Wednesday, 29 June, 2022
होमहेल्थचुनाव वाले राज्यों में 530% तक, होली के बाद 152% बढ़ोत्तरी- नई कोविड लहर के लिए ये हैं जिम्मेदार

चुनाव वाले राज्यों में 530% तक, होली के बाद 152% बढ़ोत्तरी- नई कोविड लहर के लिए ये हैं जिम्मेदार

विशेषज्ञों का कहना है कि महामारी की दूसरी लहर के दौरान ये सुपरस्प्रेडर घटनाएं नए मामलों में तेजी से उछाल का प्रमुख कारण रही हैं.

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नई दिल्ली: भारत इस समय कोविड-19 की दूसरी लहर से जूझ रहा है और वे राज्य सर्वाधिक बुरी तरह प्रभावित नजर आ रहे हैं जिन्होंने हाल ही में नई (या पुरानी) सरकार को चुना है. डेटा दर्शाता है कि इन राज्यों में मतदान के एक पखवाड़े के भीतर नए मामलों में बहुत तेजी वृद्धि हुई है.

इससे भी बड़ी बात यह है कि दूसरी लहर की संभावना से भारत के स्पष्ट इनकार का असर यह हुआ कि 2021 में होली 2020 की तरह संयमित ढंग से नहीं मनाई गई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से ट्विटर पर की गई एक अपील ने यह सुनिश्चित किया था कि भारत में होली पर कोई हुड़दंग न हो.

नतीजा सामने है, 29 मार्च यानी होली के दिन और 13 अप्रैल के बीच सक्रिय मामलों की संख्या में 152 प्रतिशत का उछाल आया है.

भारत में कोविड-19 मरीजों की बीमारी का पता लगने और मौत के बीच औसतन 15 दिन का अंतराल माना जाता है.


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चुनावों के कारण भारी उछाल

देश में चाहे धार्मिक उत्सव मनाया गया हो या लोकतंत्र का, दोनों के दौरान ही सार्स-कोव2 वायरस ने पूरी तेजी से हमला बोला है.

केरल में विधानसभा चुनावों के लिए एक चरण में हुए मतदान के दिन यानी 6 अप्रैल को सक्रिय केस 30,228 थे, जो 349 फीसदी बढ़कर 21 अप्रैल को 1,35,910 पर पहुंच गए. पड़ोसी राज्य तमिलनाडु, जहां पर उसी दिन वोट पड़े थे. में इसी अवधि के दौरान सक्रिय केस 229 फीसदी बढ़कर 84,361 हो गए.

छोटे-से राज्य पुदुचेरी में इसी अंतराल के दौरान सक्रिय केस 204 प्रतिशत बढ़कर 5,404 पर पहुंच गए.

असम में 27 मार्च, 1 अप्रैल और 6 अप्रैल को तीन चरणों में वोट डाले गए थे. स्पष्ट तौर पर कई चरण में मतदान वाले राज्यों में उस समय भी राज्य के अन्य हिस्सों में चुनाव अभियान जारी था, जब किसी हिस्से में वोट पड़ चुके थे या फिर कहीं प्रचार बंद होने की 48 घंटे की अवधि चल रही थी.

असम में सक्रिय मामलों में 27 मार्च से 11 अप्रैल तक 83 प्रतिशत, 1 अप्रैल से 16 अप्रैल के बीच 187 प्रतिशत और 6 अप्रैल से 20 अप्रैल के बीच 344 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है.

यह स्थिति एक ऐसे राज्य में सामने आई है, जहां सबसे अहम विभाग संभालने वाले स्वास्थ्य और वित्त मंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने ऐलान किया था कि असम में मास्क लगाने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि यह कोविड मुक्त है.

बेहद कड़वाहट भरी चुनावी जंग के गवाह बने पश्चिम बंगाल में भी कुछ ऐसी तस्वीर सामने आई है, जहां आठ चरण में मतदान के आखिरी तीन चरणों के दौरान स्थिति कितनी बिगड़ी है, यह अगले कुछ दिनों में ही सामने आ पाएगा.

बंगाल में 27 मार्च से 11 अप्रैल के बीच सक्रिय मामले चार गुना से ज्यादा बढ़कर 4,608 से 23,981 पर पहुंच गए—जो कि 420 प्रतिशत का उछाल है. 1 अप्रैल (दूसरे चरण) और 16 अप्रैल के बीच मामले लगभग सात गुना बढ़कर 6,513 से 41,047 हो गए—यानी 530 प्रतिशत का उछाल.

तीसरे चरण यानी 6 अप्रैल और इसके एक पखवाड़े के बाद यानी 20 अप्रैल के बीच मामले लगभग पांच गुना बढ़े और 12,775 से 58,386 हो गए. यह वृद्धि 357 फीसदी की है. चौथे चरण का चुनाव 10 अप्रैल को हुआ था और 25 अप्रैल तक सक्रिय मामले 21,366 से बढ़कर 88,800 पहुंच गए यानी 315 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई.

17 अप्रैल को जब पांचवें चरण का मतदान हुआ तब पश्चिम बंगाल में सक्रिय केस 45,300 थे. 2 मई को 162 फीसदी उछाल के साथ यह बढ़कर 1,18,945 हो गए.

कोविड की बढ़ती संख्या ने देशभर में खतरे की घंटी बजा रखी है. आक्रोशित मद्रास हाईकोर्ट ने तो पिछले माह यहां तक कह दिया था कि भारतीय चुनाव आयोग ‘गैर-जिम्मेदार’ है और उस पर ‘हत्या का मामला’ चलाया जाना चाहिए.


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‘चुनावों ने कोविड प्रबंधन पर असर डाला’

हालांकि, दुनियाभर में समय-समय पर सुपर-स्प्रेडर घटनाओं और कोविड-19 के आंकड़े के बीच संबंध होने को पुष्ट किया जाता रहा है, लेकिन विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि चुनाव वाले राज्यों में एक कारण यह भी रहा कि सरकारी मशीनरी का ध्यान कोविड प्रबंधन से हट गया और वह भी पूरी तरह चुनाव प्रक्रिया में शामिल हो गई.

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया में लाइफकोर्स एपिडेमिओलॉजी के प्रमुख और प्रोफेसर डॉ. गिरिधर बाबू ने कहा, ‘कोई भी सुपर-स्प्रेडर घटना संक्रमण फैलाने वाली ही होगी. होली हो या चुनाव ज्यादातर लोग सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क लगाने के दिशानिर्देशों का पालन नहीं करते हैं और इसके कारण संक्रमण ज्यादा फैल सकता है. हालांकि, आपको इस संभावना पर भी विचार करना होगा कि चुनावों के बाद टेस्टिंग में तेजी आई है.’

बाबू ने कहा, ‘चुनावों के दौरान कभी-कभी ऐसा होता है कि कार्यक्रम की समीक्षा के लिए आपको जितना समय देना चाहिए, उतना नहीं दिया जाता. कोविड पीछे छूट जाता है क्योकि मुख्य फोकस चुनावों पर होता है. स्वास्थ्य कर्मियों को भी चुनावी ड्यूटी पर लगाया जा सकता है, हो सकता है कि इससे चुनाव के दौरान कोविड पर ध्यान देना और भी कम हो गया हो.’

उन्होंने आगे कहा कि भारत में कोविड-19 दूसरी लहर की उत्पत्ति और प्रकृति को बेहतर ढंग से समझने के लिए इन राज्यों या दूसरों में आए उछाल की तुलना करने और कोविड के बढ़ते आंकड़ों को लोगों के सामूहिक तौर पर जुटने से जोड़कर देखने की जरूरत है.


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