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Thursday, 3 September, 2026
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इच्छामृत्यु के बाद हरीश राणा की आंखें अब किसी और की हैं, उनके माता-पिता उनसे मिलना चाहते हैं

पांच महीने पहले, निर्मला और उनके पति अशोक राणा ने अपने बेटे हरीश को अलविदा कहा था. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें हरीश का जीवन बचाने वाला इलाज बंद करने की अनुमति दी थी, जिससे पैसिव यूथेनेशिया की इज़ाज़त मिली थी.

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गाज़ियाबाद: तेरह साल कोई कम समय नहीं होता. इन 13 सालों में निर्मला राणा ने ऐसे शब्द सीखे, जिनकी उन्हें कभी कल्पना भी नहीं थी कि उन्हें जानने की ज़रूरत पड़ेगी—“पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट”, “लाइफ-सस्टेनिंग ट्रीटमेंट”, “यूथेनेशिया”. ये शब्द कभी डॉक्टरों और अदालतों तक सीमित थे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गए. उन्होंने उन अलग-अलग ट्यूबों के बारे में सीखा, जो उनके बेटे के शरीर को ज़िंदा रखती थीं और उन्हें कैसे लगाया जाता है. जब उनका बेटा खुद यह नहीं बता सकता था कि उसे क्या परेशानी हो रही है, तब उन्होंने उसके शरीर के संकेतों से उसकी तकलीफ को समझना सीखा. इन 13 सालों में उन्होंने यह भी सीखा कि अब अपने बेटे को जाने देने का समय आ गया है.

पांच महीने पहले, निर्मला और उनके पति अशोक राणा ने अपने बेटे हरीश को अलविदा कहा, जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें उनका (बेटे) लाइफ-सस्टेनिंग ट्रीटमेंट बंद करने की अनुमति दी और पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) की मंजूरी दी. इस मामले की गूंज दुनिया भर में हुई. अंतरराष्ट्रीय मीडिया और सोशल मीडिया पर लोग इस मामले का विश्लेषण कर रहे थे. आज, उनके गाज़ियाबाद स्थित घर के एक कमरे में कभी रखे मेडिकल बेड और व्हीलचेयर वहां नहीं हैं. जिन ट्यूबों और मशीनों का उन्होंने पहले से इंतजाम करके रखा था, वे अब बालकनी में गत्ते के डिब्बों में पैक हैं. वह काम, जो कभी उनके दिन के लगभग हर घंटे को ले लेता था, अब खत्म हो चुका है.

उसकी जगह क्या आया है, इसे समझाना थोड़ा मुश्किल है. अशोक राणा अब अपना दिन खाने के एक स्टॉल पर बिताते हैं, जबकि निर्मला घर और अपनी तीन साल की पोती की देखभाल करती हैं, लेकिन हरीश की मौत के पांच महीने बाद भी, निर्मला अभी भी उन दिनों की आदत डाल रही हैं, जिनकी शुरुआत अब अपने बेटे को देखने से नहीं होती.

निर्मला ने कहा, “मेरा रोज का काम अब जल्दी खत्म हो जाता है. उसके बिना ऐसा लगता है कि करने के लिए कुछ है ही नहीं.”

जिस कमरे में हरीश ने 13 साल लगातार देखभाल पाई, वह अब लगभग खाली है, उनका मेडिकल बेड और व्हीलचेयर भी नहीं है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
जिस कमरे में हरीश ने 13 साल लगातार देखभाल पाई, वह अब लगभग खाली है, उनका मेडिकल बेड और व्हीलचेयर भी नहीं है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

एक खाली कमरा, और उसके साथ क्या करें

जिस कमरे में हरीश ने इतने साल बिताए, वह अब लगभग खाली है. बिना चाहे भी, निर्मला की नज़र अब भी उस जगह चली जाती है, जहां कभी उनके बेटे का बिस्तर हुआ करता था.

निर्मला ने कमरे में इधर-उधर देखते हुए कहा, “मेरी नज़र अब भी हर समय वहीं चली जाती है.”

परिवार सिर्फ हरीश के जाने का दुख नहीं मना रहा है, बल्कि वे अब उस काम के बिना भी जीना सीख रहे हैं, जिसके जरिए वे हर दिन उनकी देखभाल करते और अपना प्यार जताते थे. अब देखने के लिए कोई बिस्तर नहीं है, करवट दिलाने के लिए कोई शरीर नहीं है, निगरानी करने के लिए कोई ट्यूब नहीं है, देखने के लिए कोई यूरोबैग नहीं है.

निर्मला उनकी ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब बदला करती थीं. अशोक ने कैथेटर, यूरोबैग और दवाइयों के नाम और उनके अलग-अलग साइज सीख लिए थे. उनके छोटे बेटे आशीष हरीश को नहलाते थे, उन्हें फिजियोथेरेपी देते और उनकी मालिश करते थे.

13 सालों तक, इन्हीं छोटे-छोटे कामों ने उनके परिवार का दिन बीत जाता था.

अब हरीश की छोटी भतीजी ने कमरे में अपने किचन वाले खिलौने फैला लिए हैं. जिस जगह पर सालों तक लगभग पूरी तरह बीमारी का साया रहा, वह अब एक बच्चे का प्ले स्टेशन बन गया है.

निर्मला नहीं जानतीं कि आखिर में वे इस कमरे का क्या करेंगी.

हरीश की मां निर्मला राणा, अपने बेटे के कॉलेज के दिनों की एक तस्वीर देख रही हैं, इससे पहले कि दुर्घटना ने उसकी ज़िंदगी बदल दी | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
हरीश की मां निर्मला राणा, अपने बेटे के कॉलेज के दिनों की एक तस्वीर देख रही हैं, इससे पहले कि दुर्घटना ने उसकी ज़िंदगी बदल दी | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

वह एक ऐसे एनजीओ की तलाश कर रही हैं, जो उन पाइपों, ट्यूबों, सक्शन टूल्स और अन्य मेडिकल सामान को ले सके, जिन्हें परिवार ने पहले से इकट्ठा करके रखा था और उन्हें उन परिवारों तक पहुंचा सके जिन्हें अभी भी उनकी ज़रूरत है.

“मैं उन्हें किसी एनजीओ को देने की कोशिश कर रही हूं, ताकि जिन लोगों को उनकी ज़रूरत है, वे उनका इस्तेमाल कर सकें.”

मेडिकल सामान को घर से हटाना परिवार के लिए शोक मनाने का भी एक तरीका है. यह समझने का एक तरीका कि हरीश के बिना उनकी दुनिया कैसी दिखेगी.

लेकिन इस नई ज़िंदगी में ढलने की कोशिश सिर्फ घर तक सीमित नहीं है.

हरीश की रोज़ाना की देखभाल के लिए इस्तेमाल होने वाले ट्यूब, सक्शन इक्विपमेंट और दूसरे मेडिकल सप्लाई अब परिवार के घर में बक्सों में पैक करके रखे गए हैं | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
हरीश की रोज़ाना की देखभाल के लिए इस्तेमाल होने वाले ट्यूब, सक्शन इक्विपमेंट और दूसरे मेडिकल सप्लाई अब परिवार के घर में बक्सों में पैक करके रखे गए हैं | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

हरीश के बिना एक दिन

13 सालों में पहली बार, अशोक का दिन कुछ हद तक एक आम कामकाजी दिन जैसा होने लगा है.

बतौर पिता उनकी भूमिका हमेशा घर के बाहर के काम संभालने की रही थी. अब राजनगर एक्सटेंशन में उनका एक छोटा सा फूड स्टॉल है, जिसका नाम ‘पोषक आहार कॉर्नर’ है. यहां वह स्प्राउट्स, सैंडविच और फल बेचते हैं.

अशोक राणा का फूड कियोस्क, पोषक आहार कॉर्नर ने उनके दिनों को एक नया रूटीन दिया है, क्योंकि उन्होंने सालों तक अपने बेटे की देखभाल के इर्द-गिर्द ज़िंदगी बिताई थी | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
अशोक राणा का फूड कियोस्क, पोषक आहार कॉर्नर ने उनके दिनों को एक नया रूटीन दिया है, क्योंकि उन्होंने सालों तक अपने बेटे की देखभाल के इर्द-गिर्द ज़िंदगी बिताई थी | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

अंदर हरीश की एक तस्वीर लगी है.

नीले रंग के मेटल कियोस्क को फेयरी लाइट्स और छत से लटकते पौधों से सजाया गया है. अशोक ने यह पूरी जगह खुद तैयार की है और इसके लिए उन्होंने ताज सैट्स एयर कैटरिंग में 35 साल काम करने के दौरान जो सीखा, उसका इस्तेमाल किया है.

बाहर लगे एक बोर्ड पर लिखा है कि यह कार्ट उत्तर प्रदेश सरकार की मदद से स्थापित किया गया है और हरीश राणा की प्यारी याद में है.

अशोक ने बताया कि उन्होंने स्टॉल के लिए फाइबर शीट्स और दूसरे उपकरणों पर करीब 70,000 रुपये खर्च किए. कियोस्क उन्हें सिर्फ 15-20 दिन पहले मिला है, जब उन्होंने बार-बार जिला प्रशासन से संपर्क किया.

उन्होंने कहा कि उनसे एक दुकान देने का वादा किया गया था, लेकिन उन्हें कियोस्क दिया गया. वह पांच बार जिलाधिकारी के कार्यालय जा चुके हैं और वहां घंटों इंतज़ार कर चुके हैं. पेंशन समेत दूसरे वादों पर अभी तक कोई फैसला नहीं हुआ है.

फिर भी, इस स्टॉल ने उनके दिन को एक स्ट्रक्चर दिया है. ग्राहकों को संभालना है, खाना तैयार करना है और हर सुबह उठने की एक वजह है.

कई सालों तक परिवार कहीं यात्रा नहीं कर सकता था क्योंकि हरीश के साथ घर पर किसी का रहना ज़रूरी था. हाल ही में, अशोक अपने छोटे बेटे के साथ अमरनाथ यात्रा पर गए.

यह एक छोटी सी आज़ादी थी, लेकिन ऐसी आज़ादी जिसकी पहले कल्पना करना भी मुश्किल था.

निर्मला घर संभालती हैं और अपनी पोती को स्कूल से घर लेकर आती हैं. घर के काम हैं, छोटे-मोटे काम हैं और पारिवारिक जीवन की वे आम बातें हैं, जिनके लिए तब बहुत कम जगह थी जब हरीश को लगातार देखभाल की ज़रूरत थी.

लेकिन आम ज़िंदगी में लौट आने से उसकी गैरमौजूदगी आम नहीं हो गई है.

निर्मला ने कहा, “जितना मैं उसके बारे में सोचती हूं, जितना उसके बारे में बात करती हूं, उतना ही मेरा दिल दुखता है.”

हरीश की ज़रूरतों के हिसाब से चलती थी ज़िंदगी

हरीश के पेट में PEG ट्यूब लगी थी, जिसे एंडोस्कोपी के जरिए बदला जाता था. उनकी ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब भी थी, जिसे नियमित रूप से बदलना पड़ता था. धीरे-धीरे निर्मला ने इसे खुद करना सीख लिया, ताकि उन्हें नर्सों और डॉक्टरों पर निर्भर न रहना पड़े.

अशोक ने कहा, “मेरी पत्नी आधी डॉक्टर बन गई है. डॉक्टर ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब बदलने के पैसे लेते हैं, लेकिन अब वह नर्सों से भी बेहतर तरीके से इसे बदल लेती है.”

अशोक ने भी बहुत कुछ सीखा. उन्हें नहीं पता था कि पुरुषों के लिए कैथेटर क्या होता है, उसके अलग-अलग साइज क्या होते हैं, यूरोबैग क्या होता है और कितनी तरह की दवाइयां होती हैं, लेकिन क्योंकि वह ये चीज़ें खरीदते थे, अब उन्हें इनके बारे में पता है.

रोज की देखभाल के अलावा भी अचानक कई तरह की परेशानियां आती थीं. हरीश की ज़िंदगी के आखिरी डेढ़ साल में उन्हें बहुत ज्यादा कफ बनने लगा था और वह अक्सर खांसते रहते थे. निर्मला को खुद कफ साफ करना और सक्शन करना पड़ता था.

उन्होंने बताया, “इतना ज्यादा होता था कि कभी-कभी मैं भगवान से प्रार्थना करती थी और सोचती थी कि उसे और कितनी तकलीफ सहनी पड़ेगी? उसे इस तरह देखना भी बहुत मुश्किल होता था. वह हमें यह भी नहीं बता सकता था कि उसे तकलीफ या दर्द हो रहा है.”

उन्हें याद है कि वह सक्शन की पाइप डालते हुए सोचती थीं कि कहीं इससे उसे दर्द तो नहीं हो रहा.

माता-पिता को यह चिंता भी सताने लगी थी कि उनके बाद हरीश का क्या होगा. 63 साल के अशोक और 59 साल की निर्मला की उम्र भी बढ़ रही थी. उनकी बेटी की शादी हो चुकी थी और वह अलग रहती थी और हालांकि, आशीष अपने भाई की देखभाल कर सकते थे, निर्मला ने कहा कि उनकी भी पूरी ज़िंदगी अभी आगे थी.

उन्होंने कहा, “माता-पिता अपने बच्चों के साथ ऐसा कुछ होने की कभी कल्पना भी नहीं करते. हमें हमेशा चिंता रहती थी कि अगर हमें कुछ हो गया तो उसका क्या होगा? अब हमारी उम्र भी बढ़ रही है.”

राणा परिवार 2021 में द्वारका से गाज़ियाबाद आ गया था. उन्होंने हरीश के इलाज का खर्च कम करने के लिए अपना घर बेच दिया था. उनका छोटा बेटा आशीष बाद में काम के लिए बेंगलुरु चला गया, लेकिन कई सालों तक वह हरीश की देखभाल में सबसे ज्यादा समय देने वाले लोगों में से एक था. परिवार ने काम आपस में बांट रखा था. अशोक घर के बाहर के काम संभालते थे, जबकि निर्मला और आशीष हरीश की रोज की देखभाल का ज्यादातर काम करते थे.

परिवार की परेशानी अदालतों तक पहुंचने से बहुत पहले शुरू हो गई थी. हरीश के हादसे के बाद, उन्होंने अस्पतालों में सही इलाज और सुविधाएं ढूंढने के लिए नौ दिन तक कोशिश की. हरीश को पीजीआई चंडीगढ़ में वेंटिलेटर पर रखा गया, लेकिन बाद में परिवार को वह बेड खाली करने के लिए कहा गया.

हरीश के दोस्तों और साथ पढ़ने वाले छात्रों ने परिवार की मदद की और उनके इलाज के लिए पैसे जुटाए. आखिरकार, उनकी मदद से हरीश को AIIMS में इलाज मिल सका, लेकिन वहां भी परिवार को एक और मुश्किल सच्चाई का सामना करना पड़ा: देश का सबसे बड़ा अस्पताल भी हरीश जैसे मरीज को हमेशा के लिए नहीं रख सकता था.

उन्हें घर पर हरीश जैसी स्थिति वाले व्यक्ति की देखभाल करने के बारे में बहुत कम जानकारी थी.

अशोक ने कहा, “तो हमने 28,000 रुपये की तनख्वाह पर एक नर्स रखी और मेरी मासिक तनख्वाह भी 28,000 रुपये ही थी.”

13 सालों तक परिवार के दिन हरीश को ज़िंदा रखने के इर्द-गिर्द चलते रहे—उन्हें खाना खिलाना, उनकी सफाई करना, दवाइयां देना, ट्यूब बदलना और उनकी हालत पर नज़र रखना. साल बीतने के साथ वे यह सोचने लगे कि इलाज जारी रखने से क्या वास्तव में उन्हें कोई मदद मिल रही थी.

हरीश खुद खाना, पानी या बोल नहीं सकते थे. वे अपने आप हिल-डुल नहीं सकते थे और न ही अपने माता-पिता को बता सकते थे कि उन्हें दर्द हो रहा है.

निर्मला ने कहा, “उसकी हालत बहुत खराब थी. उसके शरीर में कुछ नहीं था. मैं सोचती थी, इस तरह जीने का क्या मतलब है? जब कोई इंसान न खा सकता है, न बोल सकता है, न पानी पी सकता है, जब वह अपने आप कुछ नहीं कर सकता, तो ऐसी जिंदगी का क्या मतलब है?”

आखिरकार, उन्होंने अदालत का रुख किया और हरीश का लाइफ-सस्टेनिंग ट्रीटमेंट बंद करने की अनुमति मांगी.

जब मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने इसकी अनुमति दी, तो अशोक ने कहा कि परिवार दो दिनों तक ठीक से सो भी नहीं पाया. उन्हें लोगों को यह भी समझाना पड़ा कि पैसिव यूथेनेशिया का मतलब क्या है. उनके मुताबिक, इसका मतलब जानबूझकर मौत चुनना नहीं था. हरीश के मामले में 11 दिनों के दौरान डॉक्टरों की निगरानी में खाना और पानी धीरे-धीरे कम किया गया.

11 मार्च के अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह फैसला मौत चुनने के बारे में नहीं था, बल्कि ज़िंदगी को कृत्रिम तरीके से लंबे समय तक न खींचने के बारे में था. कोर्ट ने हरीश के माता-पिता से कहा: “आप अपने बेटे को छोड़ नहीं रहे हैं. आप उसे सम्मान के साथ जाने दे रहे हैं.”

हालांकि, निर्मला के लिए कानूनी भाषा से ज्यादा मायने उन 13 सालों में उन्होंने जो देखा, उसका था.

“अच्छा है कि यह अध्याय खत्म हो गया और अब वह शांति में है.”

जब निजी दुख सबके सामने आ गया

कई हफ्तों तक राणा परिवार की ज़िंदगी पूरी तरह उनकी अपनी नहीं रही. हरीश के मामले पर हर जगह चर्चा हो रही थी—अदालतों, अस्पतालों, टीवी स्टूडियो और घरों में. परिवार के मुताबिक, रिपोर्टर और मीडिया कर्मी उनकी हाउसिंग सोसाइटी के बाहर डेरा डाले रहते थे, जिससे उनके लिए बाहर आना-जाना भी मुश्किल हो गया था.

आखिरी कुछ दिन खास तौर पर मुश्किल थे. हरीश ने अपने आखिरी 11 दिन एम्स में बिताए, लेकिन अशोक और निर्मला का कहना है कि मामले को लेकर लोगों और मीडिया का इतना ध्यान था कि वे अस्पताल में नहीं रह सके. उनका छोटा बेटा आशीष हरीश के साथ रहा.

राणा परिवार के लिए यह बेहद निजी और भावनात्मक समय था, जो पूरे देश की नज़रों के सामने बीत रहा था. वे पत्रकारों से बात करने को लेकर भी सतर्क हो गए थे. उनका कहना था कि उनकी बातों को अक्सर गलत समझा जाता था या ऐसी बातों के साथ पेश किया जाता था, जिन्हें वे भड़काऊ या गलत मानते थे.

फिर, करीब एक महीने तक लोगों की चर्चा के केंद्र में रहने के बाद, लोगों का ध्यान दूसरी तरफ चला गया.

अब रिपोर्टर चले गए हैं. लोगों के बीच चल रही चर्चा भी शांत हो गई है, लेकिन राणा परिवार वहीं है, उस ज़िंदगी के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहा है जिसमें अब वह बेटा नहीं है, जिसके आखिरी दिन कुछ समय के लिए उनके निजी दुख को पूरे देश की कहानी बना गए थे.

अब भी हरीश को तलाश रहे हैं

हालांकि, एक तरीके से परिवार को हरीश की मौजूदगी अब भी महसूस होती है. राणा परिवार ने उनके अंगों को दान कर दिया था और हाल ही में उन्हें बताया गया कि उनके बेटे की आंखें अब किसी और के पास हैं. निर्मला उस व्यक्ति से मिलना चाहती हैं.

अशोक के लिए भी यह एक सुकून की बात है.

उन्होंने कहा, “वह हमारे लिए अब भी ज़िंदा है. हम उसे देख नहीं सकते, लेकिन उसकी आंखों से कोई और अब भी दुनिया देख रहा है. किसी को उससे फायदा हुआ है, इसलिए वह हमारे लिए ज़िंदा है.”

हरीश की मौत ने अशोक को एक ऐसी चीज़ भी दी है, जो उनके पास कई सालों से नहीं थी: अगली मेडिकल इमरजेंसी से आगे की ज़िंदगी के बारे में सोचने का समय.

जब 2013 में हरीश चौथी मंजिल से गिरे, तब वह चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के आखिरी सेमेस्टर में थे. वे पढ़ाई में भी अच्छे थे. अशोक ने कहा कि उन्हें कभी यह संतोषजनक जवाब नहीं मिला कि आखिर क्या हुआ था, लेकिन अब ये सवाल उनके दिन के हर घंटे पर हावी नहीं रहते.

इसके बजाय, अशोक अपना कुछ समय उन वकीलों और डॉक्टरों के वॉट्सऐप वॉइस नोट सुनने में बिताते हैं, जिन्होंने इस मामले में परिवार की मदद की थी. वे लोग देश के अलग-अलग हिस्सों में सामने आ रहे ऐसे ही मामलों और हरीश के मामले को अदालतें किस तरह देख रही हैं, इसके बारे में उन्हें लगातार बताते रहते हैं.

उनके वकील ने उन्हें बताया कि हरीश का मामला दूसरे लोगों के लिए एक मिसाल कायम करने में मदद कर रहा है.

उन्होंने कहा, “यह अपने आप में बहुत बड़ी जीत है और यह सिर्फ हरीश की वजह से और आप सभी की वजह से संभव हुआ है, जिन्होंने इसके लिए इतनी मेहनत की.”

अशोक चुपचाप सुनते रहे.

उन्होंने कहा, “जो हुआ, अच्छे के लिए हुआ. अब उसने भविष्य में दूसरे लोगों के लिए रास्ता खोल दिया है.”

राणा परिवार ने हरीश के मामले को लेकर ऑनलाइन चल रही सार्वजनिक चर्चा को जारी रहते देखा है. निर्मला खास तौर पर इस बात को लेकर सावधान हैं कि लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ऐसा उदाहरण न मानें, जिसे इसी तरह की हालत में देखभाल कर रहे हर परिवार पर सीधे लागू किया जा सकता है.

उन्हें याद है कि उन्होंने एक ऐसी महिला के लिए लिखा गया कमेंट देखा था, जिसका पति भी ऐसी ही स्थिति में था. किसी ने उससे पूछा था कि वह हरीश राणा के परिवार की तरह वही कानूनी रास्ता क्यों नहीं अपनाती.

निर्मला ने कहा, “लेकिन उसे ऐसा क्यों करना चाहिए? जब वह खुद जवान है और उसके पति में चेतना है.”

राणा परिवार के लिए हरीश का मामला उनकी खास स्थिति, 13 साल की देखभाल और इस डर से जुड़ा था कि उनके जाने के बाद उनके बेटे का क्या होगा.

अशोक को उम्मीद है कि यह कानूनी मिसाल उन परिवारों के लिए रास्ता आसान करेगी, जो खुद को ऐसी ही मुश्किल परिस्थितियों में पाते हैं.

हरीश की छोटी भतीजी बेटे के बारे में इमोशनल बातचीत के दौरान निर्मला को दिलासा देती हुई | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
हरीश की छोटी भतीजी बेटे के बारे में इमोशनल बातचीत के दौरान निर्मला को दिलासा देती हुई | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

उनका मानना है कि हरीश का नाम इतिहास में सिर्फ पैसिव यूथेनेशिया के मामले के केंद्र में रहे एक व्यक्ति के तौर पर नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्ति के तौर पर दर्ज हो गया है, जिसकी लंबी बीमारी ने कानूनी व्यवस्था को उस सवाल का सामना करने के लिए मजबूर किया, जिसका सामना भविष्य में दूसरे परिवारों को भी करना पड़ सकता है.

13 सालों तक उनके माता-पिता की ज़िंदगी अपने बेटे को ज़िंदा रखने के इर्द-गिर्द चलती रही. अब वह लड़ाई खत्म हो गई है. अशोक के पास चलाने के लिए एक स्टॉल है. निर्मला के पास संभालने के लिए घर और देखभाल करने के लिए एक पोती है.

वे धीरे-धीरे यह सीख रहे हैं कि उन घंटों का क्या करें, जो कभी हरीश के नाम थे.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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