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Monday, 19 October, 2026
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सिर्फ AI की वजह से दुनिया में हर साल 4.6 करोड़ टन ई-कचरा पैदा होगा: स्टडी

अभी दुनिया भर में 12,259 डेटा सेंटर चल रहे हैं. इनमें से हर डेटा सेंटर से ट्रांसफॉर्मर, बिजली की केबल, लिथियम-आयन बैटरी, कूलेंट आदि के रूप में कचरा पैदा होने की उम्मीद है.

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नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से पैदा होने वाला इलेक्ट्रॉनिक कचरा सिर्फ डेटा सेंटर तक सीमित नहीं है. एक नई स्टडी के मुताबिक, यह पहले लगाए गए अनुमानों से 40-60 प्रतिशत ज्यादा हो सकता है. यह स्टडी वैश्विक गैर-सरकारी संगठन बेसल एक्शन नेटवर्क ने की है.

अमेरिका स्थित इस संगठन ने अपनी रिपोर्ट ‘द कमिंग AI वेस्ट वेव’ में अनुमान लगाया है कि सिर्फ AI की वजह से दुनिया में हर साल 3 से 4.6 करोड़ टन ई-कचरा पैदा होगा. इसकी बड़ी वजह AI के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के कारण हार्डवेयर और बिजली से जुड़े उपकरणों की संख्या में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी है.

रिपोर्ट में कहा गया, “अब तक AI डेटा सेंटरों के पर्यावरण पर पड़ने वाले असर की जांच लगभग पूरी तरह कार्बन उत्सर्जन और मीठे पानी के इस्तेमाल पर केंद्रित रही है. ई-कचरे का असर, उसकी संभावित जहरीली प्रकृति और पर्यावरण से जुड़े न्याय के असर को अब तक काफी हद तक नज़रअंदाज़ किया गया है.”

बेसल एक्शन नेटवर्क के निष्कर्षों के मुताबिक, 2025 से 2030 के बीच दुनियाभर में सिर्फ AI का बुनियादी ढांचा तैयार करने पर करीब 7 ट्रिलियन डॉलर निवेश होने की उम्मीद है. इससे 2030 तक डेटा सेंटर की क्षमता में करीब 219 गीगावाट की बढ़ोतरी होगी. इसे समझने के लिए, डेटा सेंटर की 1 गीगावाट क्षमता के लिए 70,000 टन इलेक्ट्रोमैकेनिकल बुनियादी ढांचे की जरूरत होती है. इसमें सर्वर, बिजली बांटने वाले नेटवर्क, स्टोरेज, कूलिंग और एक्सेलरेटर शामिल हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, ये चीजें भी AI की ‘छिपी हुई’ लागत का हिस्सा हैं. पहले लगाए गए ज्यादातर अनुमानों में AI से पैदा होने वाले कचरे की गणना के लिए सिर्फ डेटा सेंटर, खासकर सर्वर और एक्सेलरेटर को देखा गया था. हालांकि, डेटा सेंटर में मौजूद कुल इलेक्ट्रॉनिक बुनियादी ढांचे में इनकी हिस्सेदारी सिर्फ 13 प्रतिशत है.

स्टडी में कहा गया कि जब पूरे सिस्टम को ध्यान में रखा जाता है, तो AI की वजह से पैदा होने वाले ई-कचरे का अनुमान 40-60 प्रतिशत तक बढ़ जाता है.

अतिरिक्त AI कचरा क्यों?

AI डेटा सेंटर अतिरिक्त ई-कचरा पैदा कर रहे हैं. इसकी वजह यह है कि AI के तेज़ी से विस्तार के बावजूद इस तकनीक ने मूर के नियम के टूटने की स्थिति पैदा कर दी है. इंटेल के सह-संस्थापक गॉर्डन मूर ने 1965 में पहली बार यह नियम बताया था. इसके मुताबिक, किसी चिप की कंप्यूटिंग क्षमता लगभग हर दो साल में बेहतर होती है. इससे बिना ज़रूरी औसत हार्डवेयर का आकार बढ़ाए ज्यादा ताकतवर कंप्यूटर बनाए जा सकते थे. इसे वर्टिकल स्केलिंग कहा जाता था.

हालांकि, AI के मामले में तकनीक इतनी तेजी से आगे बढ़ रही है कि वर्टिकल स्केलिंग को बनाए रखना मुश्किल है. इसके बजाय, ज्यादातर कंपनियां ज्यादा चिप्स जोड़कर कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ा रही हैं. इससे इलेक्ट्रोमैकेनिकल बुनियादी ढांचा बढ़ रहा है और इस वजह से ज्यादा कचरा भी पैदा हो रहा है.

रिपोर्ट में कहा गया, “एक ही चिप की हर नई पीढ़ी को तेज बनाने के बजाय (वर्टिकल स्केलिंग), AI का बुनियादी ढांचा समानांतर रूप से काम करने वाली इन खास चिप्स की बहुत बड़ी संख्या लगाकर बढ़ाया जाता है (हॉरिजॉन्टल स्केलिंग).”

रिपोर्ट में AI क्लाउड कंप्यूटिंग से जुड़ी एक और खास स्थिति के बारे में बताया गया है. यह AI कंपनियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सर्वरों को लेकर “पशु बनाम पालतू जानवर” वाली सोच है. इस शब्द का इस्तेमाल पहली बार माइक्रोसॉफ्ट के क्लाउड इंजीनियर बिल बेकर ने किया था. बेकर ने बताया कि पहले टेक्नोलॉजी कंपनियां सर्वरों को पालतू जानवरों की तरह मानती थीं. अगर कोई सर्वर खराब हो जाता था, तो उसे ठीक करके फिर से उसकी पुरानी स्थिति में लाया जाता था.

हालांकि, AI और क्लाउड कंप्यूटिंग के दौर में सर्वरों को पशुओं की तरह माना जाता है. अगर कोई सर्वर खराब हो जाता है, तो आज की कंप्यूटिंग जरूरतों के लिए जरूरी सर्वरों की बहुत बड़ी संख्या के कारण उसे ठीक करने के बजाय दूसरे सर्वर से बदल दिया जाता है. यही सोच AI से पैदा होने वाले ई-कचरे और ‘सर्कुलर इकॉनमी’ यानी ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें चीजों का दोबारा इस्तेमाल किया जाता है, के सिद्धांत से दूर जाने को समझाने में भी मदद करती है.

अभी दुनिया भर में 12,259 डेटा सेंटर चल रहे हैं. इनमें से 5,388 अमेरिका में हैं. रिपोर्ट ने बताया कि अमेरिका में 4,871 और डेटा सेंटर बनाने की योजना भी चल रही है. वहीं, यूरोप और एशिया भी 2030 तक डेटा सेंटर की सुविधाओं का विस्तार करने की तैयारी कर रहे हैं.

इनमें से हर डेटा सेंटर से ट्रांसफॉर्मर, बिजली की केबल, लिथियम-आयन बैटरी, कूलेंट और दूसरे हार्डवेयर के रूप में कचरा पैदा होने की उम्मीद है. रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से ज्यादातर चीजें 2.5 से 5 साल में पुरानी हो जाने या बदलने के लिए तैयार की जाती हैं. इन्हें खतरनाक कचरे की श्रेणी में भी रखा जा सकता है, खासकर इसलिए क्योंकि डेटा सेंटर से निकलने वाले ज्यादातर कचरे को अलग-अलग श्रेणियों के हिसाब से अलग नहीं किया जाएगा.

रिपोर्ट में कहा गया, “इस पेपर के अनुमान के मुताबिक, 2050 तक हम हर साल करीब 196 से 211 मिलियन टन ई-कचरा पैदा कर रहे होंगे. यह आज दुनिया में हर साल पैदा होने वाले ई-कचरे की मात्रा का लगभग तीन गुना होगा.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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