नई दिल्ली: गाजियाबाद के एक प्राइवेट अस्पताल में हर सुबह बिलिंग काउंटर अबीर बजाज की मां का इलाज जारी रखने से पहले पैसे जमा करने को कहता था. जब उनकी मां वेंटिलेटर पर थीं, तब वह हर दिन करीब 1.5 लाख रुपये खर्च कर रहे थे. साथ ही, उन्हें ऐसे बिल भी मिल रहे थे, जिनमें कई गड़बड़ियां और एक ही चीज़ के लिए दो बार पैसे जोड़े गए थे.
अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बजाज ने कहा, “जब मैंने आखिरकार उन्हें वहां से शिफ्ट करने का फैसला किया, तो इसकी वजह यह थी कि मैं इस सिस्टम और इसकी कम मॉनिटरिंग से बहुत परेशान हो चुका था. इसके बाद भी उन्हें अस्पताल से बाहर निकालने में एक दिन लग गया.”
हालांकि, भारत में किसी गंभीर रूप से बीमार मरीज को घर लाने का मतलब यह नहीं है कि उसे ICU की ज़रूरत नहीं होगी. इसका मतलब है कि अपने ही घर में शुरू से एक ICU तैयार करना.
भारतीय मिडिल क्लास के लिए डर पैदा करने वाले और बेहद महंगे तीन अक्षर—ICU—अब बदल रहे हैं. देश के कई बड़े शहरों में कई हेल्थकेयर स्टार्टअप मरीजों के घर पर एक ज्यादा आसान और आरामदायक ICU की सुविधा दे रहे हैं. दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और देहरादून के घरों में परिवार बेडरूम को अस्पताल के वार्ड में बदल रहे हैं. इनमें मॉनिटर, ऑक्सीजन टैंक और सक्शन मशीन समेत ICU की पूरी व्यवस्था की जा रही है.
कुछ परिवार होम हेल्थकेयर की खास सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं. COVID महामारी के दौरान इन सेवाओं को काफी बढ़ावा मिला था. अस्पतालों की तुलना में इनसे खर्च 30-50 प्रतिशत तक कम हो जाता है. वहीं, कुछ परिवार सीधे विक्रेताओं से टूल्स खरीदते हैं. वजह एक ही है: अस्पताल के ICU में लंबे समय तक रहने से बहुत ज्यादा पैसा खर्च होता है, इन्फेक्शन का खतरा बढ़ता है और मरीज के ठीक होने की प्रक्रिया भी सीमित हो जाती है.
इसके अलावा, परिवार चाहते हैं कि बीमारी के दौरान वे अपने बुजुर्ग परिवार के सदस्यों के साथ ज्यादा समय बिता सकें. अस्पताल के ठंडे और बिना अपनापन वाले माहौल में मिलने के लिए तय सीमित समय के मुकाबले घर पर यह ज्यादा संभव होता है.
भारत की होम हेल्थकेयर इंडस्ट्री की कीमत 11 अरब डॉलर है. इसकी वजह देश में बुजुर्गों की बढ़ती आबादी और अस्पतालों की स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ता दबाव है. हालांकि, घर पर ICU की सुविधा अभी कोई बड़ी क्रांति नहीं बनी है. घर पर ICU की सेवाएं मरीज की गरिमा बनाए रखने, इन्फेक्शन को रोकने और बहुत ज्यादा खर्च बचाने का वादा करती हैं. लेकिन इनका कामकाज कई व्यावहारिक चीज़ों पर निर्भर करता है, जैसे अच्छी तरह प्रशिक्षित नर्सें और पैसे लेने की साफ और पारदर्शी व्यवस्था.
गुरुग्राम की होम हेल्थकेयर कंपनी कोकोरो भारत के संस्थापक और CEO रम्मोहन सुंदरम ने कहा, “हमारा विचार यह है कि पैसे की कमी किसी को इलाज पाने से रोकने की वजह नहीं होनी चाहिए. पांच साल बाद मैं उम्मीद करता हूं कि भारत का कोई भी परिवार सिर्फ इसलिए अपने किसी करीबी को न खोए क्योंकि उसके पास इलाज के लिए पैसे नहीं हैं.”

अगस्त 2025 में 18 लोगों की टीम के साथ शुरू हुए इस स्टार्टअप में सिर्फ 5,000 रुपये रोज की कीमत पर घर में ICU की व्यवस्था की जाती है. डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल और उद्यमी सुंदरम ने अपनी सास के अस्पताल के इलाज का खर्च चुकाते-चुकाते परिवार की बचत खत्म होने के बाद हेल्थकेयर के क्षेत्र में काम शुरू किया.
सुंदरम अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं हैं. भारत के होम हेल्थकेयर सेक्टर का नेतृत्व सिर्फ डॉक्टर ही नहीं, बल्कि कॉरपोरेट अधिकारियों और इंजीनियरों द्वारा भी किया जा रहा है. केयर हेल्थ नर्सेज के संस्थापक शिवांग द्विवेदी जैसे IT प्रोफेशनल से लेकर केयर24 के संस्थापक और IIT से पढ़े विपिन पाठक तक, गैर-चिकित्सा क्षेत्र से आने वाले संस्थापक भारत में गंभीर मरीजों की देखभाल के लिए जरूरी सप्लाई चेन तैयार करने पर दांव लगा रहे हैं.
ICU तैयार करने की पूरी प्रक्रिया
जब दिसंबर 2023 में देहरादून में तनुजा सिंह के पिता को ब्रेन हैमरेज हुआ, तो उन्हें करीब एक महीने तक ICU में रखा गया. दिल्ली या बेंगलुरु के प्राइवेट अस्पतालों की तुलना में यहां इलाज का खर्च उतना ज्यादा नहीं था. वहां रोज का खर्च 30,000 से 70,000 रुपये तक होता है. लेकिन देहरादून के अस्पतालों में न्यूरोलॉजी के विशेषज्ञों की संख्या सीमित थी.
सिंह ने याद किया, “लेकिन हमने उन्हें मुख्य रूप से संक्रमण के खतरे की वजह से घर ले जाने का फैसला किया. डॉक्टरों ने खुद हमें बताया था कि उन्हें ज्यादा समय तक ICU में रखना उनके ठीक होने के लिए अच्छा नहीं होगा.”
इसके बाद उनकी असली परेशानी शुरू हुई. 55 साल की सिंह खुद हेल्थकेयर सेक्टर में काम करती हैं. उन्होंने जल्द ही देहरादून और बाद में बेंगलुरु में घर पर ICU की सेवाओं और नर्सों की व्यवस्था के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की. वह अपने पिता के साथ बेंगलुरु चली गई थीं. शुरुआत में उन्होंने एक बड़े मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल ग्रुप की होम हेल्थकेयर सेवा पर भरोसा किया. वहां से उन्हें उपकरण और नर्स दोनों मिल गए.
उन्होंने बताया, “लेकिन फिर मुझे पता चला कि बड़े अस्पताल ग्रुप के पास घर पर सेवाएं देने के लिए उपकरण अलग से रखे नहीं रहते. वे भी ये उपकरण विक्रेताओं से किराये पर लेते हैं. मैंने बीच के व्यक्ति को हटाकर सीधे विक्रेताओं से संपर्क करने का फैसला किया.”
अस्पताल में ICU के उपकरण और पूरी व्यवस्था पहले से तय होती है. लेकिन घर पर ICU की व्यवस्था मरीज की जरूरत के हिसाब से अलग-अलग होती है. आम तौर पर इसमें बेड, सांस लेने में मदद के लिए वेंटिलेटर, शरीर में तरल पहुंचाने के लिए इन्फ्यूजन पंप, हवा के दबाव के लिए BiPAP मशीन, खून के थक्के बनने से रोकने के लिए DVT पंप और जरूरी चीजों की निगरानी के लिए मॉनिटर शामिल होते हैं.
हालांकि, अस्पताल के ICU से अलग, घर पर मिलने वाली सेवाओं में मरीज को निजी जगह और सम्मान के साथ इलाज मिलता है. कई मरीज और उनके परिवार इसे प्राथमिकता देते हैं.
2025 में कोकोरो भारत शुरू करने वाले सुंदरम ने बताया, “कोई भी व्यक्ति अस्पताल के ICU का एक्सपीरियंस नहीं करना चाहता. आम तौर पर एक कमरे में 10 बेड होते हैं और मरीजों की हालत अलग-अलग स्तर की गंभीर होती है.”
“यह भावनात्मक रूप से बहुत मुश्किल होता है, और इसके साथ आर्थिक परेशानी भी होती है.”

पोर्टिया और हेल्थकेयर एट होम (HCAH) जैसी स्वतंत्र होम हेल्थकेयर सेवाएं और अपोलो होमकेयर तथा मैक्स@होम जैसी अस्पतालों से जुड़ी सेवाएं ICU मरीजों के लिए उनकी जरूरत के हिसाब से अलग-अलग पैकेज देती हैं.
13 साल पुरानी होम हेल्थकेयर कंपनी पोर्टिया ICU मरीजों के लिए क्रिटिकल केयर पैकेज देती है. इसमें वेंटिलेटर, ICU की ट्रेनिंग ले चुकी दो नर्सें, दो नर्सिंग असिस्टेंट, हर हफ्ते जांच और डॉक्टर से सलाह शामिल है.
इसके बाद उनके पास स्टेप डाउन पैकेज है. इसमें वेंटिलेटर की जगह BiPAP मशीन होती है. यह उन मरीजों के लिए है जो ठीक होने की प्रक्रिया में आगे के स्तर पर पहुंच चुके हैं.
फिलहाल, दिल्ली के मैक्स और अपोलो जैसे प्राइवेट अस्पतालों में ICU के एक कमरे का खर्च रोज 50,000 से 1 लाख रुपये के बीच है. वहीं, इन्हीं अस्पतालों की घर पर ICU सेवा 13,000 रुपये प्रतिदिन से शुरू होती है. हालांकि, उपकरणों की संख्या और कितने नर्सिंग स्टाफ की जरूरत है, इसके हिसाब से यह खर्च 50,000 रुपये तक पहुंच सकता है.
मैक्स@होम के प्रमुख विक्रम वर्मा के मुताबिक, घर पर हेल्थकेयर सेवाएं देने का मुख्य उद्देश्य मरीज को ठीक होने की प्रक्रिया में मदद करना है. मैक्स की कीमत के हिसाब से घर पर ICU की सुविधा अस्पताल से 30-50 प्रतिशत सस्ती है, क्योंकि दोनों जगहों की इंफ्रास्ट्रक्चर लागत में अंतर होता है.
“जिन मरीजों के लिए हम घर पर ICU की व्यवस्था की सलाह देते हैं, वे तुरंत खतरे से बाहर होते हैं और उन्हें कम मशीनों की जरूरत होती है. साथ ही, घर पर ICU होने पर कमरे का किराया नहीं देना पड़ता,” वर्मा ने कहा.
हालांकि, सिंह ने पाया कि तीसरे पक्ष के विक्रेताओं से सीधे उपकरण किराये पर लेना अस्पताल की ICU सेवा के कुल खर्च से भी सस्ता था.
सिंह ने कहा, “विक्रेताओं से सीधे उपकरण किराये पर लेने पर आपको उसी स्तर के उपकरण कम कीमत में मिल जाते हैं.” उन्होंने अपने पिता के लिए देहरादून में ऐसे स्वतंत्र विक्रेता ढूंढे थे. उनके पिता को तीन महीने तक घर पर देखभाल की जरूरत पड़ी, जिसके बाद वे बेंगलुरु चले गए.
बेंगलुरु में भी उनके पिता को लगातार मदद की जरूरत है. आखिरकार सिंह ने एक अस्पताल का बेड, BiPAP मशीन, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर और दूसरे जरूरी उपकरण खरीद लिए.
सीधे उपकरण खरीदना
सिंह की तरह, अली को भी अपने पिता को स्ट्रोक होने के बाद नई दिल्ली में बायोमेडिकल उपकरणों के बाजार में थोक में सामान खरीदने के तरीके समझने पड़े. अपने पिता को एक महीने तक होली फैमिली अस्पताल में रखने के बाद, उन्होंने डॉक्टर की सलाह पर उन्हें घर वापस लाने का फैसला किया, ताकि उनके ठीक होने में मदद मिल सके.
अली ने कहा, “मेरे पिता को दिमाग और नसों से जुड़ी बीमारी है. डॉक्टर ने हमें सलाह दी थी कि उनसे बात करें और उनके साथ समय बिताएं, क्योंकि वे हमारी आवाज सुन सकते हैं. लेकिन अस्पताल के ICU में हमें उनसे मिलने के लिए बहुत कम समय मिलता था. अब वह हमारे साथ घर पर हैं.”
लेकिन कुछ हफ्तों तक एक प्राइवेट होम हेल्थकेयर सेवा लेने के बाद अली को एहसास हुआ कि चीज़ें ठीक से काम नहीं कर रही थीं. उनके पिता के शरीर के जरूरी संकेत स्थिर थे, लेकिन फिर भी उन पर लगातार नज़र रखने की जरूरत थी. उन्हें दौरे पड़ने का खतरा भी था. इसलिए लंबे समय तक इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की जरूरत थी.
जल्द ही अली को पता चला कि एक ECG मॉनिटर को खरीदने में 26,000 रुपये लगते हैं, जबकि उसे किराये पर लेने का खर्च 4,000 रुपये हर महीने था. एक सक्शन मशीन बाजार से खरीदने पर 4,400 रुपये की थी, जबकि उसका मासिक किराया 2,500 रुपये था. इसी तरह, सलाइन के इंजेक्शन खुद खरीदने से वह अस्पताल के बिल में जोड़ी जाने वाली 70 प्रतिशत अतिरिक्त कीमत से बच सकते थे.
आखिर में, उन्होंने अपने बेडरूम को एक निजी ICU में बदलने के लिए करीब 2 लाख रुपये खर्च किए. इसके मुकाबले, इसी तरह की व्यवस्था के लिए वह प्राइवेट कंपनियों को हर महीने 1.25 लाख रुपये दे रहे थे. पांच महीने बाद भी उनके पिता इसी व्यवस्था का इस्तेमाल कर रहे हैं.
अली ने कहा, “लेकिन घर पर ICU तैयार करने में सबसे मुश्किल काम उपकरण जुटाना नहीं है. सबसे मुश्किल काम नर्स ढूंढना है.”
अच्छी ट्रेनिंग वाली नर्सों की कमी
अलग-अलग शहरों में, अलग-अलग सालों के दौरान और अलग-अलग एक्सपीरियंस के बाद अली, बजाज और सिंह की राय एक जैसी है: एक अच्छी नर्स घर पर ICU की व्यवस्था को सफल बना सकती है, जबकि खराब नर्स की वजह से पूरी व्यवस्था बिगड़ सकती है.
मशीनें और उपकरण किराये पर लिए जा सकते हैं या खरीदे जा सकते हैं, लेकिन पूरी व्यवस्था इस बात पर निर्भर करती है कि मरीज के बिस्तर के पास खड़ा व्यक्ति कितना सक्षम है.
जब बजाज ने पहली बार अपनी मां की रोजाना देखभाल की जिम्मेदारी दिल्ली की एक होम हेल्थकेयर एजेंसी को सौंपी, तो कागजों पर उनकी व्यवस्था बहुत अच्छी लग रही थी. एजेंसी ने सामान को कीटाणुओं से साफ करने की सुविधा, सभी जरूरी उपकरण और 24 घंटे उपलब्ध रहने वाली प्रशिक्षित नर्स देने का वादा किया था. ये सभी चीज़ें उनकी मां के ठीक होने और उनकी सेहत के लिए ज़रूरी थीं.
लेकिन असल में देखभाल का काम उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ. वहां भेजी गई नर्स निमोनिया और उनकी मां के फेफड़ों में तरल जमा होने जैसे गंभीर लक्षणों को पहचान नहीं पाई.
बजाज ने कहा, “मेरी मां की हालत घर आने के बाद और खराब हो गई. उन्हें सेप्सिस हो गया और मुझे उन्हें दोबारा अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा.”
अली के साथ भी उनके पिता की देखभाल के दौरान ऐसा ही अनुभव हुआ. होम हेल्थकेयर कंपनी की ओर से भेजी गई नर्स उनकी उम्मीदों के मुताबिक काम नहीं कर पाई. जब अली ने अपने पिता के लिए खुद उपकरण खरीदे, तो उन्होंने ICU में काम करने की ट्रेनिंग ले चुकी सही नर्स ढूंढने में भी काफी समय लगाया.
उन्होंने कहा, “हमें ऐसे व्यक्ति की जरूरत है, जिसे मशीनों और मरीज की जरूरतों की समझ हो. ऐसा व्यक्ति, जो किसी इमरजेंसी के दौरान घबराए नहीं और डरकर काम करना बंद न कर दे.”
कई लोगों के लिए, इस पूरे क्षेत्र में मौजूद यह बड़ी कमजोरी कोई छिपी हुई बात नहीं है. स्टार्टअप अक्सर अपने पैकेज का प्रचार यह कहकर करते हैं कि वे “ICU में ट्रेनिंग ले चुकी गंभीर मरीजों की देखभाल करने वाली नर्सें” देंगे. इन पेशेवरों के पास जनरल नर्सिंग एंड मिडवाइफरी या B.Sc. की डिग्री होती है और उन्हें मरीजों की देखभाल करने का अनुभव भी होता है.
लेकिन अक्सर ये कंपनियां ऐसी नर्सों की जगह सामान्य काम करने वाले सहायक भेज देती हैं, जिन्हें मरीजों को नहलाने और साफ-सफाई करने की ट्रेनिंग मिली होती है, लेकिन जब मरीज का ब्लड प्रेशर अचानक गिरने लगता है, ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब में बलगम जमा हो जाता है या टेलीमेट्री मॉनिटर पर दिल की गतिविधि से जुड़े आंकड़ों में अचानक अनियमित बदलाव दिखते हैं, तो वे घबरा जाते हैं और कुछ नहीं कर पाते.
अपने पिता के लिए नर्स ढूंढते समय सिंह को यह भी पता चला कि बड़े अस्पतालों के ग्रुप अक्सर घर पर देखभाल के लिए अपनी सबसे अच्छी नर्सें नहीं भेजते. वे इन नर्सों को अस्पताल में भर्ती मरीजों की देखभाल के लिए अपने पास रखते हैं. आखिरकार, सिंह को खुद कोशिश करके अपने पिता की देखभाल के लिए भरोसेमंद और प्रशिक्षित नर्सें ढूंढनी पड़ीं. यहां भी खर्च एक बड़ी रुकावट बना.
सिंह ने कहा, “देहरादून हो या बेंगलुरु, सबसे बड़ी चुनौती योग्य नर्स ढूंढना है. ऐसी नर्सें बहुत कम हैं और उनका खर्च भी बहुत ज्यादा है.”
उन्होंने आगे बताया, “अलग-अलग शहरों में खर्च भी अलग होता है. देहरादून में 24 घंटे की नर्स का खर्च 12 घंटे की नर्स से ज्यादा था, लेकिन बेंगलुरु में दोनों के लिए लगभग एक जैसा पैसा लिया जाता था.”
उनकी परेशानी भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में मौजूद एक बड़ी समस्या की ओर इशारा करती है. देश में अस्पतालों के वार्डों में काम करने के लिए ही पर्याप्त प्रशिक्षित नर्सें नहीं हैं, तो लोगों के घरों में निजी तौर पर देखभाल करने के लिए नर्सें कहां से आएंगी.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों के मुताबिक, एक स्वास्थ्य व्यवस्था को ठीक से चलाने के लिए हर 1,000 लोगों पर कम से कम तीन नर्सें होनी चाहिए. लेकिन भारत में हर 1,000 लोगों पर करीब 2.2 नर्सें हैं. यानी देश में 20 लाख से ज्यादा नर्सों की कमी है.
होम हेल्थकेयर कंपनियों के संस्थापकों ने भी इस चुनौती के बारे में बताया है. उन्हें भी अपनी कंपनियों में काम करने के लिए अच्छी नर्सें ढूंढने में परेशानी होती है. 2016 में केयर हेल्थ नर्सेज शुरू करने वाले द्विवेदी ने कहा कि कंपनियों को यह चुनने में बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है कि वे किन नर्सिंग कॉलेजों से नर्सों को काम पर रखें. उन्हें यह भी सुनिश्चित करना पड़ता है कि उम्मीदवारों के पास जरूरी अनुभव हो.
द्विवेदी ने कहा, “कई नर्सिंग कॉलेज छात्रों को कोई वास्तविक ट्रेनिंग नहीं देते. वे सिर्फ आखिरी साल की परीक्षा लेते हैं और डिग्री दे देते हैं. ऐसे में ये नर्सें असल में चल रहे ICU के दबाव को कैसे संभाल पाएंगी, चाहे वह घर पर हो या अस्पताल में?”
दोनों तरफ की चुनौतियां
घर पर ICU की व्यवस्था होने से परिवार के सदस्य मरीज के करीब रह सकते हैं और खर्च भी कुछ कम होता है, लेकिन इसके साथ घर पर ही अस्पताल के वार्ड को चलाने की अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी आती हैं. इसमें चीजों को कीटाणुओं से मुक्त रखना, जरूरी उपकरणों के साथ नर्सों को ढूंढना और उनके रहने की व्यवस्था करना, और मरीज की सेहत के लिए डॉक्टरों के साथ तालमेल बनाए रखना शामिल है.
हालांकि, पूरी तस्वीर निराशाजनक नहीं है. यह क्षेत्र नई तकनीकों और नए स्टार्टअप के आने से लगातार बेहतर हो रहा है.
जब बजाज ने दूसरी बार अपनी मां को घर लाने की कोशिश की, तो आखिरकार उन्हें सिमन हेल्थकेयर सर्विसेज नाम की एक अच्छी होम हेल्थकेयर कंपनी मिली. इस बार उन्होंने देखा कि अलग-अलग लोगों के बीच अच्छा तालमेल होने से काम कितनी आसानी से हो सकता है.
बजाज ने याद करते हुए बताया, “वे बहुत प्रोफेशनल कंपनी थी. मेरी मां को अस्पताल से घर लाने में मदद करने के लिए एक नर्स अस्पताल में हमसे मिली. देखभाल करने वाले कर्मचारी अच्छी तरह ट्रेनिंग लिए हुए थे. कंपनी ने नर्सों, डॉक्टर और मेरे साथ एक वॉट्सऐप ग्रुप भी बनाया, ताकि सभी को रेगुलर अपडेट्स दी जा सके.”
हालांकि, सिमन और पहले वाली हेल्थकेयर कंपनी, दोनों का खर्च लगभग एक जैसा था. दोनों के लिए रोजाना करीब 10,000 से 15,000 रुपये देने पड़ते थे. बजाज ने कहा कि उन्हें पैसे खर्च करने में कोई परेशानी नहीं थी, बशर्ते उन्हें अच्छी देखभाल और प्रोफेशनल सर्विस मिले.
लेकिन मैक्स हॉस्पिटल्स जैसी व्यवस्थित और बड़ी कंपनी के लिए भी घर के ऐसे माहौल में ICU चलाना कई चुनौतियां पैदा करता है, जहां हर चीज पर अस्पताल जैसा नियंत्रण नहीं होता. इसमें उपकरणों और बेड को कीटाणुओं से मुक्त करना, मरीज के कमरे को साफ और संक्रमण से सुरक्षित रखना, और अस्पताल के डॉक्टरों तथा घर पर मौजूद नर्सों के बीच तालमेल बनाए रखना शामिल है.
घर पर इलाज के लिए किन मरीजों को चुना जा सकता है और किनका इलाज घर पर करना ठीक रहेगा, यह फैसला भी मरीज की सेहत को ध्यान में रखकर बहुत सावधानी से किया जाता है.
वर्मा ने कहा, “जब हमें पता चल जाता है कि मरीज ठीक होने की राह पर है और घर पर भी उसका इलाज जारी रह सकता है, तब हम उसे घर शिफ्ट करने की सलाह देते हैं. लेकिन अस्पताल के ICU जैसी पूरी व्यवस्था घर पर नहीं बनाई जा सकती. घर पर ICU हमेशा अस्पताल के ICU का छोटा और सीमित रूप होता है.”
वहीं, कोकोरो भारत जैसी हेल्थकेयर कंपनियों के सामने चुनौती इन सेवाओं को दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचाने की है. काम शुरू करने के एक साल के अंदर कोकोरो ने 1,200 से ज्यादा घरों में स्वास्थ्य सेवाएं दी हैं. इनमें ICU की व्यवस्था भी शामिल है. कंपनी भारत के 100 शहरों में उपलब्ध है.
सुंदरम ने कहा, “हम जम्मू और ज्योलीकोट जैसी जगहों तक नर्सिंग की सेवाएं पहुंचा चुके हैं, लेकिन फिलहाल घर पर ICU की व्यवस्था सिर्फ शहरों तक सीमित है. हम अलग-अलग इलाकों में साझेदारी करते हैं, तकनीशियन और अच्छी ट्रेनिंग वाले कर्मचारियों को ढूंढते हैं, ताकि उन्हें दूर-दराज के इलाकों में भी भेजा जा सके. इसमें टाइम लगेगा.”
उन्होंने बताया कि कंपनी का लक्ष्य अगले तीन साल में 1 करोड़ घरों तक पहुंचना है. इसके साथ ही कंपनी अपने मौजूदा वादे को भी पूरा करना चाहती है कि घर पर ICU की व्यवस्था दो से चार घंटे के अंदर कर दी जाएगी. सुंदरम ने यह भी दावा किया कि फिलहाल उनकी कंपनी घर पर ICU की व्यवस्था देने वाली कंपनियों में सबसे सस्ती है.
उन्होंने कहा. “हम सिर्फ 5,000 रुपये रोज से घर पर ICU की व्यवस्था देते हैं. यह बाजार में सबसे सस्ती सेवा है और अस्पतालों में इसके लिए लिए जाने वाले 75,000 रुपये के खर्च का एक छोटा हिस्सा है. इसके बावजूद हमारा मुनाफा अभी भी 23 प्रतिशत है.”
होम हेल्थकेयर से जुड़े नियमों की समस्या
भारत में होम हेल्थकेयर का बाजार काफी हद तक नियमों की कमी के बीच काम करता है. इसकी वजह यह है कि क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट, 2010 सिर्फ अस्पतालों जैसी इमारतों पर लागू होता है, बेडरूम और निजी घरों पर नहीं. इस कानून में तय सुरक्षा के न्यूनतम मानकों के बिना, घर पर चलने वाले ICU और दूसरी स्वास्थ्य सेवाएं मूल रूप से राज्य की जांच और निगरानी की व्यवस्था से बाहर रहती हैं.
2026 में “होम हेल्थ केयर मैनेजमेंट एंड प्रैक्टिस” नाम से छपी एक स्टडी में बताया गया कि यह क्षेत्र अब भी बुनियादी तौर पर नियमों से बंधा नहीं है. सेवा देने वाली कंपनियों के लिए बायोमेडिकल कचरे से जुड़े नियमों का पालन करना जरूरी नहीं है. वे अक्सर इस्तेमाल किए गए और दूषित सक्शन कैथेटर तथा दूसरे मेडिकल कचरे को सीधे घरों के आम कचरे के साथ फेंक देती हैं. वहीं, ये एजेंसियां कंपनी एक्ट के तहत या सामान्य व्यापार लाइसेंस लेकर अपना रजिस्ट्रेशन कराती हैं, ताकि किसी नुकसान की जिम्मेदारी से बच सकें.
स्टडी में यह भी बताया गया कि आम तौर पर होम हेल्थकेयर सेवाओं का खर्च बीमा के तहत नहीं आता. इसका मतलब है कि परिवारों को यह पैसा अपनी जेब से देना पड़ता है. सिंह को देहरादून में अपने पिता के स्ट्रोक के बाद उनके ठीक होने और दोबारा सामान्य जीवन में लौटने के लिए इलाज की व्यवस्था करनी पड़ी. इस दौरान उन्हें पूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना (ECHS) जैसी सरकारी सुविधा से भी बहुत कम मदद मिली.
सिंह ने कहा, “मेरे पिता के लिए ECHS होने के बावजूद पूरा भुगतान नकद में करना पड़ा. घर पर मिलने वाली सेवाओं का खर्च इस योजना में शामिल नहीं है. इस क्षेत्र में इलाज की व्यवस्था करना आसान अनुभव नहीं है.”
स्टडी में कहा गया है कि घर पर ICU की व्यवस्था के दो पहलू हैं. एक तरफ, इससे ज्यादा लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकती हैं और परिवारों को कॉरपोरेट अस्पतालों के बहुत ज्यादा बिलों से राहत मिल सकती है. दूसरी तरफ, यह व्यवस्था अब भी बिखरी हुई है और इसके काम करने का कोई तय ढांचा नहीं है.
स्टडी में कहा गया है, “सबसे पहली और जरूरी बात यह है कि ‘घर’ को स्वास्थ्य सेवाएं देने की जगह और देखभाल करने वाले लोगों के ‘काम करने की जगह’ के रूप में मान्यता दी जाए. इससे होम हेल्थकेयर को स्वास्थ्य व्यवस्था का औपचारिक हिस्सा बनाने का रास्ता खुलेगा.”
इस क्षेत्र में नियमों की कमी के बीच रहने वाले परिवारों के लिए अस्पताल और घर के निजी माहौल के बीच संतुलन बनाना मुश्किल होता है. इससे तनाव और घर के भीतर लगातार थकान बनी रहती है. कॉरपोरेट सलाहकार 29 साल के अद्वैत तिवारी के लिए गुरुग्राम में अपने दो बेडरूम वाले फ्लैट को पिता के लिए पूरी तरह अस्पताल के कमरे में बदलना आसान नहीं था.
उन्होंने कहा, “पिता को स्ट्रोक होने के बाद मैंने घर से काम करना शुरू कर दिया, लेकिन इन दो महीनों में हमारी जिंदगी बदल गई है. घर में दवाइयों की शीशियां, IV ड्रिप, इंजेक्शन और डॉक्टर की पर्चियां बिखरी रहती हैं और हर रात मुझे यही चिंता रहती है कि कहीं कोई मशीन बीप करने न लगे या उनकी सांस लेने का तरीका न बदल जाए.”
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