‘कॉकरोचों’ के झंडे तले जब हजारों युवा दिल्ली की सड़कों और सोशल मीडिया पर विरोध जता रहे थे, तब मैंने अपनी टीम के साथ तमिलनाडु में अपने चुनाव क्षेत्र शिवगंगा में ‘इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इन्स्टीट्यूटों’ (आईटीआई), जिला रोजगार केंद्रों और लाइब्रेरी के दौरे किए. इन दौरों ने मुझे यकीन दिला दिया कि युवाओं के विरोध प्रदर्शन कोई इक्का-दुक्का विस्फोट नहीं हैं. ये भारतीय युवाओं के सामने एक के बाद एक विफलताओं के नतीजे हैं और और ये दर्शाते हैं कि जब आकांक्षाएं हमारी राजनीति में पहचान जितनी ही शक्तिशाली संगठक शक्ति बन जाती हैं, तो उसके क्या परिणाम सामने आते हैं
जिन सवालों के जवाब ज़रूरी हैं
धर्म, जाति, और भाषा हमारी राजनीति को लंबे समय से संगठित करते रहे हैं, लेकिन आज के किसी युवा नागरिक से पूछिए, उन्हें राष्ट्रीय राजधानी में जंतर-मंतर पर छात्रों के विरोध प्रदर्शनों के बारे में अच्छी तरह मालूम है. यह संकेत है कि आज की पीढ़ी पहचानों की सीमाओं से इतर सरोकारों के पीछे किस तरह संगठित हो रहे हैं.
परीक्षाओं की शुद्धता उनके सरोकारों में से एक है. नीट-यूजी के पेपर लीक ने इस समस्या को केंद्र में ला दिया, लेकिन यह कोई अपवाद नहीं था. संसदीय कमिटी ने 2024 में दर्ज किया था कि शिक्षा मंत्रालय के अधीन स्वायत्त संस्था ‘नेशनल टेस्टिंग एजेंसी’ (एनटीए) ने जो 14 बड़े इम्तहान आयोजित किए उनमें से पांच में गंभीर समस्याएं पैदा हुई थीं. उस साल, ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम’ जब पहली बार पेश किया गया था, तब ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने खबर दी थी कि पिछले पांच वर्षों में 15 राज्यों में पेपर लीक के मामलों के कारण 1.04 लाख पदों के लिए आवेदन करने वाले 1.4 करोड़ उम्मीदवार (यानी प्रत्येक खाली पद के लिए 135 उम्मीदवार) प्रभावित हुए.
छात्रों के विरोध प्रदर्शनों ने भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार को ‘सुधारों’ को लागू करने पर मजबूर किया. संसद के मॉनसून सत्र में पेश किए गए ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) विधेयक 2026’ में मुख्य रूप से पेपर लीक होने के बाद की स्थिति पर ज्यादा ज़ोर दियागया है, कि भारी जुर्माना लगाया जाए, लंबी कैद की सजा दी जाए, और ‘फास्ट ट्रैक’ अदालतों का गठन किया जाए. इस विधेयक में ‘एनटीए’ के कामकाज को लेकर असंतोष को दूर करने पर ध्यान नहीं दिया गया है. ‘एनटीए’ की 2017 में स्थापना एक आत्मनिर्भर ‘प्रमुख परीक्षा संगठन’ के रूप में की गई थी. इसकी आलोचना इसलिए भी की गई है कि इसमें स्थायी पद बहुत कम हैं और प्रतिनियुक्ति वाले तथा अनुबंध वाले कर्मचारियों पर ज्यादा भरोसा किया गया है, महत्वपूर्ण कामकाज ‘आउटसोर्स’ किए जाते हैं. इन सभी कारणों ने करोड़ों छात्रों के भविष्य को प्रभावित किया है. इसके अलावा, ‘फास्ट ट्रैक’ अदालतें कोई समाधान नहीं हैं. संसदीय आंकड़े बताते हैं कि ‘पॉक्सो’ तथा यौन अपराध के मामलों के समाधान के लिए गठित ‘फास्ट ट्रैक’ अदालतों में दो लाख मुकदमे अटके पड़े हैं.
डिग्री है, नौकरी नहीं
रोजगार और शिक्षा, भारतीय समाज के दो सबसे बड़े मसलों पर अब सार्वजनिक बहस शुरू हो गई है. अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया रिपोर्ट 2026’ के मुताबिक, 15-25 आयुवर्ग के 40 फीसदी ग्रेजुएट, और 25-29 आयुवर्ग के 20 फीसदी ग्रेजुएट बेरोजगार हैं. नीति आयोग के अनुसार, 15-29 आयुवर्ग के 8.7 करोड़ युवा शिक्षा, रोजगार या ट्रेनिंग से बाहर हैं.
मेरी टीम ने शिवगंगा में तमाम सरकारी आईटीआई में जो देखा वह इनके कारणों का खुलासा करता है. रिपोर्टों के अनुसार, आईटीआई की संख्या में लगभग 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो कि मुख्यतः निजी प्रदाताओं की वजह से हुई है लेकिन स्तर गिरा है. हमने पाया कि छात्रों को दाखिला दिया जा रहा है, कोर्स को पूरा किया जा रहा है, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि वे रोजगार पाने के लायक कितना हुनर हासिल कर पाए कंप्यूटर ओपरेटर क्लास में ट्रेनिंग ले रहीं महिलाएं अंग्रेजी में नोट तो ले रही हैं लेकिन वे यह नहीं समझा पा रही थीं कि उन्होंने क्या लिखा है, न ही वे उस भाषा में पूछे गए सवालों को समझ पा रही थीं. जिला उद्योग केंद्र में उद्योगों के प्रतिनिधि भी इसी समस्या को उजागर कर रहे थे : दाखिला और रोजगार लायक योग्यता में खाई की समस्या.
भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हो गया है, इसका लाभ अगर इस देश के युवा नहीं उठा पा रहे हैं, तो कौन उठा रहा है?
इसके बजाय हम किन मुद्दों पर बात करते हैं?
यह सब हो रहा है जब संसद एक संस्थागत संकट का सामना कर रहा है. इसके मॉनसून सत्र में लोकसभा में प्रश्नकाल के तय समय में से मात्र 1 फीसदी समय के लिए काम हो सका, जबकि अधिकतर विधेयक सदस्यों द्वारा चर्चा के बिना पास करवा लिये गए.
मीडिया और राजनीतिक हलक़ों में जो चर्चाएं होती रही हैं उन पर गौर करें तो हमें यह सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा कि क्या हमारी प्राथमिकताएं सही हैं. हम इसी में उलझे हैं कि राष्ट्रीय गीत के कितने छंद गाएँ, दो या छह? राष्ट्रीय खिलाड़ियों की जर्सी का रंग क्या हो, नीला या नारंगी? और जो हमसे असहमत हैं या हमसे सवाल पूछते हैं उन्हें क्या नाम दें, ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ या ‘खान मार्केट गैंग’ या ‘अर्बन नक्सल’ या सबसे ताजा नाम ‘दिमागी नक्सल’?
नतीजों पर ज़ोर
हमें सुर्खियों वाले आंकड़ों के पीछे देखना चाहिए. प्रगति की असली कसौटी संपूर्णता का आकार नहीं बल्कि उसके अंदर जीवन का स्तर है. इसका अर्थ है उत्तम रोजगार और हुनर, जो युवाओं को उद्योगों के लिए जरूरी क्षमताओं से लैस करे, न कि सिर्फ खोखले सर्टिफिकेट दे. दो स्कीमें बताती हैं कि हम इस लक्ष्य से कितने दूर हैं.
पहली स्कीम है हुनर सिखाने वाली सरकारी स्कीम, (प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना) (पीएमकेवीवाई). ‘सीएजी’ की 2025 की एक रिपोर्ट ने इसके डिजाइन में खामी पाई. यह भी पाया गया कि इसमें बाजार की मांग वाले विशेष रोजगार के लिए ट्रेनिंग को दिशा देने वाले व्यवस्थित विश्लेषण का अभाव है. दूसरी स्कीम है ‘प्राइम मिनिस्टर्स इंटर्नशिप स्कीम (पीएमआईएस)’. एक संसदीय कमिटी के अनुसार, इस स्कीम के प्रथम दो पाइलट चरणों में तीन लाख उम्मीदवारों की सूची बनाई गई और कंपनियों ने 1.3 लाख ऑफर किए. इनमें से 52,782 ऑफरों को कबूल किया गया लेकिन अंततः केवल 16,060 इंटर्न इस कार्यक्रम में शामिल हुए. हैरानी की बात है कि पहले चरण में 53.6 प्रतिशत की ‘ड्रॉप आउट’ दर दर्ज की गई.
यह बताता है कि घोषणाओं के पैमाने पर नहीं ध्यान देना है बल्कि मूल्यांकन की कसौटियों पर गौर करना है. जैसे, हाल में यह वादा किया गया कि एक साल में एक करोड़ युवाओं को ‘एआई स्किल’ से लैस किया जाएगा. हमें यह सवाल उठाना चाहिए कि कौशल विकास और रोजगार देने वाली अग्रणी सरकारी स्कीमों ने बीते वर्षों में 48,000 करोड़ खर्च करके वास्तव में क्या हासिल किया?
युवाओं के प्रदर्शनों ने सत्तातंत्र को इन हकीकतों का सामना करने के लिए मजबूर करने की कोशिश की है. अब पहले कदम के तौर पर यह कबूल करना चाहिए कि ‘सिस्टम’ खरी नहीं उतरी. यह सतत नाकामी का नरेटिव नहीं है, लेकिन यह सतत कामयाबी का नरेटिव न बने. भारत को आज इस ईमानदार आकलन की जरूरत है कि वह आज कहां खड़ा है; वह शानदार वायदों पर कम ज़ोर दे और स्पष्ट, यथार्थपरक, तथा हासिल किए जा सकने वाले लक्ष्यों पर ज्यादा ध्यान दे.
कार्ति पी. चिदंबरम शिवगंगा से सांसद हैं और ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सदस्य हैं. उनका एक्स हैंडल @KartiPC है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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