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Friday, 3 July, 2026
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भारत में कोचिंग का नया क्रेज IIT या UPSC नहीं, अब ट्रेडिंग सीखने की होड़

18 साल के स्टूडेंट्स से लेकर अधेड़ उम्र के दुकानदारों तक, नई पीढ़ी स्टॉक मार्केट में मास्टर बनने और फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस पाने के लिए हज़ारों रुपये खर्च कर रही है.

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नई दिल्ली: एक सुबह, 18 साल के पीयूष ने अपना ट्रेडिंग अकाउंट रिफ्रेश किया और देखा कि 1,800 रुपये का ट्रेड सिर्फ एक महीने में 24,000 रुपये के प्रॉफिट में बदल गया. दिल्ली के उत्तम नगर में एक ट्रेडिंग एकेडमी, जो स्टॉक मार्केट के लिए भारत की बढ़ती दिलचस्पी पर बनी कोचिंग बूम का हिस्सा है, उसने उन्हें प्रॉफिट कमाने में मदद की.

पीयूष ने कहा, “मुझे बहुत खुशी हुई कि इतनी कम उम्र में मैंने इतना अच्छा प्रॉफिट कमा लिया.”

इस कोर्स की फीस तीन महीने के लिए 28,000 रुपये थी. अब इस किशोर का रोज़ाना का रुटीन बदल चुका है.

हर सुबह करीब 11 बजे वह एक रिक्लाइनर कुर्सी पर बैठते हैं, अपना लैपटॉप खोलते हैं और अगले 9 घंटे तक शेयर मार्केट पर नज़र रखते हैं. उनके सामने लगी बड़ी स्क्रीन पर लाल और हरे रंग की कैंडलस्टिक लगातार बदलती रहती हैं, जबकि स्टूडेंट्स चार्ट देखकर ऐसे मौके तलाशते हैं, जहां वे कई हफ्तों से सीखी गई ट्रेडिंग ट्रिक्स को आजमा सकें.

पूरा कमरा महत्वाकांक्षा का माहौल दिखाता है. दीवारों पर “Bold Moves, Big Success” और “Grind Now, Shine Later” जैसे स्लोगन लिखे हैं.

मेरठ से ओपन कॉलेज की पढ़ाई कर रहे और साथ में पार्ट-टाइम डीजे का काम करने वाले पीयूष के लिए वादा सीधा है—अगर शेयर मार्केट सीख लिया, तो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर ज़िंदगी मिल सकती है.

और पीयूष अकेले नहीं हैं.

दिल्ली-एनसीआर में ट्रेडिंग अकादमियां अब उन इलाकों में तेज़ी से खुल रही हैं, जहां पहले से ही बेहतर भविष्य का सपना दिखाने वाले कई कोचिंग सेंटर मौजूद हैं. पश्चिम दिल्ली के उत्तम नगर से लेकर पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मी नगर तक अब ऑप्शंस ट्रेडिंग और रिस्क मैनेजमेंट सिखाने वाली क्लासें, इंजीनियरिंग एंट्रेंस एग्जाम, सरकारी नौकरी और भाषा की तैयारी कराने वाले संस्थानों के साथ-साथ चल रही हैं. यह चलन अब छोटे शहरों तक भी पहुंच गया है.

लखनऊ, प्रयागराज, रायपुर, जयपुर और भुवनेश्वर जैसे शहरों में ट्रेडर अब अपने मार्केट के एक्सपीरियंस को कोचिंग बिजनेस में बदल रहे हैं. यहां 9 रुपये की शुरुआती वेबिनार से लेकर 1 लाख रुपये से ज्यादा की फीस वाले मेंटरशिप प्रोग्राम तक उपलब्ध हैं. कुछ लोगों ने अपने ऑफलाइन सेंटर बंद करके पूरी तरह ऑनलाइन क्लासें शुरू कर दी हैं, जबकि कई लोग ऑफलाइन और ऑनलाइन, दोनों तरह से पढ़ा रहे हैं.

कोरोना महामारी के बाद रिटेल इन्वेस्टमेंट में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है. स्मार्टफोन, ऑनलाइन ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया की वजह से पहली बार इन्वेस्ट करने वाले लाखों लोगों के लिए शेयर मार्केट तक पहुंच आसान हो गई. मार्च 2020 में डिमैट खातों की संख्या 4.1 करोड़ थी, जो अब बढ़कर 17 करोड़ से ज्यादा हो गई है. नए ट्रेडरों में बड़ी संख्या युवाओं और छोटे शहरों के लोगों की है.

द्वारका मोड़, दिल्ली में बिजली के तारों के बीच लगा एक ट्रेडिंग अकादमी का विज्ञापन | फोटो: प्रेक्षा/दिप्रिंट
द्वारका मोड़, दिल्ली में बिजली के तारों के बीच लगा एक ट्रेडिंग अकादमी का विज्ञापन | फोटो: प्रेक्षा/दिप्रिंट

अब इन नए ट्रेडरों को सिखाने के लिए एक पैरलल कोचिंग इंडस्ट्री भी खड़ी हो गई है. इन संस्थानों के नाम ऐसे रखे गए हैं, जो एक तरफ सफलता का भरोसा दिलाते हैं और दूसरी तरफ तेज़ी वाले शेयर मार्केट (बुल मार्केट) का संकेत भी देते हैं. जैसे—Mad Over Trading, Trading Bulls और Bull’s Eye Trading.

इनके विज्ञापन इंस्टाग्राम रील्स और टेलीग्राम चैनलों पर आर्थिक आज़ादी के सपने दिखाते हैं. वहीं क्लासरूम में दावा किया जाता है कि कुछ ही हफ्तों में एक शुरुआती व्यक्ति को फुल-टाइम ट्रेडर बनाया जा सकता है.

एक इंस्टाग्राम पेज आपको यूट्यूब चैनल तक ले जाता है, यूट्यूब चैनल से टेलीग्राम ग्रुप तक पहुंचते हैं और टेलीग्राम ग्रुप से आपको कोई पेड कोर्स ऑफर किया जाता है, लेकिन इस तेज़ी से बढ़ते कारोबार पर अब सवाल भी उठने लगे हैं. SEBI के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 (FY25) में भारत के इक्विटी डेरिवेटिव मार्केट में ट्रेडिंग करने वाले 91 प्रतिशत व्यक्तिगत ट्रेडरों को नुकसान हुआ. इसके बावजूद 75 प्रतिशत से ज्यादा लोग दोबारा ट्रेडिंग करने लौट आए. इसी दौरान ट्रेडिंग सिखाने वाले संस्थानों की संख्या लगातार बढ़ती रही और नियामकों ने ट्रेडिंग से जुड़े नियम भी सख्त किए.

शिक्षकों और शेयर मार्केट के जानकारों का कहना है कि भारत में वित्तीय शिक्षा की कमी और जल्दी पैसा कमाने के वादे इस समस्या की सबसे बड़ी वजह हैं. बेंगलुरु के मार्केट एनालिस्ट और ट्रेडर सुनी पटवाल, जो पहले जेपी मॉर्गन और Danske Bank में काम कर चुके हैं, कहते हैं कि ट्रेडिंग क्लासों का यह बढ़ता चलन चिंता की बात है.

42-वर्षीय पटवाल ने कहा, “इन संस्थानों में आने वाले ज्यादातर लोगों का सिर्फ एक ही मकसद होता है—पैसा कमाना.”

उन्होंने कहा, “पहले पैसा कमाने का मतलब एक स्थायी नौकरी और लंबे अनुभव से जुड़ा होता था, लेकिन अब जल्दी मुनाफा कमाने वाली सोच के कारण लोगों की यह धारणा बदल गई है.”

ओडिशा के भुवनेश्वर की एक ट्रेडिंग अकादमी अपने छात्रों के मुनाफे के स्क्रीनशॉट इंस्टाग्राम पर पोस्ट करती है | फोटो: इंस्टाग्राम/@thetradingleo
ओडिशा के भुवनेश्वर की एक ट्रेडिंग अकादमी अपने छात्रों के मुनाफे के स्क्रीनशॉट इंस्टाग्राम पर पोस्ट करती है | फोटो: इंस्टाग्राम/@thetradingleo

आर्थिक आज़ादी का सपना

करीब दो दशक से 36 साल के श्याम कुमार शाह मोबाइल फोन रिपेयर करके अपना गुज़ारा कर रहे हैं. दिल्ली के अंसारी नगर में उनकी किराये की दुकान से घर का खर्च तो चल जाता है, लेकिन यही बात उन्हें रात में चिंता भी देती है. अगर उन्हें अपने गांव बिहार के दरभंगा लौटना पड़ा, तो उन्हें भरोसा नहीं कि उनका यह काम चल पाएगा. उनके दो बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं और तीसरा भी जल्द ही स्कूल जाना शुरू करेगा. ऐसे में आय का एक और जरिया ढूंढ़ना अब सिर्फ सपना नहीं, बल्कि ज़रूरत बन गया है.

यही ज़रूरत उन्हें द्वारका मोड़ की एक गली में मौजूद ट्रेडिंग अकादमी तक ले आई. उन्होंने कहा, “हर किसी को पैसों की ज़रूरत होती है. अगर मेरा कारोबार नहीं चला, तो मुझे गांव लौटना पड़ सकता है, लेकिन अगर मुझे ट्रेडिंग की जानकारी होगी, तो मैं वहां से भी यह काम कर सकूंगा. बैकअप के तौर पर यह होना बेहतर है.”

काउंसलिंग सेशन किसी भी कोचिंग इंस्टीट्यूट जैसा ही होता है. उनके सामने अलग-अलग कोर्स की लिस्ट वाली एक प्रिंटेड शीट रखी जाती है, फीस पर पेन से गोला बनाया जाता है और एक-एक करके वादे समझाए जाते हैं. महीनों तक यूट्यूब वीडियो और ऑनलाइन ट्रेडिंग क्लास देखने के बाद, शाह ने तय किया है कि एक ऑफलाइन क्लासरूम आखिरकार उन्हें मार्केट में आने का कॉन्फिडेंस दे सकता है.

और वह अकेले ऐसे नहीं हैं.

जबलपुर की एक ट्रेडिंग अकादमी तीन दिन का मुफ्त डेमो देती है | फोटो: इंस्टाग्राम/@dream__academy__jabalpur
जबलपुर की एक ट्रेडिंग अकादमी तीन दिन का मुफ्त डेमो देती है | फोटो: इंस्टाग्राम/@dream__academy__jabalpur

अकादमी के लाइव ट्रेडिंग रूम में अलग-अलग उम्र के स्टूडेंट्स एक साथ बैठे दिखाई देते हैं. उन्हें एक्सपीरियंस से ज्यादा एक ही सपना जोड़ता है. अभी-अभी स्कूल खत्म करने वाले किशोर, दुकानदार, नौकरी करने वाले लोग और छोटे कारोबारी एक साथ ट्रेडिंग सीख रहे हैं. कुछ इसे अपना करियर बनाना चाहते हैं, जबकि कुछ लोग दूसरी कमाई का जरिया तलाश रहे हैं.

साल 2024 में दिवाली की एक शाम 24 साल के अभय सिंह पहली बार ट्रेडिंग की दुनिया की ओर आकर्षित हुए. उन्होंने सुना था कि उनके एक दोस्त ने सिर्फ एक ट्रेड से 8.5 लाख रुपये का प्रॉफिट कमाया है. उन्होंने कहा, “जब मुझे उनके प्रॉफिट के बारे में पता चला, तो मुझे यह बहुत एक्साइटिंग लगा. मैंने सोचा कि अगर ऐसा हो सकता है, तो यह बहुत अमेज़िंग होगा.”

दिल्ली यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस में ग्रेजुएट अभय की नई जिज्ञासा ने उन्हें कई ट्रेडिंग कोर्स देखने पर मजबूर कर दिया, जब तक कि उन्हें एक प्री-रिकॉर्डेड कोर्स नहीं मिल गया. जल्द ही, उनके मन में ऐसे सवाल आने लगे जिनका जवाब स्क्रीन पर नहीं मिल पा रहा था. उन्होंने उसी इंस्ट्रक्टर से 15,000 रुपये में एक लाइव कोर्स खरीदा. क्लास छह हफ्ते तक चलीं, जब तक कि सर्दियों में ठंड नहीं पड़ गई. एक साल बाद, उन्होंने एक और कोर्स में एडमिशन लिया—इस बार क्रिप्टोकरेंसी ट्रेडिंग पर.

शुरुआती तीन महीनों में उन्हें अच्छा प्रॉफिट हुआ. इसके बाद 2025 में उन्होंने फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) ट्रेडिंग शुरू की, लेकिन धीरे-धीरे उन्हीं क्लासों को लेकर उनका नजरिया बदल गया, जिन्होंने उन्हें ट्रेडिंग में दिलचस्पी दिलाई थी. आज वह बहुत कम ट्रेडिंग करते हैं और ज्यादातर तभी क्रिप्टो में ट्रेड करते हैं, जब उन्हें कोई अच्छा मौका दिखाई देता है.

उन्होंने नाराज़गी भरे अंदाज में कहा, “असल में कोई भी आपको ट्रेडिंग नहीं सिखा सकता. यह मार्केट है जो आपको सिखाता है. ये कोचिंग आपकी साइकोलॉजी को डेवलप नहीं कर सकतीं और मेरे हिसाब से, उनमें से ज़्यादातर उस साइकोलॉजी को बिगाड़ने में ज़्यादा एक्टिव हैं. सभी नहीं, लेकिन उनमें से ज़्यादातर.”

दिल्ली के उत्तम नगर में किराये की दुकान से चल रहा करण सलूजा का ट्रेडिंग इंस्टीट्यूट ‘धनअर्न’अब ज्यादा लोगों तक पहुंचने के लिए मेन रोड पर शिफ्ट होने की तैयारी कर रहा है | फोटो: प्रेक्षा/दिप्रिंट
दिल्ली के उत्तम नगर में किराये की दुकान से चल रहा करण सलूजा का ट्रेडिंग इंस्टीट्यूट ‘धनअर्न’अब ज्यादा लोगों तक पहुंचने के लिए मेन रोड पर शिफ्ट होने की तैयारी कर रहा है | फोटो: प्रेक्षा/दिप्रिंट

अब अभय नोएडा की एक कंपनी में पायथन डेवलपर हैं. उनका कहना है कि अक्सर लोगों से यह वादा किया जाता है कि ट्रेडिंग उनकी 9 से 5 वाली नौकरी की जगह ले सकती है. उन्होंने कहा, “मैंने ट्रेडिंग इसलिए शुरू की क्योंकि मेरे दोस्त ने बहुत बड़ा प्रॉफिट कमाया था और मैं उसे देखकर उत्साहित हो गया था. उस समय मैंने यह नहीं सोचा कि इतना प्रॉफिट कमाने के लिए उसने कितने पैसे लगाए थे.”

सुनी पटवाल ट्रेडिंग की दुनिया की मुश्किलों को अच्छी तरह जानते हैं. जब उन्होंने शुरुआत की थी, तब उन्होंने भारत और विदेशों के ट्रेडिंग कोर्स पर 9 लाख रुपये से ज्यादा खर्च कर दिए थे. वह ऐसी बढ़त (एज) तलाश रहे थे, जो उन्हें कहीं नहीं मिली. आखिरकार उन्होंने अपना खुद का ट्रेडिंग सिस्टम बनाया, लेकिन आज भी उस खर्च को याद करके उन्हें अफसोस होता है.

उन्होंने कहा, “जब लोग शेयर मार्केट में आते हैं, तो उनके मन में बहुत उम्मीद होती है, लेकिन ज़िंदगी ऐसे नहीं चलती. दुनिया में ऐसा कोई ट्रेडर नहीं है, जो हर ट्रेड में पैसा कमाता हो. ऐसा हो ही नहीं सकता.”

उन्होंने आगे कहा, “ट्रेडिंग में कई बार ऐसा होता है कि आप सब कुछ सही करते हैं, फिर भी आपको नुकसान हो सकता है.”

लेकिन अब एक नई बात सामने आ रही है.

लोग अब सिर्फ कोर्स नहीं खरीद रहे, बल्कि उम्मीद खरीद रहे हैं.

उन्हें लगता है कि शायद इस बार सही मेंटर और सही क्लासरूम मिल जाए, तो उनकी किस्मत बदल जाएगी. पटवाल ने कहा, “पढ़ाने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन यह कहना कि इससे आपकी पूरी ज़िंदगी बदल जाएगी, गलत है.” उन्होंने कहा, “लोग सिर्फ कैंडलस्टिक सीखना नहीं चाहते. वे यह सीखना चाहते हैं कि उससे पैसा कैसे कमाया जाए. इसलिए उन्हें वही चीज़ बेची जा रही है, जो वे सुनना चाहते हैं.”

दिल्ली के उत्तम नगर में हाल ही में खुली एक ट्रेडिंग अकादमी का दावा है कि वह बताएगी—'90% ट्रेडरों को नुकसान क्यों होता है?' | फोटो: प्रेक्षा/दिप्रिंट
दिल्ली के उत्तम नगर में हाल ही में खुली एक ट्रेडिंग अकादमी का दावा है कि वह बताएगी—’90% ट्रेडरों को नुकसान क्यों होता है?’ | फोटो: प्रेक्षा/दिप्रिंट

शेयर मार्केट सिखाने का कारोबार

अगर स्टूडेंट्स आर्थिक आज़ादी का सपना खरीद रहे हैं, तो ट्रेडरों की एक नई पीढ़ी उन्हें उस सपने तक पहुंचने का रास्ता बेचकर कारोबार खड़ा कर रही है.

इनमें से ज्यादातर ट्रेडिंग अकादमियां ऐसे ट्रेडर चलाते हैं, जिन्होंने किसी इंस्टीट्यूट से नहीं, बल्कि खुद सीखकर ट्रेडिंग की है. उन्होंने कई साल शेयर मार्केट में काम किया और फिर अपने एक्सपीरियंस को क्लासरूम में पढ़ाना शुरू कर दिया. इनमें से कई लोग आज भी ट्रेडिंग करते हैं और अब पढ़ाना भी उनकी कमाई का एक बड़ा जरिया बन चुका है.

27 साल के दिनेश वर्मा भी ऐसे ही लोगों में शामिल हैं. उन्होंने पहली बार 800 रुपये इन्वेस्ट किए थे और उसमें उन्हें 1,400 रुपये का प्रॉफिट हुआ. इसी के बाद उन्होंने ट्रेडिंग को गंभीरता से अपनाने का फैसला किया. मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुके वर्मा ने साल 2019 में सिर्फ एक मकसद से ट्रेडिंग शुरू की थी—पैसा कमाना. उन्होंने किताबों, यूट्यूब वीडियो और देर रात तक जागकर ट्रेडिंग सीखी. कई बार वह रात 4 बजे तक पढ़ाई और सीखने में लगे रहते थे. उस समय ट्रेडिंग उनके लिए सिर्फ एक एक्स्ट्रा काम था. वह पहले इंजीनियर और बाद में क्वालिटी एनालिस्ट की जॉब करते थे. इसी जॉब में वह नए कर्मचारियों को ट्रेनिंग भी देते थे. तभी उन्हें एहसास हुआ कि पढ़ाना उनके लिए आसान काम है.

साल 2021 में उन्होंने उत्तम नगर की एक छोटी-सी गली में किराये पर कमरा लिया और अपनी ट्रेडिंग अकादमी शुरू कर दी. उस समय कमरे का किराया 15,000 रुपये प्रति महीने था. शुरुआत में सिर्फ 4-5 स्टूडेंट्स आए, जो जान-पहचान के जरिए पहुंचे थे. उस समय फीस सिर्फ 1,500 रुपये से शुरू होती थी. करीब दो साल तक इस इंस्टीट्यूट में उन्हें नुकसान ही हुआ. फिर उनकी ज़िंदगी में बड़ा बदलाव आया, जब उन्होंने अपनी जॉब छोड़ दी.

द्वारका मोड़ की एक ट्रेडिंग अकादमी के बाहर लिखा है—'15 जून से नए बैच के लिए एडमिशन शुरू | फोटो: प्रेक्षा/दिप्रिंट
द्वारका मोड़ की एक ट्रेडिंग अकादमी के बाहर लिखा है—’15 जून से नए बैच के लिए एडमिशन शुरू | फोटो: प्रेक्षा/दिप्रिंट

जॉब छोड़ने के बाद वर्मा ने पूरा वक्त ट्रेडिंग और पढ़ाने में लगाना शुरू कर दिया. इसके बाद उनकी अकादमी गली से निकलकर मुख्य सड़क पर बड़ी जगह पर पहुंच गई. अब हर महीने का किराया 50,000 रुपये से ज्यादा हो चुका है. आज उनकी अकादमी में रिसेप्शनिस्ट, मेंटर और असिस्टेंट काम करते हैं. यहां 25,000 रुपये से लेकर 50,000 रुपये तक की फीस वाले पर्सनल मेंटरशिप कोर्स चलाए जाते हैं. अब हर महीने उनके पास दर्जनों स्टूडेंट्स आते हैं.

वर्मा कहते हैं कि उनकी सफलता सिर्फ अच्छी पढ़ाई की वजह से नहीं मिली.

उन्होंने कहा, “प्रॉफिट का सबसे बड़ा बेस ज्यादा से ज्यादा स्टूडेंट्स को जोड़ना है. इसके लिए उन्हें प्रॉफिट दिखाना पड़ता है. कई बार स्टूडेंट्स यह समझ ही नहीं पाते कि जो प्रॉफिट दिखाया जा रहा है, वह असली है या बनाया हुआ.”

थोड़ी देर रुककर वह कहते हैं कि यह कारोबार “बिल्कुल फायदे का है.”

लेकिन साथ ही उन्होंने कहा, “इसमें बहुत दिखावा भी होता है. इस इंडस्ट्री में जितना ज्यादा प्रॉफिट दिखाओगे, उतना ज्यादा मुनाफा कमाओगे.”

उनकी अकादमी इस बात का उदाहरण है कि यह कारोबार कितनी तेज़ी से पेशेवर रूप ले चुका है. रिसेप्शनिस्ट आने वाले लोगों का स्वागत करते हैं. काउंसलर फीस और कोर्स की जानकारी देते हैं.

सोशल मीडिया के लिए अलग इंटर्न रखे जाते हैं, जो लगातार वीडियो बनाते रहते हैं. उनके पुराने स्टूडेंट्स अब मेंटर बन चुके हैं, जबकि कुछ ने अपनी खुद की ट्रेडिंग अकादमी खोल ली है. वर्मा के तीन पुराने स्टूडेंट्स अब उत्तम नगर के दूसरे इलाकों में अपनी-अपनी ट्रेडिंग अकादमी चला रहे हैं. यहां का क्लासरूम भी किसी सामान्य कोचिंग सेंटर जैसा ही दिखता है. टीचर्स को “सर” और “मैम” कहकर बुलाया जाता है. जो स्टूडेंट पूरा कोर्स नहीं करना चाहते, वे सिर्फ लाइव ट्रेडिंग रूम में बैठने के लिए भी फीस देकर शामिल हो सकते हैं.

यहां पूरे साल एडमिशन चलते रहते हैं.

वर्मा ने कहा, “ट्रेडिंग किसी खेल की तरह है. इसे सिर्फ प्रैक्टिस करके ही सीखा जा सकता है. माहौल ऐसा होना चाहिए, जो लोगों को पैसा कमाने के लिए प्रेरित करे. या तो आप खुद अच्छे ट्रेनर बनिए, या फिर किसी अच्छे ट्रेनर को रखिए.”

Trading options displayed on the stairs leading up to a trading institute in Delhi’s Uttam Nagar| Photo: Preksha, ThePrint

पढ़ाई खत्म, सलाह शुरू

ट्रेडिंग अकादमियों की तेज़ी से बढ़ोतरी ने रेगुलेटरी जांच को भी बढ़ा दिया है.

कई इंस्टिट्यूट क्रेडिबिलिटी के तौर पर नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ सिक्योरिटीज़ मार्केट्स (NISM) से सर्टिफिकेशन का बड़े पैमाने पर विज्ञापन करते हैं, लेकिन जनवरी 2025 के एक ऑर्डर में, सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने एजुकेशन और इन्वेस्टमेंट सलाह के बीच एक साफ लाइन खींचने की कोशिश की.

SEBI ने कहा कि जो लोग सिर्फ सिक्योरिटीज (शेयर मार्केट) की एजुकेशन देते हैं, वे ज़रूरी रजिस्ट्रेशन के बिना इन्वेस्ट करने की सलाह या किसी शेयर की सिफारिश नहीं कर सकते. वे सीधे या इशारों में यह दावा भी नहीं कर सकते कि कितना रिटर्न मिलेगा.

SEBI ने यह भी कहा कि टीचर्स तीन महीने से पुराने मार्केट डेटा का इस्तेमाल करके भविष्य की कीमतों का अनुमान नहीं लगा सकते और न ही वीडियो, स्क्रीन शेयर, सेमिनार या किसी दूसरे मीडियम से किसी खास शेयर की खरीद-बिक्री की सलाह दे सकते हैं.

लेकिन नियम सख्त होने के बावजूद ट्रेडिंग सीखने की चाह लगातार बढ़ रही है. हर दिन इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब चैनल और टेलीग्राम ग्रुप के ज़रिए नए लोग इन अकादमियों तक पहुंच रहे हैं. उन्हें उम्मीद होती है कि सही मेंटर या सही रणनीति उन्हें शेयर मार्केट में सफल बना देगी. जब बात बच्चों की आती है, तो यह मामला और भी उलझ जाता है. कई ट्रेडिंग अकादमियां स्किल डेवलपमेंट के नाम पर नाबालिग बच्चों को भी दाखिला देती हैं.

हालांकि, सेबी के नियमों के मुताबिक, नाबालिग अपने पैरेंट्स की देखरेख में ही डिमैट अकाउंट रख सकते हैं. वे अपने दम पर रेगुलर ट्रेडिंग नहीं कर सकते. व्यवहार में अकादमी चलाने वालों का कहना है कि स्टूडेंट अक्सर अपने परिवार के किसी सदस्य के अकाउंट का इस्तेमाल करते हैं, या TradingView और FrontPage जैसे पेपर ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर प्रैक्टिस करते हैं. बाद में अगर वे इवैल्यूएशन पास कर लेते हैं, तो वे ऐसी प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग फर्मों के साथ काम कर सकते हैं, जो उन्हें ट्रेडिंग के लिए अपनी पूंजी देती हैं.

दिनेश वर्मा का मानना है कि किशोरों को कम उम्र से ही शेयर मार्केट से परिचित कराना गलत नहीं है. उनके मुताबिक, उनकी अकादमी में सबसे कम उम्र का स्टूडेंट 12 साल का था. वह अपने माता-पिता की मंजूरी और 1.5 लाख रुपये की ट्रेडिंग पूंजी के साथ आया था. वर्मा का दावा है कि अब यह रकम बढ़कर 2 लाख रुपये हो चुकी है.

उन्होंने कहा, “मैंने देखा है कि Gen Z बहुत तेज़ होते हैं. मेरा मानना है कि उन्हें ट्रेडिंग सीखनी चाहिए. अगर हमें भी पहले सही मेंटर मिला होता, तो हम जल्दी सफल हो जाते. जब मेरे बच्चे होंगे, तो मैं भी उन्हें ट्रेडिंग सिखाऊंगा.”

दिल्ली के द्वारका मोड़ में एक साथ लगे कई ट्रेडिंग अकादमियों के विज्ञापन | फोटो: प्रेक्षा/दिप्रिंट
दिल्ली के द्वारका मोड़ में एक साथ लगे कई ट्रेडिंग अकादमियों के विज्ञापन | फोटो: प्रेक्षा/दिप्रिंट

माता-पिता का दांव

शेयर मार्केट में उतरने का फैसला अक्सर सिर्फ युवा नहीं लेते. उनके पीछे माता-पिता भी होते हैं, जो सपनों और स्थिर भविष्य के बीच संतुलन बनाते हुए यह तय करते हैं कि वे कितना जोखिम उठाने को तैयार हैं. 43 साल के दलिप सिंह अच्छी तरह जानते हैं कि धीरे-धीरे मेहनत करके रोजी-रोटी कैसे बनाई जाती है. आठवीं क्लास में पढ़ाई छोड़ने के बाद उन्होंने पिछले 20 साल से दिल्ली में हैंडिक्राफ्ट का कारोबार किया है. इस कारोबार से उन्होंने कई साल की मेहनत के बाद आर्थिक स्थिरता हासिल की. उन्हें ट्रेडिंग के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, लेकिन एक दिन उनका बेटा पीयूष घर आया और उसने भरोसे के साथ कहा कि उसे अपना भविष्य मिल गया है.

दलिप ने कहा, “हमने सोचा कि वह अभी सिर्फ 18 साल का है. अगर वह यह करना चाहता है, तो हमें उसका साथ देना चाहिए.”

लेकिन इस समर्थन की भी एक समय-सीमा है. उन्होंने अपने बेटे को दो साल का वक्त दिया है, ताकि वह देख सके कि ट्रेडिंग उसके लिए सफल होती है या नहीं. अगर नहीं हुई, तो वह पीयूष के लिए डिस्पोजेबल सामान का कारोबार शुरू करवाना चाहते हैं. उस स्थिति में ट्रेडिंग सिर्फ अतिरिक्त कमाई का जरिया रहेगी.

उन्होंने कहा, “मजबूत कारोबार होना बहुत जरूरी है. कारोबार में कभी-कभी जोखिम होता है, लेकिन ट्रेडिंग में हर दिन जोखिम होता है.”

दिल्ली की एक ट्रेडिंग अकादमी का दावा है—'सिर्फ 5 दिन में सीखें.' अकादमी का कहना है कि अब वह यह विज्ञापन हटाने की योजना बना रही है | फोटो: प्रेक्षा/दिप्रिंट
दिल्ली की एक ट्रेडिंग अकादमी का दावा है—’सिर्फ 5 दिन में सीखें.’ अकादमी का कहना है कि अब वह यह विज्ञापन हटाने की योजना बना रही है | फोटो: प्रेक्षा/दिप्रिंट

फिलहाल पीयूष अपने पार्ट-टाइम डीजे के काम से बचाए हुए पैसे और माता-पिता की ओर से उसके लिए रखी गई रकम से ट्रेडिंग करते हैं. पीयूष ने कहा, “मैं फुल-टाइम ट्रेडिंग में अपना करियर बनाना चाहता हूं. मैं हमेशा से बिजनेस या ऐसा ही कोई काम करना चाहता था. मैं कभी नौकरी नहीं करना चाहता था और न ही किसी के नीचे काम करना चाहता था.”

दलिप कहते हैं कि अगर पीयूष सफल होता है, तो पूरा परिवार उसमें और पैसा लगाने को तैयार है. अगर उसे नुकसान होता है, तो पूरा परिवार मिलकर उस नुकसान को संभालेगा.

उन्होंने कहा, “नुकसान कहीं भी हो सकता है, लेकिन प्रॉफिट कमाने के लिए मौका लेना भी ज़रूरी है.”

यही बात मार्केट एनालिस्ट सुनी पटवाल को सबसे ज्यादा चिंता में डालती है.

वह समझते हैं कि आर्थिक अनिश्चितता के इस दौर में युवा ट्रेडिंग की तरफ क्यों आकर्षित हो रहे हैं, लेकिन उन्हें इस बात पर सवाल है कि क्या ट्रेडिंग को एक परमानेंट जॉब के ऑप्शन के रूप में पेश किया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, “अगर लोग सिर्फ इसलिए ट्रेडिंग में आ रहे हैं क्योंकि उन्हें जॉब नहीं मिल रही है, तो ऐसा नहीं होना चाहिए. ट्रेडिंग कोई रेगुलर इनकम नहीं है. इससे लोग बड़ी मुश्किल में पड़ सकते हैं.”

बच्चों को कम उम्र में ट्रेडिंग से जोड़ने को लेकर वह और भी ज्यादा चिंतित हैं.

पटवाल ने कहा, “उस उम्र में कोई साइकोलॉजिकली या इमोशनली मैच्योर नहीं होता है. वे (ट्रेडिंग इंस्टिट्यूट) फीस जमा करने के नाम पर बोझ डाल रहे हैं. यह आखिर में बच्चे के गले पर चाकू मारने जैसा हो जाता है.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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