कई सालों से अंदर ही अंदर बढ़ रही हिंदू विरोधी भावना हाल के महीनों में तेजी से बढ़ी है. यह दुश्मनी तब एक वास्तविक खतरा बन गई, जब 19 साल के एक युवक ने नवरात्रि के दौरान शिकागो के पास एक हिंदू मंदिर में बड़े पैमाने पर गोलीबारी करने की साजिश रची. इस त्योहार के दौरान हिंदू नौ दिनों तक व्रत रखते हैं और आदिशक्ति मां दुर्गा की पूजा करते हैं. साथ ही, वे पूजा स्थलों पर इकट्ठा होते हैं.
कई हिंदुओं ने इस घटना को टलने का कारण ईश्वरीय हस्तक्षेप को माना, क्योंकि हमलावर का हथियार एक अहम मौके पर काम नहीं कर पाया.
आज भारतीयों और खासकर हिंदुओं के खिलाफ दिखाई देने वाली दुश्मनी अक्सर पुराने इस्लामी और ब्रिटिश औपनिवेशिक पूर्वाग्रहों और तिरस्कार को नए रूप में पेश करती है. औपनिवेशिक शासकों ने ऐसी कहानियां गढ़ीं, जिनमें हिंदुओं को पिछड़ा, असभ्य और बर्बर बताया गया, ताकि अपने अधीन लोगों पर उनके शासन को सही ठहराया जा सके. उन्होंने हिंदू समाज को कई सामाजिक बुराइयों से घिरा हुआ बताया, खासकर महिलाओं की स्थिति को लेकर. औपनिवेशिक दौर के लेखन और विचारों में गलत तरीके से, लेकिन जानबूझकर, यह दावा किया गया कि सती प्रथा, दहेज, कन्या भ्रूण हत्या, गुलामी और जातिगत भेदभाव जैसी प्रथाएं हिंदू समाज का अभिन्न हिस्सा थीं.
इसके बाद के दशकों में, भारत की आजादी के बाद, भारतीय विद्वानों समेत मार्क्सवादी विचारधारा वाले शिक्षाविदों ने हिंदुओं के बारे में औपनिवेशिक दौर में बाहरी लोगों द्वारा गढ़ी गई इन गलत धारणाओं को अपना लिया. कैलिफोर्निया की इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में हिंदुओं के बारे में गलत जानकारी को सुधारने के लिए हिंदू अमेरिकियों ने जो संघर्ष किया, उसमें भी इन धार्मिक और वैचारिक पूर्वाग्रहों की झलक दिखाई दी. हिंदू अमेरिकियों ने इन गलतियों को सुधारने के लिए लंबे समय तक लगातार लड़ाई लड़ी.
जब 19वीं सदी के आखिर में ब्रिटिश शासन के अधीन भारतीय उपमहाद्वीप से शुरुआती प्रवासी अमेरिका पहुंचे, तो उनके वास्तविक धर्म की परवाह किए बिना उन्हें “हिंदू” कहा गया. खासकर अमेरिका के पश्चिमी तट पर उनके आने को उस समय की चर्चाओं में “पगड़ी वालों की बाढ़” या “हिंदू आक्रमण” बताया गया.
व्यवस्थित नस्लभेद
20वीं सदी की शुरुआत में नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा के कारण अमेरिका में काफी अशांति पैदा हुई. 1907 में वॉशिंगटन के बेलिंगहैम में भीड़ ने भारतीय उपमहाद्वीप से आए मिल मजदूरों को जबरन वहां से निकाल दिया. करीब 500 श्वेत मजदूर इस इरादे से इकट्ठा हुए कि वे भारतीय मजदूरों को इतनी बुरी तरह पीटेंगे कि वे “मिलों में श्वेत मजदूरों की नौकरियां छीनने की कोशिश न करें.” दंगाइयों ने पूरे शहर में उत्पात मचाया, खिड़कियां तोड़ीं, पत्थर फेंके, लोगों पर हमले किए, पुलिस अधिकारियों को काबू में किया और मजदूरों को उनके काम की जगहों और घरों से जबरन बाहर निकाल दिया.
अमेरिका के पश्चिमी तट पर ऐसी ही कई घटनाएं हुईं. कैलिफोर्निया में 1905 में एशियाई लोगों के प्रवेश का विरोध करने के लिए एशियाटिक एक्सक्लूजन लीग जैसे संगठन बनाए गए. ये संगठन भारतीय उपमहाद्वीप से आने वाले प्रवासियों के साथ-साथ चीनी और जापानी प्रवासियों के भी खिलाफ अभियान चलाते थे. इसके बाद 1917 के इमिग्रेशन एक्ट ने “एशियाई प्रतिबंधित क्षेत्र” बनाया, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप से अमेरिका आने वाले प्रवासियों का रास्ता लगभग बंद हो गया.
1923 में यूनाइटेड स्टेट्स बनाम भगत सिंह थिंड मामले में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भारतीय “श्वेत” नहीं हैं और इसलिए उन्हें प्राकृतिक नागरिकता नहीं दी जा सकती. अदालत ने कहा था कि श्री थिंड, “पूरी तरह भारतीय मूल के उच्च जाति के हिंदू थे, जिनका जन्म अमृतसर, पंजाब, भारत में हुआ था”, इसलिए विदेशी नागरिकों को प्राकृतिक नागरिकता देने से जुड़े कानूनों के तहत उन्हें “श्वेत व्यक्ति” नहीं माना जा सकता.
कैलिफोर्निया के 1913 के एलियन लैंड लॉ और इसी तरह के दूसरे कानूनों ने भारतीयों के संपत्ति खरीदने और उसका मालिक बनने के अधिकारों पर रोक लगाई. वहीं, शादी से जुड़े कानूनों ने भी तय किया कि भारतीय पुरुष किन महिलाओं से शादी कर सकते हैं. इसके नतीजे में कई भारतीय पुरुषों ने मैक्सिकन-अमेरिकी महिलाओं से शादी की.
1965 के इमिग्रेशन एक्ट ने राष्ट्रीय मूल के आधार पर लगाए गए भेदभावपूर्ण कोटे खत्म कर दिए. ये कोटे 1920 के दशक से अमेरिका में प्रवेश को नियंत्रित कर रहे थे. इस कानूनी बदलाव से प्रवासियों के लिए अमेरिका आने का रास्ता फिर खुल गया. इसके बाद बड़ी संख्या में भारतीय, खासकर पेशेवर लोग, अमेरिका पहुंचे. इनमें से कई हिंदू थे. इस कानून ने गैर-यूरोपीय देशों से आने वाले प्रवासियों, जिनमें अत्यधिक कुशल भारतीय कर्मचारी भी शामिल थे, के लिए अमेरिका में प्रवेश आसान बनाया. भारतीय प्रवासियों की आबादी 1980 में 2,06,000 से बढ़कर 2019 में 26,88,000 हो गई. यानी करीब चार दशकों में यह संख्या 13 गुना बढ़ गई.
1965 के बाद के दशकों में भारतीय अमेरिकी, अमेरिका में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे और आर्थिक रूप से समृद्ध प्रवासी अल्पसंख्यक समूहों में शामिल हो गए. अमेरिका की कुल आबादी में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ एक प्रतिशत से थोड़ी ज्यादा है, लेकिन भारतीय अमेरिकियों की परिवारों की औसत आय सबसे ज्यादा है. चार साल की कॉलेज डिग्री हासिल करने के मामले में भी भारतीय अमेरिकी सबसे ज्यादा शिक्षित समूहों में शामिल हैं. उनमें से 79 प्रतिशत लोगों के पास ऐसी डिग्री है. इसके अलावा, 25 साल या उससे अधिक उम्र के करीब 77 प्रतिशत भारतीय अमेरिकियों के पास स्नातक या उससे ऊंची डिग्री है.
1965 के इमिग्रेशन एक्ट के बाद 1980 के दशक में भारतीय मूल के प्रवासियों के खिलाफ हिंसा फिर बढ़ने लगी. इसका एक उदाहरण न्यू जर्सी के जर्सी सिटी में “डॉटबस्टर्स” नामक समूह के हमले थे, जो बिंदी लगाने वाली महिलाओं को निशाना बनाते थे. बिंदी माथे के बीच में, भौंहों के पास लगाई जाने वाली रंगीन बिंदी होती है. भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया में इसका सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है.
कैलिफ़ोर्निया, न्यू जर्सी और न्यूयॉर्क जैसी जगहों पर हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ की घटनाएं होने लगीं. इसके साथ ही भारतीयों और हिंदुओं के खिलाफ हेट स्पीच (नफरत भरी बातें) भी बढ़ने लगीं. कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के नियंत्रण वाली नगरपालिकाओं, नगर परिषदों और राज्य विधानसभाओं में भारत के नागरिकता संशोधन कानून (CAA), कृषि कानून, अनुच्छेद 370 को हटाने और जातिगत भेदभाव के खिलाफ बनाए गए कानूनों की आलोचना करते हुए प्रस्ताव पारित किए गए. कई बार इन प्रस्तावों का इस्तेमाल अमेरिका में हिंदुओं के खिलाफ नफरत भड़काने के लिए किया गया.
12 सितंबर 2022 को टीनेक डेमोक्रेटिक म्यूनिसिपल कमेटी (TDMC) ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें अमेरिका में सक्रिय कई हिंदू संगठनों को आतंकवादी संगठन बताया गया. प्रस्ताव में संघीय जांच ब्यूरो (FBI) और अमेरिका की दूसरी जांच और कानून लागू करने वाली एजेंसियों से इन हिंदू संगठनों की जांच करने और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की भी मांग की गई. कई लोगों ने इन कदमों को हिंदू समुदाय को डराने और उसे हाशिये पर धकेलने की कोशिश के रूप में देखा.
हिंदू विरोधी शिक्षाविद
कोविड-19 महामारी के बाद दुनिया भर में हालात सामान्य होने के दौरान, शिक्षाविदों के एक समूह ने 2021 में “डिस्मैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व कॉन्फ्रेंस” यानी वैश्विक हिंदुत्व को खत्म करने के उद्देश्य से एक सम्मेलन आयोजित किया. कई लोगों ने इसे अकादमिक मंचों के जरिए हिंदुओं और हिंदू धर्म की आलोचना करने की कोशिश के रूप में देखा.
इस सम्मेलन का उद्देश्य “‘हिंदुत्व’ के ऐतिहासिक विकास, इस विचारधारा के फासीवादी पहलुओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों तथा दूसरे वंचित समुदायों के खिलाफ हिंसा को जारी रखने” की पड़ताल करना था. संस्कृत में हिंदुत्व का अर्थ हिंदूपन है. हिंदुओं का कहना था कि यह सम्मेलन हिंदू धर्म, हिंदू ग्रंथों और परंपराओं का अपमान था. उनका यह भी कहना था कि यह उन हिंदुओं का अपमान था, जो हिंदू धर्म को मानते हैं, लेकिन वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा वाले समूहों की मान्यताओं और रूढ़िवादी सोच को मानने से इनकार करते हैं.
सम्मेलन के कई प्रमुख आयोजकों को वामपंथी कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों के रूप में पहचाना गया. उन पर आरोप था कि वे उस प्राचीन सभ्यता के प्रति गहरी दुश्मनी रखते हैं, जो फिर से मजबूत हो रही है और मानसिक, शारीरिक, आर्थिक तथा बौद्धिक स्तर पर एक हजार साल तक चले औपनिवेशिक दबाव से आत्मविश्वास के साथ बाहर निकल रही है. सम्मेलन में शामिल रटगर्स यूनिवर्सिटी की एक शिक्षाविद ने अमेरिका के विश्वविद्यालयों में आयोजित “होली अगेंस्ट हिंदुत्व” कार्यक्रम का समर्थन किया और हिंदू देवी-देवताओं के लिए अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल किया. होली हिंदू धर्म का एक त्योहार है, जिसे आम तौर पर रंगों के त्योहार के रूप में जाना जाता है. वहीं, भगवान राम हिंदुओं के पूजनीय देवता हैं.
इसके अलावा, हार्वर्ड केनेडी स्कूल के एक शिक्षाविद ने ट्वीट किया, “भारत के हिंदू बीमार लोग हैं. उनकी धार्मिक किताबें ही उनके दिमाग को ऐसा बनाती हैं.” 2021 में, अमेरिकी कैपिटल पर हुए दंगे के एक दिन बाद, रटगर्स यूनिवर्सिटी की उस प्रोफेसर ने ट्विटर पर अपने नए पाठ्यक्रम “दक्षिण एशिया का इतिहास-2 (मुगलों से मोदी तक)” की घोषणा की. उनके ट्वीट में अमेरिकी कैपिटल की एक तस्वीर थी, जिसमें कई अमेरिकी झंडों और तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन वाले झंडों के बीच भारत का तिरंगा भी दिखाई दे रहा था. इसके साथ उन्होंने लिखा, “कल वॉशिंगटन डीसी की यह तस्वीर मेरी शुरुआती तस्वीरों में से एक होगी. इसके साथ सवाल होगा कि यह समझने के लिए हमें क्या जानने की जरूरत है कि यहां भारतीय झंडा क्यों है?”
1893 में शिकागो में विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद की उपस्थिति और शुरुआती वेदांत समितियों की स्थापना से कुछ पश्चिमी बुद्धिजीवियों और आध्यात्मिक खोज में लगे लोगों के बीच हिंदू धर्म को लेकर जिज्ञासा और प्रशंसा पैदा हुई थी. इसके बावजूद, पश्चिमी देशों में ईसाई मिशनरियों के नजरिये से हिंदू धर्म को अक्सर “गैर-ईसाई”, “मूर्ति पूजक” या पिछड़ा हुआ बताया जाता है. इस दौरान खास तौर पर जाति व्यवस्था और कथित तौर पर “अनोखी” प्रथाओं पर जोर दिया जाता है.
हाल के दिनों में ऑनलाइन नफरत में आई तेजी और बड़े पैमाने पर गोलीबारी की नाकाम साजिश को इसी ऐतिहासिक संदर्भ में समझा जाना चाहिए. H-1B वीजा और नौकरियों की सुरक्षा को लेकर मौजूदा बहस ने भारतीय और हिंदू मूल के लोगों को निशाना बनाने का रास्ता आसान किया है. यह वैसा ही है, जैसा 19वीं सदी के आखिर और 20वीं सदी की शुरुआत में देखने को मिला था. मिनियापोलिस के एननसिएशन कैथोलिक स्कूल में गोलीबारी करने वाले हमलावर ने अपने हथियार पर “भारत को परमाणु बम से उड़ा दो” लिखा था. ऐसे लोगों के मन में नफरत रखने वालों की नजर में ये धमकियां अब सिर्फ विचारों तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि वास्तविक खतरे का रूप ले चुकी हैं.
अवतांस कुमार एक भाषाविद् हैं और उन्हें कैलिफ़ोर्निया न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन और सैन फ्रांसिस्को प्रेस क्लब के जर्नलिज़्म अवॉर्ड्स मिल चुके हैं. विचार निजी हैं.
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