नई दिल्ली: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संघर्षविराम को एक साल से ज्यादा समय हो चुका है, लेकिन भले ही बंदूकें शांत हो गई हों, भारत का पड़ोसी देश अपनी तैयारी लगातार मजबूत करता रहा है. पिछले 16 महीनों में पाकिस्तान ने जासूसी सैटेलाइट्स का एक नेटवर्क तैयार किया है, जिसे खास तौर पर भारतीय क्षेत्र पर लगातार नज़र रखने के लिए बनाया गया है.
जनवरी 2025 से जून 2026 के बीच पाकिस्तान ने छह अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट लॉन्च किए. इन सभी को सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में स्थापित किया गया है, जो निगरानी के लिए बेहद उपयुक्त मानी जाती है.
सामूहिक रूप से ये सैटेलाइट्स कम से कम हर दो दिन में एक बार भारतीय क्षेत्र की मैपिंग कर रहे हैं.
अपोलो मैपिंग और SkyFi के ज़रिए की गई पड़ताल में दिप्रिंट ने पाया कि इन सैटेलाइट्स को इस तरह तैनात किया गया है कि पाकिस्तान को भारतीय क्षेत्र की लगातार तस्वीरें मिलती रहें. ये सैटेलाइट्स अफगानिस्तान, चीन, ईरान और उत्तरी हिंद महासागर जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों की भी निगरानी कर रहे हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि इसका उद्देश्य भारत की सीमाओं के बाहर होने वाली रणनीतिक गतिविधियों पर नज़र रखना और नौसैनिक जहाजों तथा भारत आने वाले वाणिज्यिक जहाजों जैसी महत्वपूर्ण संपत्तियों की आवाजाही को ट्रैक करना हो सकता है.
लेकिन ज़मीन की निगरानी ही इनका एकमात्र हथियार नहीं है. ये सैटेलाइट्स रियल टाइम में सैन्य गतिविधियों पर नज़र रख सकते हैं और छिपाए गए सैन्य संसाधनों को भी काफी स्पष्टता के साथ पहचान सकते हैं.
और यह पूरा नेटवर्क सिर्फ 16 महीनों के भीतर तैयार किया गया है.
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि चीन की तकनीकी और प्रक्षेपण सहायता के साथ पाकिस्तान के अंतरिक्ष कार्यक्रम में आई अचानक तेजी और इन सैटेलाइट्स के लिए चुनी गई कक्षाएं महज एक संयोग नहीं हो सकतीं.
इसरो के एक पूर्व अधिकारी ने कहा, “सीधी सी बात है. चलने-फिरने में दिक्कत वाला कोई व्यक्ति एक दिन उठकर अचानक उसैन बोल्ट को नहीं हरा सकता. इसके पीछे और भी बहुत कुछ है.”
यह स्थिति इसलिए भी चिंता बढ़ाने वाली है क्योंकि पिछले एक साल में भारत के कई सैटेलाइट प्रक्षेपण लगातार विफल रहे हैं, जिनमें तीन रणनीतिक महत्व वाले सैटेलाइट भी शामिल थे.
भारतीय नौसेना के पूर्व फ्लैग ऑफिसर सुधीर पिल्लई ने कहा कि इन “नागरिक” सैटेलाइट्स के नेटवर्क का उभरना, जो संयोगवश सैन्य उपयोग की क्षमता भी रखते हैं, किसी भी तरह से संयोग नहीं है.
उन्होंने एक ब्लॉग पोस्ट में लिखा, “जनवरी 2025 से अप्रैल 2026 के बीच SUPARCO ने लगभग आधा दर्जन सैटेलाइट कक्षा में स्थापित किए. यह गति किसी सामान्य कार्यक्रम के विस्तार की नहीं, बल्कि एक बड़े संरचनात्मक बदलाव की ओर इशारा करती है.”
उन्होंने आगे लिखा, “इन सैटेलाइट्स की कक्षीय संरचना, इनके सेंसर और सबसे महत्वपूर्ण इनके संस्थागत स्रोत एक अलग और कहीं अधिक महत्वपूर्ण कहानी बताते हैं.”
पाकिस्तान के पहले सैटेलाइट Badr-1 के 1990 में लॉन्च होने के बाद, उसकी अंतरिक्ष एजेंसी को अगला मिशन करने में 11 साल लग गए थे. 2001 और 2002 में लॉन्च के बाद पाकिस्तान का अगला सैटेलाइट 2011 में लॉन्च हुआ. इसके बाद 2013 में एक और प्रक्षेपण हुआ, जबकि 2018 और 2024 में दो-दो सैटेलाइट लॉन्च किए गए.
पाकिस्तान के हालिया सैटेलाइट लॉन्च
पिछले साल 14 जनवरी को पाकिस्तान की अंतरिक्ष एजेंसी Space and Upper Atmosphere Research Commission (SUPARCO) ने SpaceX के Falcon-9 रॉकेट के जरिए PAUSAT-1 लॉन्च किया. यह अर्थ-ऑब्जर्वेशन 16U CubeSat है. इस सैटेलाइट को पृथ्वी से लगभग 513 किलोमीटर की ऊंचाई और 97.4 डिग्री झुकाव वाली सूर्य-समकालिक निम्न पृथ्वी कक्षा (Sun-Synchronous Low-Earth Orbit) में स्थापित किया गया.
इसके सिर्फ तीन दिन बाद पाकिस्तान ने एक और अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट PRSC-EO1 लॉन्च किया. इसे चीन के Long March-2D रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में भेजा गया.
ये दोनों मिशन पहलगाम हमले से लगभग तीन महीने पहले और भारत के ऑपरेशन सिंदूर से भी करीब तीन महीने पहले हुए थे.

लगातार हुए इन दो लॉन्च ने पाकिस्तान के लंबे समय से लगभग ठप पड़े अंतरिक्ष कार्यक्रम में नई जान फूंकने का काम किया.
और पाकिस्तान यहीं नहीं रुका. इसके बाद उसने तीन और मिशन लॉन्च किए.
31 जुलाई पिछले साल पाकिस्तान ने चीन के सहयोग से हाई-रिजॉल्यूशन Pakistan Remote Sensing Satellite-2 (PRSS-2) लॉन्च किया.
इसके बाद 19 अक्टूबर को पाकिस्तानी अंतरिक्ष एजेंसी ने एचएस-1 लॉन्च किया. यह देश का पहला हाइपरस्पेक्ट्रल अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट है, जिसे सैकड़ों लगातार और बेहद संकीर्ण तरंगदैर्घ्य (वेवलेंथ) में तस्वीरें लेने के लिए तैयार किया गया है.
एक इसरो अधिकारी ने कहा, “चीनी सैटेलाइट भारत के क्षेत्र की निगरानी भारत से भी ज्यादा करते हैं. हमारे क्षेत्र का हर इंच निगरानी में है.”
इन सैटेलाइट्स से मिलने वाली तस्वीरों की मदद से छिपाए गए सैन्य ठिकानों या कैमोफ्लाज की पहचान की जा सकती है, अलग-अलग तरह की सामग्रियों में फर्क किया जा सकता है और जमीन पर हुए ढांचागत बदलावों का पता लगाया जा सकता है.
इस साल पाकिस्तान ने दो और सैटेलाइट मिशन लॉन्च किए—PRSC-EO2 और PRSC-EO3. इन्हें क्रमशः फरवरी और अप्रैल में लॉन्च किया गया.
इन दोनों मिशनों को हाई-रिजॉल्यूशन ऑप्टिकल इमेजिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) बेस्ड इमेज प्रोसेसिंग के लिए तैयार किया गया है. इन क्षमताओं की मदद से ये सैन्य ठिकानों की निगरानी कर सकते हैं और सीमावर्ती क्षेत्रों पर लगातार नज़र रख सकते हैं.
कक्षा (ऑर्बिट) क्यों महत्वपूर्ण है
नई तकनीक के अलावा, पाकिस्तान के इन अंतरिक्ष मिशनों में एक और समान बात है.
पाकिस्तान के हालिया सभी सैटेलाइट्स को ऐसे ऑर्बिट में स्थापित किए गए, जिससे वे हर बार लगभग एक ही समय पर उसी स्थान के ऊपर से गुज़रते हैं. इससे वक्त के साथ ली गई तस्वीरों की तुलना करना और ज़मीन पर हुए बदलावों का पता लगाना आसान हो जाता है.
सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट एक प्रकार की ध्रुवीय कक्षा (पोलर ऑर्बिट) होती है, जिसमें सैटेलाइट सूर्य के साथ तालमेल बनाए रखता है क्योंकि यह पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर होने वाली गति के साथ मेल खाती है, इसलिए सैटेलाइट हर बार लगभग एक ही स्थानीय समय पर उसी स्थान के ऊपर से गुज़रता है.


लेकिन यह कहानी का सिर्फ एक छोटा हिस्सा है.
असल मकसद का संकेत हाल ही में अमेरिका की अंतरिक्ष निगरानी सॉफ्टवेयर कंपनी COMSPOC ने दिया. कंपनी ने LinkedIn पर एक पोस्ट में बताया कि पाकिस्तान का PRSC-EO3 एक “ऑप्टिकल सैटेलाइट के लिए असामान्य कक्षा” में काम कर रहा है.
कंपनी के निष्कर्षों के अनुसार, यह पाकिस्तानी सैटेलाइट खास तौर पर कश्मीर पर केंद्रित है.
पोस्ट में कहा गया, “अधिकांश ऑप्टिकल लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट्स सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट (लगभग 97 से 105 डिग्री झुकाव) का उपयोग करते हैं, जिससे तस्वीरों के लिए समान रोशनी मिलती है. लेकिन PRSC-EO3 को 38 डिग्री झुकाव वाली कक्षा और 334 डिग्री RAAN में रखा गया है. इससे वैश्विक कवरेज और समान रोशनी की सुविधा कम हो जाती है, लेकिन 20 से 40 डिग्री उत्तर अक्षांश वाले क्षेत्र पर बार-बार निगरानी की क्षमता बढ़ जाती है. इसमें पाकिस्तान, भारत और कश्मीर शामिल हैं.”
इसका मतलब यह है कि PRSC-EO3 अधिकांश अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट्स की तरह सामान्य सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट का पालन नहीं करता. इसके बजाय इसे 38 डिग्री झुकाव वाली कक्षा और 334 डिग्री राइट एसेन्शन ऑफ एसेन्डिंग नोड (RAAN) में स्थापित किया गया है.


RAAN एक कक्षीय पैरामीटर है, जिसका उपयोग किसी सैटेलाइट की कक्षा के स्थान और दिशा को तय करने के लिए किया जाता है.
लो इंक्लिनेशन सैटेलाइट के कवरेज क्षेत्र को सीमित कर देता है, लेकिन किसी विशेष क्षेत्र के ऊपर उसके बार-बार लौटने की क्षमता बढ़ा देता है. दूसरे शब्दों में, यह सैटेलाइट बड़े वैश्विक कवरेज की जगह छोटे भौगोलिक क्षेत्र की ज्यादा बार निगरानी करने को प्राथमिकता देता है.
COMSPOC के अनुसार, इस सैटेलाइट की ग्राउंड ट्रैक लगभग 38 डिग्री उत्तर से 38 डिग्री दक्षिण अक्षांश के बीच है. यह क्षेत्र भारत के जम्मू-कश्मीर और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों के आसपास केंद्रित है, जो लगभग 32°N से 37°N अक्षांश तक फैला हुआ है.
इसका मतलब है कि यह सैटेलाइट इस क्षेत्र के ऊपर अधिक बार गुज़र सकता है—संभवतः एक दिन में कई बार. इससे पाकिस्तान को सामान्य सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट की तुलना में कहीं अधिक घनी और लगातार तस्वीरें मिल सकती हैं.
COMSPOC ने कहा, “16 महीनों में पांच रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट. सभी चीन द्वारा लॉन्च किए गए. सभी की कक्षाएं दक्षिण एशिया पर ज्यादा कवरेज देने वाली हैं. आधिकारिक तौर पर इनके मिशन नागरिक उपयोग के बताए गए हैं. लेकिन इनकी कक्षीय संरचना एक बहु-उद्देश्यीय ISR (इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस) नेटवर्क जैसी दिखाई देती है.”
इन सैटेलाइट्स की मदद से गतिविधियों पर रियल टाइम में नजर रखी जा सकती है और ये प्रिसिजन-गाइडेड स्ट्राइक को सपोर्ट देने की क्षमता भी रखते हैं.
नागरिक सैटेलाइट, लेकिन सैन्य नजर
विशेषज्ञों का कहना है कि इन सैटेलाइट्स को कृषि, आपदा प्रबंधन और दूरसंचार जैसे नागरिक उद्देश्यों के लिए पेश किया गया हो सकता है, लेकिन इनके सैन्य उपयोग को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.
अश्विन प्रसाद राव, जो अंतरिक्ष रणनीति विशेषज्ञ हैं और तक्षशिला संस्थान के एडवांस्ड मिलिट्री टेक्नोलॉजीज एंड आउटर स्पेस प्रोग्राम में स्टाफ रिसर्च एनालिस्ट हैं, उन्होंने दिप्रिंट को बताया कि भारत की निगरानी तीन स्रोतों से हो सकती है—समर्पित सैन्य सैटेलाइट, पृथ्वी अवलोकन करने वाले दोहरे उपयोग (ड्यूल-यूज) वाले सैटेलाइट, और वाणिज्यिक सैटेलाइट सेवाएं (जैसे Vantor, जिसे पहले Maxar के नाम से जाना जाता था).
राव ने कहा, “असल में ज्यादातर व्यावसायिक अर्थ-ऑब्जर्वेशन तस्वीरें पैसे देकर खरीदी जा सकती हैं या किसी विशेष स्थान की तस्वीर लेने का निर्देश दिया जा सकता है. इसमें विदेशी सरकारें भी शामिल हैं, जो भारतीय क्षेत्रों की तस्वीरें हासिल कर सकती हैं.”
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि आज के दौर में लगभग हर वह अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट, जिसे नागरिक उपयोग के लिए बनाया गया है, सैन्य उद्देश्यों के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है और इसका उल्टा भी सही है.
उन्होंने कहा कि सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट का इस्तेमाल अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट्स के लिए कोई असामान्य बात नहीं है.
राव ने कहा, “असल में ज्यादातर व्यावसायिक अर्थ-ऑब्जर्वेशन तस्वीरें भुगतान करने वाले ग्राहकों द्वारा खरीदी जा सकती हैं या उनके निर्देश पर ली जा सकती हैं, जिनमें विदेशी सरकारें भी शामिल हैं, ताकि भारतीय ठिकानों की तस्वीरें हासिल की जा सकें.”
राव ने हाल ही में पश्चिम एशिया में हुए संघर्ष का उदाहरण देते हुए बताया कि व्यावसायिक सैटेलाइट तस्वीरें न तो पूरी तरह निष्पक्ष होती हैं और न ही हमेशा उपलब्ध रहने की गारंटी होती है.
एक तरफ, अमेरिकी कंपनी Planet Labs ने अप्रैल 2026 में अमेरिकी सरकार के अनुरोध पर ईरान और व्यापक संघर्ष क्षेत्र की तस्वीरें उपलब्ध कराना सीमित कर दिया था. इसके बाद उसने “मैनेज्ड एक्सेस” यानी मामले-दर-मामले के आधार पर पहुंच देने की नीति अपनाई.
इस घटना ने यह दिखाया कि संघर्ष के दौरान व्यावसायिक सैटेलाइट सेवा प्रदाता अपने देश की सरकार के कहने पर तस्वीरों की उपलब्धता सीमित कर सकते हैं.
दूसरी तरफ, फाइनेंशियल टाइम्स ने लीक हुए ईरानी दस्तावेजों के हवाले से रिपोर्ट किया था कि ईरान की Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) ने अपने हमलों से पहले अमेरिकी सैन्य ठिकानों की निगरानी के लिए चीन निर्मित एक सैटेलाइट हासिल किया था और उसे निर्देश भी दिए थे.
हालांकि, चीन ने इस दावे को खारिज कर दिया था.
राव ने कहा कि यह खंडन अपने आप में काफी कुछ बताता है. रिपोर्टों के अनुसार, ईरान उस सैटेलाइट का मालिक था और उसी ने उसे निर्देश दिए थे, इसलिए चीन यह कह सकता था कि सैटेलाइट किस दिशा में देखेगा, इसमें उसकी कोई भूमिका नहीं थी.
उन्होंने कहा, “यही वजह है कि वे सेवा नहीं, बल्कि क्षमता बेचते हैं. आप किसी को आसमान में आंखें दे देते हैं और फिर भी कह सकते हैं कि उसने उनका इस्तेमाल कैसे किया, उसमें आपका कोई हाथ नहीं था.”
उन्होंने आगे कहा, “आज की दुनिया में इसके बारे में बहुत कुछ नहीं किया जा सकता. भारत को यह समझना होगा कि उसके क्षेत्र पर लगातार नजर रखी जा रही है और उसे भी अंतरिक्ष में अपनी निगरानी क्षमता, यानी अपनी ‘आंखें’, और बढ़ानी होंगी.”
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चीन-पाकिस्तान की साझेदारी
अंतरिक्ष और रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं को अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए.
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के एक पूर्व अधिकारी, जो कई वर्षों से चीन और पाकिस्तान के अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर नजर रख रहे हैं, ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के अंतरिक्ष कार्यक्रम एक-दूसरे के पूरक बन गए हैं.
उन्होंने कहा कि दोनों देशों के कार्यक्रमों के बीच सक्रिय रूप से सूचनाओं का आदान-प्रदान भी हो रहा है.
अधिकारी ने कहा, “चीनी सैटेलाइट भारत के क्षेत्र की निगरानी भारत से भी ज्यादा करते हैं. हमारे क्षेत्र का हर इंच निगरानी में है.”
अधिकारी ने यह भी कहा कि ओपन-सोर्स सामग्री से संकेत मिले हैं कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन और पाकिस्तान के बीच सहयोग था.
हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन माना जाता है कि पाकिस्तान ने चीन के सैटेलाइट नेटवर्क, खासकर Yaogan और Gaofan सीरीज़ पर भरोसा किया था.
चीन का अंतरिक्ष कार्यक्रम काफी हद तक गोपनीय तरीके से संचालित होता है, लेकिन उसके कुछ सैटेलाइट दुनिया की सबसे उन्नत पृथ्वी-अवलोकन क्षमताओं में शामिल हैं.
चीन की याओगान सैटेलाइट श्रृंखला, जिसका अर्थ “रिमोट सेंसिंग” होता है, एक अंतरिक्ष आधारित निगरानी प्रणाली है, जिसकी पहुंच पृथ्वी की कम से कम एक-तिहाई सतह तक है.
2025 में मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान (MP-IDSA) की चीन की अंतरिक्ष आधारित निगरानी क्षमताओं पर जारी रिपोर्ट में कहा गया था, “इनकी रिजॉल्यूशन इतनी अच्छी है कि बड़े जहाजों का पता लगाया जा सकता है और संभवतः उनकी पहचान भी की जा सकती है. ये सैटेलाइट हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरें और हर मौसम में, दिन-रात निगरानी की क्षमता प्रदान करते हैं, यहां तक कि बादलों के बीच से भी. याओगान सैटेलाइट श्रृंखला का एक प्रमुख उद्देश्य समुद्री निगरानी है और ये जहाजों तथा अर्ली वार्निंग विमानों का पता लगा सकते हैं.”
इसके अलावा Gaofan और Ziyuan सीरीज़ के सैटेलाइट हाई-डेफिनिशन थ्रीडी तस्वीरें और मल्टीस्पेक्ट्रल डेटा भी उपलब्ध करा सकते हैं.
17 मार्च को प्रकाशित स्वराज्य मैगज़ीन की एक रिपोर्ट, जिसका शीर्षक था—“China Has Built A Triad Of Satellites, Towers And Fibre To Never Lose Its Way In War. India Doesn’t Have One”, ने भी चीन और पाकिस्तान के बीच डेटा साझा करने के नेटवर्क को उजागर किया था.
पत्रकार प्रखर गुप्ता ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, “चीन ने यह बढ़त अपने सहयोगी देशों को भी दी है. 2018 में उसने पाकिस्तान को BeiDou की सैन्य-स्तर की नेविगेशन जानकारी तक पहुंच दी, जिससे मिसाइलों, विमानों और नौसैनिक प्लेटफॉर्मों की लक्ष्य साधने की क्षमता कहीं अधिक सटीक हो गई.”
रिपोर्ट में आगे कहा गया, “भारतीय अधिकारियों का कहना है कि इसके बाद पाकिस्तान सैन्य और नागरिक दोनों उपयोगों के लिए पूरी तरह BeiDou पर निर्भर हो गया और GPS पर उसकी निर्भरता समाप्त हो गई.”
पाकिस्तान के अंतरिक्ष कार्यक्रम की असामान्य रफ्तार
पिछले साल पाकिस्तान के अंतरिक्ष कार्यक्रम में आई अचानक तेजी और उसके बाद लगातार हो रहे लॉन्च ने भी कई सवाल खड़े किए हैं.
1961 में पाकिस्तान की अंतरिक्ष एजेंसी Space and Upper Atmosphere Research Commission (SUPARCO) की स्थापना के बाद से अब तक कुल 15 सैटेलाइट लॉन्च किए गए हैं. इनमें से छह लॉन्च सिर्फ पिछले 16 महीनों में हुए हैं.
2025 से पहले यह कार्यक्रम बेहद धीमी गति से आगे बढ़ रहा था.
1990 में पाकिस्तान के पहले सैटेलाइट Badr-1 के लॉन्च के बाद अगला मिशन करने में 11 साल लग गए थे. 2001 और 2002 में लॉन्च के बाद अगला सैटेलाइट 2011 में भेजा गया. फिर 2013 में एक लॉन्च हुआ और उसके बाद 2018 तथा 2024 में दो-दो सैटेलाइट लॉन्च किए गए.
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ हालिया लॉन्चों की संख्या (छह) ही नहीं, बल्कि जिस तेजी से ये हुए हैं, वह बाहरी मदद की संभावना की ओर इशारा करती है.
पाकिस्तान ने 14 जनवरी 2025 को PAUSAT-1 लॉन्च किया. इसके सिर्फ तीन दिन बाद PRSC-EO1 लॉन्च कर दिया गया. फिर केवल छह महीने के भीतर पाकिस्तानी अंतरिक्ष एजेंसी ने PRSS-2 भी लॉन्च कर दिया.
इसके बाद HS-1 और PRSC-EO2 के बीच सिर्फ चार महीने का अंतर रहा, और फिर PRSC-EO3 के लिए केवल दो महीने का इंतजार करना पड़ा.
ऐसे कार्यक्रम के लिए, जो पहले बेहद धीमी गति से आगे बढ़ता था, लगातार इतने कम समय में हुए ये लॉन्च एक बड़े बदलाव को दिखाते हैं.
यह रफ्तार कई पुराने और विकसित अंतरिक्ष कार्यक्रमों के बराबर मानी जा रही है. उदाहरण के लिए, European Space Agency (ESA) हर साल औसतन छह से सात लॉन्च करता है, जबकि भारत भी सालाना करीब छह कक्षीय (ऑर्बिटल) लॉन्च का औसत बनाए हुए है.
पूर्व इसरो अधिकारी ने कहा, “सीधी सी बात है. चलने-फिरने में दिक्कत वाला कोई व्यक्ति एक दिन उठकर अचानक उसैन बॉल्ट को नहीं हरा सकता. इसके पीछे और भी बहुत कुछ है.”
भारत का कमजोर पड़ा फोकस
इन घटनाक्रमों के बीच सबसे ज्यादा चिंता की बात भारत की अपनी हालिया असफलताएं हैं.
2025 और 2026 के बीच भारत को तीन रणनीतिक सैटेलाइट मिशनों में नुकसान उठाना पड़ा. इस साल जनवरी में इसरो अपने रणनीतिक सैटेलाइट EOS-N1, जिसे ‘अन्वेषा’ भी कहा जाता है, को उसकी तय कक्षा में स्थापित करने में असफल रहा.
EOS-N1, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा बनाया गया 150 किलोग्राम का अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट था.
इसे एक हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट के रूप में डिजाइन किया गया था. इसकी मदद से कई परतों के नीचे मौजूद सामग्री की पहचान की जा सकती थी, छिपाए गए हथियारों और टैंकों का पता लगाया जा सकता था, और राष्ट्रीय सीमाओं के आसपास होने वाली अवैध गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती थी.
यही वे क्षमताएं हैं, जो अक्सर इंसानी आंखों और सामान्य ऑप्टिकल इमेजिंग सैटेलाइट्स की नजर से छूट जाती हैं. इसी वजह से पाकिस्तान के हालिया हाइपरस्पेक्ट्रल सैटेलाइट लॉन्च खास महत्व रखते हैं.
विशेषज्ञों ने कहा है कि इसरो का ध्यान शायद ज्यादा चर्चित वैज्ञानिक मिशनों, जैसे चंद्रयान और गगनयान, पर अधिक केंद्रित रहा, जबकि अंतरिक्ष में तत्काल रणनीतिक जरूरतों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया.
इससे पहले, पिछले साल मई में भारत का EOS-09 सैटेलाइट (RISAT-1B) भी अपनी तय कक्षा तक पहुंचने में विफल रहा था.
लगभग 1,710 किलोग्राम वजनी EOS-09 भी एक अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट था. इसमें C-बैंड सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) लगाया गया था.
इसे खराब मौसम, भारी बारिश और घने बादलों के बीच भी हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरें उपलब्ध कराने के लिए डिजाइन किया गया था.
भारत के महत्वाकांक्षी नेविगेशन सैटेलाइट कार्यक्रम NavIC को भी जनवरी 2025 में झटका लगा, जब NVS-02 मिशन सफल नहीं हो पाया.
विशेषज्ञों ने फिर से यह सवाल उठाया कि कहीं ISRO का ध्यान चंद्रयान और गगनयान जैसे बड़े वैज्ञानिक मिशनों की ओर ज्यादा तो नहीं चला गया, जबकि अंतरिक्ष में जरूरी रणनीतिक जरूरतों पर अपेक्षाकृत कम फोकस रहा.
दिप्रिंट से बात करने वाले ISRO के एक अधिकारी ने कहा कि यह अंतरिक्ष क्षमताओं में तेज प्रगति का दौर है और कक्षा में निगरानी सहायता प्रणाली तैयार करना कोई गैरकानूनी काम नहीं है.
हालांकि उनका कहना था कि अगर भारत युद्ध जैसी स्थिति में बढ़त बनाए रखना चाहता है, तो उसे अपने पड़ोसी देशों की गति के साथ कदम मिलाकर चलना होगा.
अधिकारी ने कहा, “संघर्ष की स्थिति में जानकारी ही सबसे बड़ी ताकत होती है. हमने यह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान देखा और अमेरिका-ईरान युद्ध में भी देख रहे हैं. निगरानी का मुकाबला करने का एकमात्र तरीका और बेहतर निगरानी ही है.”
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