नई दिल्ली: ब्राजील के मौजूदा राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा के लिए राजनीति में वापसी करना कोई नई बात नहीं है. कई राजनीतिक विश्लेषकों ने पिछले एक महीने में उनके राजनीतिक करियर के खत्म होने की बात कही थी, लेकिन 80 साल के लूला ने सोमवार को एक बार फिर शानदार वापसी की. उन्होंने अनुमानों को गलत साबित करते हुए 45 साल के सीनेटर और पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे फ्लावियो बोल्सोनारो को हरा दिया और रिकॉर्ड चौथी बार राष्ट्रपति बनने का रास्ता साफ किया. ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव में इससे पहले किसी उम्मीदवार ने पहले दौर में हारने के बाद दूसरे दौर का चुनाव जीतकर राष्ट्रपति पद नहीं पाया था.
लूला की जीत के साथ ब्राजील ने लैटिन अमेरिका में चल रही रूढ़िवादी लहर को रोक दिया है. इस लहर के दौरान कोलंबिया, पेरू, अर्जेंटीना और चिली में दक्षिणपंथी सरकारें सत्ता में आई हैं. इन सभी को अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का सपोर्ट मिला है. जीत के बाद अपने भाषण में लूला ने ट्रंप पर निशाना साधते हुए कहा, “यह देश किसी का बैकयार्ड बनना स्वीकार नहीं करता.”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने लूला की जीत साफ होने के बाद उन्हें बधाई दी. उन्होंने लूला को “माय डियर फ्रेंड” कहा. मोदी ने एक्स पर लिखा, “भारत-ब्राजील रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत और व्यापक बनाने के लिए उनके साथ मिलकर काम करने को लेकर उत्सुक हूं.”
उन्होंने लिखा, “हम मिलकर अलग-अलग क्षेत्रों में अपना सहयोग मजबूत करते रहेंगे, ग्लोबल साउथ की साझा प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाएंगे और ज्यादा समावेशी, समान और टिकाऊ दुनिया बनाने की दिशा में काम करेंगे.”
Heartiest congratulations to my dear friend, President Lula, on his remarkable re-election victory.
I look forward to working closely with him to further deepen and expand the multifaceted India-Brazil Strategic Partnership.
Together, we will continue to strengthen our…
— Narendra Modi (@narendramodi) October 26, 2026
रविवार को हुए दूसरे दौर के चुनाव में लूला को 51.78 प्रतिशत वोट मिले, जबकि बोल्सोनारो को 48.22 प्रतिशत वोट मिले. पहले दौर में किसी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट नहीं मिले थे, इसलिए दूसरा दौर कराना पड़ा. 4 अक्टूबर को हुए पहले दौर में बोल्सोनारो 47.03 प्रतिशत वैध वोट के साथ लूला के 45.16 प्रतिशत वोट से आगे थे. किसी भी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट नहीं मिले, इसलिए दूसरे दौर का चुनाव हुआ और इससे लूला के राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़े हो गए थे. पहले दौर में करीब 22 लाख वोटों से पीछे रहने के बाद दूसरे दौर के अंत तक लूला करीब 43 लाख वोटों से जीत गए.
बोल्सोनारो ने हार मानने से इनकार कर दिया है. उनके पिता ने भी 2022 में हार के बाद ऐसा ही किया था. वह दूसरे दौर के चुनाव को रद्द कराने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की आलोचना की है, जिसमें पूरे देश में मतदान का समय दो घंटे बढ़ा दिया गया था.
DW ने बताया, “लूला के चुनाव अभियान ने कई राज्यों में मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक पहुंचाने में आ रही दिक्कतों का हवाला देते हुए समय बढ़ाने की मांग की थी. बोल्सोनारो के अभियान ने भी अतिरिक्त मतदान समय की मांग की थी, लेकिन सिर्फ पांच राज्यों की नगरपालिकाओं में. उसने भारी बारिश, बाढ़ और बिजली कटौती का हवाला दिया था.”
लौटकर आने से बना राजनीतिक करियर
लूला ने 1970 के दशक के आखिर में साओ पाउलो की एक फैक्ट्री में काम किया. इसके बाद वह ट्रेड यूनियन नेता बने. उन्होंने 1980 में वर्कर्स पार्टी बनाने में मदद की और उस दशक में ब्राजील के लोकतांत्रिक बदलाव के सबसे पहचाने जाने वाले चेहरों में शामिल हो गए.
1989, 1994 और 1998 में उनके पहले तीन राष्ट्रपति चुनाव अभियान हार में खत्म हुए. 2002 में उन्होंने आखिरकार राष्ट्रपति चुनाव जीत लिया और 2006 में दोबारा चुनाव जीता. संविधान के तहत लगातार दो कार्यकाल की सीमा पूरी करने के बाद उन्होंने 2010 में पद छोड़ दिया.
इसके बाद भ्रष्टाचार के आरोपों में उन्हें जेल भेज दिया गया, लेकिन ब्राजील की सुप्रीम फेडरल कोर्ट ने फैसला दिया कि क्यूरिटिबा की फेडरल कोर्ट के पास संबंधित मामलों की सुनवाई करने का अधिकार नहीं था. कोर्ट ने उसके फैसलों को रद्द कर दिया और लूला के चुनाव लड़ने का रास्ता फिर से खोल दिया.
2022 में उन्होंने उस समय के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो को हरा दिया. इसके बाद बोल्सोनारो को चुनाव के नतीजे पलटने की साजिश के मामले में दोषी ठहराया गया और 27 साल जेल की सजा सुनाई गई.
लूला का चौथा कार्यकाल इसलिए संभव है क्योंकि ब्राजील में लगातार राष्ट्रपति बनने के कार्यकाल पर रोक है, लेकिन जीवनभर में सिर्फ दो कार्यकाल की सीमा नहीं है. कोई राष्ट्रपति लगातार दो कार्यकाल पूरा करने के बाद बीच में पद से हटकर फिर से उसी पद के लिए चुनाव लड़ सकता है.
लूला की यह नई जीत उनके 81वें जन्मदिन से ठीक पहले आई है, जो मंगलवार को है. उनका शपथ ग्रहण 5 जनवरी 2027 को होना है.
80 साल की उम्र में लूला ने अपनी जीत को सिर्फ अपने राजनीतिक भविष्य को बचाने से कहीं बड़ी चीज़ के तौर पर पेश किया है. उन्होंने अपने जीत के बयान में कहा, “मैं हमेशा सोचता हूं कि भगवान मेरे प्रति बहुत दयालु रहे हैं.”
उन्होंने पूछा, “और भगवान ने मुझे ही क्यों चुना?” इसके बाद उन्होंने कहा कि उनका मानना है कि भगवान का हाथ हमेशा उनके सिर पर रहा है.
धार्मिक भाषा का राजनीतिक महत्व भी था. जून 2025 में जारी जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, ब्राजील के इतिहास में पहली बार इवेंजेलिकल ईसाइयों की संख्या आबादी के एक चौथाई से ज्यादा हो गई है. ब्राजील के इंस्टीट्यूट ऑफ जियोग्राफी एंड स्टैटिस्टिक्स की ओर से जारी 2022 की जनगणना के आंकड़ों में 4.74 करोड़ इवेंजेलिकल ईसाई दर्ज किए गए. यह 10 साल और उससे ज्यादा उम्र के ब्राजील के लोगों की आबादी का 26.9 प्रतिशत है. 2010 में यह आंकड़ा 21.6 प्रतिशत था.
इन आंकड़ों में पेंटेकोस्टल और दूसरे प्रोटेस्टेंट समूह भी शामिल हैं. ब्राजील की राजनीति में इनकी भूमिका लगातार बढ़ रही है, खासकर रूढ़िवादी दक्षिणपंथ के लिए.
अर्थव्यवस्था और विदेश नीति
लूला की सत्ता में वापसी के साथ ऐसी उम्मीदें भी जुड़ी हैं, जो सिर्फ चुनावी जीत के प्रतीक से कहीं आगे हैं. ब्राजील के सामने सरकारी कर्ज, वित्तीय विश्वसनीयता, निवेश और आर्थिक विकास को लेकर लगातार सवाल बने हुए हैं. अटलांटिक काउंसिल के चुनाव से पहले के विश्लेषण में सरकारी कर्ज को सकल घरेलू उत्पाद के 80 प्रतिशत से ज्यादा बताया गया था और सालाना वित्तीय घाटा GDP के करीब 9 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था.
विश्लेषण में कहा गया कि लूला सरकार धीरे-धीरे वित्तीय सुधार करने के पक्ष में हो सकती है. इससे सरकारी निवेश और सामाजिक योजनाओं के लिए जगह बनी रहेगी और साथ ही कर्ज को संभालने के लिए एक भरोसेमंद ढांचा बनाए रखने की कोशिश होगी. इसमें कहा गया कि सरकार के सामने चुनौती वित्तीय बाजारों को यह भरोसा दिलाने की होगी कि कर्ज को स्थिर करने के लिए यह तरीका पर्याप्त रूप से मजबूत है.
लूला को ऐसी संसद का भी सामना करना होगा, जिसमें दक्षिणपंथी और मध्य-दक्षिणपंथी पार्टियों ने अपनी स्थिति मजबूत की है. व्यापार समझौते और ऐसे दूसरे फैसले, जिनके लिए संसद की मंजूरी जरूरी है, उन सांसदों के साथ बातचीत पर निर्भर करेंगे, जिनकी राजनीतिक सोच राष्ट्रपति से काफी अलग हो सकती है.
इसका नतीजा ब्राजील की राजनीति में एक जानी-पहचानी स्थिति होगी: बदलाव के वादे पर चुना गया राष्ट्रपति, लेकिन सरकार चलाने के लिए समझौते करने को मजबूर.
लूला की जीत का सबसे बड़ा असर ब्राजील की सीमाओं से बाहर दिखाई दे सकता है. लूला की राजनीतिक पसंद चाहे जो हो, अमेरिका के साथ ब्राजील के रिश्ते महत्वपूर्ण बने रहेंगे. यही बात चीन के लिए भी लागू होती है, जो ब्राजील का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है. चुनाव अभियान के दौरान लूला ने ब्राजील के महत्वपूर्ण खनिज क्षेत्र में अमेरिका की बढ़ती भूमिका के असर की आलोचना की थी. वहीं बोल्सोनारो ने अमेरिका के साथ ज्यादा खुफिया जानकारी साझा करने और सुरक्षा सहयोग का समर्थन किया था. लूला ने रणनीतिक स्वतंत्रता, अलग-अलग देशों के साथ साझेदारी और बहुपक्षीय कूटनीति पर जोर दिया है.
लूला के पहले दो कार्यकालों के दौरान ब्राजील ने अपनी आर्थिक ताकत और कूटनीतिक पहुंच को वैश्विक शासन में बड़ी भूमिका में बदलने की कोशिश की. लूला और उनके विदेश मंत्री सेल्सो अमोरिम ने ब्राजील की विदेश नीति का ध्यान सिर्फ उत्तर-दक्षिण संबंधों से हटाकर दक्षिण-दक्षिण सहयोग की ओर किया.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्राजील ने अफ्रीकी देशों के साथ अपने संबंध बढ़ाए और रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ मिलकर ब्रिक्स बनाने में मदद की.
ब्राजील ने IBSA यानी इंडिया, ब्राजील, साउथ अफ्रीका डायलॉग फोरम के जरिए भारत और दक्षिण अफ्रीका के साथ भी काम किया. इसका मकसद तीनों लोकतांत्रिक देशों के बीच सहयोग बढ़ाना और गरीबी और विकास से जुड़ी दूसरी चुनौतियों से निपटने के लिए साझा एजेंडा तैयार करना है. उनकी सरकार ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग भी बार-बार की और ब्राजील के लिए स्थायी सीट की मांग की. उसकी महत्वाकांक्षाएं जर्मनी, जापान और भारत की महत्वाकांक्षाओं से मिलती थीं. इसी वजह से ये चारों देश G4 पहल में एक साथ आए.
ब्राजील कृषि उत्पादों, ऊर्जा, खनिज और तैयार सामान का बड़ा उत्पादक है. चीन को होने वाला उसका निर्यात उसकी अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत आधार देता है, जिसे कोई नई सरकार या विदेश नीति में बदलाव आसानी से नहीं बदल सकता.
भारत के लिए इसका महत्व
भारत के लिए लूला की जीत सिर्फ एक पुराने राजनीतिक सहयोगी की वापसी से आगे का मौका है.
ब्राजील और भारत लंबे समय से वैश्विक शासन में सुधार करने, उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रभाव बढ़ाने और स्वतंत्र विदेश नीति के लिए जगह बनाए रखने में साझा रुचि रखते हैं. लेकिन दोनों देशों के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों के साथ जैसे मजबूत संबंध हैं, वैसी मजबूती भारत-ब्राजील रिश्तों में कभी नहीं रही.
लूला के नए कार्यकाल में यह बदल सकता है, खासकर अगर ब्रासीलिया और नई दिल्ली ब्रिक्स, IBSA और G20 में अपने साझा हितों का ज्यादा इस्तेमाल करें.
ब्राजील की तरह भारत भी अमेरिका और दूसरे क्षेत्रीय साझेदारों के साथ करीबी रिश्तों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है. इसमें क्वाड भी शामिल है. साथ ही भारत रूस के साथ अपने पुराने रिश्ते को भी बनाए हुए है. वहीं ब्राजील ने ऐतिहासिक रूप से दक्षिण अमेरिका में अमेरिकी प्रभाव को कम करने की कोशिश की है और अपने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों का दायरा बढ़ाया है.
दोनों देश नहीं चाहते कि उन्हें वॉशिंगटन और बीजिंग में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर किया जाए, या पश्चिमी गठबंधन और रूस में से किसी एक को चुनना पड़े.
दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्तों के पीछे मजबूत आर्थिक वजह भी है. भारत चीन के साथ अपनी भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को संभालते हुए अपने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों में विविधता लाना चाहता है. वहीं ब्राजील चीन को होने वाले कमोडिटी निर्यात पर अपनी भारी निर्भरता से पैदा होने वाले जोखिमों और ज्यादा विदेशी निवेश की जरूरत को समझता है.
चुनाव अभियान के दौरान लूला ने ब्राजील में निवेश को बढ़ावा देने के लिए विदेश यात्रा करने की अपनी इच्छा पर जोर दिया था. भारत इस कोशिश के लिए एक महत्वपूर्ण देश हो सकता है.
व्यापारिक रिश्ते मजबूत होने से सिर्फ व्यापार को तुरंत होने वाला फायदा ही नहीं होगा. इससे दोनों देशों को कुछ ही साझेदारों पर ज्यादा निर्भरता से पैदा होने वाली कमजोरियों को कम करने में मदद मिल सकती है. साथ ही, इससे दोनों देशों के कूटनीतिक सहयोग के लिए एक मजबूत आर्थिक आधार भी तैयार हो सकता है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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