scorecardresearch
Sunday, 9 August, 2026
होमThe FinePrintहिंदू महासभा ने 1952 के आम चुनावों में मांगी थी ब्रिटिश मदद, एक पत्र से और क्या खुलासा हुआ

हिंदू महासभा ने 1952 के आम चुनावों में मांगी थी ब्रिटिश मदद, एक पत्र से और क्या खुलासा हुआ

हिंदू महासभा की अपील 27 अगस्त 1951 के एक गोपनीय पत्र में की गई थी, जिसे आशुतोष लाहिड़ी ने कोलकाता में ब्रिटिश डिप्टी हाई कमिश्नर को सौंपा था.

Text Size:

नई दिल्ली: ब्रिटेन के नेशनल आर्काइव्स, केव में रखे गए अब सार्वजनिक किए गए राजनयिक रिकॉर्ड से पता चला है कि हिंदू महासभा ने 1952 के आम चुनावों में ब्रिटेन से मदद मांगी थी. यह स्वतंत्र भारत का पहला आम चुनाव था. हिंदू महासभा ने बढ़ते कम्युनिस्ट प्रभाव को रोकने के लिए ब्रिटिश मदद मांगी थी.

हिंदू महासभा की यह अपील 27 अगस्त 1951 को लिखे एक गोपनीय पत्र में की गई थी. यह पत्र कोलकाता में ब्रिटिश डिप्टी हाई कमिश्नर को दिया गया था. इसे उस समय पार्टी के संसदीय बोर्ड के चेयरमैन आशुतोष लाहिड़ी ने दिया था.

लाहिड़ी के पत्र में कहा गया था, “प्रांत को कम्युनिस्ट समर्थक ताकतों की निश्चित जीत से बचाने के लिए, आपको अपना पूरा समर्थन उस एकमात्र पार्टी के पीछे लगाना होगा, जिसके पास अगले चुनाव में बड़ी सफलता पाने की उम्मीद है, या जो दूसरे कम्युनिस्ट विरोधी दलों के साथ मिलकर कम्युनिस्ट समर्थक सरकार बनने से रोक सकती है.”

Declassified diplomatic records from the United Kingdom reveal that Hindu Mahasabha appealed for British assistance in the 1952 general elections | Photo: UK National Archives at Kew
ब्रिटेन के रिकॉर्ड से पता चला कि हिंदू महासभा ने 1952 के आम चुनावों में ब्रिटिश मदद मांगी थी | फोटो: यूके नेशनल आर्काइव्स, केव
The letter was delivered to the British Deputy High Commissioner in Kolkata by Ashutosh Lahiry, then serving as chairman of the Hindu Mahasabha's parliamentary board | Source: UK National Archives at Kew
इस पत्र को हिंदू महासभा के संसदीय बोर्ड के तत्कालीन चेयरमैन आशुतोष लाहिड़ी ने कोलकाता में ब्रिटिश डिप्टी हाई कमिश्नर को दिया था | स्रोत: यूके नेशनल आर्काइव्स, केव

इस पत्र में ब्रिटेन से “अपना पूरा प्रभाव” इस्तेमाल करने की अपील की गई थी.

लाहिड़ी ने लिखा, “ब्रिटिश सरकार को यह तय करना होगा कि क्या वह आने वाले आम चुनाव के नतीजे को प्रभावित करने में कोई भूमिका निभाना चाहती है.” पत्र में आगे कहा गया, “मैं आपसे अपील करता हूं कि आप अपने पूरे प्रभाव का इस्तेमाल करें और हमें अपना पूरा समर्थन दें.”

लाहिड़ी स्वतंत्रता आंदोलन के एक जाने-माने व्यक्ति थे. उन्हें 1915 से 1922 तक अंडमान द्वीप समूह में जेल में रखा गया था. वह 1924 में हिंदू महासभा में शामिल हुए. इसके बाद 1932 में उन्हें कोलकाता के द स्टेट्समैन अखबार के संपादक अल्फ्रेड वॉटसन की हत्या की कोशिश के मामले में हिरासत में लिया गया था, लेकिन उन पर मुकदमा नहीं चलाया गया. हिंदू महासभा के इस नेता को 1950 में फिर गिरफ्तार किया गया और उन पर सांप्रदायिक नफरत भड़काने का आरोप लगाकर प्रिवेंटिव डिटेंशन एक्ट के तहत हिरासत में रखा गया. सुप्रीम कोर्ट ने उनकी हिरासत को रद्द कर दिया था.

ब्रिटिश हाई कमीशन के अधिकारियों ने 4 सितंबर 1951 को एक छोटा सा जवाब तैयार किया. इसमें कहा गया था कि “हाई कमीशन पार्टी की राजनीति में हिस्सा लेने की स्थिति में नहीं है.”

पत्र लिखने से पांच महीने पहले, दस्तावेजों के अनुसार, लाहिड़ी ने अमेरिकी कॉन्सुल-जनरल इवान विल्सन और वाइस-कॉन्सुल एन.जी. थैचर से मुलाकात की थी. 13 मार्च 1951 की उनकी बातचीत के एक मेमो को ब्रिटिश हाई कमीशन के साथ भी साझा किया गया था. इसमें दर्ज था कि लाहिड़ी ने हिंदू महासभा की पत्रिका केसरी के लिए अमेरिकी कंपनियों से विज्ञापन मांगे थे.

The British High Commission's brief response, drafted on 4 September 1951
ब्रिटिश हाई कमीशन का 4 सितंबर 1951 को तैयार किया गया छोटा जवाब
A memo of the conversation between Lahiry and then American Consul-General Evan Wilson and Vice-Consul NG Thacher
लाहिड़ी और तत्कालीन अमेरिकी कॉन्सुल-जनरल इवान विल्सन और वाइस-कॉन्सुल एन.जी. थैचर के बीच बातचीत का मेमो

स्वतंत्रता सेनानी बने CIA के मददगार

इस बात के सबूत कि हिंदू महासभा ने भारत के औपनिवेशिक शासकों से समर्थन मांगा था, ऐसे शोध के बाद सामने आए हैं जिसमें बताया गया है कि नए बने गणराज्य के राजनीतिक दल विदेशी दखल का विरोध करने के बावजूद समर्थन के लिए ब्रिटेन और अमेरिका से संपर्क करते रहे. इस दौर की दो दूसरी बड़ी पार्टियों, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI), को भी विदेशों से काफी समर्थन मिला था. यह बात आर्काइव रिकॉर्ड पर किए गए शोध से सामने आई है.

CIA का मानना था कि तेलंगाना में आजादी के तुरंत बाद शुरू हुआ विद्रोह विदेशों से काफी मदद पा रहा था. एक गुप्त केबल में दावा किया गया था कि ऐसे रेडियो प्रसारण किए जा रहे थे, जिन्हें स्लाविक लहजे वाले लोग चला रहे थे.

कांग्रेस के नेताओं की भी यही राय थी और उन्होंने ब्रिटेन और अमेरिका की खुफिया एजेंसियों के साथ मिलकर काम किया. 1949 के आखिर में कांग्रेस ने CIA को बताया कि वह हैदराबाद में एक नई राजनीतिक पार्टी बना रही है, ताकि CPI को कमजोर किया जा सके. इंटेलिजेंस ब्यूरो ने केरल के मालाबार इलाके में एक गुप्त कम्युनिस्ट विरोधी समूह बनाया और इस दौरान CIA को इसकी जानकारी देता रहा.

भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत डैनियल पैट्रिक मोयनिहान ने अपनी आत्मकथा में माना कि CIA ने 1959 में केरल में कम्युनिस्ट विरोधी पार्टियों को पैसा दिया था.

उन्होंने लिखा, “हमने सिर्फ दो बार, लेकिन सिर्फ दो बार, भारतीय राजनीति में इस हद तक दखल दिया कि हमने एक राजनीतिक पार्टी को पैसा दिया. दोनों बार ऐसा उस समय किया गया जब किसी राज्य के चुनाव में कम्युनिस्टों की जीत की संभावना थी. एक बार केरल में और एक बार पश्चिम बंगाल में.”

In 1949, the Congress told the CIA that it was forming a new political party in Hyderabad in an effort to marginalise the CPI
1949 में कांग्रेस ने CIA को बताया कि वह हैदराबाद में एक नई राजनीतिक पार्टी बना रही है, ताकि CPI को कमजोर किया जा सके.

मोयनिहान ने दावा किया कि पैसे की एक किस्त “पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को खुद दी गई थी, जो उस समय पार्टी की एक अधिकारी थीं.”

दूसरी तरफ, सोवियत संघ भारत में प्रचार से जुड़े कामों के लिए लगातार पैसा देता था. हालांकि, पैसे की कमी के कारण सोवियत संघ का प्रभाव सीमित था. 1924 में ही ब्रिटिश भारतीय इंटेलिजेंस ब्यूरो ने रिपोर्ट दी थी कि “भारत में अच्छी तरह से पैसा मिलने वाले कम्युनिस्ट संगठन के होने का कोई सबूत बिल्कुल नहीं है.”

हालांकि हाई कमीशन ने ऐसी मांगों से दूरी बनाए रखी, इतिहासकार पॉल मैकगार ने लिखा है कि ब्रिटेन की सीक्रेट इंटेलिजेंस सर्विस, यानी MI6, ने ऐसा करने से परहेज नहीं किया.

1948-1949 के दौरान मैकगार के अनुसार, MI6 ने भारत और मध्य पूर्व में गुप्त प्रचार पर 3,50,000 पाउंड खर्च किए.

मैकगार ने लिखा कि “इस पैसे का ज्यादातर हिस्सा प्रचार सामग्री छापने और प्रकाशित करने में खर्च हुआ… और ऐसे ‘फुसफुसाकर चलाए जाने वाले अभियानों’ को पैसा देने में इस्तेमाल हुआ, जिनका मकसद स्थानीय नेताओं को सोवियत संघ के निर्देश पर काम करने वाला बताना था. साथ ही ऐसे अभियान भी चलाए गए जिनका मकसद स्थानीय कम्युनिस्ट पार्टियों में फूट डालना था.”

आर्चिबाल्ड नाय, जो 1947 में भारत में हाई कमिश्नर बने थे, तेलंगाना, केरल और पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट आंदोलनों से निपटने के सरकार के सख्त तरीके से प्रभावित थे.

नाय ने लिखा, “उन्होंने कम्युनिस्टों से जिस मजबूती से, बल्कि यह कहा जा सकता है कि जिस बेरहमी और क्रूरता से निपटा, वैसा हमने खुद इस देश में अपने सबसे मुश्किल समय में भी कभी नहीं किया था.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: RSS गुरु की शिष्य मोदी सरकार को नसीहत: Gen Z पर भागवत के समर्थन में छिपा है इंदिरा गांधी दौर का सबक


 

share & View comments