नई दिल्ली: शाहरुख खान और वसीम खान ने लंगूर की आवाज़ की नकल की—“ईक-ईक-ईक” और “हूप-हूप” और गुरुद्वारा रकाबगंज रोड के पास जमा हुए बंदर तुरंत अलग-अलग दिशाओं में भाग गए. बंदरों का एक झुंड सड़कों से होते हुए नॉर्थ एवेन्यू की तरफ भाग गया, जबकि दूसरा जामुन और नीम के पेड़ों की शाखाओं के बीच छिप गया. खान भाइयों की एक नज़र पड़ते ही बंदर अपनी जान बचाकर भागने लगे.
शाहरुख 15 साल से ज्यादा समय से यह काम कर रहे हैं. हालांकि, वसीम 2020 में ही अपने चचेरे भाई के साथ इस काम में जुड़े. दोनों मिलकर दिल्ली में घूमने वाले आम बंदरों या रीसस मकाक की परेशानी को कम करने में मदद करते हैं. खासकर लुटियंस दिल्ली में इन बंदरों की समस्या ज्यादा है.
वसीम ने कहा, “हम तो खानदानी बंदर भगाने वाले हैं.” उन्होंने बताया कि उनके कम से कम पांच चचेरे भाई भी इसी ‘पेशे’ में हैं.
दोनों भाई न तो लाठी रखते हैं और न ही कोई दूसरा हथियार. उनकी आवाज़ ही उनका सबसे बड़ा हथियार है. बंदरों के व्यवहार की जानकारी और कई तरह की लंगूर की आवाज़ों की नकल करने की कला के कारण उन्हें तब बुलाया जाता है, जब आम बंदरों के झुंड राजधानी के हाई-सिक्योरिटी वाले सरकारी और राजनयिक इलाके में परेशानी पैदा करने लगते हैं. उन्हें आम तौर पर मंकी व्हिस्परर्स यानी बंदरों को भगाने वाले कहा जाता है, लेकिन वे फुसफुसाकर आवाज़ नहीं निकालते, बल्कि इसके बिल्कुल उलट करते हैं. वे बड़े, अपने इलाके की रक्षा करने वाले और ज्यादा आक्रामक ग्रे लंगूरों की चेतावनी वाली आवाज़ की नकल करते हैं, जिनसे आम बंदर स्वाभाविक रूप से डरते हैं.
जब भी दिल्ली में बड़े कार्यक्रम होते हैं, इन बंदरों को भगाने वालों की मांग बढ़ जाती है.
हाल ही में, उन्हें कथित तौर पर इंदिरा गांधी एरिना से आम बंदरों को दूर रखने के लिए बुलाया गया था. यहां 17 अगस्त से BWF वर्ल्ड चैंपियनशिप आयोजित हो रही है, ताकि खेलों के दौरान कोई परेशानी न हो. इस कदम की कई लोगों ने आलोचना की और इसका मजाक भी बनाया, लेकिन खिलाड़ियों ने इसका बचाव किया.
बैडमिंटन वर्ल्ड चैंपियन पीवी सिंधु ने एक्स पर एक पोस्ट में याद किया कि विंबलडन के दौरान कबूतरों को दूर रखने के लिए बाज को प्रशिक्षित किया जाता है. उन्होंने कहा, “हम सभी विंबलडन को पसंद करते हैं और वहां कई सालों से रूफस नाम का बाज कबूतरों को दूर रखता है. हर बड़े खेल आयोजन के सामने अपनी स्थानीय चुनौतियां होती हैं.”
मंकी व्हिस्परर्स इरफान खान और अब्बास खान ने दिप्रिंट को बताया कि पिछले चार दिनों से वे बंदरों को भगाने के लिए इंदिरा गांधी स्टेडियम जा रहे हैं. दिप्रिंट ने दोनों से तब बात की, जब वे स्टेडियम के गेट नंबर 16 के पास आवारा कुत्तों को भगा रहे थे.

अब्बास ने कहा, “हमें ठेकेदार ने यहां भेजा है. हम सुबह 9 बजे स्टेडियम में ड्यूटी पर आते हैं और शाम 5 बजे तक यहां रहते हैं. हमें रोज 800 रुपये मिलते हैं.”
जब दिप्रिंट ने भारतीय खेल प्राधिकरण और बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया से संपर्क करने की कोशिश की, तो दोनों संस्थाओं ने टूर्नामेंट के लिए मंकी व्हिस्परर्स को काम पर रखने से इनकार किया.
जनवरी में हुए इंडिया ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट के दौरान बंदर खेल के मैदान तक पहुंच गए थे, जबकि कबूतरों की बीट कोर्ट पर गिरने के कारण कुछ समय के लिए मैच रोकने पड़े थे. 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स से लेकर 2023 के G20 समिट तक, दिल्ली ने बड़े आयोजनों से बंदरों की परेशानी को दूर रखने के लिए बार-बार अलग-अलग तरीके अपनाए हैं. इनमें असली लंगूर से लेकर आदमकद कटआउट और मंकी व्हिस्परर्स तक का इस्तेमाल किया गया है.
फिर भी, बंदरों की यह समस्या हर उपाय के बाद बनी रही है—यह एक अजीब शहरी संघर्ष है, जो कितने भी नए तरीके अपनाए जाएं, बार-बार वापस आ जाता है.
वर्ल्ड कप में बंदरों को भगाने वाले
इंदिरा गांधी एरिना के बाहर इरफान और अब्बास पूरे परिसर में घूमते हैं और बंदरों और कुत्तों को स्टेडियम से दूर रखते हैं.
25 साल के इरफान चार महीने पहले ही बेहतर कमाई वाले मंकी व्हिस्परिंग के काम की तलाश में दिल्ली आए हैं. उन्होंने बताया कि इससे पहले उन्हें लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर तैनात किया गया था.
इरफान ने बताया कि उन्हें यह काम बादल और रोहित नाम के ठेकेदारों के जरिए मिला. उत्तर-पश्चिम दिल्ली के जहांगीरपुरी में रहने वाले ये दोनों पिछले दो दशकों से ज्यादा समय से मंकी व्हिस्परर और बंदर पकड़ने वाले के तौर पर काम कर रहे हैं.
रोहित ने दावा किया, “बैडमिंटन वर्ल्ड कप से कुछ दिन पहले मुझे नगर निगम दिल्ली (MCD) से फोन आया था.” उन्होंने बताया कि उनका फोन नंबर इंटरनेट पर उपलब्ध है और सरकारी अधिकारी अक्सर मंकी व्हिस्परर्स की तलाश में उन्हें फोन करते हैं.
दिप्रिंट ने एमसीडी के पशु चिकित्सा विभाग से संपर्क किया, लेकिन विभाग ने किसी भी मंकी व्हिस्परर को नियुक्त करने से इनकार किया.
एमसीडी के पशु चिकित्सा सेवा विभाग के डिप्टी डायरेक्टर अखिलेश कमल ने कहा, “हमारे पास निजी बंदर पकड़ने वाले हैं, जो बंदरों को पकड़ते हैं और उन्हें एक वन्यजीव अभयारण्य में ले जाते हैं. यह अभयारण्य दिल्ली सरकार के अधीन है.”
कमल ने दिप्रिंट को बताया कि जब उन्हें बंदरों से जुड़ी शिकायतें मिलती हैं, तो वे निजी टीमों को भेजते हैं. कमल ने कहा, “अभी हमें इंदिरा गांधी स्टेडियम से बंदरों और कुत्तों की कोई शिकायत नहीं मिली है.”
VIP इलाकों से बंदरों को भगाना
संसद के पास गुरुद्वारा रकाबगंज (GRG) रोड पर शाहरुख और वसीम पार्क के पास बैठे बंदरों के एक झुंड की ओर बढ़े. बंदरों को दूर से ही समझ आ गया कि खान भाई आ गए हैं. वे उसी समय अलग-अलग दिशाओं में भाग गए. यह दृश्य किसी कोलिवुड फिल्म जैसा लग रहा था: हीरो आता है और बदमाश अपनी जान बचाकर भागने लगते हैं. कुछ बंदर सांसदों के घरों की ऊंची दीवारों पर चढ़ गए, जबकि कुछ खंभों के पीछे छिप गए और अपनी जगह वापस पाने का इंतजार करने लगे.

इस काम में कई दशक बिताने के बाद भाइयों ने बंदरों के झुंड को किताब की तरह समझना सीख लिया है. उन्होंने झुंड के मुखिया को पहचानना, उनके व्यवहार को समझना और सबसे जरूरी, यह जानना सीख लिया है कि वे किस तरह प्रतिक्रिया देंगे.
GRG रोड पर मुखिया को पहचानना आसान है—एक ऐसा बंदर जिसका सिर थोड़ा एक तरफ झुका हुआ रहता है. वसीम ने कहा, “हम सबसे पहले उसे निशाना बनाने की कोशिश करते हैं. अगर वह चला जाता है तो बाकी बंदर भी आसानी से चले जाते हैं.”
हर आवाज़ के लिए उनके पास एक कोड वर्ड है. कभी-कभी बंदरों से उनकी आम भाषा में बात करना भी असरदार होता है. वे पुलिस के सायरन से भी ज्यादा तेज़ आवाज़ में चिल्लाते हैं, “चलो जाओ तुम लोग, हम आ गए हैं.”
सड़क पर चलते हुए दोनों भाई कई सांसदों (MPs) के घरों की ओर इशारा करते हैं, जहां उन्हें बंदरों को भगाने के लिए बुलाया गया था.
शाहरुख ने दावा किया, “हमने 10 जनपथ पर भी बंदरों को भगाया है, जो कांग्रेस सांसद सोनिया गांधी का आवास है.” उन्होंने कहा, “कांग्रेस, बीजेपी, AAP और राजनीतिक नेता बदलते रहे, लेकिन हम लगातार बंदरों को भगाते रहे.”
GRG रोड पर एक कोने का घर जल्द ही एक सांसद के पास होगा. शाहरुख और वसीम पहले भी वहां काम कर चुके हैं. अब वे वहां संपर्क बनाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि अगला सांसद जैसे ही वहां रहने आए, उन्हें वहां काम मिल सके.

इन भाइयों ने इस काम में अपनी पहचान बना ली है. उनके बिजनेस कार्ड पर बंदरों की एक तस्वीर है और लिखा है, “शाहरुख, अनुभवी बंदर भगाने वाला, WM Monkey Handler.”
कार्ड पर लिखा है, “हम लंगूरों की आवाज़ से बंदरों को भगाते हैं. हमारे पास हर ऑफिस के लिए खास सेवाएं हैं.”
इस काम में संपर्क बनाना बहुत जरूरी है. दोनों भाइयों के लिए लोगों से संपर्क बनाने का यह काम तब शुरू हुआ था, जब उनके पिता बंदर भगाने का काम करते थे.
पीढ़ियों से चला आ रहा एक काम
खान भाइयों के लिए बंदरों के व्यवहार की यह जानकारी किसी औपचारिक ट्रेनिंग का हिस्सा नहीं है; यह जानकारी पीढ़ियों से उन्हें मिलती आ रही है.
40 साल से भी पहले, शाहरुख के पिता नज़र अली अपने परिवार और चार ग्रे लंगूरों के साथ लखनऊ से दिल्ली आए थे. अली लंगूरों के साथ लुटियंस दिल्ली की सड़कों पर घूमते थे और इसी से अपना गुज़ारा करते थे. अमीर और पॉश इलाकों से उन्हें बच्चों के मनोरंजन के लिए बुलाया जाता था. लंगूर उनके लिए करतब दिखाते थे और खुश माता-पिता अली को पैसे देते थे, लेकिन इससे बहुत कम और कभी-कभी ही कमाई होती थी.
ऐसी ही एक घटना के दौरान शाहरुख को याद है कि उनके पिता को “एक बड़े पद पर बैठे अधिकारी” ने सलाह दी थी. अधिकारी ने अली से पूछा, “आप इन लंगूरों का इस्तेमाल आम बंदरों को भगाने के लिए क्यों नहीं करते?”
और इसी तरह अली बंदर भगाने वाले बन गए. शाहरुख ने कहा, “उस सलाह ने न सिर्फ मेरे पिता की ज़िंदगी बदल दी, बल्कि हमारी ज़िंदगी को भी संवार दिया.” उन्होंने बताया कि सेंट्रल दिल्ली में पुलिसकर्मी और लोग उनके पिता को अली—बंदर भगाने वाले के नाम से जानते थे.
शाहरुख 17 साल की उम्र में अपने पिता के साथ काम करने लगे. उन्होंने बताया कि उनकी पहली नौकरी ओखला में वोडाफोन के ऑफिस से बंदरों को भगाने की थी. इसके बाद उन्होंने मथुरा के एक डेंटल कॉलेज और झांसी रेलवे स्टेशन पर काम किया.

बचपन से ही शाहरुख और वसीम लंगूरों के साथ समय बिताते रहे हैं, लेकिन 2012 में उनके परिवार को बड़ा झटका लगा, जब सरकार ने छोटे बंदरों को डराने के लिए पालतू लंगूरों के व्यावसायिक इस्तेमाल और उन्हें तैनात करने पर रोक लगा दी.
उन्हें अपने सभी ग्रे लंगूर छोड़ने पड़े. उन्होंने कुछ लंगूर झंडेवालान, बिड़ला मंदिर और कुछ को लुटियंस दिल्ली के पास आज़ाद कर दिया. शाहरुख को याद है कि उन्हें अपने पसंदीदा लंगूर हीरा को भी वहां से जाने के लिए बहलाना पड़ा था.
शाहरुख ने अपने भाई का हाथ पकड़े हीरा की एक पुरानी तस्वीर दिखाते हुए कहा, “वे हमारे परिवार जैसे थे, लेकिन हम मजबूर थे.”
उस समय जिन सरकारी दफ्तरों में वे काम करते थे, वहां से उन्हें लंगूरों के बिना ही बंदरों को भगाने की सलाह दी गई. लंगूरों के साथ बिताए समय ने उन्हें जानवरों के व्यवहार के बारे में बहुत कुछ सिखाया था. अब वे इसी जानकारी और हुनर का इस्तेमाल बंदरों को भगाने के लिए करते हैं.
शाहरुख, वसीम और उनके परिवार के दूसरे लोग सरकारी दफ्तरों के बाहर करीब आठ घंटे रोज काम करते हैं और बंदरों को भगाते हैं. शाहरुख ने कहा, “शास्त्री भवन, कृषि भवन, दिल्ली पुलिस मुख्यालय, विधानसभा और कई सरकारी दफ्तरों से हमारे परिवार के लोग सालों से सेंट्रल दिल्ली में बंदरों को भगाते आ रहे हैं.”
आम ऑफिस जाने वाले लोगों की तरह दोनों भाई सुबह 9 बजे काम पर पहुंचते थे; अपनी खास “ईक-ईक-ईक” और “हूप-हूप” आवाजों से बंदरों को भगाते थे; और कुछ देर आराम करते थे. लंच के समय उनका काम स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता था.
पर्यावरण विशेषज्ञों को संदेह
कई लोगों ने बंदर भगाने वालों को काम पर रखना एक अनोखा, लेकिन व्यावहारिक समाधान माना, लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों को इस पर संदेह है.
डॉ. इकबाल मलिक, जो प्राणी विज्ञानी और वातावारण की संस्थापक हैं, ने कहा कि समस्या सिर्फ लुटियंस दिल्ली तक सीमित नहीं है और बंदर भगाने वाले कोई स्थायी समाधान नहीं हैं. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “किसी भी सरकारी इमारत या किसी भी जगह को आसानी से बंदर-रोधी बनाया जा सकता है.” उन्होंने जाल लगाने का सुझाव दिया.
उन्होंने आगे कहा कि बंदरों की समस्या कई गलत कदमों की वजह से शुरू हुई. इन कदमों में बंदरों को इंसानों के साथ रहने देने के बजाय उन्हें भगाने पर ध्यान दिया गया.

दिल्ली में बंदर लंबे समय से समस्या बने हुए हैं. 2007 में दिल्ली के तत्कालीन डिप्टी मेयर सुरिंदर सिंह बाजवा की बालकनी से गिरकर मौत हो गई थी. एक बंदर ने उन पर हमला किया था. इस घटना के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने अधिकारियों को बंदरों को पकड़कर दिल्ली के बाहर असोला भट्टी वन्यजीव अभयारण्य में ले जाने का निर्देश दिया था. वहां पीवीसी की दीवारें बनाई जानी थीं और खाने के लिए जगहें बनाई जानी थीं. हालांकि, पर्याप्त खाना नहीं मिलने के कारण बंदर असोला भट्टी से बाहर निकलकर वापस शहर में आने लगे.
इसके बाद एक और समस्या सामने आई. 2022 में रीसस मकाक बंदरों को वन्यजीव (संरक्षण) कानून की संरक्षित सूची से हटा दिया गया. इसके बाद इनके प्रबंधन की जिम्मेदारी वन विभाग से हटाकर स्थानीय निकायों को दे दी गई, लेकिन इन जानवरों के प्रबंधन के लिए कोई साफ और मिलकर बनाई गई रणनीति नहीं होने के कारण दिल्ली में बंदरों की समस्या बनी रही.
जनवरी में दिल्ली सरकार ने कहा था कि पिछले पांच साल में उसने रिहायशी और व्यावसायिक इलाकों से 6,500 से ज्यादा बंदरों को वन्यजीव अभयारण्य में भेजा है.
एमसीडी के पशु चिकित्सा विभाग के पूर्व कार्यवाहक निदेशक हेमंत कौशिक ने कहा, “बंदर भगाने वाले की अवधारणा वास्तव में प्रभावी नहीं है. लोगों ने लंगूरों की आवाज़ की नकल करके बहुत से प्रयोग किए हैं, लेकिन उन्हें कोई प्रभावी नतीजे नहीं मिलते. यह मूल रूप से समय और पैसे की बर्बादी है.”
बंदरों को “पूर्वज” बताते हुए उन्होंने दिप्रिंट से कहा कि एमसीडी और दूसरी संस्थाएं बंदरों को पकड़ने के लिए लोगों को काम पर रखती हैं और उन्हें अलग-अलग इलाकों में तैनात किया जाता है.
इकबाल ने कहा, “मैं इन युवा लड़कों को दोष नहीं देती, वे अपना गुज़ारा करने की कोशिश कर रहे हैं.”
काम के दौरान लगने वाले घाव
दोनों भाइयों ने बताया कि उन्हें हर महीने 20,000 रुपये मिलते हैं. आठ घंटे काम करने पर वे रोज करीब 700–800 रुपये कमाते हैं.
शाहरुख ने कहा, “इलाके के लोग हमें बंदर भगाने वाले के नाम से जानते हैं.” यह कहते हुए वह एक बंदर के साथ थोड़ी देर के लिए भिड़ गए. बंदर चीखने लगा, आगे की ओर झपटा और अपने दांत दिखाने लगा. शाहरुख ने भी तेज़ आवाज़ के साथ उसकी नकल की.
अपने झुंड के बिना बंदर दो मिनट की इस लड़ाई में हार गया और वहां से जाने का फैसला किया. इस काम में भी, किसी दूसरे काम की तरह, अपने कुछ खतरे हैं.

इरफान ने अपने हाथों पर निशान दिखाते हुए कहा, “मुझे बंदरों ने कई बार काटा है. उनके काटने से जान भी जा सकती है.” उन्होंने बताया कि उन्होंने इन घावों पर चूना (कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड) लगाकर इलाज किया.
अब्बास भी डरे हुए हैं, लेकिन उनका कहना है कि घर चलाने के लिए उन्हें यह काम करना पड़ता है. अब्बास ने कहा, “अगर मुझे कभी बंदर काटेगा तो मैं टीका लगवाऊंगा.”
लंबी दूरी तक पैदल चलना, बंदरों के साथ खेलना, दीवारों पर चढ़ना, भागना और कई बार अपनी जान जोखिम में डालना—बंदर भगाने वाले की जिंदगी ऐसी ही होती है.
हालांकि, जानवरों से बात करने का यह हुनर खान परिवार के पुरुषों में पीढ़ियों से चला आ रहा है, लेकिन महिलाएं उनके साथ इस काम के लिए बाहर नहीं जातीं. शाहरुख ने अपने दो बच्चों को भी इस काम से दूर रखने की कोशिश की है.
शाहरुख ने कहा, “उन्होंने मेरे वीडियो देखे हैं और मेरे काम के बारे में जानते हैं, लेकिन उन्होंने मुझे असल जिंदगी में यह काम करते हुए नहीं देखा है.”
हाल ही में शादी करने वाले वसीम भी नहीं चाहते कि उनके बच्चे उनके रास्ते पर चलें. शाहरुख ने कहा, “हम चाहते हैं कि वे पढ़ाई करें और हमारी तरह संघर्ष न करें.”
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