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Monday, 8 June, 2026
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ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच ट्रैक-II वार्ता के 3 दौर, फोकस में कॉनफ्लिक्ट मैनेजमेंट

EXCLUSIVE | ऑपरेशन सिंदूर के बाद दोनों देशों के बीच ट्रैक-II कूटनीति का तरीका बदला है. अब बातचीत विवाद सुलझाने के बजाय संघर्ष को संभालने पर ज्यादा केंद्रित है.

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नई दिल्ली: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच ट्रैक-II कूटनीति का तरीका बदल गया है. अब बातचीत पहले की तरह विवादों के समाधान पर नहीं, बल्कि संघर्ष प्रबंधन (कॉनफ्लिक्ट मैनेजमेंट) पर ज्यादा केंद्रित है. कई दशकों से ऐसी बातचीत का मुख्य उद्देश्य विवाद सुलझाना रहा था.

मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि मई 2025 के बाद से दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों के बीच ट्रैक-II संवाद के कम से कम तीन दौर हो चुके हैं. इनमें पिछले छह महीनों में पश्चिम एशिया के देशों में हुई दो बैठकें शामिल हैं, जबकि एक पुराना संवाद प्रारूप भारत के पूर्व में स्थित एक राजधानी शहर में आयोजित किया गया.

इस साल के अंत तक कम से कम दो और बैठकें होने वाली हैं.

मामले से जुड़े और इन बैठकों में शामिल रहे एक व्यक्ति ने दिप्रिंट को बताया, “हाल की बैठकों में यह साफ हो गया है कि पाकिस्तान की तरफ से ट्रैक-II प्रक्रिया, उसमें शामिल होने वाले लोगों और उनके संदेशों पर पाकिस्तान सेना ने ज्यादा औपचारिक नियंत्रण ले लिया है. भारत-पाकिस्तान ट्रैक-II नेटवर्क अब पूरी तरह मौजूदा राजनीतिक वास्तविकताओं के ढांचे के भीतर काम करता है. इसका उद्देश्य अब विवादों का समाधान नहीं, बल्कि संघर्ष का प्रबंधन करना है.”

हालांकि, हमेशा ऐसा नहीं था. कई वर्षों से नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच अनौपचारिक संवाद बनाए रखने के लिए एक दर्जन से ज्यादा संवाद प्रारूप मौजूद रहे हैं. इनमें से कुछ को सरकारी मंजूरी भी प्राप्त है. इन बैठकों की रिपोर्ट दोनों पक्षों तक पहुंचती है, ताकि वे समझ सकें कि दूसरा पक्ष क्या सोच रहा है.

लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद इन वार्ताओं का मुख्य फोकस संघर्ष प्रबंधन और तनाव बढ़ने से रोकने पर रहा है. वहीं जम्मू-कश्मीर और सिंधु जल संधि जैसे अन्य लंबित मुद्दे, जिनके राजनीतिक प्रभाव हैं, एजेंडे में नीचे चले गए हैं.

पिछले पांच साल से अधिक समय से इस प्रक्रिया से जुड़े एक अन्य व्यक्ति ने दिप्रिंट को बताया, “चूंकि, पाकिस्तान सेना का पाकिस्तानी स्टेट पर काफी नियंत्रण है, इसलिए यह तंत्र नई दिल्ली के लिए एक ‘साउंडिंग बोर्ड’ और संदेश पहुंचाने वाले माध्यम दोनों की तरह काम करता है. इससे भारत को यह समझने में मदद मिलती है कि उसका प्रतिद्वंद्वी क्या सोच रहा है. यही ट्रैक-II बैठकों का सबसे बड़ा फायदा है. सरकार इन बैठकों की जानकारी रखती है, लेकिन सीधे तौर पर इनमें शामिल नहीं होती.”

दोनों देशों के प्रमुख व्यक्तियों, जिनमें राजनयिक और पूर्व सैन्य अधिकारी भी शामिल थे, की सबसे हालिया बैठक इस साल 2 फरवरी को दो दिनों के लिए दोहा में हुई थी. इसमें कई मुद्दों पर चर्चा की गई. दोनों प्रतिनिधिमंडलों में सैन्य प्रतिनिधि मौजूद थे, लेकिन राजनयिकों और अन्य अधिकारियों की संख्या ज्यादा थी.

इससे पहले दिसंबर 2025 में भारत के पूर्व में स्थित एक राजधानी शहर में ट्रैक-II वार्ता हुई थी, जिसका फोकस सैन्य-से-सैन्य संबंधों पर था. इसमें पूर्व सैन्य अधिकारियों ने ऐसे व्यावहारिक तरीकों पर चर्चा की, जिनसे संघर्ष बढ़ने से रोका जा सके.

ऑपरेशन सिंदूर के बाद मस्कट में भी एक संवाद आयोजित किया गया था. इसके अलावा ओटावा स्थित एक थिंक-टैंक के नेतृत्व में भी पिछले साल एक बैठक हुई थी.

पहले ट्रैक-II संवादों में भारत और पाकिस्तान के बीच बड़े मुद्दों पर चर्चा होती थी, जिनमें नियंत्रण रेखा (एलओसी) का प्रबंधन और राजनीतिक विषय भी शामिल थे.

ऑपरेशन सिंदूर के बाद हुई हालिया बैठकों में से एक में, उदाहरण के तौर पर, सिंधु जल संधि के भविष्य पर बहुत कम चर्चा हुई. जबकि भारत द्वारा इस संधि को स्थगित रखने के फैसले को लेकर नई दिल्ली और इस्लामाबाद सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहे हैं.

इसी तरह प्रभावी संघर्ष प्रबंधन से जुड़े मुद्दों को छोड़कर अन्य विषयों पर भले चर्चा हुई हो, लेकिन पाकिस्तान सेना में जनरल असीम मुनिर के प्रभाव बढ़ने के बाद उनकी प्राथमिकता और गंभीरता कम हो गई है.

ट्रैक-II तंत्र से जुड़े पहले व्यक्ति ने दिप्रिंट को बताया, “एक संस्था, जो पहले भारत-पाकिस्तान ट्रैक-II बैठकों में शामिल रही है, का मानना है कि अब दोनों देशों के बीच ट्रैक-II संवाद पूरी तरह परिस्थितियों पर आधारित हो गए हैं और संघर्ष प्रबंधन में उनकी एक बहुत खास भूमिका है.”

उन्होंने बताया कि पहले ट्रैक-II तंत्र ज्यादा “निष्पक्ष और उद्देश्यपूर्ण” तरीके से काम करता था, लेकिन हाल के वर्षों में इसमें बदलाव आया है. हालांकि, इन प्रारूपों में बदलाव से इन संवादों की बड़ी उपलब्धियों पर असर पड़ सकता है, लेकिन इससे नई दिल्ली को इस्लामाबाद की सोच को समझने का मौका मिलता है, खासकर तब जब औपचारिक कूटनीतिक तंत्र लगभग पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है.

इन बैठकों से निकले कुछ निष्कर्ष भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारियों के साथ साझा किए जाते हैं. प्रतिनिधिमंडल वरिष्ठ अधिकारियों को इन वार्ताओं के बारे में जानकारी भी देते हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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