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Friday, 12 June, 2026
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यूरोप का फैशन कचरा पहुंचता है पानीपत, इसके असर भी यहीं झेलने पड़ते हैं

एशिया के सबसे बड़े टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग हब को सस्टेनेबिलिटी की सफलता की कहानी माना जाता है. वर्कर, निवासी और डॉक्टर एक ज़्यादा मुश्किल कहानी बताते हैं.

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पानीपत: हरियाणा के पानीपत में एक टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग यूनिट के अंदर मजदूर फेंके गए कपड़ों के पहाड़ जैसे ढेर को बड़ी-बड़ी मशीनों में डालते हैं, जो बिना रुके लगातार चलती रहती हैं. हवा में बारीक रेशे रंगीन धुएं की तरह उड़ते रहते हैं. 12 घंटे की शिफ्ट खत्म होने तक ये रेशे उत्तम कुमार के हाथों, पैरों और पसीने से भीगी टी-शर्ट से चिपक जाते हैं और उनके पूरे शरीर पर रूई जैसी परत जमा हो जाती है.

अब वे इन्हें झाड़ने की भी कोशिश नहीं करते.

फैक्ट्री के अंदर जो एक सामान्य कामकाज जैसा दिखता है, वह दरअसल एक बहुत बड़े सिस्टम का हिस्सा है, जो ऐसे ही कठिन और धूल-भरे काम पर टिका हुआ है. इसी के जरिए दुनिया भर के फेंके गए कपड़ों को दोबारा इस्तेमाल होने वाले फाइबर में बदला जाता है.

पानीपत दुनिया की फास्ट फैशन इंडस्ट्री का एक छिपा हुआ और कम दिखने वाला हिस्सा है. यह छोटा शहर एशिया का सबसे बड़ा टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग हब बन चुका है, जहां हर साल करीब 10 लाख टन फेंके गए कपड़ों को प्रोसेस किया जाता है. यूरोप, अमेरिका और पूर्वी एशिया से फेंके गए कपड़े कंटेनरों में भरकर यहां आते हैं. फिर उन्हें छांटा जाता है, काटा-फाड़ा जाता है और कंबल, कालीन, धागे और नए कपड़ों में बदला जाता है. ये सामान दिल्ली के सरोजिनी नगर से लेकर वियतनाम तक पहुंचता है. जलवायु के प्रति जागरूक उपभोक्तावाद के इस दौर में, पानीपत को अक्सर इस बात का सबूत माना जाता है कि सर्कुलर फैशन काम करता है.

लेकिन इस टिकाऊ विकास की कहानी के पीछे एक कहीं ज्यादा असहज करने वाली सच्चाई छिपी है.

मजदूर कई साल तक खराब वेंटिलेशन वाली फैक्ट्रियों में फाइबर से भरी धूल में सांस लेते हैं, जिससे उन्हें टीबी, सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) और यहां तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां हो जाती हैं. स्थानीय लोग गंदे नालों, बदबूदार हवा और दूषित भूजल की शिकायत करते हैं. नियामक एजेंसियां औद्योगिक इलाकों में फैली सैकड़ों रीसाइक्लिंग यूनिटों पर निगरानी रखने में संघर्ष कर रही हैं. और जहां एक तरफ वैश्विक ब्रांड रीसाइक्लिंग वाले कपड़ों को फैशन कचरे का नैतिक समाधान बताकर बेच रहे हैं, वहीं इस बदलाव की पर्यावरणीय और मानवीय कीमत का बड़ा हिस्सा एक ही शहर पर पड़ रहा है.

हर साल करीब 10 लाख टन टेक्सटाइल कचरा पानीपत के रीसाइक्लिंग सिस्टम से होकर गुजरता है. इससे लगभग 7,000-8,000 करोड़ रुपये के उद्योग को सहारा मिलता है और एमएसएमई तथा अनौपचारिक सप्लाई चेन में 2 लाख से ज्यादा लोगों को रोज़गार मिलता है. 1980 के दशक में शुरू हुआ यह उद्योग पूरे शहर में फैला हुआ है. यहां तक कि सड़कों के किनारे पड़ा कचरा भी कपड़ों के टुकड़ों से भरा रहता है. इसके पर्यावरणीय फायदे साफ दिखाई देते हैं. लेकिन इसकी कीमत भी उतनी ही बड़ी है.

फैक्ट्री मालिकों का कहना है कि पानीपत को बेवजह निशाना बनाया जा रहा है. उनका कहना है कि भले ही कुछ अवैध और बिना पंजीकरण वाली रीसाइक्लिंग यूनिटें पानीपत में छिपकर काम करती हों, लेकिन वे पूरे उद्योग की तस्वीर नहीं दिखातीं.

ग्लोबल अलायंस फॉर टेक्सटाइल सस्टेनेबिलिटी काउंसिल (GATS) के संस्थापक परविंदर सिंह ने कहा, “पानीपत का उद्योग शायद ‘सस्टेनेबिलिटी’ और ‘सर्कुलैरिटी’ जैसे शब्दों से परिचित न हो. फिर भी यह क्लस्टर वैश्विक स्तर पर एक नेता बनकर उभरा है. भारत दुनिया की एकमात्र बड़ी अर्थव्यवस्था है जहां रीसाइक्लिंग फाइबर तीसरा सबसे बड़ा फाइबर है.”

उन्होंने कहा, “आप दुनिया की समस्या का समाधान कर रहे हैं, लेकिन आपको खुद भी इसका एहसास नहीं है.”

पानीपत दुनिया के टेक्सटाइल कचरे का एक बड़ा हिस्सा प्रोसेस करता है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
पानीपत दुनिया के टेक्सटाइल कचरे का एक बड़ा हिस्सा प्रोसेस करता है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

दुनिया के फेंके हुए कपड़े कहां जाते हैं

किसी फेंकी गई टी-शर्ट के पानीपत की फैक्ट्री तक पहुंचने से पहले वह हज़ारों किलोमीटर का सफर तय कर चुकी होती है.

उसकी यात्रा लंदन के किसी डोनेशन बॉक्स, जर्मनी के किसी रीसाइक्लिंग सेंटर, अमेरिका के किसी चैरिटी कपड़ा संग्रह अभियान या पूर्वी एशिया के किसी सॉर्टिंग वेयरहाउस से शुरू हो सकती है. अमीर देशों में बेकार समझे जाने वाले कपड़े आखिरकार भारत के पश्चिमी तट पर पहुंचते हैं और दुनिया की सबसे बड़ी टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग सप्लाई चेन में शामिल हो जाते हैं.

इस नेटवर्क का केंद्र गुजरात का कांडला और उसका दीनदयाल पोर्ट है, जहां इस तरह के कपड़ों का सबसे ज्यादा आयात होता है.

आयात नियमों के कारण भारत दोबारा पहनने के लिए सेकेंड-हैंड कपड़ों के आयात की अनुमति नहीं देता, सिर्फ रीसाइक्लिंग के लिए अनुमति है. इसलिए इन कपड़ों को कांडला स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन भेजा जाता है, जहां इन्हें “म्यूटिलेट” यानी काटा-फाड़ा जाता है — अक्सर इतना कि इन्हें दोबारा पहनना मुश्किल हो जाए, लेकिन पूरी तरह नष्ट नहीं किया जाता.

इसके बाद इस सामग्री का बड़ा हिस्सा उत्तर की ओर पानीपत भेजा जाता है, जहां इसकी 350-400 मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स हैं.

कई मायनों में, पानीपत दुनिया का टेक्सटाइल कूड़ाघर भी बन गया है और उसका मरम्मत केंद्र भी.

पानीपत के औद्योगिक इलाकों में रीसाइक्लिंग यूनिट्स की ओर ले जाए जा रहे छांटे गए कपड़ों के कचरे से भरे ट्रक यहां का रोज़ का दृश्य | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
पानीपत के औद्योगिक इलाकों में रीसाइक्लिंग यूनिट्स की ओर ले जाए जा रहे छांटे गए कपड़ों के कचरे से भरे ट्रक यहां का रोज़ का दृश्य | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

कांडला से आने वाले कसकर दबाए गए कपड़ों के बंडलों को सबसे पहले तीन श्रेणियों में बांटा जाता है — ग्रेड A (बहुत कम खराबी), ग्रेड B (कुछ अच्छे, कुछ खराब) और ग्रेड C (ज्यादातर इस्तेमाल के लायक नहीं).

सबसे अच्छी गुणवत्ता वाले कपड़े, जिनमें सिर्फ मामूली खराबी या इस्तेमाल के निशान होते हैं, अक्सर रीसाइक्लिंग प्रक्रिया में जाते ही नहीं हैं. इसके बजाय उन्हें भारत के तेज़ी से बढ़ते सेकेंड-हैंड कपड़ा बाज़ार में भेज दिया जाता है.

पानीपत की बरसात रोड पर व्यापारी आयातित कपड़ों के बंडलों की खरीद-बिक्री करते हैं. यहां से ये कपड़े थोक बाज़ारों में जाते हैं और फिर सरोजिनी नगर जैसे मशहूर बाज़ारों तक पहुंचते हैं, जहां लोग ब्रांडेड और “विंटेज” जैकेट, जींस और शर्ट उनकी असली कीमत से बहुत कम दाम पर खरीदते हैं.

ऑनलाइन थ्रिफ्ट स्टोर्स के बढ़ने से इसकी मांग और बढ़ गई है.

सनी, जो विदेशों से फेंके हुए कपड़ों के बंडल आयात कर बाज़ारों में सप्लाई करते हैं, कहते हैं कि यह कारोबार इतना लाभदायक हो गया कि उन्होंने अपनी स्थायी प्राइवेट नौकरी छोड़ दी.

उन्होंने करीब छह-सात साल पहले इस कारोबार में कदम रखा था और कहते हैं कि तब से इसका दायरा तेज़ी से बढ़ा है.

उन्होंने कहा, “हमने एक कंटेनर से शुरुआत की थी और अब हर महीने 15 कंटेनर आते हैं, जिनमें हर कंटेनर में करीब 350 बंडल होते हैं.”

एक कंटेनर की कीमत कपड़ों की गुणवत्ता के आधार पर 30 लाख से 50 लाख रुपये तक होती है.

समय के साथ यह कारोबार लगातार लाभ में रहा है, क्योंकि सेकेंड-हैंड कपड़ों के बाज़ार में आयातित कपड़ों की मांग काफी मजबूत है.

एक कर्मचारी बिना किसी सुरक्षा उपकरण के कटी हुई फाइबर को धागा बनाने वाली मशीन में डालता हुआ | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
एक कर्मचारी बिना किसी सुरक्षा उपकरण के कटी हुई फाइबर को धागा बनाने वाली मशीन में डालता हुआ | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

जो कपड़े दोबारा नहीं बेचे जा सकते, उनका रास्ता बिल्कुल अलग होता है. ये कम गुणवत्ता वाले कपड़े जो अक्सर दागदार, खराब या बहुत ज्यादा घिस चुके होते हैं — पानीपत की रीसाइक्लिंग यूनिट्स में भेजे जाते हैं, जहां उनकी पहचान पूरी तरह खत्म कर उन्हें फाइबर में बदल दिया जाता है.

पहला चरण छंटाई का होता है. कर्मचारी हर कपड़े को उसके मटेरियल और रंग के आधार पर अलग करते हैं. इसके बाद बटन, ज़िप और अन्य फिटिंग्स निकाल दी जाती हैं, फिर कपड़े को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर श्रेडिंग के लिए तैयार किया जाता है.

छंटाई का काम ज्यादातर महिला कर्मचारी करती हैं. उन्हें तय वेतन नहीं मिलता, बल्कि जितने किलो कपड़े वे प्रोसेस करती हैं, उसके हिसाब से भुगतान किया जाता है.

इसी चरण में कपड़ों के रंग-बिरंगे ढेर बनते हैं, जो आज पानीपत की पहचान बन चुके हैं. बाद में इन्हें गोदामों में रखा जाता है, ट्रकों में लादा जाता है और कई बार सड़कों के किनारे भी बिखरे हुए दिखाई देते हैं.

इस व्यवस्था में दो तरह का कचरा इस्तेमाल होता है — पोस्ट-इंडस्ट्रियल और पोस्ट-कंज्यूमर. ज्यादातर आयातित कपड़े पोस्ट-कंज्यूमर श्रेणी के होते हैं. उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि इन्हें प्रोसेस करना आसान होता है क्योंकि ये पहले से कुछ हद तक छांटे हुए और अपेक्षाकृत साफ होते हैं.

उनका कहना है कि भारत में इस्तेमाल के बाद फेंके गए कपड़ों को बड़े पैमाने पर रीसाइकिल करना ज्यादा मुश्किल है, क्योंकि उनमें अलग-अलग तरह की सामग्री मिली होती है, वे ज्यादा गंदे होते हैं और स्रोत पर उनकी अलग-अलग छंटाई नहीं होती.

दूर से देखने पर यह व्यवस्था भले अव्यवस्थित लगे, लेकिन वास्तव में यह कचरे से अधिकतम मूल्य निकालने के लिए बनाई गई एक सुव्यवस्थित प्रणाली है.

पानीपत की प्रमुख रीसाइकल्ड यार्न निर्माता कंपनी TSM कॉटस्पिन के निदेशक सिया राम गुप्ता ने कहा, “हर जगह कचरे की मात्रा बढ़ रही है क्योंकि लोग ज्यादा कपड़े खरीद रहे हैं और उन्हें जल्दी फेंक भी रहे हैं.”

इस बढ़ोतरी के पीछे फास्ट फैशन इंडस्ट्री का लगातार बढ़ता उत्पादन चक्र है.

कपड़े सस्ते हो गए हैं, फैशन ट्रेंड तेज़ी से बदलते हैं और लोग कपड़ों को पूरी तरह घिसने से पहले ही फेंक देते हैं. नतीजा यह है कि दुनिया भर में कपड़ों का कचरा तेजी से बढ़ रहा है, जिसे संभालने में यूरोप और उत्तरी अमेरिका के कई देश मुश्किल महसूस कर रहे हैं.

जब उनसे पूछा गया कि क्या पानीपत दुनिया के टेक्सटाइल कचरे का डंपिंग ग्राउंड बन गया है, तो गुप्ता ने इस बात का विरोध किया और कहा कि इस उद्योग को अक्सर गलत समझा जाता है.

उन्होंने कहा, “उद्योग से जुड़े सभी लोग जानते हैं कि यह कैसे काम करता है. अब इसकी चर्चा ज्यादा हो रही है, लेकिन यह व्यवस्था दशकों से चल रही है.”

और पानीपत उन जगहों में से एक बन गया है जो इस काम को करने के लिए तैयार भी है और आर्थिक रूप से सक्षम भी.

रीसाइकल किए गए टेक्सटाइल फाइबर से बनाया जा रहा धागा | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
रीसाइकल किए गए टेक्सटाइल फाइबर से बनाया जा रहा धागा | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

सर्कुलर फैशन की मानवीय कीमत

उत्तम कुमार के लिए यह नौकरी पर्यावरण बचाने से ज्यादा जीवन चलाने का साधन है. उनकी 12 घंटे की शिफ्ट शुरू होने वाली है.

उत्तर प्रदेश के बिजनौर से आए 32-वर्षीय प्रवासी मजदूर पिछले आठ साल से पानीपत की टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग यूनिट्स में काम कर रहे हैं, जहां वे फेंके गए कपड़ों को कच्चे फाइबर में बदलते हैं. शहर आने के बाद उन्हें मजदूर चौक और ठेकेदारों के जरिए काम मिला था और तब से वे इसी उद्योग में काम कर रहे हैं. फिलहाल वे टीएम कॉटस्पिन में काम करते हैं.

उन्होंने कहा, “सामान को पहले कटर में काटा जाता है, फिर इसे इस मशीन में डाला जाता है जहां कच्चा फाइबर बनता है. इसके बाद इसे अंदर धागा बनाने के लिए भेजा जाता है. हम तो बस प्लांट के लिए यह ‘कच्चा माल’ तैयार करते हैं.”

यह काम बार-बार एक जैसा करने वाला और शारीरिक रूप से काफी कठिन है.

जब वह श्रेडिंग सेक्शन से बाहर निकलते हैं, तब उनका पूरा शरीर बारीक नीले रंग के रेशों से ढका होता है — यह उन घंटों का असर होता है जो उन्होंने प्रोसेसिंग यूनिट के अंदर बिताए हैं, लेकिन कुमार के लिए अब यह चिंता की बात नहीं, बल्कि नौकरी का हिस्सा बन चुका है.

शहर में टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग, छंटाई, स्पिनिंग और प्रोसेसिंग यूनिट्स में 2 लाख से ज्यादा लोग काम करते हैं. इनमें ज्यादातर बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से आए प्रवासी मजदूर हैं, जो स्थायी रोज़गार की तलाश में यहां पहुंचे थे. इनमें से कई लोगों के लिए लंबे समय के स्वास्थ्य जोखिमों से ज्यादा जरूरी मासिक वेतन, किराया और घर भेजे जाने वाले पैसे होते हैं.

उत्तम ने कहा, “जब तक काम लगातार मिलता रहे और कोई समस्या हो तो मालिक उसका समाधान कर दे, तब तक नौकरी अच्छी है.”

लेकिन किसी खतरे को सामान्य मान लेने से वह खत्म नहीं हो जाता.

रीसाइक्लिंग यूनिट के अंदर कपड़ों के कचरे के ढेर पर आराम करती महिला मजदूर | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
रीसाइक्लिंग यूनिट के अंदर कपड़ों के कचरे के ढेर पर आराम करती महिला मजदूर | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग को अक्सर फैशन इंडस्ट्री के सबसे अच्छे पर्यावरणीय समाधानों में से एक बताया जाता है. जो भी कपड़ा काटकर दोबारा इस्तेमाल किया जाता है, वह लैंडफिल में जाने से बच जाता है और हर किलो रीसाइकल्ड फाइबर नए कच्चे माल की जरूरत कम करता है.

लेकिन यह पूरी प्रक्रिया आज भी बहुत ज्यादा श्रम पर निर्भर है.

किसी शर्ट को दोबारा फाइबर में बदलने से पहले उसे रंग और कपड़े की किस्म के आधार पर अलग किया जाता है. बटन, ज़िप और अन्य फिटिंग्स हाथ से निकाली जाती हैं. फिर कपड़े को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है और श्रेडर मशीनों में डालकर फाइबर बनाया जाता है.

हर दिन हज़ारों मजदूर यह काम करते हैं. इनमें से कई बिना किसी सुरक्षा उपकरण के काम करते हैं.

पानीपत के एक औद्योगिक इलाके के बाहर चाय की दुकान पर शिफ्ट खत्म होने के बाद जुटे मजदूर बताते हैं कि गर्मी और असुविधा की वजह से कई लोग कुछ ही घंटों में मास्क उतार देते हैं.

डॉक्टरों का कहना है कि इसके परिणाम अक्सर कई साल बाद सामने आते हैं.

पानीपत सिविल अस्पताल में टेक्सटाइल मजदूरों के बीच सांस से जुड़ी बीमारियां सबसे आम शिकायतों में शामिल हैं.

डॉ. हितेश ने कहा, “सबसे आम बीमारी सीओपीडी है, जो बहुत ज्यादा धूल और कपड़ों के रेशे सांस के जरिए अंदर जाने से होती है. मशीनों के कारण माहौल गर्म हो जाता है और धूल भी बहुत होती है, इसलिए हाइपरथर्मिया और सिलिकोसिस जैसी समस्याएं भी देखने को मिलती हैं.”

उनके मुताबिक, अस्पताल आने वाले लगभग हर पांच में से एक टेक्सटाइल मजदूर को सांस से जुड़ी समस्याएं होती हैं. इनमें लगातार खांसी, सीने में जकड़न और सांस लेने में परेशानी जैसी शिकायतें शामिल हैं. रंग और रसायनों से होने वाले केमिकल बर्न कम देखने को मिलते हैं, क्योंकि लोग आमतौर पर उनसे बचाव करते हैं.

उन्होंने कहा, “मैं उन्हें सिर्फ यही सलाह दे सकता हूं कि मास्क पहनें. इससे सीओपीडी का खतरा काफी कम हो जाता है. लेकिन या तो मालिक मास्क नहीं देते या फिर मजदूरों को मास्क पहनना असहज लगता है.”

हाल ही में हुए एक स्वास्थ्य सर्वे में पाया गया कि रीसाइक्लिंग क्लस्टर के आसपास रहने वाले 93 प्रतिशत परिवारों ने पिछले पांच वर्षों में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की शिकायत की. इनमें सांस की पुरानी बीमारियां, टीबी और कैंसर शामिल हैं. खांसी, त्वचा में जलन और आंखों में परेशानी आम समस्याएं हैं, जबकि सही स्वास्थ्य सेवाएं ज्यादातर लोगों की पहुंच से बाहर हैं.

हालांकि, फैक्ट्रियों के अंदर इन खतरों पर कम ही चर्चा होती है. वहां सबसे ज्यादा ध्यान उत्पादन लक्ष्य पूरा करने पर रहता है.

धागा बनाने के लिए प्रोसेस होने का इंतज़ार करता कटा हुआ टेक्सटाइल कचरा | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
धागा बनाने के लिए प्रोसेस होने का इंतज़ार करता कटा हुआ टेक्सटाइल कचरा | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

कचरे का कारोबार

पानीपत में कई लोगों के लिए टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग कोई पर्यावरणीय परियोजना नहीं है.

TSM कॉटस्पिन के निदेशक सिया राम गुप्ता इस उद्योग की शुरुआत को वैश्विक कीमतों के दबाव और टेक्सटाइल व्यापार में आए बदलावों से जोड़ते हैं.

यह कंपनी 1980 से काम कर रही है, लेकिन 2000 के शुरुआती वर्षों में स्पेन और तुर्की की तकनीकों की स्टडी करने के बाद इसने औपचारिक रूप से रीसाइक्लिंग के क्षेत्र में कदम बढ़ाया.

गुप्ता ने कहा, “पहले कॉटन यार्न महंगा होता जा रहा था और चीन बहुत सस्ते विकल्प बना रहा था. हमने विदेशों में यह रीसाइक्लिंग तकनीक देखी और 2002 में इस पर काम शुरू किया.”

उन्होंने बताया कि प्रक्रिया फेंके गए कपड़ों को इकट्ठा करने से शुरू होती है. इनमें ऊन, ऐक्रेलिक, सिंथेटिक कपड़े और कॉटन शामिल होते हैं, जो बाज़ारों और व्यापारिक नेटवर्क के जरिए जुटाए जाते हैं. इनमें से ज्यादातर सामग्री दिल्ली के कबाड़ी बाज़ार सिस्टम से आती है.

इसके बाद इन कपड़ों को स्थानीय स्तर पर फाइबर और रंग के आधार पर अलग किया जाता है. फिर इन्हें काटकर फाइबर बनाया जाता है और धागे में बदला जाता है. मजबूती बढ़ाने के लिए कभी-कभी इसमें पॉलिएस्टर भी मिलाया जाता है.

गुप्ता ने कहा, “सब कुछ रीसाइकल किया जाता है. हम कोई नया कच्चा माल इस्तेमाल नहीं करते.” उन्होंने बताया कि उनकी फैक्ट्री में बना धागा बाद में व्यापारियों, निर्यातकों और निर्माताओं को बेचा जाता है, जो भारत के साथ-साथ बांग्लादेश, वियतनाम और केन्या जैसे देशों में भी इसे भेजते हैं.

उनका अनुमान है कि करीब 70-80 प्रतिशत कच्चा माल फेंके गए कपड़ों से आता है, जबकि बाकी हिस्सा PET बोतलों और प्लास्टिक कचरे से तैयार किया जाता है.

कंपनी में करीब 100-150 कर्मचारी काम करते हैं, लेकिन मुनाफा बहुत ज्यादा नहीं है.

उन्होंने कहा, “मुनाफा लगभग 5 से 7 प्रतिशत रहता है. यह बहुत ज्यादा कमाई वाला कारोबार नहीं है, लेकिन इसमें नुकसान भी नहीं होता.”

उन्होंने बताया कि एक किलो कचरे पर सिर्फ कुछ रुपये का ही लाभ होता है.

पानीपत के औद्योगिक इलाकों में यह स्थिति आम है.

अश्विनी जिंदल, जिनका परिवार 1940 के दशक से टेक्सटाइल कारोबार में है, पानीपत के काबड़ी रोड औद्योगिक क्षेत्र में दो रीसाइक्लिंग यूनिट चलाते हैं. यह शहर के सबसे पुराने और सबसे घने टेक्सटाइल क्लस्टरों में से एक है. उनकी एक यूनिट कॉटन के लिए और दूसरी ऊन के लिए है.

दोनों यूनिट्स में मिलाकर करीब 200 कर्मचारी काम करते हैं, जो छंटाई, श्रेडिंग और धागा बनाने जैसे काम करते हैं.

दशकों में यह कारोबार कालीन के धागे बनाने से बदलकर आयातित कपड़ों के कचरे को बड़े पैमाने पर रीसाइकल्ड धागे और कंबलों में बदलने तक पहुंच गया है. आज यह पानीपत की अर्थव्यवस्था की बुनियादों में से एक बन चुका है.

जब फाइबर से धागा तैयार हो जाता है, तो वह एक ऐसी सप्लाई चेन में जाता है जिस पर पानीपत के व्यापारी और डीलर हावी हैं. ये बिचौलिए बड़ी मात्रा में धागा खरीदते हैं और फिर उसे निर्यातकों और निर्माताओं तक पहुंचाते हैं. यूनिट्स आमतौर पर सीधे अंतिम खरीदारों से सौदा नहीं करतीं.

इसी व्यवस्था पर सैकड़ों छोटे और मध्यम उद्योग टिके हुए हैं, लेकिन इससे प्रतिस्पर्धा भी बहुत बढ़ गई है और नियमों का पालन करना कई बार महंगा पड़ता है.

उदाहरण के लिए, गुप्ता का कहना है कि उनकी यूनिट में रंगाई या ब्लीचिंग का कोई काम नहीं होता.

गुप्ता ने कहा, “छंटाई से लेकर धागा बनाने तक हम कोई ब्लीच या रंग इस्तेमाल नहीं करते. कपड़े पहले से ही रंग के हिसाब से अलग किए जाते हैं, इसलिए धागा भी उसी रंग का बनता है. यह पूरी तरह मशीनों के जरिए होने वाली प्रक्रिया है.”

पानीपत में तो सड़क किनारे पड़ा कचरा भी कपड़ों के टुकड़ों से भरा दिखाई देता है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
पानीपत में तो सड़क किनारे पड़ा कचरा भी कपड़ों के टुकड़ों से भरा दिखाई देता है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

प्रदूषण का संकट

अगर पानीपत की फैक्ट्रियां वह जगह हैं जहां फेंके गए कपड़ों को दूसरी ज़िंदगी मिलती है, तो शहर की नालियां एक अलग और कम खुशी वाली कहानी बताती हैं.

पूरे शहर में टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग यूनिट, डाइंग हाउस और प्रोसेसिंग फैक्ट्रियां उत्तरी भारत के सबसे बड़े औद्योगिक क्लस्टरों में से एक बनाती हैं. इनसे पानीपत एक बड़ा आर्थिक केंद्र तो बना, लेकिन साथ ही यह हरियाणा में औद्योगिक प्रदूषण के सबसे बड़े स्रोतों में से एक भी बन गया.

कहा जाता है कि हरियाणा में यमुना नदी के प्रदूषण का 45 प्रतिशत हिस्सा अकेले पानीपत से आता है. यह राज्य में प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की सबसे बड़ी संख्या है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के 2021-22 के सर्वे में पाया गया कि पानीपत में 181 प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग बिना ट्रीट किया हुआ गंदा पानी यमुना में छोड़ रहे थे. इनमें टेक्सटाइल डाइंग और ब्लीचिंग यूनिट्स का हिस्सा 64.2 प्रतिशत था.

हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों का कहना है कि पानीपत की औद्योगिक इकाइयां वायु और जल प्रदूषण कानूनों के तहत काम करती हैं और उन्हें संचालन की अनुमति लेनी होती है. उत्सर्जन और गंदे पानी के निपटान के लिए तय सीमा का पालन करना होता है. निरीक्षण किए जाते हैं, लेकिन किसी तय समय-सारणी के अनुसार नहीं.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “हम कभी भी जांच के लिए चले जाते हैं. अगर सब कुछ नियमित रूप से चल रहा होता है, तो हमें इसका अंदाज़ा हो जाता है कि यूनिट ठीक से चल रही है.” उन्होंने बताया कि नियमों के पालन की जांच के लिए हवा और पानी दोनों के नमूने लिए जाते हैं और उनकी जांच की जाती है.

बोर्ड के अनुसार, गंदे पानी के निकलने की वजह से डाइंग यूनिट्स पर सबसे ज़्यादा निगरानी रखी जाती है.

फाउंडेशन फॉर MSME क्लस्टर्स की 2026 की डायग्नोस्टिक स्टडी में पाया गया कि 350 से ज़्यादा रीसाइक्लिंग यूनिट्स से हर साल 7,684 टन खतरनाक कीचड़ (स्लज) निकलता है. ब्लीचिंग यूनिट्स से निकलने वाले 80 प्रतिशत गंदे पानी को बिना ट्रीटमेंट के ही छोड़ दिया जाता है. यह स्लज ऐसे निपटान तंत्र से गुजरता है जिसकी कोई निगरानी या रिकॉर्ड नहीं रखा जाता. अध्ययन में कहा गया कि नियमों का पालन केवल “उपकरण लगाने” तक सीमित है — मशीनें लगी हैं, परमिट लिए गए हैं, लेकिन इस कचरे का आखिर में क्या होता है, यह किसी को नहीं पता.

दूसरे शब्दों में कहें तो, दुनिया के टेक्सटाइल कचरे को संभालने के दौरान पैदा होने वाला कचरा अक्सर नियमों की निगरानी से बाहर रह जाता है.

कई फैक्ट्रियां सीमित पूंजी पर चलती हैं, जिनमें एक करोड़ रुपये से भी कम निवेश होता है. ऐसे में हर यूनिट की लगातार निगरानी करना मुश्किल है, खासकर तब जब यह उद्योग कई औद्योगिक इलाकों में फैला हुआ हो और इसमें छोटे तथा मध्यम उद्योगों की संख्या बहुत ज़्यादा हो.

नियामक एजेंसियों को बार-बार नियमों के उल्लंघन मिले हैं.

2018 से अब तक प्रदूषण नियंत्रण अधिकारियों ने पर्यावरण नियमों का पालन न करने पर पानीपत की 37 से ज़्यादा टेक्सटाइल यूनिट्स को बंद करने का आदेश दिया है. 2019 में 9 डाइंग यूनिट्स बंद की गई थीं. इसके बाद 2023 और 2025 में भी कई यूनिट्स बंद की गईं, क्योंकि जांच में पाया गया कि प्रदूषण नियंत्रण सिस्टम या तो खराब थे या बिल्कुल काम नहीं कर रहे थे.

माइक्रोफाइबर और धूल के उत्सर्जन पर बोर्ड ने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों के जरिए हवा में उड़ने वाले कणों को रोका जाता है, लेकिन औद्योगिक इलाकों में नियमों को लागू करना अभी भी चुनौती बना हुआ है.

यानी पर्यावरण पर पड़ने वाला बोझ खत्म नहीं हुआ है, बल्कि सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह चला गया है. और इसका असर सबसे ज़्यादा उन बस्तियों और मोहल्लों पर पड़ता है जो शहर के औद्योगिक इलाकों के आसपास स्थित हैं.

बड़े-बड़े कटर मशीनें अलग किए गए कपड़ों के कचरे को काटकर रेशों में बदलती हैं | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
बड़े-बड़े कटर मशीनें अलग किए गए कपड़ों के कचरे को काटकर रेशों में बदलती हैं | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

दुनिया की अलमारी के पास रहने वाले लोग

पानीपत के औद्योगिक इलाकों के किनारे बनी रिहायशी कॉलोनियों में रीसाइक्लिंग की यह अर्थव्यवस्था फैक्ट्री के गेट पर खत्म नहीं होती. यह लोगों के घरों तक पहुंचती है.

लोग कहते हैं कि सबसे पहले बदबू महसूस होती है.

रसायनों और गीले कपड़ों की गंध अक्सर हवा में रहती है, खासकर सुबह-सुबह और देर शाम, जब फैक्ट्रियां पूरी क्षमता से चल रही होती हैं. एक पुराने औद्योगिक इलाके के पास रहने वाले निवासी ने कहा, “यह हमेशा रहती है. इसकी आदत पड़ जाती है, लेकिन यह कभी जाती नहीं है.”

पानी उससे भी बड़ी चिंता है.

औद्योगिक गंदे पानी के रास्तों के आसपास कई इलाकों में लोगों का कहना है कि वर्षों में भूजल में हल्की बदबू आने लगी है और अब वे इसे पीते नहीं हैं. कई लोग पैकेज्ड पानी या नगर निगम की पानी सप्लाई पर निर्भर हैं, लेकिन वह भी अक्सर नियमित नहीं होती.

पुराने निवासियों के लिए यह बदलाव नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है.

यमुना में जाकर मिलने वाली एक बड़ी नाली, ड्रेन नंबर-2 के पास खड़े एक निवासी ने कंक्रीट की नाली में धीरे-धीरे बहते काले पानी की ओर इशारा किया.

उन्होंने कहा, “दस साल पहले इन नालियों का पानी बिल्कुल साफ होता था. हम इसमें नहाते थे, लेकिन अब इसे छू भी नहीं सकते, लेकिन अक्सर हम देखते हैं कि ट्रक इनमें कचरा डाल रहे हैं. इसकी इजाजत कैसे है? इसका हमारी सेहत पर असर कैसे नहीं पड़ रहा होगा?”

ज़्यादातर लोगों के लिए यहां से कहीं और जाना कोई विकल्प नहीं है. सस्ता घर मिलने की वजह काम की जगह के पास होने से जुड़ी है और कई परिवार सीधे या परोक्ष रूप से रीसाइक्लिंग उद्योग पर अपनी रोज़ी-रोटी के लिए निर्भर हैं.

नतीजा यह है कि निवासी उसी विरोधाभास में फंसे हुए हैं जिसने पानीपत को दुनिया भर में महत्वपूर्ण बना दिया है. नौकरियां पानीपत में रहती हैं. पर्यावरणीय नुकसान भी यहीं रह जाते हैं.

कैप्शन- पानीपत के ड्रेन नंबर-2 के पास रहने वाले लोगों का कहना है कि कभी इसका पानी साफ हुआ करता था, लेकिन अब यह बहुत ज़्यादा प्रदूषित और ज़हरीला हो गया है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
कैप्शन- पानीपत के ड्रेन नंबर-2 के पास रहने वाले लोगों का कहना है कि कभी इसका पानी साफ हुआ करता था, लेकिन अब यह बहुत ज़्यादा प्रदूषित और ज़हरीला हो गया है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

मुनाफे से मकसद तक

परविंदर सिंह ने पानीपत के टेक्सटाइल उद्योग में दो दशक से ज़्यादा समय बिताया है. जब उन्होंने 2003 में इस कारोबार में कदम रखा था, तब “सस्टेनेबिलिटी” यानी टिकाऊ विकास की कोई चर्चा नहीं होती थी.

मकसद सीधा था: फेंके गए कपड़े खरीदो, उन्हें प्रोसेस करो और फिर बेच दो. यह पूरी तरह एक कारोबारी काम था. उनका कहना है कि बदलाव धीरे-धीरे आया, जब वैश्विक सप्लाई चेन और सस्टेनेबिलिटी से जुड़ी अपेक्षाएं बदलने लगीं. यूरोप में टेक्सटाइल कचरे को लेकर सख्त नियम और सर्कुलर इकोनॉमी से जुड़े नए नियमों ने रीसाइकल फाइबर को कम कीमत वाली सामग्री से बदलकर वैश्विक ब्रांडों की रणनीतिक जरूरत बना दिया.

उन्होंने कहा, “यूरोप में अब रीसाइक्लिंग अनिवार्य हो गई है. 2027 से उन्हें रीसाइकल किए गए उत्पादों का आयात करना ही होगा. दूसरी चीज़ WSR यानी वेस्ट शिपमेंट रेगुलेशन है. इसका भारत पर बड़ा असर पड़ेगा.”

पानीपत के लिए इसका मतलब अवसर भी हो सकता है और ज्यादा जांच-पड़ताल भी.

इसके बाद सिंह ने ग्लोबल एलायंस फॉर टेक्सटाइल सस्टेनेबिलिटी काउंसिल (GATS) की स्थापना की. यह संगठन उद्योग से जुड़े लोगों, शैक्षणिक संस्थानों और फैशन ब्रांडों के साथ मिलकर टेक्सटाइल क्षेत्र में सर्कुलर और ज़ीरो-वेस्ट सिस्टम को बढ़ावा देता है.

यह काउंसिल टिकाऊ फैशन को बढ़ावा देने वाली वैश्विक पहल का हिस्सा है और पानीपत जैसे औद्योगिक क्षेत्रों के निर्माताओं को H&M जैसे अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों से जोड़ती है, जिन्होंने अपने उत्पादों में रीसाइकल सामग्री के इस्तेमाल के लक्ष्य तय किए हैं.

इस साल की शुरुआत में काउंसिल ने पानीपत इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, आईआईटी दिल्ली, क्रेया यूनिवर्सिटी, दिल्ली यूनिवर्सिटी के कई कॉलेजों और निफ्ट (NIFT) समेत कई संस्थानों के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) भी किए. इनका उद्देश्य टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग, डिज़ाइन और नवाचार पर साथ मिलकर काम करना है.

सिंह ने कहा, “दुनिया के सभी बड़े ब्रांडों ने 90 प्रतिशत से अधिक रीसाइकल और रीजनरेटेड फाइबर इस्तेमाल करने के लक्ष्य तय किए हैं. लेकिन छोटे उद्योगों को यह पता ही नहीं है कि इससे उनकी वैल्यू कितनी बढ़ सकती है.”

उनके लिए इस बदलाव ने उद्योग में उनकी भूमिका को देखने का नजरिया भी बदल दिया है.

उन्होंने कहा, “अब यह सिर्फ कारोबार नहीं रह गया है, बल्कि समाज को कुछ लौटाने जैसा है. दुनिया का भी ध्यान रखना है और उस उद्योग का भी, जो हजारों लोगों को रोजगार देता है.”

उन्होंने जोर देकर कहा कि यह उद्योग लगभग पूरी तरह MSME यानी छोटे और मध्यम उद्योगों पर टिका हुआ है. पानीपत के औद्योगिक इलाकों में फैली ये छोटी-छोटी इकाइयां मिलकर एक बड़ा लेकिन बिखरा हुआ नेटवर्क बनाती हैं, जो दुनिया के टेक्सटाइल कचरे को प्रोसेस करता है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर सस्टेनेबिलिटी और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी नीतियों में इसकी आवाज़ बहुत कम सुनाई देती है.

उन्होंने कहा, “उन्हें यह बताने वाला कोई नहीं है कि सस्टेनेबिलिटी और सर्कुलैरिटी भी एक अच्छा बिज़नेस मॉडल बन सकती है.”

उन्होंने नीति-निर्माण और ज़मीन पर मौजूद उद्योगों की वास्तविकता के बीच के अंतर की ओर इशारा करते हुए कहा, “अगर आप कुछ नियमों का पालन करते हैं, तो आपको आगे बढ़ने के अवसर मिल सकते हैं, लेकिन सस्टेनेबिलिटी और सर्कुलैरिटी को निवेश और कारोबार के रूप में कैसे देखा जाए, यह कोई उन्हें नहीं बताता.”

लेकिन वैश्विक स्तर पर सस्टेनेबिलिटी से जुड़े ढांचे भले ही बदल रहे हों, ज़मीन पर स्थिति काफी हद तक वैसी ही है — कम मुनाफे पर चलने वाले MSME, अनौपचारिक श्रम नेटवर्क और एक ऐसा उद्योग जो अभी भी वैश्विक जलवायु एजेंडे और स्थानीय औद्योगिक अस्तित्व के बीच अपनी जगह तय करने की कोशिश कर रहा है.

एक महिला पोस्ट-इंडस्ट्रियल टेक्सटाइल कचरे को रंग के आधार पर अलग कर रही है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
एक महिला पोस्ट-इंडस्ट्रियल टेक्सटाइल कचरे को रंग के आधार पर अलग कर रही है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

एक पक्की नौकरी

खुशबू पानीपत की एक यूनिट में रीसाइक्लिंग के आखिरी चरण में काम करती हैं. उनका काम यह सुनिश्चित करना है कि धागा बनाने वाली मशीनों में पर्याप्त फाइबर डाला जाता रहे ताकि वे लगातार चलती रहें. यह बार-बार दोहराया जाने वाला काम है — उठाना, डालना, ठीक करना, फिर वही काम दोबारा करना.

उनका दुपट्टा चेहरे पर ढीले ढंग से बंधा रहता है, जो मशीनों के बीच चलते समय बार-बार खिसक जाता है. इससे बहुत कम सुरक्षा मिलती है.

उन्होंने कहा, “मास्क पहनना असहज लगता है. मैं आमतौर पर अपने चेहरे को दुपट्टे से ढकने की कोशिश करती हूं और साथ ही पसीना भी पोंछती रहती हूं. अगर ऐसा न करूं, तो घर जाते समय तबीयत खराब लगती है और खांसी होने लगती है.”

बिहार की रहने वाली खुशबू उसी औद्योगिक इलाके में काम करती हैं जहां उनके पति भी काम करते हैं. उनके पति एक श्रेडिंग यूनिट में काम करते हैं. खुशबू कहती हैं कि उनके पति की खांसी उनसे भी ज़्यादा खराब है.

लेकिन दोनों ने कभी नौकरी छोड़ने के बारे में नहीं सोचा.

नौकरी पक्की है, और फिलहाल उनके लिए सबसे ज़्यादा मायने यही रखता है.

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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