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Saturday, 6 June, 2026
होममत-विमतरबि लामिछाने की हाई-प्रोफाइल दिल्ली यात्रा नेपाल की भारत नीति की दोहरी परत को दिखाती है

रबि लामिछाने की हाई-प्रोफाइल दिल्ली यात्रा नेपाल की भारत नीति की दोहरी परत को दिखाती है

दिल्ली और नेपाल पर नज़र रखने वालों को यह समझना होगा कि नेपाल में भारत के प्रति कोई खास लगाव नहीं है.

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नेपाल की सबसे बड़ी सत्तारूढ़ पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के अध्यक्ष और पूर्व उपप्रधानमंत्री रबि लामिछाने की भारत यात्रा, जो भारत की सत्तारूढ़ पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के निमंत्रण पर हुई, कई मायनों में महत्वपूर्ण है. सबसे अहम बात यह है कि 35-वर्षीय प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के नेतृत्व वाली नई आरएसपी सरकार के गठन के बाद यह नई दिल्ली और काठमांडू के बीच सबसे उच्च स्तर की बातचीत है.

इस यात्रा का समय इसे और भी महत्वपूर्ण बनाता है. लामिछाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ लगभग एक घंटे की बैठक हुई. इस बैठक में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल, विदेश मंत्री एस. जयशकंर और विदेश सचिव विक्रम मिसरी भी मौजूद थे. यह भारत द्वारा अपने पड़ोसी देश नेपाल के साथ संबंधों को दिए जा रहे महत्व को दिखाता है.

पिछले महीने ही विदेश सचिव विक्रम मिसरी को मई की शुरुआत में काठमांडू जाना था. वहां उन्हें प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की भारत यात्रा को लेकर चर्चा करनी थी, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर प्रस्तावित थी, लेकिन खबरों के मुताबिक यह यात्रा टाल दी गई क्योंकि बालेंद्र शाह ने प्रोटोकॉल संबंधी मुद्दों का हवाला देते हुए मुलाकात से इनकार कर दिया था.

अब तक भारत नेपाल की नई सरकार के साथ सक्रिय रूप से संवाद कर रहा था. इसकी मुख्य वजह यह थी कि नेपाल में नया नेतृत्व सत्ता में आया है, जिसने उन पारंपरिक पुराने नेताओं को पीछे छोड़ दिया है जिनके भारत के साथ ज्यादा करीबी संबंध थे.

इस बीच नेपाल के नए विदेश मंत्री शिशिर खनाल और एस. जयशंकर की मॉरीशस में आयोजित 9वें इंडियन ओशन कॉन्फ्रेंस के दौरान हुई मुलाकात भी काफी चर्चा में रही थी. नेपाल मामलों पर नज़र रखने वाले कई लोगों के लिए यह नई बालेंद्र शाह सरकार बनने के बाद दोनों देशों के बीच सबसे सकारात्मक और सार्वजनिक बातचीत मानी गई.

हालांकि, भारत के विदेश सचिव की नेपाल यात्रा टलने से दोनों देशों के रिश्तों में ठंडापन दिखाई दिया. इसकी वजह यह थी कि प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की सरकार ने कैलाश मानसरोवर यात्रा दोबारा शुरू किए जाने पर गंभीर आपत्ति जताई थी. यह हिंदुओं की एक महत्वपूर्ण तीर्थयात्रा है, जो चीन के तिब्बत स्थित कैलाश पर्वत तक जाती है और लिपुलेख मार्ग से संचालित होती है. नेपाल अब भी एकतरफा रूप से लिपुलेख क्षेत्र पर अपना दावा करता है.

ऐसे समय में, जब बालेंद्र शाह की भारत यात्रा अभी भी अनिश्चित बनी हुई है, रबि लामिछाने की यह हाई-प्रोफाइल भारत यात्रा आखिर क्या संकेत देती है?

काठमांडू चाहता है कि उसे गंभीरता से लिया जाए

एक भारतीय अखबार में लिखे अपने संपादकीय में रबि लामिछाने ने विस्तार से बताया है कि नेपाल की नई सरकार भारत के साथ किस तरह संबंध आगे बढ़ाना चाहती है. यह सोच भारत समर्थक या भारत विरोधी होने से कम जुड़ी है—कुछ ऐसा जिसे पारंपरिक राजनीतिक दल कभी पीछे नहीं छोड़ पाए और भविष्य की विकास आधारित साझेदारी पर ज्यादा केंद्रित है.

उनका सुझाव है कि सिर्फ सीमाओं को नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्थाओं को भी जोड़ा जाए. नेपाल चाहता है कि उसे भारत की आर्थिक विकास यात्रा का लाभ मिले. वह यह भी चाहता है कि भारत आईआईटी और एम्स जैसे संस्थानों के निर्माण की अपनी कहानियां और अनुभव साझा करे, जो युवाओं के बेहतर भविष्य की कुंजी बन सकते हैं.

लामिछाने का मानना है कि दोनों देशों के रिश्तों में विकास आधारित कूटनीति (डेवलपमेंट डिप्लोमेसी) सबसे महत्वपूर्ण आधार बननी चाहिए. उनका कहना है कि जलविद्युत जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई ऊंचाइयों तक ले जाना चाहिए और इसे राजनीतिक मतभेदों का बंधक नहीं बनाना चाहिए.

पिछले 17 वर्षों में नेपाल के पारंपरिक राजनीतिक दल अक्सर चीन का कार्ड खेलते रहे, जिससे नई दिल्ली कई बार नाराज हुई. पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, जिन्हें सितंबर 2025 में जेन ज़ी के नेतृत्व वाले आंदोलन के बाद सत्ता से हटना पड़ा था, अपनी चीन-फर्स्ट नीति को लेकर कभी नहीं झिझके.

लेकिन लामिछाने के अनुसार नेपाल की नई व्यवस्था का नेतृत्व “गैर-पक्षपाती पेशेवरों और राजनीति में नए लोगों” के हाथ में है, जिन्होंने चार साल के भीतर दो-तिहाई बहुमत हासिल किया और दुनिया के सबसे युवा प्रधानमंत्री को चुना.

लामिछाने ने लिखा, “नेपाल में क्या हो रहा है और देश किस दिशा में जा रहा है, इसे लेकर दुनिया की जिज्ञासा पूरी तरह स्वाभाविक है. 1000 मील से अधिक लंबी साझा सीमा वाले करीबी पड़ोसी होने के नाते भारत में यह जिज्ञासा और भी स्वाभाविक है.”

दिलचस्प बात यह है कि काठमांडू में बैठकर, न्यूारी समुदाय द्वारा पारंपरिक रूप से तैयार किए जाने वाले हल्के नशीले पेय ‘छ्यांग’ (Chhang) की चुस्कियां लेते हुए, स्थानीय लोगों की बातचीत में भारतीय मीडिया की कवरेज को लेकर नाराज़गी साफ सुनाई देती है. खासकर प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह और क्षेत्रीय विवाद पर उनके रुख को जिस तरह दिखाया गया है, उससे लोग असहमत नज़र आते हैं.

भारतीय न्यूज़रूम में बैठे तथाकथित “नेपाल विशेषज्ञों” का शायद यह मानना है कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच किसी तरह का “युद्ध जैसा माहौल” है और नई दिल्ली को सख्त रुख अपनाने की ज़रूरत है, लेकिन नेपाल की नई सरकार भारत से जिस चीज़ की उम्मीद करती है, वह है नज़रिए में बदलाव और रिश्तों के प्रति अधिक ईमानदार दृष्टिकोण.

असल में, दोनों देशों की सरकारें जानती हैं कि मतभेद कोई संघर्ष नहीं हैं और उनका समाधान निकाला जा सकता है.

भारत को लेकर दो-स्तरीय नीति

सोशल मीडिया पोस्टों में रबि लामिछाने अपने वरिष्ठ पार्टी सहयोगी और प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की तुलना में ज्यादा खुलकर संवाद करते दिखाई दिए हैं. वहीं बालेंद्र शाह, ऐतिहासिक जीत के बाद सत्ता संभालने के बाद से काफी सोच-समझकर, सख्त और संतुलित तरीके से अपनी बात रखते रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक्स पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए रबि ने लिखा, “मैं उस भविष्य के आपके दृष्टिकोण से सहमत हूं, जहां नेपाल और भारत पुरानी सीमाओं से आगे बढ़कर विकास आधारित कूटनीति के एक नए दौर को अपनाएं.”

उन्होंने आगे लिखा, “साझा सभ्यतागत रिश्तों, डिजिटल कॉरिडोर और निर्बाध संपर्क पर ध्यान देकर हम वास्तव में ऐसी साझेदारी बना सकते हैं, जिसकी पहचान प्रगति और आपसी विश्वास हो. आरएसपी इन संभावनाओं को नेपाल और भारत के लोगों की साझा समृद्धि के लिए हकीकत में बदलने की उम्मीद करता है.”

जहां बालेंद्र शाह अपनी सरकार के लिए अपेक्षाकृत सख्त रुख पेश करते हैं, वहीं उनकी पार्टी का नेतृत्व भारत के प्रति अधिक गर्मजोशी और स्वागत वाला रवैया अपना रहा है.

दिल्ली, या कहें कि नेपाल पर नज़र रखने वालों को यह समझना होगा कि नेपाल में भारत के प्रति कोई दुश्मनी नहीं है और टीवी स्टूडियो या मीडिया ग्राफिक्स में दिखाई जाने वाली तस्वीर वास्तविकता को सही तरीके से नहीं दिखाती.

दिल्ली के लोगों के लिए एक मित्रतापूर्ण सलाह के तौर पर, काठमांडू की गलियों में आरएसपी के समर्थक कहते हैं, “कृपया किसी संप्रभु देश के घरेलू, विदेश और सुरक्षा मामलों को इस तरह पेश न करें जैसे वे सब भारत के खिलाफ बनाए गए हों. वे उस देश और उसके लोगों से जुड़े स्वतंत्र मामले हैं.”

साथ ही, दिल्ली को यह भी समझना होगा कि एक पार्टी के रूप में आरएसपी और बालेंद्र शाह के नेतृत्व वाली सरकार पहले की सरकारों की तुलना में अधिक संगठित और स्थिर है, क्योंकि उसे गठबंधन की मजबूरियों का सामना नहीं करना पड़ता.

इस सरकार के पास युवा ऊर्जा है और यह समझने की सक्रिय इच्छा भी है कि नेपाल क्या चाहता है. हाल ही में नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले ने अपना पहला वार्षिक बजट पेश किया, जिसकी जनता और नेताओं दोनों ने सराहना की.

पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई ने प्रशंसा करते हुए लिखा, “गांव के आंगन में बैठकर विद्वान वित्त मंत्री का बजट भाषण सुनना काफी रोमांचक लगता है. उनके शब्द और प्रस्तुति बेहद ताज़ा और आकर्षक हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “नीतिगत रूप से यह बजट खास तौर पर तकनीक-समझ रखने वाली नई पीढ़ी, निजी क्षेत्र, विदेशों में रहने वाले नेपाली लोगों, कर्मचारियों और अन्य वर्गों को आकर्षित करने के लिए तैयार किया गया है.”

नई सरकार को अब तक सराहना मिली है और उसने प्रशासनिक ढांचे में सुधार पर जोर दिया है, लेकिन उसकी “भारत नीति” दो-स्तरीय है. पहली परत में बालेंद्र शाह का संरक्षणवादी रुख है, जबकि दूसरी परत में उनकी पार्टी दिल्ली के साथ संवाद करती है और यह संदेश देती है कि “राम की कहानी तभी पूरी होती है जब जनकपुर और अयोध्या जुड़े हों.”

आगे का रास्ता

रबि लामिछाने की भारत यात्रा और भारत के साथ संबंधों को लेकर उनके दृष्टिकोण से यह स्पष्ट होता है कि उनका जोर विकास आधारित सहयोग को प्राथमिकता देने पर है. उनका मानना है कि विभिन्न परियोजनाओं और पहलों को द्विपक्षीय मतभेदों का बंधक बनने के बजाय तेज़ी से आगे बढ़ना चाहिए.

भविष्य की भारत-नेपाल साझेदारी में तकनीकी, चिकित्सा और शैक्षणिक आदान-प्रदान को सबसे अधिक महत्व दिया गया है. अब नई दिल्ली को ज़रूरत है कि वह नेपाल को विकास और प्रगति की यात्रा में साथ लेकर चले और दोनों देशों के रिश्तों को ऐसे नज़रिए से देखे जो भविष्य उन्मुख हो और दोनों पक्षों के लिए लाभकारी साबित हो.

ऋषि गुप्ता ग्लोबल स्ट्रैटेजिक अफेयर्स के एक्सपर्ट हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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