नई दिल्ली: हर शाम, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के नए मुंबई सेंटर के छात्र क्लास खत्म होने के बाद बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर लगी चाय की दुकान पर आते हैं. इसी बिल्डिंग में कई प्रोडक्शन और क्रिएटिव हाउस भी हैं.
सेंटर के पहले बैच की 15 छात्रों में से एक अनन्या राज ने कहा, “माहौल ऐसा है कि कोई न कोई क्रिएटिव डायरेक्टर चाय की दुकान पर बैठा होता है. चारों तरफ कुछ ऐसा ही माहौल है.”
उन्होंने कहा, “कहीं न कहीं देखकर आपको भी लगता है कि ‘ठीक है, यह कोई बिल्कुल अनजान या दूर की चीज नहीं है’, क्योंकि यहां चाय की दुकान भी नेटवर्किंग की जगह बन गई है.”
असल में यही चीज NSD का मुंबई सेंटर बेच रहा है. करीब छह दशकों से नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने दिल्ली में चलने वाली, एंट्रेंस एग्जाम पर आधारित और मुफ्त थिएटर शिक्षा व्यवस्था के जरिए भारत के कई पीढ़ियों के कलाकारों को ट्रेनिंग दी है. इसकी नई मुंबई शाखा इस मॉडल के लगभग हर हिस्से को बदल देती है: यहां कोई एंट्रेंस एग्जाम नहीं है, फीस 5 लाख रुपये तक है, कोर्स सिर्फ तीन महीने का भी हो सकता है और यह बॉलीवुड के प्रोडक्शन हाउस से पैदल दूरी पर स्थित है. इस कदम से NSD की ट्रेनिंग उन लोगों के लिए भी खुल गई है, जो पहले कभी यहां तक नहीं पहुंच सकते थे. लेकिन इसने भारतीय थिएटर के अंदर एक बहस भी शुरू कर दी है कि जब संस्था इस तरह काम करने लगेगी तो उसकी सख्ती और उसकी पहचान का क्या होगा.
राज के लिए यह फैसला उनके पिता के साथ हुई एक बातचीत से तय हुआ. उनकी नजर फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) या दिल्ली के NSD पर थी, लेकिन उनके पिता ने उन्हें NSD के नए खुले मुंबई सेंटर की तरफ जाने को कहा. उन्होंने पूछा कि अगर आखिर में उन्हें मुंबई में ही काम करना है, तो ट्रेनिंग भी वहीं से क्यों न ली जाए.
उन्होंने कहा, “वही थे जिन्होंने मुझे मुंबई जाने के लिए कहा. फिर मुझे लगा कि यह बहुत अच्छा मौका है, क्योंकि आप मुंबई में रह रहे हैं और यह एक्टिंग का कोर्स है. यह पूरी तरह थिएटर के लिए नहीं है, कैमरे के लिए भी है.”
राज बचपन से ही स्कूल में थिएटर कर रही थीं. उन्होंने बेंगलुरु के दयानंद सागर कॉलेज में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान भी थिएटर जारी रखा. वहां वह एक थिएटर ग्रुप में शामिल हुईं, जो नुक्कड़ नाटक और दूसरे शौकिया थिएटर करता था. बाद में उन्होंने जमशेदपुर में नौकरी की, लेकिन पाया कि वह अपने जुनून को आगे नहीं बढ़ा पा रही थीं. इसलिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी, पाथ थिएटर ग्रुप से जुड़ गईं और कई जीरो-बजट फिल्मों में काम किया. वह मुंबई में पिछले “नौ महीनों” की ट्रेनिंग को “वाकई बदलाव लाने वाली” बताती हैं. उनका कहना है कि वह एक छोटे शहर से आई थीं और “साथ ही यहां बहुत ज्यादा भूख है.”
मुंबई सेंटर नवंबर 2025 में दो कोर्स के साथ शुरू हुआ था: एक्टिंग में एक साल का फुल-टाइम डिप्लोमा प्रोग्राम और तीन महीने का पार्ट-टाइम एक्टिंग कोर्स, जिसमें कैमरे के सामने एक्टिंग करने की स्किल पर ध्यान दिया जाता है.
यह अभिनेता चित्तरंजन त्रिपाठी की पहल थी, जब वह NSD के डायरेक्टर बने. त्रिपाठी ने तलवार, रक्तांचल, छपाक और सेक्रेड गेम्स समेत कई फिल्मों और सीरीज में काम किया है. उन्होंने करीब 30 फिल्मों में भी काम किया है, इसलिए वह मुंबई में ऐसे ट्रेनिंग सेंटर की जरूरत को जानते थे. दूसरा विकल्प गोवा था.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “मार्केट में काम मिलने की संभावना के नजरिए से मुंबई बहुत बड़ी जगह है. इसलिए अगर मुंबई में ट्रेनिंग की सुविधा शुरू की जाती है, तो बहुत से लोगों को इसका फायदा मिलेगा.”

NSD के दिल्ली कैंपस और बेंगलुरु, वाराणसी और गंगटोक के क्षेत्रीय केंद्रों में एडमिशन जॉइंट एंट्रेंस एग्जामिनेशन (JEE) के जरिए होता है. छात्रों को उनके रैंक के आधार पर कैंपस और प्रोग्राम दिए जाते हैं. दिल्ली में तीन साल का डिप्लोमा प्रोग्राम काफी प्रतिस्पर्धी है और छात्रों से उम्मीद की जाती है कि उन्हें इस कला की अच्छी समझ हो.
मौजूदा प्रोग्राम में काफी समय देना पड़ता है, इसलिए नौकरी करने वाले लोगों के लिए अपने करियर के साथ इसे करना मुश्किल होता है. यहीं मुंबई सेंटर अलग है. आवेदकों को NSD JEE देने की जरूरत नहीं होती. इसके बजाय सेंटर अलग स्क्रीनिंग प्रक्रिया चलाता है और इसका तीन महीने का प्रोग्राम इस तरह बनाया गया है कि नौकरी करने वाले लोग भी इसमें शामिल हो सकें.
त्रिपाठी ने कहा कि इसका मकसद NSD की ट्रेनिंग प्रक्रिया को ज्यादा लोगों तक पहुंचाना और उसे अलग-अलग जगहों तक ले जाना था, ताकि ज्यादा लोग इस कला को सीख सकें.
उन्होंने कहा, “जो लोग इतनी ज्यादा प्रतियोगिता के बाद भी यहां जगह नहीं बना पाए, या जिनकी उम्र 50, 55 या 18 साल है, वे भी इसमें शामिल हो सकते हैं. मुंबई में हमने उम्र की सीमा 18 से 60 साल रखी है. अगर कोई 12वीं पास है या ग्रेजुएशन कर रहा है और इसे संभाल सकता है, तो वह इसमें शामिल हो सकता है. सेंटर इन्हीं सभी चीजों को ध्यान में रखकर खोला गया था.”
लेकिन अभिनेता और थिएटर डायरेक्टर अविजित दत्त सवाल उठाते हैं कि इस कदम का संस्था की पहचान और एक अलग विरासत वाले राष्ट्रीय केंद्र के रूप में NSD की पहचान पर क्या असर पड़ सकता है.
उन्होंने कहा, “मॉस्को आर्ट थिएटर मॉस्को में है. RADA लंदन में है, इसी तरह LAMDA भी. NSD हमेशा से दिल्ली की संस्था रही है. क्या इसे देश के दूसरे हिस्सों में ले जाने से इसकी पहचान और महत्व कम नहीं होता?”
यह विस्तार सिर्फ मुंबई तक सीमित नहीं है. गोवा, भुवनेश्वर, चेन्नई, उदयपुर, इंदौर और भोपाल में नए क्षेत्रीय कैंपस बनाने की योजना पर काम चल रहा है, हालांकि इनकी जगह अभी तय नहीं हुई है.
NSD के डीन शांतनु बोस ने कहा, “कई दूसरे राज्यों में बातचीत चल रही है. जैसे-जैसे चीजें आगे बढ़ेंगी, हम भी आगे बढ़ते जाएंगे.” बिहार का कैंपस पहले ही तय हो चुका है. 1 सितंबर को राज्य सरकार ने कहा था कि वह NSD कैंपस के लिए उचित जमीन उपलब्ध कराएगी और निर्माण की 50 प्रतिशत लागत वहन करेगी.
क्लासरूम के अंदर
राज ने एक साल के कोर्स में एडमिशन लिया. ट्रेनिंग के शुरुआती महीनों में क्लास में शरीर की गतिविधियों, बोलने और फिजिकल थिएटर पर ध्यान दिया गया. इस कोर्स में थिएटर की थोड़ी झलक थी, लेकिन ज्यादा ध्यान वास्तविकता और इंसानी व्यवहार पर था. क्लास सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक चलती थीं. इसकी शुरुआत तीन घंटे की बॉडी मूवमेंट क्लास से होती थी. इसके बाद, बुलाए गए गेस्ट फैकल्टी के हिसाब से मोनोलॉग या सीन की क्लास होती थी, जो बाकी दिन चलती थी.
उन्होंने जमशेदपुर के अपने समय को याद करते हुए कहा, “मैं ऑडिशन देती थी, लेकिन मैं अपनी ही दुनिया में थी.” लेकिन NSD के मुंबई सेंटर ने उन्हें उस इंडस्ट्री तक आसानी से पहुंचने का मौका दिया, जिसमें वह हमेशा काम करना चाहती थीं.

अब वह बेहतर प्रोडक्शन हाउस में लगातार ऑडिशन दे रही हैं. जिन लोगों के लिए उन्होंने ऑडिशन दिया था, उनसे बाद में NSD की बिल्डिंग में फिर मुलाकात होती थी.
दिल्ली के तीन साल के डिग्री कोर्स में मॉडर्न इंडियन ड्रामा, क्लासिकल इंडियन ड्रामा और एस्थेटिक्स, वर्ल्ड ड्रामा, थिएटर म्यूजिक, थिएटर आर्किटेक्चर, सीनिक डिजाइन और स्टेज टेक्नोलॉजी, कॉस्ट्यूम डिजाइन और स्टेज लाइटिंग जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं. इसके साथ प्रैक्टिकल काम भी होता है. NSD के डीन शांतनु बोस ने साफ किया कि तीन साल के कोर्स में थ्योरी सिर्फ 25 प्रतिशत है और बाकी प्रैक्टिकल है. इसी वजह से मुख्य कोर्स का प्रैक्टिकल हिस्सा क्षेत्रीय केंद्रों की तुलना में काफी ज्यादा है. उन्होंने कहा कि नए कोर्स के कम समय में जितना पढ़ाया जा सकता है, वे उतना पढ़ाने की कोशिश करते हैं.
उन्होंने कहा, “सभी केंद्रों में मुंबई के कोर्स NSD के मुख्य तीन साल के कोर्स से अलग हैं. इनमें कम समय के और छोटे स्तर के फोकस होते हैं और हम उसी फोकस को पूरा करने की कोशिश करते हैं.”
छोटे कोर्स की कीमत क्या है
दिल्ली कैंपस में छात्रों को कोई फीस नहीं देनी पड़ती है और सभी छात्रों को स्कॉलरशिप मिलती है. यह स्कॉलरशिप संस्कृति मंत्रालय की ओर से दी जाती है, ताकि उन्हें आर्थिक मदद मिल सके. बोस ने कहा कि इन कोर्स की लागत कम है, क्योंकि मुख्य कोर्स के लिए संस्थान के पास पहले से ही इन्फ्रास्ट्रक्चर और फैकल्टी मौजूद है. हालांकि, मुंबई में एक साल के कोर्स में दाखिला लेने के लिए छात्रों को 5 लाख रुपये देने पड़ते हैं.
उन्होंने कहा, “वहां हमारी अपनी बिल्डिंग भी नहीं है… इसलिए इन सभी खर्चों की वजह से मुंबई में वही कोर्स चलाने में दिल्ली के मुकाबले ज्यादा खर्च आता है.” उन्होंने कहा कि इन कोर्स से जो भी पैसा आता है, उसे वापस सेंटर में ही लगाया जाता है. उन्होंने कहा, “सरकार हमें इसके लिए अलग से कोई ग्रांट नहीं देती है.”
थिएटर डायरेक्टर और एक्टर अस्मित के लिए फर्क सिर्फ इस बात का नहीं है कि कम समय वाले कोर्स में कितना कुछ पढ़ाया जा सकता है, बल्कि यह भी है कि ट्रेनिंग का समय कम होने पर छात्र क्या-क्या सीखने से रह सकते हैं. उनका मानना है कि डिग्री कोर्स छात्रों को अपने काम को ज्यादा व्यापक तरीके से समझने और उसके अलग-अलग पहलुओं को तलाशने का समय देता है, खासकर तब जब वे किसी प्रोफेशन को सीखने में अपनी जिंदगी के कई साल लगा रहे हों.
उन्होंने कहा, “किसी भी प्रोफेशन में प्रोफेशनल कहलाने के लिए आपको उस इंडस्ट्री या स्ट्रीम में एक तय समय तक प्रैक्टिस करनी पड़ती है. इसी वजह से इंजीनियरिंग में 4 साल लगते हैं, कॉमर्स या आर्ट्स की किसी भी दूसरी स्ट्रीम में 3 साल लगते हैं. PhD में 5-7 साल लगते हैं.”
उनका कहना है कि जब ट्रेनिंग का समय कम कर दिया जाता है, तो चीजों को अलग-अलग तरीके से समझने और तलाशने के मौके भी कम हो जाते हैं. उन्होंने कहा, “आप (स्टूडेंट) इसे हर संभव नजरिए से नहीं सोच पाएंगे. आप सिर्फ उन चीजों पर ध्यान देंगे जो इंडस्ट्री के लिए जरूरी हैं… इसका मतलब है कि जिस व्यक्ति का फायदा इस चीज से जुड़ा है, वही आपको बताएगा कि आपको कैसे जीना है.”
फीस के मॉडल को लेकर अस्मित और भी सीधे शब्दों में कहते हैं, “आप शिक्षा को एक इंडस्ट्री की तरह देख रहे हैं… आपको अपने टारगेट पूरे करने हैं. अपने टारगेट तक पहुंचने के लिए आपको उपलब्ध हर सीट से 5 लाख रुपये लेने हैं. तो आपकी तलाश कला नहीं है. आपकी तलाश मुनाफा है.”
तीन महीने का प्रोग्राम
तीन महीने का कोर्स ज्यादा छोटा है और खास तौर पर काम करने वाले प्रोफेशनल्स के लिए बनाया गया है. इसकी क्लास शाम 6 बजे से रात 10 बजे तक चलती है और इसमें कुल 20 छात्र हैं. इनमें से एक राजत बजाज हैं, जिन्होंने NSD दिल्ली में कई शॉर्ट-टर्म एक्टिंग कोर्स करने के बाद इस कोर्स में दाखिला लिया. वहां उन्होंने कई नाटकों में काम किया था, जिनमें शंतनु बोस का दि टोथ्स अब्दुल लतीफ खताना का आधे-अधूरे देवता और चिमन दास के निर्देशन में बना रक्त कल्याण शामिल हैं.
उनके लिए मुंबई जाना सिर्फ कोर्स करने की बात नहीं थी. अगर वह दिल्ली में रहते, तो उन्हें सिर्फ इस बात का इंतजार करना पड़ता कि कास्टिंग डायरेक्टर ऑडिशन लेने आएं. उन्होंने कहा, “वहां कोर्स करना एक ही समय में अलग-अलग प्रोडक्शन हाउस और कास्टिंग डायरेक्टर्स से जुड़ने का एक शानदार मौका था.”

दिल्ली में रहने के दौरान उन्होंने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए ऑडिशन देखे, लेकिन उनमें से किसी का भी कोई नतीजा नहीं निकला. उनके लिए किसी जगह जाकर ऑडिशन देना अलग असर डालता है, क्योंकि कास्टिंग डायरेक्टर की मौजूदगी “एक अलग और लंबे समय तक याद रहने वाला प्रभाव छोड़ती है.”
उनके कोर्स में ज्यादातर सेशन चार घंटे के होते हैं और इन्हें इंडस्ट्री के प्रोफेशनल्स कराते हैं, जिन्हें डायरेक्टर और डीन चुनते हैं. इनमें रंजन सिंह भी शामिल हैं, जिन्होंने दशकों तक बालाजी के साथ काम किया है. छात्रों को फिल्में दिखाई जाती हैं, उन्हें स्क्रिप्ट दी जाती है और उनसे एक्टिंग करने के लिए कहा जाता है.
दिल्ली के मुकाबले, जहां लाइव ऑडियंस के सामने स्टेज परफॉर्मेंस पर ज्यादा ध्यान दिया जाता था, बजाज ने पाया कि मुंबई के कोर्स में कैमरे के सामने एक्टिंग की जरूरतों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है. उन्होंने कहा, “मुंबई में ट्रेनिंग में योग, डांस और खास तौर पर कैमरा एक्टिंग शामिल है. इसमें कैमरे के एंगल, मिड-शॉट, वाइड शॉट और अपने एक्सप्रेशन को कितना रखना है, यह समझना भी शामिल है.”
उन्होंने कहा कि उन्हें सिर्फ इसलिए ज्यादा सीखने का मौका मिला क्योंकि माहौल बदल गया था. उनके बैच के साथी डेली सोप और फिल्मों में काम कर रहे थे, जिससे उन्हें इस काम की चुनौतियों और बारीकियों को समझने में मदद मिली.
उन्होंने कहा, “यशराज, बालाजी और फोर लायंस जैसे बड़े प्रोडक्शन हाउस सिर्फ दो मिनट की दूरी पर हैं. इससे नेटवर्किंग करना और प्रोफाइल छोड़ना काफी आसान हो जाता है.”
लेकिन तीन महीने के इस कोर्स ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि कम समय वाले पार्ट-टाइम फॉर्मेट में NSD से जुड़ी सख्ती और गहराई को कितना बरकरार रखा जा सकता है. अविजित दत्त मुंबई सेंटर को “टेस्ट द वॉटर्स” यानी पहले स्थिति को परखने की कोशिश के तौर पर देखते हैं. उन्होंने कहा, “वे पार्ट-टाइम कोर्स कर रहे हैं. और यह काम करने वाले प्रोफेशनल्स के लिए भी होगा. इसलिए यहां NSD वाली सख्ती और गहराई मौजूद नहीं होगी.”

कैमरे से आगे
पहला बैच करीब दो महीने में अपनी ट्रेनिंग पूरी करके इंडस्ट्री में जाने वाला है. लेकिन त्रिपाठी नहीं चाहते कि उनकी सीख सिर्फ कैमरे तक सीमित रहे. वह चाहते हैं कि छात्र पृथ्वी जैसे थिएटर में भी परफॉर्म करें.
उन्होंने कहा, “मान लीजिए आपके पास एक ऐसा सीन है जिसमें आपको रोना है. क्या आप सिनेमा में हंसेंगे और स्टेज पर रोएंगे?” उन्होंने कहा कि दोनों तरह के काम में वे स्टेज पर असलियत लाने की कोशिश कर रहे हैं, बस माध्यम अलग हैं.
उन्होंने बताया कि NSD ने कई बार पृथ्वी थिएटर से संपर्क किया है, लेकिन अभी तक वहां से कोई जवाब नहीं मिला है. पृथ्वी थिएटर पूरे भारत के आधुनिक थिएटर में एक महत्वपूर्ण जगह रखता है और त्रिपाठी इसे “तीर्थ स्थल” मानते हैं.
उन्होंने कहा, “जिस दिन हमें मिस्टर कपूर की कृपा मिल जाएगी, हम पृथ्वी में अपना नाटक करने में सफल हो जाएंगे… लेकिन हमें कभी भी इसके लायक नहीं समझा गया.” उन्होंने कहा, “अगर वे दया दिखाएंगे, तो हमें अनुमति देंगे. हमारे लिए पृथ्वी बहुत बड़ी चीज है, बहुत महत्वपूर्ण जगह है और इसका अपना महत्व है.”
फिलहाल पृथ्वी थिएटर को संभाल रहे कुणाल कपूर की थिएटर की भूमिका को लेकर सोच अलग है. यह थिएटर साल में करीब 300 दिन चलता है और यहां लगभग 600 शो होते हैं.
उन्होंने कहा, “हम पृथ्वी थिएटर हैं, हम शिक्षक नहीं हैं, हम पढ़ाते नहीं हैं.” उन्होंने यह भी कहा कि डिग्री किसी व्यक्ति को कलाकार नहीं बना सकती.
उन्होंने कहा, “अगर आप एक पेंटर जैसे कलाकार हैं, तो आप रंगों को मिलाना सीखेंगे. जब आप इस रंग को उस रंग के साथ मिलाते हैं तो क्या होता है, आप यह सीखेंगे. आप लाइट और शेड सीखेंगे, है ना?” उनका कहना है कि कला एक “टैलेंट और स्किल” है, जिसमें कोई डिग्री या औपचारिक शिक्षा मदद नहीं कर सकती, जब तक कि कोई मेडिसिन या कानून जैसे ऐसे प्रोफेशन में न जा रहा हो, जहां डिग्री जरूरी होती है.
उन्होंने कहा, “कला परफॉर्मेंस आर्ट है. उदाहरण के लिए, ऐसे बहुत से कलाकार हैं जिन्होंने कोई ट्रेनिंग नहीं ली है. फिर भी वे बहुत अच्छे कलाकार बने हैं. इनमें पेंटर, सिंगर और एक्टर सभी शामिल हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: ‘गुजराती अस्मिता’ से ‘मोदी पावर’ तक: क्यों बदल गया कुछ गुजराती पर्यटकों का व्यवहार