक्षण दिखते हैं.”
उन्होंने दिप्रिंट को बताया, “भारत में, NTM मामलों को टीबी समझकर गलत डायग्नोस किया जाता है और मरीज़ों का गलत इलाज किया जाता है.”
डॉ. शर्मा के अनुसार, 1980 के दशक की शुरुआत में HIV महामारी के बाद NTM बीमारी पर दुनिया भर में ध्यान दिया जाने लगा, क्योंकि HIV वाले लोग इन इन्फेक्शन के प्रति विशेष रूप से कमज़ोर थे. उन्होंने कहा कि भारत में, कुछ शुरुआती दर्ज मामले चेन्नई से रिपोर्ट किए गए थे.
डॉ. शर्मा ने कहा कि एक ज़रूरी अंतर यह है कि फेफड़ों की NTM बीमारी आमतौर पर टीबी के विपरीत एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलती है. उन्होंने कहा कि क्योंकि नियमित टीबी टेस्ट दोनों इन्फेक्शन के बीच भरोसेमंद रूप से अंतर नहीं कर सकते हैं, इसलिए कई मरीज़ों को सही डायग्नोसिस होने से पहले महीनों तक एंटी-ट्यूबरकुलोसिस दवाएं लेनी पड़ती हैं.
पहले हुई TB, सबसे बड़ा रिस्क फैक्टर
स्टडी की सबसे बड़ी खोज यह है कि पहले हुई टीबी और भविष्य में होने वाली NTM बीमारी के बीच एक मज़बूत लिंक है. NTM पल्मोनरी बीमारी वाले मरीज़ों में से 80.6 प्रतिशत को पहले पल्मोनरी टीबी की हिस्ट्री थी, जिससे यह अब तक का सबसे बड़ा रिस्क फैक्टर बन गया है.
डॉ. शर्मा ने बताया कि ट्यूबरकुलोसिस निशान छोड़ जाता है, फेफड़ों के टिशू को नुकसान पहुंचाता है, और यह नुकसान NTM बैक्टीरिया के पनपने की एक नैचुरल जगह बन जाता है — उन्होंने पुराने टीबी घावों को इन्फेक्शन के रहने और बढ़ने के लिए “एक बहुत अच्छी जगह” बताया.
ब्रोंकाइटिस, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD), स्मोकिंग, डायबिटीज, कुपोषण और विटामिन D की कमी जैसी पुरानी फेफड़ों की बीमारियों को भी इसकी वजह बताया गया.
डॉ. शर्मा ने कहा, “डॉक्टरों को उन मरीज़ों पर शक करना चाहिए जिन्हें सांस की पुरानी दिक्कतें हैं और जिनका पहले टीबी का इलाज हो चुका है, लेकिन सही इलाज के बावजूद उनमें सुधार नहीं हो रहा है या हालत बिगड़ती जा रही है.”
उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में, डॉक्टरों को इसे टीबी या ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी का दूसरा मामला मानने के बजाय NTM बीमारी पर विचार करना चाहिए और यह पता लगाने के लिए मॉलिक्यूलर टेस्ट करने चाहिए कि NTM इसके लिए ज़िम्मेदार है या नहीं.
बीमारी की पहचान में देरी क्यों होती है
स्टडी का सबसे अहम आंकड़ा यह है कि NTM बीमारी की पहचान होने में काफी देर लगती है. मरीजों में लक्षण शुरू होने से लेकर बीमारी की पुष्टि होने तक औसतन 7 महीने से ज्यादा (221.8 दिन) लग गए.
उपाध्याय ने कहा कि इसकी वजह यह है कि डॉक्टरों को पहले टीबी का ज्यादा शक होता है, क्योंकि टीबी के मामले NTM से कहीं ज्यादा हैं. इसके अलावा, भारत में आमतौर पर होने वाले टेस्ट सिर्फ यह बताते हैं कि माइकोबैक्टीरिया मौजूद हैं, लेकिन यह नहीं बता पाते कि संक्रमण टीबी का है या NTM का.
NTM की पुष्टि के लिए सिर्फ सामान्य टीबी टेस्ट काफी नहीं होते. इसके लिए डॉक्टरों को बार-बार माइकोबैक्टीरिया कल्चर, लाइन प्रोब असे (Line Probe Assay) या जेनेटिक सीक्वेंसिंग जैसे मॉलिक्यूलर टेस्ट से बैक्टीरिया की पहचान करनी पड़ती है. कुछ मामलों में दवा किस पर असर करेगी (ड्रग ससेप्टिबिलिटी टेस्ट) भी करना पड़ता है.
फिलहाल ये सुविधाएं ज्यादातर विशेष लैब और बड़े अस्पतालों में ही उपलब्ध हैं. इसी वजह से देश के कई हिस्सों में बीमारी की जल्दी पहचान नहीं हो पाती.
उपाध्याय ने कहा कि स्वास्थ्यकर्मियों में इस बीमारी के बारे में कम जानकारी और बेहतर जांच सुविधाओं की कमी भी पहचान में देरी की वजह है.
उन्होंने कहा, “अगर पूरे भारत में जल्दी और कम खर्च वाले जांच टेस्ट उपलब्ध कराए जाएं और लैब की क्षमता बढ़ाई जाए, तो बीमारी की जल्दी पहचान में काफी मदद मिलेगी.”
इलाज लंबा और महंगा
टीबी का इलाज आमतौर पर 6 महीने का होता है, लेकिन NTM का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि संक्रमण किस बैक्टीरिया से हुआ है.
मरीजों को आमतौर पर एज़िथ्रोमाइसिन, एथाम्बुटोल और रिफैम्पिसिन जैसी एंटीबायोटिक दवाएं एक साथ दी जाती हैं. कुछ मरीजों को अमिकासिन जैसी इंजेक्शन वाली दवाएं भी देनी पड़ सकती हैं. इलाज अक्सर 12 से 18 महीने तक चलता है और कुछ मामलों में इससे भी ज्यादा समय लग सकता है.
डॉ. शर्मा ने कहा कि NTM की सभी बीमारियों के लिए एक ही इलाज नहीं होता. कुछ तरह के बैक्टीरिया कई एंटीबायोटिक दवाओं पर असर नहीं दिखाते, जिससे इलाज और मुश्किल हो जाता है. उन्होंने कहा कि इलाज शुरू करने से पहले यह पता लगाना जरूरी है कि संक्रमण किस तरह के बैक्टीरिया से हुआ है, क्योंकि उसी के हिसाब से इलाज तय होता है.
स्टडी में 155 मरीजों ने इलाज शुरू किया. इनमें से 88.4 प्रतिशत मरीजों का इलाज सफल रहा, लेकिन 18 मरीजों का नतीजा अच्छा नहीं रहा. इनमें 9 मरीजों की मौत हो गई, जबकि 9 मरीज इलाज के दौरान संपर्क से बाहर हो गए.
विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी कि एज़िथ्रोमाइसिन, जो NTM के इलाज की सबसे अहम दवा है, उसे बिना डॉक्टर की सलाह के नहीं लेना चाहिए. उन्होंने कहा कि सामान्य खांसी या वायरल बुखार में इस दवा का गलत या अधूरा इस्तेमाल आगे चलकर दवाओं के असर खत्म होने (ड्रग रेजिस्टेंस) की वजह बन सकता है.
स्टडी के लेखकों, जिनमें ICMR के डिलीवरी रिसर्च विभाग की डॉ. मंजुला सिंह भी शामिल हैं, ने सिफारिश की है कि NTEP में NTM की जांच भी शामिल की जाए.
डॉ. सिंह ने दिप्रिंट को लिखित जवाब में कहा, “हमारी स्टडी बताती है कि भारत में जिन लोगों की टीबी की जांच की जाती है, उनमें NTM बीमारी भी एक ऐसी वजह है, जिसे अक्सर पहचान नहीं मिलती. हालांकि इसके मामले कम थे (टीबी की आशंका वाले 71,000 से ज्यादा लोगों में सिर्फ 0.32 प्रतिशत), लेकिन जिन लोगों को यह बीमारी थी, उनमें पहचान होने में काफी देरी हुई और ज्यादातर मरीज पहले टीबी से पीड़ित रह चुके थे तथा उनके फेफड़ों की बीमारी बनी हुई थी.”
उन्होंने कहा कि इसका मतलब यह नहीं है कि टीबी के शक वाले हर मरीज का NTM टेस्ट किया जाए. बल्कि डॉक्टरों को उन मरीजों में NTM की संभावना पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, जिनमें लक्षण लंबे समय तक बने रहें, पहले टीबी हो चुकी हो या जिनके लक्षण सामान्य टीबी जैसे न हों.
उन्होंने कहा, “अगर शुरुआत में ही बैक्टीरिया की सही पहचान हो जाए, तो मरीज को सही इलाज मिल सकता है और उसे बेवजह टीबी की दवाएं लेने से बचाया जा सकता है.”
उन्होंने कहा कि स्टडी के आधार पर निष्कर्ष निकला है कि अगर मौजूदा टीबी कार्यक्रम में NTM की जल्दी पहचान करने वाले मॉलिक्यूलर टेस्ट और तय दिशा-निर्देशों के अनुसार इलाज को शामिल किया जाए, तो बीमारी की पहचान में होने वाली देरी कम होगी और मरीजों का इलाज बेहतर हो सकेगा.
शोधकर्ताओं ने कहा कि इसके लिए मजबूत लैब नेटवर्क, डॉक्टरों में ज्यादा जागरूकता और भारत में बने सस्ते जांच टेस्ट जरूरी होंगे, ताकि मरीजों को बिना देरी सही बीमारी की पहचान और सही इलाज मिल सके.
टीबी के उलट, जिसकी दवाएं सरकार के कार्यक्रम के तहत मुफ्त मिलती हैं, NTM के इलाज में महंगी एंटीबायोटिक दवाएं लगती हैं, जिन्हें कई मरीज खरीद नहीं पाते. डॉ. शर्मा ने कहा कि अगर NTM को NTEP में शामिल किया जाता है, तो मरीजों के लिए इलाज तक पहुंच भी बेहतर हो सकती है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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