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Sunday, 7 June, 2026
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भारत-नेपाल सीमा विवाद का समाधान द्विपक्षीय तरीके से होगा, मध्यस्थता नहीं चाहते: विदेश मंत्री खनाल

शिशिर खनाल ने दिल्ली में दिप्रिंट से कहा कि नेपाल ने लिपुलेख से जुड़े दस्तावेजी सबूतों के लिए ब्रिटेन से संपर्क किया है. भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों की भर्ती को लेकर अभी कोई बातचीत नहीं हुई है.

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नई दिल्ली: नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा है कि भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद का समाधान द्विपक्षीय स्तर पर किया जाएगा. रविवार को भारत की अपनी तीन दिवसीय यात्रा समाप्त कर रहे खानाल ने स्पष्ट किया कि काठमांडू इस मामले में किसी तीसरे देश की मध्यस्थता नहीं चाहता.

खनाल ने दिप्रिंट से कहा, “प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह से संसद में भारत-नेपाल सीमा विवाद के बारे में सवाल पूछा गया था और वे एक सांसद के प्रश्न का जवाब दे रहे थे. उन्होंने यह समझाने की कोशिश की कि लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र, जहां मानसरोवर यात्रा हो रही है या भारत और चीन के समझौते के कारण आगे होगी, वह जमीन हमारी है और इसके ऐतिहासिक सबूत हमारे पास हैं.”

उन्होंने कहा, “भारत और चीन उस यात्रा को फिर से शुरू करने के लिए आपस में द्विपक्षीय समझौता नहीं कर सकते, क्योंकि वह नेपाली भूमि है. हमारी अनुमति या हमारी भागीदारी के बिना दोनों देशों को उस क्षेत्र में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए.”

काठमांडू का दावा है कि लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी नेपाल के संप्रभु क्षेत्र हैं और उसने भारत तथा चीन से सीमा विवाद से जुड़े मामलों में कोई एकतरफा बदलाव न करने का आग्रह किया है.

नई दिल्ली ने नेपाल के इन दावों को खारिज किया है और कहा है कि कैलाश मानसरोवर यात्रा कम से कम 1954 से जारी है. पिछले हफ्ते विवाद ने नया मोड़ तब लिया जब प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने संसद में कहा कि काठमांडू ने इस मुद्दे पर ब्रिटेन और चीन को भी पत्र लिखा है.

शाह के बयान को स्पष्ट करते हुए खनाल ने दिप्रिंट से कहा कि काठमांडू ने लिपुलेख को लेकर अपने दावों के संबंध में भारत और चीन दोनों को राजनयिक नोट भेजे हैं. साथ ही, उसने ब्रिटेन से 1800 के दशक के दस्तावेजी सबूत मांगे हैं, जब लंदन का भारतीय उपमहाद्वीप पर नियंत्रण था.

खानाल ने कहा, “हम इस विवाद को तथ्यों और सबूतों, खासकर ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर दोनों देशों के बीच सुलझाना चाहते हैं. यह विवाद 1814-1816 के बीच की उस लड़ाई से जुड़ा है, जो तत्कालीन गोरखाली नेपाल और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई थी. नेपाल की वर्तमान सीमा काफी हद तक उसी के आधार पर तय हुई थी.”

उन्होंने कहा, “हमें कुछ ऐतिहासिक दस्तावेजों और संदर्भों की ज़रूरत पड़ सकती है, जिनके बारे में हमें जानकारी है कि वे इंग्लैंड के पुराने अभिलेखागार और पुस्तकालयों में मौजूद हैं. इसलिए हम उन तक पहुंच चाहते हैं.”

खनाल ने दोहराया कि सभी विवाद “मौजूदा द्विपक्षीय तंत्रों के जरिए, सबूतों और तथ्यों के आधार पर” सुलझाए जाएंगे.

नेपाल के विदेश मंत्री शुक्रवार को नई दिल्ली पहुंचे थे. शनिवार को उन्होंने विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से द्विपक्षीय बैठक की.

नेपाल की नई सरकार के किसी वरिष्ठ अधिकारी की यह पहली आधिकारिक भारत यात्रा है. खनाल कई बार कह चुके हैं कि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के नेतृत्व वाली नई सरकार पिछली सरकारों की तरह “पुराने बोझ” से नहीं बंधी हुई है. इस साल हुए चुनावों में RSP सत्ता में आई थी.

रविवार को मीडिया से बातचीत के दौरान खनाल ने कहा कि RSP का मुख्य लक्ष्य भारत के साथ संबंधों को मजबूत कर नेपाल की घरेलू अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना है.

उन्होंने कहा, “वास्तविक स्वतंत्रता का मतलब है कि हमारी साझा सीमाएं अत्यधिक प्रभावी पुल का काम करें, न कि निराशा पैदा करने वाली बाधाएं बनें. अतिराष्ट्रवादी बयानबाजी के बजाय हम चुनौतियों को अच्छे विश्वास के साथ हल करने के लिए शांत, आंकड़ों और सबूतों पर आधारित बातचीत कर रहे हैं.”

खनाल ने कहा कि RSP दो वादों के साथ सत्ता में आई थी—सुशासन और तेज आर्थिक विकास.

इसी नीति के तहत शनिवार को भारत और नेपाल के बीच कई समझौता ज्ञापनों (MoU) पर हस्ताक्षर हुए. इनमें यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के जरिए सीमा पार भुगतान को आसान बनाना और राष्ट्रीय स्तर का वॉयस-फर्स्ट ट्रांसलेशन प्लेटफॉर्म विकसित करना शामिल है.

जब उनसे पूछा गया कि क्या भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों की भर्ती का मुद्दा भी चर्चा में आया, तो खानाल ने कहा कि इस विषय पर अभी कोई बातचीत नहीं हुई है, लेकिन काठमांडू इस मामले पर नई दिल्ली के साथ बातचीत करने को तैयार है.

भारतीय सेना में अग्निवीर योजना लागू होने के बाद से गोरखा सैनिकों की भर्ती फिलहाल रुकी हुई है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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