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Saturday, 18 July, 2026
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राजस्थान में राजपूत परंपरा का ऐतिहासिक फैसला, 13 साल की लड़की बनी उत्तराधिकारी

65 साल से बंद पड़ी 'पगड़ी की रस्म' इस जून में मारवाड़ के एक गांव में फिर निभाई गई. इस रस्म में एक स्कूली छात्रा को उत्तराधिकारी घोषित किया गया. इससे राजपूत समाज में परंपरा और विरासत को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है.

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खेरवा, राजस्थान: अब वह तालाब नहीं रहा. पुराने किले के नीचे जहां कभी पानी भरा रहता था, वहां अब सिर्फ सूखी और बंजर ज़मीन बची है. करीब तीन हफ्ते पहले राजस्थान की पूर्व रियासत खेरवागढ़ की उत्तराधिकारी बनीं 13 साल की तेजस्वी कुमारी जोधा उसी खाली जगह की ओर इशारा करती हैं. शायद उन्हें भी अभी तक यकीन नहीं हो रहा कि सदियों पुरानी राजपूत उत्तराधिकार की परंपरा बदल गई है.

पिस्ता-गुलाबी फूलों वाला कुर्ता पहने तेजस्वी ने दिप्रिंट को दिए अपने पहले और खास इंटरव्यू में कहा, “वह जगह पहले तालाब थी, लेकिन अब उसमें पानी नहीं है.”

यह एक छोटी-सी बात है, जैसी बच्चे बड़े लोगों के बात खत्म होने का इंतिज़ार करते हुए कह देते हैं, लेकिन इस हफ्ते पाली जिले के खेरवा गांव में लगभग हर चीज़ पहले और बाद की कहानी बन चुकी है.

करीब 20 दिन पहले, जोधपुर से लगभग 100 किलोमीटर दूर मारवाड़ के इस गांव में करीब एक हज़ार लोग इकट्ठा हुए थे. वे तेजस्वी कुमारी जोधा को देखने आए थे, जिन्हें यहां प्यार से ‘बाई-सा’ कहा जाता है. इस समारोह में उन्हें खेरवागढ़ का उत्तराधिकारी घोषित किया गया. यह वह पद था, जो पीढ़ियों से लगभग हमेशा किसी पुरुष को मिलता आया था. राजस्थान के किसी भी राजपूत शाही परिवार में अब तक किसी लड़की को यह सम्मान नहीं मिला था.

महल के उस हिस्से में तेजस्वी, जिसे कोविड तक होटल के रूप में चलाया जाता था | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट
महल के उस हिस्से में तेजस्वी, जिसे कोविड तक होटल के रूप में चलाया जाता था | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट

गांव के बुजुर्गों, ब्राह्मण समाज के नेताओं, परिवार के लोगों और जोधपुर राजघराने के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में तेजस्वी के सिर पर पगड़ी बांधी गई. उनके माथे पर शाही पुजारी के अंगूठे से निकाले गए खून से तिलक लगाया गया. इसके लिए तलवार की सपाट धार से पुजारी का अंगूठा हल्का-सा काटा गया. इसे ‘पगड़ी की रस्म’ कहा जाता है, जिसके जरिए खेरवागढ़ रियासत अपना उत्तराधिकारी चुनती है. यह रस्म 65 साल बाद हुई थी और राजस्थान की यादों में पहली बार किसी लड़की के लिए निभाई गई.

तेजस्वी के पिता ठाकुर हरिश्चंद्र सिंह जोधा का पिछले महीने जयपुर में लंबी बीमारी के बाद 78 साल की उम्र में निधन हो गया था. उनका कोई बेटा नहीं था. पीढ़ियों से राजपूत शाही परिवारों में यह नियम था कि अगर किसी शासक का बेटा नहीं होता, तो गद्दी परिवार के सबसे नज़दीकी पुरुष रिश्तेदार को मिलती थी, चाहे वह कितना भी दूर का रिश्तेदार क्यों न हो. बेटियों को प्यार, जिम्मेदारी और कभी-कभी संपत्ति मिलती थी, लेकिन राजगद्दी लगभग हमेशा पुरुषों को ही मिलती थी.

महल के प्रवेश द्वार पर तेजस्वी कुमारी जोधा के पिता स्वर्गीय हरिश्चंद्र सिंह जोधा की तस्वीर लगी है | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट
महल के प्रवेश द्वार पर तेजस्वी कुमारी जोधा के पिता स्वर्गीय हरिश्चंद्र सिंह जोधा की तस्वीर लगी है | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट

स्वर्गीय ठाकुर हरिश्चंद्र के बहनोई, 77 साल के भारत सिंह चौहान, जिन्होंने सफेद कुर्ता-पायजामा पहन रखा था, उन्होंने इस उत्तराधिकार को “ऐतिहासिक” बताया.

उन्होंने कहा, “पहले अगर गद्दी पर बैठे व्यक्ति का बेटा नहीं होता था, तो परिवार में सबसे नजदीकी पुरुष रिश्तेदार, चाहे वह कितना भी दूर का क्यों न हो, वही उत्तराधिकारी बनता था, लेकिन अब जब बाई-सा अकेली हैं, तो सबने तय किया कि इन्हें ही उत्तराधिकारी बनाया जाए.”

इतिहासकारों का कहना है कि पुरानी उत्तराधिकार व्यवस्था भेदभाव नहीं, बल्कि उस समय की ज़रूरतों पर आधारित थी. उस दौर में उत्तराधिकारी से उम्मीद की जाती थी कि वह खुद सेना की अगुवाई करेगा और युद्ध लड़ेगा. इसलिए परिवार नजॉदीकी महिला रिश्तेदार की बजाय दूर के पुरुष रिश्तेदार को चुनता था.

हालांकि, महिलाओं को पूरी तरह युद्ध से दूर नहीं रखा गया था. इतिहासकार डॉ. रीमा हूजा बताती हैं कि 16वीं सदी की रानी उमादे भाटियानी जैसी महिलाएं भी युद्ध में सेना का नेतृत्व कर चुकी हैं, लेकिन तेजस्वी का मामला अलग है, क्योंकि यहां पहली बार उत्तराधिकार की औपचारिक रस्म ही किसी लड़की के लिए की गई है.

डॉ. हूजा ने कहा, “अगर इसे नया बदलाव कहें, तो यह अच्छी बात है, क्योंकि इससे लड़के और लड़की, पुरुष और महिला के बीच बराबरी को मान्यता मिल रही है. उत्तराधिकार का टीका पहली बार किसी लड़की को दिया गया है.”

स्कूल जाने वाली ‘बाई-सा’

तेजस्वी अभी भी समझने की कोशिश कर रही हैं कि यह सब आखिर क्या है.

वह सातवीं क्लास में पढ़ती हैं और हर दिन करीब 30 किलोमीटर दूर पाली के एक मशहूर अंग्रेज़ी मीडियम स्कूल जाती हैं. उन्हें पेंटिंग करना और जानवर बहुत पसंद हैं. वह कहती हैं कि उन्होंने अभी तक यह नहीं सोचा कि बड़ी होकर क्या बनना है. अब वह मुस्कुराते हुए कहती हैं कि शायद परिवार की रियासत की देखभाल करना ही उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन जाएगी.

लेकिन जब वह अपने पिता की बात करती हैं, तो वह आज भी वही 13 साल की बेटी लगती हैं, जिसने कुछ ही हफ्ते पहले अपने पिता को खोया है.

उन्हें सिर्फ इतना बताया गया था कि उनके दाता की तबीयत खराब है. जब तक वह नारायणगढ़ से खेरवा अपने घर पहुंचीं, तब तक घर में शोक मनाने वाले लोगों की भीड़ लग चुकी थी.

उन्होंने कहा, “मुझे कुछ भी पता नहीं था. मुझे पिताजी की मौत के बारे में तब पता चला, जब मैं खेरवा पहुंची. तब तक मुझे यही लग रहा था कि वह इलाज के लिए अहमदाबाद जा रहे हैं.”

उनके पास उनकी भाभी-सा यशश्री बैठी हैं, जो उनके चचेरे भाई की पत्नी हैं. उन्होंने पीले रंग की फूलों वाली सूती पोशाक पहन रखी है. बच्ची की बातें सुनते हुए उनकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं. तेजस्वी अपनी बात बीच में रोककर उनकी तरफ देखती हैं.

उन्होंने सहज अंदाज़ में कहा, “यहां ऐसा होता है कि जैसे ही कुछ होता है, लोग रोने लगते हैं.” फिर वह अपनी भाभी-सा की ओर हल्की मुस्कान के साथ देखती हैं.

बिना पूछे ही वह बताती हैं कि उन्होंने रास्ते में अपने मन में क्या सोचा था. उनके पिता की तबीयत पहले भी कई बार खराब हुई थी. एक बार उनकी मां का ब्लड शुगर इतना कम हो गया था कि वह बेहोश हो गई थीं. तब भी घर में सभी लोग ऐसे ही घबरा गए थे और रोने लगे थे. इसलिए जब वह घर पहुंचीं और सबको रोते देखा, तो उन्हें लगा कि शायद अहमदाबाद जाते समय तबीयत फिर ज्यादा बिगड़ गई होगी, न कि उनकी मौत हो गई है.

खेरवा, पाली स्थित अपने महल में 46 साल की भाभी-सा यशश्री के साथ चलती तेजस्वी | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट
खेरवा, पाली स्थित अपने महल में 46 साल की भाभी-सा यशश्री के साथ चलती तेजस्वी | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट

आखिर में उनकी भाभी-सा यशश्री ने ही उन्हें सच बताया.

तेजस्वी ने धीमी आवाज़ में कहा, “तो मैंने दाता को प्यार भी किया.” सच जानने से पहले उन्होंने अपने पिता के माथे पर प्यार से हाथ फेरा था. हाथ से इशारा करते हुए उन्होंने कहा, “मैंने दाता के सिर पर भी ऐसे-ऐसे किया.”

यह सुनकर यशश्री फिर रोने लगती हैं. तेजस्वी उनकी तरफ मुड़कर आधी हंसते और आधी मनाते हुए कहती हैं, “अरे यार! प्लीज ना, भाभी-सा… प्लीज, मत रोइए.”

पगड़ी की रस्म के बारे में उन्हें सिर्फ एक दिन पहले बताया गया था.

उन्होंने कहा, “मुझे बताया गया था कि बहुत सारे लोग आएंगे और मेरे सिर पर पगड़ी बांधेंगे.” उन्होंने बताया कि इस पूरे कार्यक्रम का इंतज़ाम उनके दो बड़े चचेरे भाइयों ने किया था.

वह इस पूरे अनुभव को “बहुत भावुक” बताती हैं. उनकी मां अभी अपने मायके में हैं और सदमे से उबर रही हैं. इस पूरी घटना का असर अभी तक पूरी तरह कम नहीं हुआ है.

तेजस्वी ने कहा, “मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है.”

जब परंपराएं बदलीं

यह समारोह पहले कभी नहीं हुआ था, लेकिन परिवार का कहना है कि इसके पीछे वजह बहुत सीधी थी. उनके मुताबिक, तेजस्वी के अलावा किसी और को उत्तराधिकारी बनाने की कोई ज़रूरत नहीं थी.

परिवार का कहना है कि इस फैसले पर पहले चर्चा हुई, फिर सभी ने मिलकर विचार किया. इसके बाद पंडितों और ब्राह्मण समाज के नेताओं ने अपनी मंजूरी दी. फिर जोधपुर के पूर्व राजघराने से भी सहमति ली गई क्योंकि मारवाड़ की कई पुरानी रियासतों में आज भी उनका प्रतीकात्मक सम्मान और प्रभाव माना जाता है.

भारत सिंह चौहान ने कहा, “अगर इसमें कोई दिक्कत होती, तो यह संभव ही नहीं हो पाता. यह फैसला सबकी राय और बदलाव की इच्छा के बाद लिया गया है, यहां तक कि जोधपुर महाराजा की भी सहमति ली गई.”

गांव के सभी लोगों की राय एक जैसी नहीं है और परिवार भी ऐसा दावा नहीं करता.

कई ग्रामीणों ने दिप्रिंट से कहा, “हमें गर्व है कि एक लड़की शासक बनी है.”

लेकिन गांव के कुछ लोग, खासकर बुजुर्ग, मानते हैं कि परंपरा के अनुसार गद्दी किसी पुरुष रिश्तेदार को मिलनी चाहिए थी. उनका कहना है कि परिवार को पुरानी परंपरा नहीं बदलनी चाहिए थी.

तेजस्वी जोधा के महल का बड़ा प्रवेश द्वार | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट
तेजस्वी जोधा के महल का बड़ा प्रवेश द्वार | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट

परिवार की बात को इस समारोह के बड़े आयोजन से भी कुछ हद तक समर्थन मिलता है. क्षेत्रीय हिंदी अखबारों ने इसे राजपूत उत्तराधिकार की परंपरा में ऐतिहासिक बदलाव बताया. ‘पगड़ी की रस्म’ की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हुए.

भद्राजून, निम्बलारा, जोजावर और धामली जैसी कई पूर्व रियासतों के प्रतिनिधि पूरी राजपूताना परंपरा के साथ खेरवा पहुंचे. जोधपुर के पूर्व शाही परिवार के सदस्य भी समारोह में शामिल हुए और उन्होंने ही तेजस्वी के सिर पर रस्म के अनुसार पगड़ी बांधी.

तिलक से पहले महल को हरिद्वार से लाए गए गंगाजल से शुद्ध किया गया. वैदिक विद्वानों ने मंत्रोच्चार और पूजा की रस्में पूरी कीं. परिवार के शाही पुजारी शंकर सिंह ने खून का तिलक लगाया. परिवार का कहना है कि यह रस्म लंबे समय से जोधपुर के पूर्व शाही परिवार की उत्तराधिकार परंपरा का हिस्सा रही है.

तेजस्वी के मामा पक्ष के रिश्तेदार और ओसियां राजघराने से जुड़े उनके चचेरे भाई जयवर्धन सिंह भाटी भी वहीं बैठे थे. उन्होंने भी परिवार के बाकी पुरुषों की तरह सफेद कुर्ता पहन रखा था, सिर पर पारंपरिक टोपी और गले में सोने की चेन थी. वह बताते हैं कि यह पल इतिहास में इतना खास क्यों माना जा रहा है.

38 साल के जयवर्धन ने कहा, “हमारे पहले राजा मोटाराजा उदय सिंहजी थे. उनके बाद हमारा परिवार यहां आकर बसा. इसके बाद खेरवागढ़ जोधपुर राज्य की नौ सिरायतों (जागीरों) में सबसे प्रमुख बन गया. हम वंश से जोधा राजपूत हैं.”

इतिहास के अनुसार, खेरवा कभी जोधपुर के मेहरानगढ़ दरबार की न्यायिक चौकी हुआ करता था. यहां अपनी जेल थी, अपने मजिस्ट्रेट थे और ‘नवचौकी’ नाम का एक कमरा था, जहां कभी न्यायाधीश बैठते थे. वह कमरा आज भी मौजूद है, लेकिन अब वह महल के उस हिस्से में है, जिसे बाद में होटल बना दिया गया. उसे कभी मेहमानों के लिए नहीं खोला गया और आज भी जानबूझकर बंद रखा गया है.

पिता की विरासत का बोझ

अगर हरिश्चंद्र सिंह जोधा इतने सम्मानित व्यक्ति नहीं होते, तो शायद यह सब कभी नहीं हो पाता.

राजघराने से होने के बावजूद वह दो बार गांव के सरपंच रहे. बाद में पंचायत समिति के सदस्य भी बने. इसके साथ ही वह लोगों के झगड़े सुलझाते थे, सरकारी योजनाओं का फायदा दिलाने में मदद करते थे और जो भी उनके पास मदद के लिए आता था, उसके लिए हमेशा तैयार रहते थे.

ओसियां राजघराने से तेजस्वी के चचेरे भाई जयवर्धन ने कहा, “स्वर्गीय ठाकुर साहब हरिश्चंद्र जी बहुत बड़े व्यक्तित्व थे. गांव के लोग उन्हें नेता ही नहीं, भगवान जैसा मानते थे. वह सबकी मदद करते थे, कभी किसी के साथ बुरा व्यवहार नहीं किया और किसी को खुद से छोटा नहीं समझा.”

वह बताते हैं कि करीब 50 साल पहले, जब सरकारी व्यवस्था गांवों तक ठीक से नहीं पहुंचती थी, तब भी हरिश्चंद्र सिंह गांव और लोगों की मदद के लिए हमेशा मौजूद रहते थे.

खेरवा का महल पूरे गांव से सबसे ऊंचाई पर बना है. कई किलोमीटर दूर से भी यह सबसे ऊंची जगह दिखाई देती है. इतिहास में खेरवा की बाकी बसावट इसी महल के आसपास विकसित हुई थी | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट
खेरवा का महल पूरे गांव से सबसे ऊंचाई पर बना है. कई किलोमीटर दूर से भी यह सबसे ऊंची जगह दिखाई देती है. इतिहास में खेरवा की बाकी बसावट इसी महल के आसपास विकसित हुई थी | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट

उन्होंने कहा, “अगर आधी रात को भी कोई उन्हें बुलाने आता था, तो वह मदद के लिए तैयार रहते थे. इसी वजह से लोग उन्हें अपना प्रतिनिधि मानते थे और आज भी उनके लिए लोगों के मन में बहुत सम्मान और प्यार है.”

मौत से सिर्फ 15 दिन पहले भी, जब उनकी तबीयत काफी खराब थी, तब भी उन्होंने गांव वालों के साथ एक बैठक की थी.

उनके चचेरे भाई ने कहा, “गांव वालों के लिए उनके मन में इतना प्यार था.”

परिवार के मुताबिक, उनके निधन पर करीब 2,000 से 4,000 लोग अंतिम संस्कार में शामिल हुए. पूरे खेरवा का बाज़ार उस दिन बंद रहा. आसपास के गांवों ने भी सम्मान में अपनी दुकानें बंद रखीं. वह नाम से भले ही एक छोटे राजघराने के सदस्य थे, लेकिन लोगों के लिए परिवार के बड़े बुजुर्ग जैसे थे.

परिवार का कहना है कि तेजस्वी को सिर्फ गद्दी ही नहीं मिली, बल्कि अपने पिता का वह सम्मान और लोगों का विश्वास भी मिला, जिसे उन्होंने कई दशकों में कमाया था.

‘बाई-सा’ बनना सीख रहीं तेजस्वी

समारोह से अलग, तेजस्वी की ज़िंदगी अब भी एक आम लड़की जैसी है.

यशश्री ने कहा, “वह सुबह स्कूल जाती है. स्कूल से लौटकर कुछ खाती है, थोड़ा आराम करती है, फिर अपनी क्लास में जाती है और पढ़ाई करती है. शाम को उसके दोस्त खेलने आ जाते हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “कभी-कभी वह खाना भी बनाती है. अगर उसे कोई चीज़ पसंद आ जाए, तो वह रसोइए के साथ रसोई में जाकर खुद बना लेती है.”

लेकिन ‘पगड़ी की रस्म’ से पहले भी तेजस्वी की रोजमर्रा की ज़िंदगी में ऐसी जिम्मेदारियां थीं, जो आम 13 साल की लड़कियों के पास नहीं होतीं.

छोटी उम्र से ही वह अपने पिता के साथ गांव की बैठकों, धार्मिक कार्यक्रमों और सार्वजनिक आयोजनों में जाती थीं.

यशश्री ने कहा, “वह बचपन से ही अपने पिता के साथ रहती थी. हर कार्यक्रम में उनके साथ जाती थी. अगर किसी वजह से उनके पिता नहीं जा पाते थे, या किसी रस्म के लिए उसका जाना जरूरी होता था, तो वह उनकी जगह जाती थी.”

पाली जिले के खेरवा स्थित डेरा खेरवागढ़ महल में बाघ के शिकार की तस्वीरें | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट
पाली जिले के खेरवा स्थित डेरा खेरवागढ़ महल में बाघ के शिकार की तस्वीरें | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट

हर स्वतंत्रता दिवस पर, जब उनके पिता बीमारी या किसी और वजह से नहीं जा पाते थे, तो उनके परदादा द्वारा स्थापित स्थानीय स्कूल में होने वाले ध्वजारोहण कार्यक्रम में तेजस्वी उनकी जगह शामिल होती थीं.

यशश्री ने कहा, “वह हर जगह अपने पिता के साथ जाती थी. वहां जो कुछ भी होता था, वह सब देखती और समझती थी.”

तेजस्वी पहले से ही सार्वजनिक जीवन से परिचित हैं. अब उनका परिवार उन्हें पिता के बिना इस नई जिम्मेदारी को निभाना सिखा रहा है.

यशश्री ने कहा, “अब यह कहना मुश्किल है कि वह किसके साथ जाएगी, लेकिन हम यह ज़रूर सुनिश्चित करेंगे कि वह हर कार्यक्रम में शामिल हो. उसके साथ हमेशा कोई न कोई रहेगा, जो उसे रास्ता दिखाएगा.”

फिलहाल परिवार का कहना है कि भविष्य को लेकर कोई बड़ा प्लान नहीं बनाया गया है.

महल के पास बने मेहराब के नीचे खड़ी 1942 मॉडल की फोर्ट जीप | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट
महल के पास बने मेहराब के नीचे खड़ी 1942 मॉडल की फोर्ट जीप | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट

यशश्री ने कहा, “अभी उसे अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना है. उसे खुद को मजबूत बनाना है. लोगों का मार्गदर्शन करना हमारे परिवार की परंपरा है, लेकिन इसे सीखना और आगे बढ़ाना पड़ता है. वह अभी बहुत छोटी है. जब वह पूरी तरह सक्षम हो जाएगी, तब अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाएगी और लोगों के लिए वैसे ही काम करेगी, जैसा यहां हमेशा से होता आया है.”

फिर वह थोड़ा रुकती हैं और इस बड़े पद के पीछे छिपी उस छोटी बच्ची की एक झलक दिखाती हैं.

उन्होंने कहा, “उसका दिल बहुत अच्छा है. अगर वह किसी को तकलीफ में देखती है, तो उसे उसकी चिंता होती है. अभी कुछ दिन पहले ही वह दोपहर की तेज धूप में खेल रहे बच्चों को लेकर परेशान हो गई थी.”

पुरानी परंपराएं, नई ज़िंदगी

महल का वह हिस्सा, जहां परिवार आज भी रहता है, कमरों और आंगनों से भरा हुआ है. वह किसी घर से ज्यादा भूलभुलैया जैसा लगता है.

दीवारों पर लगी काले-सफेद तस्वीरों में बाघ के शिकार, शाही शादियां और पूर्वजों की तस्वीरें हैं. कांच वाली अलमारियों में पुराने बर्तन और खिलौने रखे हैं. एक दूसरी अलमारी पूरी तरह तलवारों से भरी हुई है.

यशश्री बताती हैं कि ‘पगड़ी की रस्म’ की तस्वीरें सोशल मीडिया पर आने के बाद इन्हीं तलवारों को लेकर विवाद हो गया.

उन्होंने कहा, “कई लोगों ने सवाल उठाया कि उसके हाथ में तलवार क्यों थी. वे यह नहीं समझते कि राजपूत परंपरा में तलवार की पूजा की जाती है. हमारे लिए तलवार उतनी ही पवित्र है, जितनी सिखों के लिए कृपाण.”

परंपरा के अनुसार, उत्तराधिकारी का तिलक तलवार के बाद ही लगाया जाता है और अगर कभी दूल्हा शादी में मौजूद न हो, तो कुछ मामलों में उसकी जगह तलवार रखकर भी शादी की रस्म पूरी की जाती है.

परिवार ने महल की गाड़ियों, इमारत और रस्मों के बारे में खुलकर बताया, लेकिन तलवारों के बारे में साफ कहा कि उनके लिए ये सिर्फ पुरानी चीज़ें नहीं, बल्कि पवित्र और निजी विरासत हैं.

महल की इमारत भी बताती है कि समय के साथ यहां की परंपराएं कैसे बदली हैं.

परिवार के पुराने घुड़साल में घोड़े के देवता की पत्थर पर बनी भित्ति चित्रकारी, जिस पर चांदी और सोने का काम है. समय के साथ यह काफी घिस चुकी है | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट
परिवार के पुराने घुड़साल में घोड़े के देवता की पत्थर पर बनी भित्ति चित्रकारी, जिस पर चांदी और सोने का काम है. समय के साथ यह काफी घिस चुकी है | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट

महल पहले दो अलग-अलग हिस्सों में बनाया गया था. ‘मरदाना’ हिस्सा पुरुषों के लिए था और ‘जनाना’ हिस्सा महिलाओं के लिए. दोनों को अलग रखा जाता था.

आज परिवार पुराने मरदाना हिस्से में साथ रहता है, जबकि जनाना हिस्से को 10 साल से ज्यादा पहले 20 कमरों वाले हेरिटेज होटल में बदल दिया गया था.

पुराने अस्तबल आज भी हैं, लेकिन वहां अब घोड़े नहीं हैं. जहां कभी घोड़ों को नहलाया जाता था, वहां अब एक खाली स्विमिंग पूल है. वहीं अभी भी बड़े-बड़े बर्तन रखे हैं, जिनमें हरिश्चंद्र सिंह जोधा के अंतिम संस्कार में आए हज़ारों लोगों के लिए खाना बनाया गया था. कोविड महामारी के बाद से यह होटल बंद पड़ा है.

अगर तेजस्वी का उत्तराधिकारी बनना एक पुरानी परंपरा से अलग फैसला था, तो महल के अंदर की कई दूसरी परंपराएं भी समय के साथ बदल चुकी हैं.

परिवार की बड़ी उम्र की महिलाएं आज भी परंपरा के अनुसार सार्वजनिक जगहों पर घूंघट करती हैं, लेकिन तेजस्वी समेत नई पीढ़ी की महिलाएं ऐसा नहीं करतीं. वे लोगों से आमने-सामने मिलती हैं और बिना झिझक कैमरे पर बात भी करती हैं.

शोक मनाने की परंपरा भी अब बदल रही है.

हरिश्चंद्र सिंह जोधा के निधन के सिर्फ एक महीने बाद परिवार ने 12-मासी, या कुछ परंपराओं के अनुसार 6-मासी, की प्रार्थना सभा की.

पहले ऐसी रस्में और उसके बाद सामान्य जीवन में वापसी आमतौर पर छह महीने या एक साल बाद होती थी, खासकर अगर परिवार में कोई अविवाहित बेटी हो, लेकिन इस बार यह समय काफी कम कर दिया गया.

सिर पर बंधी पगड़ी

अब तेजस्वी फिर अपनी रोजमर्रा की ज़िंदगी में लौट आई हैं. सोमवार को वह फिर पाली में अपनी कक्षा 7 की पढ़ाई के लिए जाएंगी. इसके लिए उन्हें हर दिन 30 किलोमीटर का सफर तय करना होगा.

घर के बाहर, पुराने तालाब के पास खड़ी होकर वह दूर क्षितिज की ओर इशारा करती हैं. वहां एक पहाड़ी की हल्की-सी आकृति दिखाई देती है.

उन्होंने कहा, “वहां एक मंदिर है. अब वह ठीक से दिखाई नहीं देता, क्योंकि प्रदूषण और बादलों की वजह से वह ढक जाता है.”

जब उनसे पूछा गया कि महल का उनका सबसे पसंदीदा हिस्सा कौन-सा है, तो उन्होंने न तो उस ड्रॉइंग रूम का नाम लिया, जहां मेहमानों का स्वागत होता है और न ही उस हॉल का, जहां उन्हें उत्तराधिकारी घोषित किया गया था.

खेरवा स्थित अपने महल में घूमती हुई तेजस्वी | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट
खेरवा स्थित अपने महल में घूमती हुई तेजस्वी | फोटो: समन हुसैन/दिप्रिंट

इसके बजाय उन्होंने महल के सबसे पुराने हिस्से की ओर इशारा किया.

वह मुस्कुराते हुए बोलीं, “घर के बड़े लोग मुझे वहां जाने से मना करते हैं, क्योंकि वह हिस्सा बहुत पुराना है, लेकिन वहां एक दीवार है, जिससे नीचे ज़मीन पर कूद सकते हैं. वहां एक नीम का पेड़ भी है. जब उसके फल पीले हो जाते हैं, तो वे बहुत मीठे लगते हैं.”

एक रियासत की जिम्मेदारी उठाने के लिए वह अभी बहुत छोटी हैं.

लेकिन फिलहाल, महल में एक ऐसी पगड़ी है, जो उनके सिर पर बिल्कुल ठीक बैठती है.

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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