जगदलपुर/दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़): लगभग दो दशकों तक, लखमू पोयम बस्तर के जंगलों में बंदूक लेकर घूमते रहे और इसे जल, जंगल और ज़मीन की लड़ाई मानते रहे. आज, उनकी सुबह छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में पंडुम कैफे में फर्श की सफाई करते हुए और कॉमरेड के बजाय ग्राहकों का स्वागत करते हुए शुरू होती है.
कारतूस अब उनके हाथों में नहीं हैं. उसकी जगह कॉफी कप, पोछा और सामने ग्राहक हैं.
32 वर्षीय पोयम ने कहा, “मैं खुश हूं कि मैंने वह जीवन पीछे छोड़ दिया. अब मैं महीने में 9,000 रुपये कमाता हूं. यह पूरी तरह से नया जीवन है.”
मोदी सरकार इस इलाके में माओवादी हिंसा को खत्म करने में तो कामयाब रही है, लेकिन असली काम अभी बाकी है. सरेंडर करने वाले कई माओवादी गुरिल्ला और हिंसा के शिकार लोगों को अब फिर से समाज की मुख्यधारा में लाना होगा. शांति से आर्थिक मौके भी पैदा होने चाहिए. पिछले नौ महीनों से यह कैफे उस नई शुरुआत का प्रतीक बन गया है.
पिछले साल नवंबर में खुला पंडुम कैफे, बस्तर पुलिस और कैफे चेन ‘नुक्कड़’ की एक संयुक्त पहल है. इसके स्टाफ में पोयम जैसे पूर्व नक्सली और वे लोग भी शामिल हैं जिनकी ज़िंदगी नक्सलवाद की वजह से बुरी तरह प्रभावित हुई थी — यह पीड़ितों और पूर्व विद्रोहियों को एक ही जगह काम पर लाने की एक अनोखी कोशिश है.
माओवादी उग्रवाद 1960 के दशक के आखिर में शुरू हुआ था और इसकी जड़ें गहरी सामाजिक-आर्थिक असमानता, ज़मीन छिनने और प्राकृतिक संसाधनों पर आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करने में सरकार की नाकामी में थीं. यह मुख्य रूप से छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र व ओडिशा के कुछ हिस्सों में फैला हुआ था. हथियारबंद कम्युनिस्ट समूहों ने स्थानीय आदिवासियों का समर्थन पाने के लिए उन्हें कॉरपोरेट और सरकार से उनके इलाकों की रक्षा करने का वादा किया था.
मध्य भारत के सबसे हिंसक इलाकों में से एक की नई तस्वीर बनाने का काम अब चल रहा है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा 19 मई को जगदलपुर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह घोषणा किए जाने के बाद कि भारत से वामपंथी उग्रवाद खत्म हो गया है, छत्तीसगढ़ सरकार बस्तर की एक नई छवि पेश कर रही है — अब इसे भारत के सबसे हिंसक उग्रवाद वाले इलाकों में से एक के तौर पर नहीं, बल्कि झरनों, जंगलों, आदिवासी संस्कृति और पर्यटन वाले इलाके के तौर पर दिखाया जा रहा है.
सरकारी योजनाओं और पहलों के अलावा, सरकार ने एक पुनर्वास कार्यक्रम भी शुरू किया है, जिसका मकसद सरेंडर करने वाले माओवादियों को नौकरी और स्किल ट्रेनिंग के ज़रिए मुख्यधारा में लाना है.
‘रेड कॉरिडोर’ से टूरिस्ट डेस्टिनेशन तक का सफर
बस्तर के बारे में लोगों की सोच बदलना पहला कदम है.
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने दिप्रिंट से कहा, “पूरे देश में बस्तर को लेकर एक खास तरह की सोच बनी हुई थी. हम इस इलाके को ‘रेड कॉरिडोर’ (नक्सल प्रभावित क्षेत्र) से ‘ग्रीन कॉरिडोर’ में बदलने के लिए काम कर रहे हैं. बस्तर अब नक्सल-मुक्त है और हम शांति और विकास को इस तरह से ला रहे हैं जो स्थानीय आदिवासियों के लिए सही हो.”

यह बदलाव भारत की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास के सबसे खूनी दौर में से एक के बाद आया है. गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2004 से 2014 के बीच वामपंथी उग्रवाद से जुड़ी हिंसा की 17,542 घटनाएं हुईं, जिनमें 1,913 सुरक्षाकर्मी और 5,019 आम नागरिक मारे गए. भारत में नक्सलवाद से प्रभावित जिलों की संख्या लगातार कम हुई है—2014 में यह 126 थी और मार्च-अप्रैल 2026 तक यह संख्या शून्य हो गई. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2024 से अब तक छत्तीसगढ़ में 237 नक्सली मारे गए हैं, 812 गिरफ्तार किए गए हैं और 723 ने सरेंडर किया है.
बस्तर के एसपी शलभ कुमार सिन्हा ने कहा कि हालांकि कई कैडर खेती-बाड़ी में लौट आए हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि उन्हें शुरू में माओवादियों में शामिल होने के लिए कितनी आसानी से मना लिया गया था.
सिन्हा ने कहा, “उनमें से ज़्यादातर लोग विचारधारा के स्तर पर नक्सलवाद से नहीं जुड़े थे, फिर भी उन्होंने अपनी जवानी का सबसे अच्छा समय इस संघर्ष में गंवा दिया. मुझे लगता है कि यह सबसे दुखद बात है. इतना होनहार टैलेंट और इतनी क्षमता. अगर उन्होंने पहले नक्सलवाद का रास्ता नहीं चुना होता, तो यह इलाका अब तक बहुत आगे निकल चुका होता.”
सरकार का कहना है कि इस बदलाव में इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढांचे) की अहम भूमिका रही है. 2014 से बस्तर में 3,240 किलोमीटर से ज़्यादा सड़कें बनाई गई हैं और कनेक्टिविटी बेहतर करने के लिए 889 मोबाइल टावर लगाए गए हैं. सरेंडर करने वाले कैडरों के लिए रिहैबिलिटेशन पैकेज (पुनर्वास पैकेज) का दायरा बढ़ाया गया है ताकि उन्हें नौकरी मिल सके.
मुख्यमंत्री के विशेष सचिव रजत बंसल ने कहा, “बस्तर में ऐसा कोई इलाका नहीं है जहां अब नक्सली मौजूद हों. अब सभी इलाकों तक पहुंचा जा सकता है. बस्तर बहुत अनोखा है और यहां पर्यटन की काफी संभावनाएं हैं.”
पहले और बाद की ज़िंदगी
लेकिन लखमू पोयम के लिए, बस्तर में आए बदलाव को नई सड़कों, मोबाइल टावरों या सरकारी योजनाओं से नहीं मापा जा सकता. इसे एक बहुत ही साधारण चीज़ से मापा जा सकता है: हर शाम, वह कैफे में अपना काम खत्म करके घर लौटते हैं और सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे जाने के डर के बिना सो पाते हैं.
जिन जंगलों में उन्होंने लगभग दो दशक तक बंदूक लेकर बिताए, वहां कभी ऐसी निश्चितता नहीं मिली. पंडुम कैफे यह देता है. हालांकि कैफे उनके अतीत को मिटा नहीं सकता, लेकिन इसने पोयम को वह चीज़ दी है जो वैचारिक विद्रोह कभी नहीं दे सका — एक भविष्य.
पोयम सिर्फ 14 साल के थे जब वे 2006 में माओवादियों में शामिल हुए. वे बस्तानार में पले-बढ़े, जो कभी माओवादी प्रभाव के मज़बूत नियंत्रण में था. उन्हें याद है कि माओवादी कैडरों की बैठकें गांव की ज़िंदगी का एक आम हिस्सा थीं. वे जल, जंगल, ज़मीन और आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने की ज़रूरत के बारे में बात करते थे.
पोयम ने बताया, “गांव वाले उनके लिए खाना पकाने के लिए अनाज इकट्ठा करते थे. बहुत कम उम्र में ही मेरा भी मन उनके साथ जुड़ने का हुआ और मैंने वहां 19 साल तक काम किया.” पोयम आदिवासी समुदाय से आते हैं. उनका परिवार मुख्य रूप से खेती करता था. उनके अलावा परिवार में कोई भी विद्रोह में शामिल नहीं हुआ.

सालों तक, पोयम पूर्वी बस्तर डिवीज़न में नक्सलियों के साथ जुड़े रहे, और बाद में उन्हें उत्तरी बस्तर डिवीज़न के किस्कोडो इलाके में भेज दिया गया. उन्होंने कहा कि ज़िंदगी एक खानाबदोश जैसी थी.
पोयम ने कहा, “कोई स्थिरता नहीं थी. हम एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते थे. लेकिन पिछले कुछ सालों में, सुरक्षा बलों ने गश्त और मुठभेड़ें बढ़ा दीं. हमारे कई साथी मारे जा रहे थे. हमें एहसास हुआ कि हम अब पहले की तरह काम नहीं कर सकते.”
जब केंद्र सरकार ने इस साल मार्च तक वामपंथी उग्रवाद को खत्म करने का इरादा ज़ाहिर किया, तो दबाव बढ़ गया. अर्धसैनिक बल बस्तर में और अंदर तक घुस गए, ऑपरेशन तेज़ हो गए, और माओवादी कैडरों के लिए उपलब्ध जगह लगातार कम होती गई.
पोयम के लिए, छोड़ने का फैसला चुपचाप लिया गया. एक दिन, उन्होंने अपने सीनियर कैडर को एक चिट्ठी लिखी.
उन्होंने कहा, “उस चिट्ठी में मैंने उनसे कह दिया कि मैं अब और आगे नहीं बढ़ सकता. मैं घर लौटकर सामान्य ज़िंदगी जीना चाहता था.” और बस, बात वहीं खत्म हो गई. उनके सीनियर ने कभी भी कैडर छोड़ने वाले किसी भी व्यक्ति से संपर्क करने की कोशिश नहीं की.
पंडुम कैफे: उम्मीद की एक किरण
पंडुम कैफे में अब लगभग 20 पूर्व नक्सली साथ काम करते हैं. कैफे की दीवारें बस्तर की जनजातियों – जैसे गोंड, धुरवा, मुरिया और हल्बा के बारे में जानकारी से भरी हुई हैं. एक कोना बस्तर की हाथ से बनी चीज़ों के लिए समर्पित है. वहां लिखी एक लाइन कहती है, “हाथ से बनी हर चीज़ अपने लोगों, अपने जंगलों और अपनी शांत उम्मीद की कहानी कहती है.”
एक दीवार कैफे में आने वाले लोगों के फीडबैक से भरी है. एक पर लिखा है, “यह नया है और बस्तर के लिए बहुत अच्छा है.”

कैफे से जुड़ने वाले सबसे नए सदस्य लक्ष्मण मांडवी हैं, जिनकी कहानी बस्तर के संघर्ष के एक अलग अध्याय को दिखाती है.
चमकीले पीले रंग की शर्ट पहने मांडवी पर पिछले साल तक 8 लाख रुपये का इनाम था. उनके हाथ सख्त और ज़ख्मों के निशान वाले हैं. उन पर राइफ़ल की बैरल को पकड़े हुए बिताई गई ज़िंदगी की शारीरिक छाप है.
इससे पहले वे एक सीनियर माओवादी नेता रूपेश के बॉडीगार्ड के तौर पर काम कर चुके थे. बाद में पिछले साल अक्टूबर में जगदलपुर में उन दोनों ने सरेंडर कर दिया. बस्तर के संघर्ष में शामिल कई अन्य लोगों की तरह, मांडवी भी बचपन में ही विद्रोह में शामिल हो गए थे. 2005 में जब उन्होंने पहली बार बंदूक उठाई थी, तब वे सिर्फ 11 साल के थे.
छत्तीसगढ़ के बीजापुर ज़िले के डुंगा गांव के रहने वाले मांडवी ने कहा, “सलवा जुडूम के दौरान मेरा घर जला दिया गया था. मैं गुस्से में था. उसी गुस्से ने मुझे नक्सली आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया.” सलवा जुडूम राज्य द्वारा समर्थित एक नागरिक मिलिशिया थी, जिसे 2005 में छत्तीसगढ़ में माओवादी विद्रोह का मुकाबला करने के लिए शुरू किया गया था. इसका नेतृत्व आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा ने किया था. 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे गैर-कानूनी और असंवैधानिक घोषित कर दिया और इसे भंग कर दिया गया.
मांडवी ने कई साल इंद्रावती क्षेत्र और माड के घने जंगलों में काम करते हुए बिताए, जो छत्तीसगढ़ में माओवादियों के सबसे मज़बूत गढ़ों में से कुछ हैं. अब, कैफे में ब्रेक के दौरान, 32 साल के ये व्यक्ति अक्सर अपने फ़ोन पर Amazon और Meesho जैसे शॉपिंग ऐप्स देखते रहते हैं. वे कीमतें देखते हैं और अपनी विशलिस्ट में कपड़े जोड़ते हैं — यह अब एक आम आदत है, लेकिन जब वे अंडरग्राउंड थे, तब ऐसा सोचना भी नामुमकिन था.
सरेंडर करने के बाद उनके जीवन में क्या बदलाव आया, इस सवाल पर मंडावी अपनी नौकरी या सैलरी के बारे में बात नहीं करते. फ़ोन से नज़र हटाकर मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा, “जब मैं वापस आया तो मेरी मां खुश थीं.”
रोज़ाना लगभग 200 लोग इस कैफे में आते हैं, और उन्हें पता होता है कि उन्हें सेवा देने वाले लोग पूर्व नक्सली और हिंसा से बचे हुए लोग हैं. शुरुआत में ग्राहकों से बात करने में स्टाफ को थोड़ी झिझक होती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है.
पंडुम कैफे का सोशल मीडिया संभालने वालीं अपेक्षा आडवाणी ने कहा, “वे शांत और मिलनसार स्वभाव के लोग हैं. उन्हें मुख्यधारा में वापस लाने की यह एक बेहतरीन पहल है.”
अधिकारियों के लिए, यह वही बदलाव है जिसे देखने के लिए यह इलाका दशकों से संघर्ष कर रहा था.
बस्तर के एसपी सिन्हा ने कहा, “रेड कॉरिडोर अब अतीत की बात है. यह स्थानीय लोगों के समर्थन की वजह से ही अस्तित्व में था.”
हालांकि, सिन्हा ने यह भी बताया कि कम समय में सैकड़ों नक्सली कैडर मुख्यधारा में शामिल हुए हैं और उन्हें फिर से बसाना एक चुनौती है.
सिन्हा ने कहा, “हमें बहुत व्यवस्थित तरीके से सुविधाएं देनी होंगी और जल्द से जल्द सुविधाएं पहुंचाना एक चुनौती है.”

उन्होंने आगे कहा, “दूसरी चुनौती बस्तर के दूर-दराज़ इलाकों तक पहुंचना और प्रशासन में लोगों का भरोसा फिर से कायम करना है.”
प्रशासन एक ऐसे चक्र में भी फंसा हुआ है — जहां उन्हें यह पक्का करना है कि इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पूरे हों, लेकिन उन जगहों तक पहुंचने के लिए कोई इंफ्रास्ट्रक्चर ही नहीं है.
बस्तर के डीएम आकाश छिकारा ने कहा, “बस्तर के लिए कई प्रोजेक्ट मंज़ूर किए गए हैं. सबसे बड़ी चुनौती उन्हें समय पर लागू करना है.” उन्होंने आगे कहा कि इलाके में विकास के प्रोजेक्ट “परंपरा और आधुनिकता का संगम” होंगे.
दंतेवाड़ा ट्रेनिंग सेंटर
बीजापुर ज़िले के मितुर गांव के रहने वाले मोहन कार्ती 2005 में माओवादी आंदोलन से जुड़े थे. समय के साथ, वे वेस्ट बस्तर डिवीज़न के प्रवक्ता बने और हिडमा, देवूजी और रूपेश जैसे सीनियर माओवादी नेताओं के साथ काम किया. जहां देवूजी ने 44 साल तक अंडरग्राउंड रहने के बाद फरवरी में तेलंगाना में सरेंडर कर दिया, वहीं हिडमा पिछले साल मारा गया.
कार्ती अब दंतेवाड़ा के लाइवलीहुड कॉलेज में एक क्लासरूम में बैठे हैं, जो छत्तीसगढ़ सरकार के रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम का एक हिस्सा है. उनके आस-पास, सरेंडर कर चुके दर्जनों माओवादी इलेक्ट्रीशियन, प्लंबर, ड्राइवर, राजमिस्त्री, वेल्डर और टेक्नीशियन बनने की ट्रेनिंग ले रहे हैं.
कार्ती कभी-कभी अपनी बाईं कलाई पर बंधी कैसियो घड़ी को देखते हैं. यह घड़ी उन कुछ चीज़ों में से एक है जो उनकी दोनों जिंदगियों में उनके साथ रही.
कार्ती ने याद करते हुए कहा, “सिक्योरिटी फ़ोर्स जंगल में बहुत अंदर तक आ गई थीं और उन्होंने हमें चारों तरफ से घेर लिया था. अगर हमने सरेंडर नहीं किया होता, तो हम मारे जाते.”
उस राइफ़ल के उलट जिसे उन्होंने सरेंडर कर दिया था, कैसियो घड़ी कभी उनसे दूर नहीं हुई.
उन्होंने घड़ी के डायल पर धीरे से थपथपाते हुए कहा, “जंगल में हमारे पास मोबाइल फ़ोन नहीं होते थे. यह घड़ी ही मेरी लाइफ़लाइन थी. इसमें अलार्म और टॉर्च है. नक्सली दिनों में, इसने मुझे समय पर जागने और रात में जंगल में चलने-फिरने में मदद की.” अब, जंगल में मूवमेंट की प्लानिंग करने के बजाय, कार्ती अपना दिन प्लंबिंग सीखने में बिताते हैं.
यह बदलाव सिर्फ उन्हीं का नहीं है.
एक महीने पहले, उनकी पत्नी, जो खुद एक पूर्व नक्सली हैं, ने इसी सेंटर से सिलाई का कोर्स पूरा किया और एक सिलाई मशीन और कुछ ज़रूरी सामान के साथ अपने गांव लौट गईं. कार्ती ने मुस्कुराते हुए कहा, “उन्होंने सिर्फ 20 रुपये का धागा खरीदा था. उससे उन्होंने कपड़े सिलकर 500 रुपये कमाए. वह यह काम करके खुश हैं.”
यह जोड़ा धीरे-धीरे वे डॉक्यूमेंट्स इकट्ठा कर रहा है जो एक आम नागरिक की ज़िंदगी की पहचान होते हैं—आधार कार्ड, राशन कार्ड, पैन कार्ड और श्रम कार्ड—ये सभी कार्ती के सरेंडर के बाद बनवाए गए थे.
लेकिन उनका कहना है कि भरोसा फिर से बनाने के लिए कागज़ी कार्रवाई से कहीं ज़्यादा की ज़रूरत होगी.
उन्होंने कहा, “सरकार ने हमसे कई वादे किए हैं. हम उन पर तभी भरोसा करेंगे जब वे वादे पूरे होंगे.”
पिछले साल, छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सलियों के सरेंडर और पुनर्वास के लिए एक नई पॉलिसी को मंज़ूरी दी थी. इस पॉलिसी में तुरंत 50,000 रुपये की आर्थिक मदद, घर के लिए ज़मीन या पैसे और प्रोफेशनल स्किल ट्रेनिंग देने का वादा किया गया था.
विद्रोह का रास्ता छोड़ने के बाद भी, उनकी कुछ सोच वैसी ही बनी हुई है. कार्ती का कहना है कि अगर बस्तर में बड़े इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स से जंगल और आदिवासियों की ज़मीन को खतरा होता है, तो वे उनका विरोध करेंगे.
उन्होंने कहा, “अगर पेड़ काटे गए और हमारी ज़मीन बर्बाद हो गई, तो हम कहां रहेंगे? हम बिना सड़कों के भी गुज़ारा कर सकते हैं, लेकिन अगर कोई कंपनी आ गई, तो हम अपनी ज़मीन खो देंगे.”
यह सोच सरकार के मौजूदा नज़रिए से पूरी तरह अलग नहीं है.
बंसल ने कहा, “अभी हमारा मुख्य मकसद भरोसा बनाना और ऐसा विकास लाना है जो स्थानीय लोगों के लिए सही हो. इसमें समय लगेगा, और हम इसके लिए तैयार हैं.”
हथियार छोड़ने के एक महीने बाद, मोहन कार्ती ने कुछ ऐसा देखा जो उन्होंने अपनी ज़िंदगी में पहले कभी नहीं देखा था — एक हवाई जहाज़.

वह सरकार के एक एक्सपोज़र प्रोग्राम के तहत छत्तीसगढ़ विधानसभा देखने रायपुर गए थे. जिस व्यक्ति ने बस्तर के घने जंगलों में लगभग दो दशक बिताए हों और सड़कों व सुरक्षा कैंपों से बचकर रहा हो, उसके लिए ऊपर उड़ता हुआ हवाई जहाज़ इस बात की याद दिलाता था कि बाहरी दुनिया का कितना बड़ा हिस्सा उसकी पहुंच से दूर रहा था.
कार्ती ने कहा, “लाइवलीहुड कॉलेज आने के बाद हमने कई चीज़ें अनुभव की हैं. मैंने पहली बार विधानसभा, हवाई जहाज़ और रायपुर में रेलवे स्टेशन देखा. यह जंगल में हमारी ज़िंदगी से बिल्कुल अलग अनुभव था.”
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