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Friday, 12 June, 2026
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भारत-नेपाल म्यूचुअल लीगल असिस्टेंस एग्रीमेंट हाई-लेवल दौरों से भी ज्यादा अहम क्यों है

भारत-नेपाल की खुली सीमा पासपोर्ट के बिना आवाजाही की सुविधा देती है, जो दोनों देशों के करीबी रिश्तों का प्रतीक है, लेकिन यही सीमा सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती भी बन जाती है क्योंकि गैर-राज्य तत्व इसका इस्तेमाल अस्थिरता फैलाने के लिए करते हैं.

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नेपाल की सत्तारूढ़ पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रबि लामिछाने की दिल्ली की सफल उच्च-स्तरीय यात्रा के बाद 5 जून को विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने भी भारत का दौरा किया. इन दोनों यात्राओं ने दिखाया कि नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की मार्च में दुनिया के सबसे युवा प्रधानमंत्री बनने के बाद होने वाली पहली विदेश यात्रा की तैयारी के लिए दोनों देशों के बीच कितनी सावधानी से राजनीतिक और कूटनीतिक काम किया गया है.

जहां लामिछाने की दिल्ली यात्रा, जो सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के निमंत्रण पर हुई, ने राजनीतिक माहौल तैयार किया, वहीं खनाल की यात्रा काठमांडू से मंत्री स्तर की पहली यात्रा थी. इसने द्विपक्षीय संबंधों को ज़रूरी कूटनीतिक मजबूती दी और शाह की संभावित पहली भारत यात्रा की तैयारी का संकेत भी दिया.

इन दोनों यात्राओं से पैदा हुए राजनीतिक और कूटनीतिक संदेशों को अलग रख दें, तो भारत-नेपाल संबंधों में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल हुई—भारत-नेपाल आपराधिक मामलों में पारस्परिक कानूनी सहायता समझौता (MLAA) से जुड़ी प्रक्रियाएं पूरी हो गईं.

इसकी जानकारी भारत के विदेश मंत्रालय ने खनाल की यात्रा के दौरान जारी प्रेस विज्ञप्ति में दी, लेकिन सवाल यह है कि MLAA से जुड़ा यह अपडेट इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

MLAA एक महत्वपूर्ण सुरक्षा ढांचा

MLAA के केंद्र में भारत और नेपाल के बीच की खुली सीमा है. दोनों देशों के बीच 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है. नेपाल के भू-आवेष्ठित (Landlocked) देश होने के कारण इस सीमा को अक्सर उसकी जीवनरेखा कहा जाता है. यह खुली सीमा दोनों देशों के लोगों को बिना वीजा और पासपोर्ट के आने-जाने की सुविधा देती है, जो दोनों पड़ोसी देशों के बीच मजबूत जन-से-जन संबंधों को दर्शाती है.

लेकिन दूसरी तरफ, यही सीमा सुरक्षा एजेंसियों के लिए हमेशा सतर्क रहने की वजह भी बनती है, क्योंकि गैर-राज्य तत्व अक्सर इसका इस्तेमाल अस्थिरता और सुरक्षा खतरे पैदा करने के लिए करते हैं.

पिछले कई वर्षों में दोनों देशों की सुरक्षा एजेंसियों ने गैर-राज्य तत्वों और वांछित अपराधियों को पकड़ने तथा आपसी समन्वय के लिए नियम-आधारित व्यवस्था बनाने पर काम किया है. जहां प्रत्यर्पण (Extradition) से जुड़े मामलों को प्रत्यर्पण संधि के तहत संभाला जाता है, जिस पर पहली बार 1953 में हस्ताक्षर हुए थे और बाद में उसमें संशोधन किए गए, वहीं MLAA एक अलग और विशेष सुरक्षा व्यवस्था है. यह समझौता “भारत और नेपाल के लोगों को लाभ पहुंचाएगा क्योंकि यह सीमा पार अपराधों से जुड़े मामलों की जांच, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बनाने के लिए एक संस्थागत कानूनी ढांचा उपलब्ध कराएगा.”

इस समझौते पर दो दशक से भी अधिक समय से काम चल रहा था. MLAA का पहला मसौदा 22 जून 1999 को भेजा गया था. उस समय नेपाल में माओवादी विद्रोह चल रहा था और राजशाही देश की राजनीति, सुरक्षा और प्रशासन में सबसे प्रभावशाली संस्था थी.

इस समझौते पर मुख्य रूप से 2002 से गृह सचिव स्तर की बैठकों में चर्चा शुरू हुई. इसके बाद 2005 में दिल्ली में दोनों देशों के गृह सचिवों ने इसके अंतिम मसौदे को तैयार किया. आखिरकार फरवरी 2025 में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए. इतनी देरी क्यों हुई? इसका एक कारण यह हो सकता है कि 2008 में नेपाल संवैधानिक राजशाही से पूर्ण लोकतंत्र में बदल गया. इसके बाद वहां सरकारों और नेतृत्व में लगातार बदलाव होते रहे.

अब सिर्फ एक काम बाकी है—इस समझौते को लागू करना. नेपाल में मौजूदा राजनीतिक स्थिरता और दोनों देशों की इच्छा को देखते हुए अब इसके अंतिम चरण, यानी लागू किए जाने का इंतज़ार है.

ऐसे समझौते की जरूरत नेपाल में 1996 से 2006 तक चले माओवादी गृहयुद्ध के दौरान स्पष्ट रूप से महसूस की गई थी. कई विवरणों में बताया गया है कि नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवाद) के सदस्य गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए खुली सीमा के रास्ते भारत आ जाते थे.

यहां तक कि नेपाल के माओवादी आंदोलन के शीर्ष नेता पुष्प कमल दहल, जिन्हें प्रचंड के नाम से जाना जाता है, के बारे में भी कहा जाता है कि वे अधिकारियों से बचने के लिए भारत और नेपाल के बीच आते-जाते रहे. बाद में प्रचंड ने हथियार छोड़ने, शांति समझौते को स्वीकार करने और मुख्यधारा की राजनीति में शामिल होने के बाद प्रधानमंत्री का पद भी संभाला. अगर उस समय यह समझौता लागू होता, तो नेपाल ऐसे मामलों को MLAA के तहत उठा सकता था.

हालांकि, व्यवहारिक रूप से MLAA का मुख्य उद्देश्य खुली सीमा से पैदा होने वाली सुरक्षा और रणनीतिक चुनौतियों से निपटना है. इनमें तस्करी, मानव तस्करी, आतंकवादी गतिविधियां, अपराधी नेटवर्क, साइबर धोखाधड़ी, फरार अपराधी और वित्तीय अपराधों में वांछित लोग शामिल हैं. यह समझौता सुरक्षा एजेंसियों को ऐसे मामलों से कानूनी दायरे में रहकर अधिक व्यवस्थित और प्रभावी तरीके से निपटने में मदद करेगा.

चीन के साथ नेपाल का MLAA समझौता

नेपाल ने 2019 में चीन के साथ भी ऐसा ही समझौता किया था. हालांकि, चीन पिछले चार दशकों से ज्यादा समय से नेपाल पर MLAA पर हस्ताक्षर करने का दबाव बना रहा था, लेकिन आखिरकार अक्टूबर 2019 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की नेपाल यात्रा के दौरान इस पर सहमति बनी. दोनों देशों द्वारा जारी संयुक्त बयान में “आपराधिक मामलों में पारस्परिक कानूनी सहायता संधि (Mutual Legal Assistance in Criminal Matters)” पर हस्ताक्षर होने पर संतोष जताया गया था.

हालांकि, MLAA पर हस्ताक्षर हो चुके हैं, लेकिन चीन अभी भी नेपाल के साथ प्रत्यर्पण संधि (Extradition Treaty) का इंतज़ार कर रहा है. चीन लंबे समय से इस पर जोर देता रहा है, जबकि नेपाल ने इस मुद्दे को काफी हद तक दबाकर रखा है.

2019 की यात्रा के दौरान शी जिनपिंग ने नेपाल के साथ प्रत्यर्पण संधि को जल्द पूरा करने की उम्मीद जताई थी. 2026 तक भी यह संधि चर्चा में है और MLAA समझौता अभी इसके अनुमोदन (Ratification) का इंतज़ार कर रहा है.

इसके अलावा, जब प्रचंड 2024 में प्रधानमंत्री के रूप में चीन गए थे, तब दोनों देशों ने “चीन-नेपाल आपराधिक मामलों में पारस्परिक कानूनी सहायता संधि” के अनुमोदन की प्रक्रिया तेज करने पर सहमति जताई थी. लेकिन अब तक इसमें कोई खास प्रगति नहीं हुई है.

जहां चीन नेपाल के साथ ऐसे तंत्र को मजबूत करने के लिए उत्सुक रहा है, वहीं नेपाल की अपनी जिम्मेदारियां और चिंताएं भी हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह वे हजारों तिब्बती शरणार्थी हैं, जो कम्युनिस्ट शासन से बचने के लिए हिमालयी पहाड़ों को पार कर नेपाल पहुंचे थे.

1960 के दशक से 1990 के दशक तक हजारों तिब्बती नेपाल आए और फिर खुले भारत-नेपाल सीमा मार्ग का इस्तेमाल कर भारत पहुंचे, ताकि धर्मशाला में मौजूद तिब्बती निर्वासित सरकार के साथ रह सकें. वहीं, कई तिब्बती नेपाल में ही बस गए क्योंकि वहां का धार्मिक महत्व भी उनके लिए खास था.

दिलचस्प बात यह है कि 1990 के दशक के बाद नेपाल आने वाले तिब्बतियों की संख्या में काफी कमी आई. साथ ही 2008 के बाद नेपाल में तिब्बती शरणार्थियों की गतिविधियों पर काफी नियंत्रण लगाया गया. लेकिन चीन को अब भी डर है कि नेपाल में चलने वाले ‘फ्री तिब्बत’ जैसे आंदोलन तिब्बत में अशांति फैला सकते हैं या फिर तिब्बत की घटनाएं नेपाल तक असर डाल सकती हैं.

इसी वजह से चीन चाहता है कि आपराधिक मामलों में कानूनी सहयोग और प्रत्यर्पण संधि जैसे तंत्र मजबूत हों, जिससे नेपाल में रहने वाले तिब्बतियों पर निगरानी और नियंत्रण और सख्त हो सके.

तिब्बत को लेकर चीन की चिंता इतनी ज्यादा है कि दोनों देशों के हर आधिकारिक संयुक्त बयान में तिब्बत का मुद्दा प्रमुखता से शामिल होता है. 2024 के संयुक्त बयान में कहा गया था, “नेपाल ने दोहराया कि शिजांग (तिब्बत का चीनी नाम) चीन का आंतरिक मामला है और वह अपनी जमीन पर चीन विरोधी किसी भी अलगाववादी गतिविधि की अनुमति नहीं देगा.”

इसलिए चीन कई मायनों में तिब्बती शरणार्थियों को तिब्बत की शांति और स्थिरता के लिए संभावित सुरक्षा खतरे के रूप में देखता है. जब अमेरिका जैसे देश तिब्बती शरणार्थियों का समर्थन करते हैं, तो बीजिंग की चिंता और बढ़ जाती है. ऐसे में MLAA और प्रत्यर्पण संधि जैसे तंत्र चीन को और ज्यादा ताकत दे सकते हैं. साथ ही यह सवाल भी पैदा कर सकते हैं कि चीन की नजर में कौन अलगाववादी है और कौन नहीं.

अंत में, नेपाल के लिए ऐसे समझौते सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कानून का विषय नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच अलग-अलग व्याख्याओं और मतभेदों को संभालने का एक तरीका भी हैं.

खुली सीमा होने की वजह से आपराधिक मामलों में लगातार सहयोग और संपर्क की जरूरत पड़ती है, और एक कानूनी ढांचा भविष्य के लिए स्पष्ट रास्ता प्रदान करता है.

वहीं दूसरी ओर, MLAA चीन को तिब्बतियों की गतिविधियों पर और ज्यादा नियंत्रण करने की शक्ति दे सकता है. लेकिन काठमांडू के लिए यह एक ऐसा औपचारिक और लिखित ढांचा भी हो सकता है, जो इस बात की अस्पष्टता को कम करे कि बीजिंग किसे “वांछित” या “अलगाववादी” मानता है और किसे नहीं.

ऋषि गुप्ता ग्लोबल स्ट्रैटेजिक अफेयर्स के एक्सपर्ट हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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