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Sunday, 7 June, 2026
होममत-विमतईरान और यूक्रेन में ड्रोन-मिसाइल युद्ध से सबसे बड़ी सीख आर्थिक सबक है

ईरान और यूक्रेन में ड्रोन-मिसाइल युद्ध से सबसे बड़ी सीख आर्थिक सबक है

भारत की रक्षा तैयारियों में अब तक हमलावर क्षमता को ज्यादा महत्व दिया गया है, लेकिन ड्रोन और मिसाइल युद्ध ने ज़िंदा रहने और सुरक्षा क्षमता पर भी बराबर ध्यान देने की ज़रूरत दिखा दी है.

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पारदर्शी युद्धक्षेत्र में सस्ते ड्रोन और सटीक निशाना लगाने वाली प्रिसीजन मिसाइलें युद्ध का तरीका इतनी तेज़ी से बदल रही हैं कि सेनाएं उनके साथ तालमेल नहीं बिठा पा रही हैं. यूक्रेन युद्ध में 80 फीसदी सैनिकों और हथियारों का नुकसान ड्रोनों की वजह से हुआ है और मिसाइलें मोर्चे से काफी दूर मौजूद हवाई अड्डों, कमांड सेंटरों, गोला-बारूद के भंडारों और ऊर्जा से जुड़े ढांचों को नष्ट कर रही हैं. एयर डिफेंस के पारंपरिक ‘काइनेटिक’ और इलेक्ट्रॉनिक जवाबी उपाय काफी महंगे हैं, खासकर ड्रोनों के मुकाबले. एक ‘टैक्टिकल’ ड्रोन 300-500 डॉलर में आता है, जबकि एक ‘स्ट्रेटेजिक’ ड्रोन की कीमत 20-50 हज़ार डॉलर के बीच होती है.

इतने सस्ते फाइटर ड्रोनों की वजह से ड्रोनों का पलड़ा भारी पड़ता है, लेकिन हवाई और मिसाइल हमलों का मुकाबला करने के लिए महंगे एयर डिफेंस प्लेटफॉर्म का कोई विकल्प नहीं है. इसी कारण गाज़ा, लेबनान, यूक्रेन और ईरान के युद्धों में हवाई, मिसाइल और ड्रोन हमलों के खिलाफ उन ‘पैसिव’ जवाबी उपायों को फिर से अपनाया जा रहा है, जिन्हें पहले नज़रअंदाज कर दिया गया था.

आदर्श स्थिति तो ‘एक्टिव’ (सक्रिय) और ‘पैसिव’ (शांत) दोनों तरह के जवाबी उपायों का मेल है, लेकिन गाज़ा और ईरान ने दिखा दिया है कि ज्यादा ताकतवर दुश्मन के सामने टिके रहने के लिए ‘पैसिव’ जवाबी उपाय ही सबसे ज्यादा काम आते हैं.

भारतीय सेना के लिए सबक

भारतीय सेना के लिए सबक बिल्कुल साफ हैं. पाकिस्तान या चीन के साथ भविष्य के किसी युद्ध में ‘टैक्टिकल’, ‘ऑपरेशनल’ और ‘स्ट्रेटेजिक’ स्तर पर ड्रोनों, मंडराने वाले हथियारों, क्रूज मिसाइलों और बैलिस्टिक मिसाइलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होगा. मोर्चे पर मौजूद रक्षा व्यवस्थाओं, तोपखानों, गोला-बारूद के भंडारों, ईंधन केंद्रों, पुलों, रेलवे, हवाई अड्डों और सैन्य साजोसामान के केंद्रों पर लगातार नज़र रखी जाएगी और उन पर बार-बार हमले किए जाएंगे. युद्धक्षेत्र की पारदर्शिता और दुश्मन की गहरी पहुंच कमज़ोरियों को और बढ़ाएगी.

भारत एयर डिफेंस मिसाइलों और तोपों, फाइटर ड्रोनों, जैमर और लेजर जैसे ‘एक्टिव’ जवाबी उपायों पर जोर देकर सही दिशा में काम कर रहा है, लेकिन केवल ‘एक्टिव’ सिस्टम बड़े पैमाने पर ड्रोन और मिसाइलों वाले युद्ध का मुकाबला नहीं कर सकते. इसका आर्थिक गणित बहुत भारी है. 50,000 रुपये के ड्रोन को गिराने के लिए लाखों या करोड़ों रुपये की इंटरसेप्टर मिसाइल का बार-बार इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. यहां तक कि आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम को भी ड्रोनों के झुंड, धोखा देने वाले हथियारों और एक साथ होने वाले मिसाइल हमलों का मुकाबला करने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

इसलिए इसका जवाब उतना ही मजबूत ‘पैसिव’ डिफेंस हो सकता है—यानी कम लागत वाले ऐसे उपाय जो कमजोरियों को कम करें, हमलों को झेल सकें और लड़ने की क्षमता को बचाकर रखें. लंबे समय से बड़े युद्ध न लड़ने के कारण भारत की सैन्य सोच अभी भी तोपों और कभी-कभार होने वाले हवाई हमलों वाले पुराने दौर में अटकी हुई है. ड्रोन और प्रिसीजन मिसाइलों वाले युद्ध के लिए पूरी तरह नई ‘पैसिव’ डिफेंस सोच की ज़रूरत है.

इसलिए भारत को कई स्तर वाला ‘पैसिव’ डिफेंस ढांचा चाहिए, जो मोर्चे की खाइयों से लेकर राष्ट्रीय रणनीतिक ढांचे तक फैला हो.

पारंपरिक छद्म आवरण, छिपाव, फैलाव और धोखा

छोटे युद्धों के इस दौर में छद्म आवरण, छिपाव, फैलाव और धोखा जैसे पारंपरिक उपाय लगभग भुला दिए गए हैं. आज कोई भी सैनिक व्यावसायिक उपग्रह तस्वीरों और नक्शों की मदद से स्थायी रक्षा ठिकानों और सैन्य संस्थानों की सही पहचान कर सकता है. उपग्रहों और ड्रोनों के थर्मल सेंसरों से मिलने वाले संकेत इस कमजोरी को और बढ़ा देते हैं. प्रिसीजन मिसाइलों की ऊंची कीमत के कारण पारंपरिक तोपखाने की तरह भारी फायर पावर को एक जगह इकट्ठा करना मुश्किल हो गया है. ऐसे में बचाव करने वाले पक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पहचान और स्थान को छिपाने की होती है.

यूक्रेन और ईरान के युद्धों ने साबित कर दिया है कि प्राकृतिक और कृत्रिम छद्म आवरण, छिपाव, फैलाव और धोखे जैसे उपाय, साथ ही ताप, ध्वनि और इलेक्ट्रॉनिक संकेतों को नियंत्रित करना, दुश्मन को निशाने की पहचान और उसकी सही जगह का पता लगाने से रोकते हैं. नई तकनीक ने सस्ते फाइबर से बने नकली लक्ष्यों और चारे के रूप में इस्तेमाल होने वाले निशानों का बड़े पैमाने पर उपयोग संभव बना दिया है. ये नकली लक्ष्य थर्मल और इलेक्ट्रॉनिक संकेत पैदा करते हैं और महंगी मिसाइलों तथा हर तरह के ड्रोनों को भ्रमित कर देते हैं.

फारस की खाड़ी में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों ने इस सामरिक सिद्धांत की अनदेखी की और इसकी बड़ी कीमत चुकाई. भारतीय वायुसेना को इस भूली हुई कला को फिर से सीखना चाहिए और इसे अपनी सैन्य संस्कृति का हिस्सा बनाना चाहिए.

सिंथेटिक और धातु के जाल

डिफेंस, हथियारों के प्लेटफॉर्म, वाहन, सैन्य सामान के अड्डे और सप्लाई/आवागमन के रास्तों की सुरक्षा के लिए जाल सबसे सस्ता और सबसे प्रभावी उपाय साबित हुए हैं, खासकर खतरनाक और विस्फोटक ड्रोन के खिलाफ. इन जालों में ड्रोन के पंखे फंस जाते हैं और उसकी मोटर बंद हो जाती है, जिससे वह बेकार हो जाता है या समय से पहले फट जाता है.

इनका जितना बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है, वह हैरान करने वाला है. सिंथेटिक जालों से सभी डिफेंस ठिकानों और स्थायी हथियार प्लेटफॉर्मों को ढक दिया जाता है.

युद्धक्षेत्र में काम करने वाली सैन्य टीमों के पास तुरंत लगाए जा सकने वाले सिंथेटिक जाल होते हैं. सैन्य सामान के अड्डे और सप्लाई/आवागमन के रास्ते इन जालों की सुरक्षा में रहते हैं. सिर्फ इसी साल यूक्रेन ने रणनीतिक महत्व वाले 4,000 किलोमीटर लंबे रास्ते को ऐसे जालों से सुरक्षित करने का लक्ष्य रखा है. यहां तक कि शहरों में बिजली और दूसरी महत्वपूर्ण सुविधाओं को भी इन जालों से सुरक्षित किया जा रहा है.

टैंकों, सेना के वाहनों, तोपों और दूसरे हथियार प्लेटफॉर्मों की सुरक्षा के लिए सिंथेटिक और धातु के ‘कोपे’ पिंजरों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है. यह ‘फर्स्ट पर्सन व्यू’ (FPV) ड्रोन के खिलाफ सबसे प्रभावी सुरक्षा उपाय माना जाता है, क्योंकि यह ड्रोन को समय से पहले विस्फोट करने पर मजबूर कर देता है.

यह कहना जरूरी नहीं है कि ड्रोन से बचाव के लिए जालों का इस्तेमाल करने में ड्रोन के हमले के कोण और ऊंचाई को ध्यान में रखते हुए विशेष तकनीक की जरूरत पड़ेगी.

ओपन-सोर्स तस्वीरों और जानकारी से साफ है कि भारतीय सेना इन जालों का इस्तेमाल मुख्य रूप से छिपाव और सुरक्षा के पारंपरिक साधन के रूप में करती है. कुछ पुरानी तस्वीरों को छोड़ दें तो टैंकों और सेना के युद्धक वाहनों पर ‘कोपे’ पिंजरे या धातु के जाल लगे नहीं दिखते. ऐसी भी कोई खबर नहीं है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सस्ते पाकिस्तानी ड्रोन एंटी-ड्रोन जालों में फंस गए हों.

ज्यादातर ड्रोन महंगी एयर डिफेंस मिसाइलों से मार गिराए गए. उदाहरण के लिए, एक ‘आकाश’ मिसाइल की कीमत करीब ढाई करोड़ रुपये है. भारत जिन आधुनिक एयर डिफेंस मिसाइलों का इस्तेमाल करता है, उनमें से अधिकतर की कीमत इसी तरह काफी ज्यादा है. पुरानी एयर डिफेंस मिसाइलें सस्ती हैं, लेकिन अब उन पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता. पाकिस्तान ने हमले के लिए 600 ड्रोन इस्तेमाल किए थे. ऐसे में उन्हें मार गिराने की लागत कितनी रही होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है, भले ही मान लें कि उनमें से 20 प्रतिशत ड्रोन सस्ती एयर डिफेंस तोपों से गिराए गए हों.

जालों का इस्तेमाल फलों के बागानों में भी बड़े पैमाने पर हो रहा है. उद्योगों से कहा गया है कि वे सेना को बड़ी संख्या में जाल उपलब्ध कराएं. सिंथेटिक और धातु के जालों का सेना द्वारा बड़े पैमाने पर इस्तेमाल और इसे राष्ट्रीय नागरिक सुरक्षा (नेशनल सिविल डिफेंस) उपाय के रूप में अपनाना आज की बड़ी ज़रूरत है.

अप्रत्यक्ष युद्ध

आधुनिक युद्ध की सबसे बड़ी प्रवृत्तियों में से एक है अप्रत्यक्ष या भूमिगत युद्ध शैली की वापसी. पिछले पांच वर्षों में ईरान, गाज़ा, लेबनान और कुछ हद तक यूक्रेन के अनुभव बताते हैं कि ज्यादा ताकतवर दुश्मन के हवाई, मिसाइल और ड्रोन हमलों का सामना करने का सबसे प्रभावी तरीका अंडरग्राउंड युद्ध शैली को अपनाना है.

कमांड चौकियों, अग्रिम मोर्चे की रक्षा व्यवस्था, हवाई/मिसाइल/ड्रोन/पनडुब्बी अड्डों और सैन्य सामान के भंडारों को जमीन के नीचे बनाना ज़रूरी है. महत्वपूर्ण रक्षा सिस्टम बनाने वाले उद्योगों को भी अंडरग्राउंड करने की ज़रूरत है. वायुसेना और मजबूत एयर डिफेंस क्षमता की कमी के बावजूद ईरान ने मिसाइल और ड्रोन की जो ताकत दिखाई, वह पिछले वर्षों में बनाए गए विशाल अंडरग्राउंड मिसाइल और ड्रोन भंडारों की वजह से संभव हो सकी.

भविष्य के युद्ध का पहला चरण बड़े पैमाने पर मिसाइल और ड्रोन हमलों का हो सकता है, जो टैक्टिकल, ऑपरेशनल और स्ट्रेटेजिक सैन्य ढांचे और महत्वपूर्ण उद्योगों को निशाना बनाएंगे. भारतीय सेना की मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था ड्रोन और प्रिसीजन मिसाइलों से भरे इस पारदर्शी युद्धक्षेत्र के लिए पर्याप्त नहीं है. यहां तक कि बहुत मजबूत विमान शेल्टर और बंकर भी जमीन के ऊपर ही बने हुए हैं.

हमारे डिफेंस और सैन्य सामान के अड्डे ऐसे हैं जिन्हें आसानी से निशाना बनाया जा सकता है. वे बड़े हवाई, मिसाइल और ड्रोन हमलों का सामना नहीं कर सकते. अमेरिका को भी खाड़ी देशों में अपने सैन्य अड्डों को पर्याप्त रूप से मजबूत न बनाने की कीमत चुकानी पड़ी. ईरान के सामान्य मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण उन्हें कई अड्डे खाली करने पड़े. ऐसा एयर डिफेंस बहुत मुश्किल से ही होगा जो बड़े पैमाने के हवाई हमलों को पूरी तरह रोक सके.

भारत को अंडरग्राउंड युद्धकला का सिद्धांत बनाकर उस पर तुरंत काम शुरू करना चाहिए. इस काम के लिए पहाड़ सबसे उपयोगी हो सकते हैं. ‘टनल डिफेंस’ (सुरंग आधारित सुरक्षा) एक व्यावहारिक समाधान है. भारत के पास इस क्षेत्र में विशेषज्ञता है, जरूरत सिर्फ इच्छाशक्ति की है.

सैन्य ढांचे को मजबूत बनाना भारत की रक्षा तैयारियों का सबसे ज्यादा नज़रअंदाज किया गया हिस्सा है. प्रिसीजन मिसाइलें सिर्फ मोर्चे पर तैनात सैनिकों को नष्ट करने के लिए नहीं होतीं, बल्कि हवाई अड्डों, कमांड सेंटरों, सैन्य भंडारों और ईंधन ढांचे पर हमला करके दुश्मन की सैन्य क्षमता को कमजोर करने के लिए बनाई जाती हैं. भविष्य के युद्धों के शुरुआती चरण में भारत के सैन्य ढांचे पर बड़े पैमाने पर मिसाइल हमले हो सकते हैं.

ऐसे संभावित खतरों का सामना करने के लिए भारत का मौजूदा सैन्य ढांचा पर्याप्त नहीं है.

टिके रहने का अर्थशास्त्र

ड्रोन और मिसाइल आधारित युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण सबक आर्थिक है. जो पक्ष सस्ते ड्रोन के खिलाफ महंगे इंटरसेप्टर इस्तेमाल करेगा, वह आखिरकार थक जाएगा. ‘पैसिव डिफेंस’ इस स्थिति को बदल सकता है.

महंगी मिसाइल प्रणालियों की जगह छिपाव के उपाय, एंटी-ड्रोन जाल, भूमिगत शेल्टर, मिट्टी के टीले, दुश्मन को भ्रमित करने वाले वाहन और मजबूत खंदक युद्धक्षेत्र में टिके रहने में काफी मदद कर सकते हैं. ‘पैसिव’ उपायों को बड़े पैमाने पर लागू किया जा सकता है, वे लंबे समय तक चलते हैं और गोला-बारूद पर निर्भर नहीं होते.

भारत की रक्षा तैयारियों में परंपरागत रूप से टिके रहने की क्षमता की तुलना में हमला करने की क्षमता पर ज्यादा ध्यान दिया गया है, लेकिन ड्रोन और मिसाइल वाले युद्ध में बदलाव की ज़रूरत है. अगला युद्ध सिर्फ इस बात से तय नहीं होगा कि किसके पास ज्यादा फायर पावर है. इसका फैसला इस बात से होगा कि कौन-सी सेना लगातार निगरानी और सटीक हमलों के बीच भी अपनी लड़ाई की क्षमता बनाए रखती है.

इसलिए भारत को पैसिव एंटी-ड्रोन और एंटी-मिसाइल सुरक्षा पर जोर देते हुए राष्ट्रीय सैन्य टिकाऊपन कार्यक्रम तुरंत शुरू करना चाहिए. इसके लिए सैन्य सोच में बदलाव, इंजीनियरिंग में नए प्रयोग और तीनों सेनाओं में संगठनात्मक लचीलापन जरूरी होगा.

युद्ध अब जासूसी और टिकाऊपन के बीच की लड़ाई बनते जा रहे हैं. जो पक्ष खुद को छिपाकर रख सकेगा, मजबूत और लचीला रहेगा, वही अंत तक टिकेगा और जीतने की स्थिति में रहेगा. भारत यह सबक अगला युद्ध शुरू होने के बाद सीखने का जोखिम नहीं उठा सकता.

लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग PVSM, AVSM (रिटायर्ड) ने भारतीय सेना में 40 साल तक सेवा की. वह नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड के GOC इन C थे. रिटायरमेंट के बाद, वह आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य थे. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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