नई दिल्ली: जुलाई के आखिर में कुछ दिनों तक एक तस्वीर हर जगह छाई रही. बारिश में भीगी हुई हुडी पहने एक युवती, पुलिस वैन के सामने अकेली खड़ी थीं और हटने से इनकार कर रही थीं. बस के अंदर हिरासत में लिए गए छात्र थे. बाहर, दुनिया यह तय करने वाली थी कि उनका शरीर, उनके कपड़े और उनके बोलने का अंदाज़ उन महिलाओं के बारे में क्या कहता है जो उस आंदोलन का हिस्सा थीं और जिसका वह चेहरा बन चुकी थीं.
उनका नाम रिया अहीर जिन्हें रिया यादव के नाम से भी जाना जाता है, वे मुंबई की 27-वर्षीय मॉडल और एक्ट्रेस हैं. अपनी तस्वीर वायरल होने के बाद, वह छात्रों के उस विरोध-प्रदर्शन का सबसे पहचाना जाने वाला चेहरा बन गई, जिसे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ ने संगठित किया था. यह विरोध नीट पेपर लीक विवाद के बाद भारत के शहरों में फैल गया था. साथ ही, वह 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुई पुलिस की उस कार्रवाई का भी चेहरा बनीं, जिसे बहुत बेरहम बताया गया था.
वह उन कई महिलाओं छात्राओं, वकीलों, गृहिणियों, पेशेवरों में से एक है जो उन भीड़ का हिस्सा बनीं. किशोर लड़कियां पेपर लीक के विरोध में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के लिए अपने घरों से भागकर आई थीं और सड़कों पर सो रही थीं. उनकी कहानियों का सफर एक जैसा ही रहा: उस पल में हिम्मत और उसके बाद कुछ बहुत ही बुरा अनुभव.
विरोध प्रदर्शन खत्म होने के तीन दिन बाद, ये महिलाएं निशाने पर आ गईं. सोशल मीडिया पर उन युवा महिलाओं की क्रॉप की हुई और कुछ मामलों में एआई से बनाई गईं तस्वीरें फैलने लगीं, जो सीजेपी विरोध प्रदर्शन में शामिल हुई थीं. कई तस्वीरों के साथ उन्हें पहचानने और उनकी रिपोर्ट करने की अपील की गई थी — एक पोस्ट में फॉलोअर्स से पुलिस की मदद करने और उस महिला को “सबक सिखाने” के लिए कहा गया था.

हिम्मत का एक पल
रिया अहीर को बस के पास बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए था. वह 22 जुलाई को विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए शिवाजी पार्क गई थीं. शुरू में, वह दूर से ही छात्रों पर हो रही कार्रवाई को देख रही थीं. विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से पहले, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, संयुक्त राष्ट्र कार्यालय और ऐसी हर जगह ईमेल भेजे थे, जहां से वे दूर बैठे हुए कुछ कर सकती थीं. उन्होंने बताया कि शिवाजी पार्क पहुंचने से एक दिन पहले, उन्होंने हिरासत में लिए गए छात्रों से भरी एक खड़ी वैन की सुरक्षा कर रहे पुलिस अधिकारियों का सामना किया था. उनमें से कुछ नाबालिग थे, और अहीर तब तक वहां डटी रहीं जब तक कि अंदर मौजूद लोगों को रिहा नहीं कर दिया गया.

22 जुलाई को, वह “इंकलाब जिंदाबाद” और “भारत माता की जय” के नारे लगा रही भीड़ के बीच गईं. वहीं पास में हिरासत में लिए गए छात्रों से भरी एक पुलिस बस खड़ी थी. अहीर ने दो अधिकारियों से पूछा कि क्या उनके पास छात्रों को हिरासत में रखने का कोई औपचारिक आदेश है. उन्होंने बताया कि उनमें से किसी ने भी उनकी आंखों में नहीं देखा.
उन्होंने कहा, “मुझे तुरंत एक फैसला लेना था. क्या मुझे बस इसे नज़रअंदाज़ कर देना चाहिए…बस चलने लगी, तो मुझे लगा कि मुझे इसके बारे में कुछ करना होगा; वरना बस चली जाएगी और एक नागरिक के तौर पर मैं खुद को नाकाम मानूंगी और ज़िंदगी भर इस बात का पछतावा रहेगा कि मैंने ऐसा होने दिया.”
वह बस के सामने आ खड़ी हुईं.
उस पल उन्होंने कहा, “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आगे क्या होता है. अगर वे मुझे कुचल देते हैं, तो भी मुझे मंज़ूर है. इसका मतलब होगा कि ज़िंदगी में मेरा यही मकसद था.”
चरित्र हनन
अहिर ने बताया कि तस्वीर के वायरल होने के बाद जो हुआ, वह सिर्फ आलोचना नहीं थी, उनके मुताबिक, यह एक प्लान्ड कैंपेन था. उन्होंने कहा कि उनकी मनगढ़ंत और मॉर्फ की हुई तस्वीरें ऑनलाइन फैलाई गईं, साथ ही यह झूठा दावा भी किया गया कि वह अश्लील कंटेंट बेचती हैं. कमेंट्स में उनकी मां पर भी हमले किए गए.
अहिर ने उत्पीड़न और मानहानि का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है. उन्होंने कहा कि वह महाराष्ट्र साइबर पुलिस के साथ भी इस मामले को आगे बढ़ा रही हैं. मुंबई के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस, दत्ता नलावडे ने पुष्टि की है कि उन्हें शिकायत मिली है और उसे जांच-पड़ताल के लिए अंधेरी ईस्ट के MIDC पुलिस स्टेशन भेज दिया गया है.
उन्होंने आरोप लगाया कि हैदराबाद में सत्ताधारी पार्टी के एक पदाधिकारी ने फेसबुक पर एक पोस्ट किया जिसमें उनकी तुलना एक ओलंपिक सिल्वर मेडलिस्ट से करते हुए उन्हें कमतर दिखाया गया. उस पोस्ट में उनके लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया और उनके इंस्टाग्राम प्रोफाइल की जानकारी भी शामिल थी. अहिर कानूनी कार्रवाई करने पर भी विचार कर रही हैं.
उन्होंने कहा, “मुझे समझ नहीं आता कि ये महिलाएं दूसरी महिलाओं के बारे में ऐसी बातें कैसे कह सकती हैं — आप दूसरी महिलाओं के बारे में इस तरह बात कर सकती हैं, आप उन्हें सिर्फ इसलिए नीचा दिखा रही हैं क्योंकि आपके हाथ में पार्टी का कार्ड है.”
उन्होंने उस व्यापक पैटर्न के बारे में भी खुलकर बात की जिसे वह देख रही थीं: जिस ध्यान ने कभी विरोध प्रदर्शन की तस्वीरों की तारीफ की थी, वही कुछ ही दिनों में महिलाओं की खुद की जांच-पड़ताल में बदल गया, उनके पेशे, उनके कपड़ों और उनके अतीत पर सवाल उठाए जाने लगे.
उन्होंने कहा, “आप मुझसे कह रही हैं कि मैं विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लायक नहीं हूं क्योंकि मैं बीच पर बिकिनी पहनती हूं. यह बहुत बुरा है.”
उन्होंने दूसरी जानी-मानी महिलाओं की सार्वजनिक टिप्पणियों की ओर भी इशारा किया, जिसमें एक्टर से नेता बनीं कंगना रनौत की टिप्पणियां भी शामिल थीं. इंस्टाग्राम स्टोरीज़ और वीडियो में, रनौत ने ‘जेन ज़ी’ (Gen Z) महिलाओं को “गटर छाप” कहकर शर्मिंदा किया और उनके घर-गृहस्थी संभालने की काबिलियत पर सवाल उठाए. यह साफ था कि महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हो रहा विरोध सिर्फ गुमनाम ट्रोल तक सीमित नहीं था.
उन्होंने कहा, “यह देखना बहुत दुखद है कि ये हमारी प्रतिनिधि हैं.”
विरोध प्रदर्शन खत्म होने के बाद भी महिलाएं ही हमलों का केंद्र क्यों बनीं? अहिर के पास इसका सीधा-सा जवाब है. “जब उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं होता, जब वे आपकी दलील का जवाब नहीं दे पाते, तो वे आपके चरित्र पर हमला करते हैं…वे हमें इसी बात से भटकाने की कोशिश कर रहे हैं.”
पितृसत्ता एक बेहतरीन हथियार है
हज़ार किलोमीटर से ज़्यादा दूर, कोलकाता में, लॉ की फाइनल ईयर की स्टूडेंट सुतिथी ने इसी कहानी का एक दूसरा रूप देखा. सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर पर चल रहे विरोध प्रदर्शन से ‘ज़बरदस्ती’ हटाए जाने के बाद और भी लोग वहां पहुंचना चाहते थे. इसके बाद 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुई कार्रवाई के बाद जाधवपुर यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स ने एक छोटा और “काफी अव्यवस्थित” प्रदर्शन किया और आखिरकार 24 जुलाई को सियालदह से धर्मतला तक एक बड़ी रैली निकाली गई.
सुतिथी, जो साथी प्रदर्शनकारियों का इंटरव्यू लेने वाले एक स्टूडेंट इनिशिएटिव को चलाने में मदद कर रही थीं, उन्होंने बताया कि बड़ी संख्या में और हर उम्र की महिलाएं इसमें शामिल हुईं. रैली के पूरे रास्ते पर 60 साल से ज़्यादा उम्र की महिलाएं भी चलीं. कोलकाता में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की पुरानी परंपरा रही है, लेकिन सुतिथी ने गौर किया कि इस पीढ़ी ने कुछ नया भी जोड़ा: लॉ, सोशियोलॉजी और पॉलिटिकल साइंस बैकग्राउंड की युवा महिलाएं, जो न सिर्फ भीड़ बढ़ा रही थीं बल्कि विरोध प्रदर्शन के तर्कों को भी आकार दे रही थीं.
विरोध प्रदर्शन के बाद महिलाओं की भूमिका पर उनके विचार अहीर की बातों से मिलते-जुलते हैं.
उन्होंने कहा, “महिलाओं पर हमला करने के लिए पितृसत्ता एक बेहतरीन हथियार बन जाती है, क्योंकि अगर आप असल मुद्दे पर हमला नहीं कर सकते, तो आप उनके चरित्र पर हमला करते हैं. आप उन्हें परेशान करते हैं और उनके चरित्र को बदनाम करते हैं. आप उनके पहनावे पर सवाल उठाते हैं, आप उनकी भाषा पर सवाल उठाते हैं.”
उन्होंने कहा कि जब किसी आंदोलन की मुख्य शिकायत के ख़िलाफ़ तर्क देना मुश्किल होता है, “तो आप छोटी-छोटी बातों में उलझ जाते हैं… क्योंकि जवाबदेही से बचने के लिए यही आपका सबसे बड़ा बचाव बन जाता है.”
महिलाओं की आवाज साफ और ज़ोरदार है
करिश्मा कोडाजी, जो 18 जुलाई से शुरू हुए मुंबई के विरोध प्रदर्शनों में तीन अलग-अलग दिनों में शामिल हुईं, अकेले ही गई थीं. उन्होंने कहा कि उन्हें कभी ऐसा नहीं लगा कि महिला होने के कारण उनकी सुरक्षा खतरे में है. असली खतरा पुलिस की बर्बरता से था, न कि भीड़-भाड़ वाली जगह पर महिला होने से.
शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के लिए महिलाओं को ऑनलाइन निशाना बनाने और उन पर हमले करने की घटनाओं से कोडाजी को कोई हैरानी नहीं हुई.
उन्होंने कहा, “भारत में ज़िंदगी ऐसी ही है.”
उन्हें हैरानी इस बात से हुई कि कई महिला प्रदर्शनकारियों ने खुद इस पर कैसी प्रतिक्रिया दी: उन्होंने मज़ाक-मज़ाक में जवाब दिया और घबराने से इनकार कर दिया.
उन्होंने कहा, “इसका महिलाओं पर उतना असर नहीं पड़ रहा है, क्योंकि वे इस बारे में बहुत हल्के-फुल्के अंदाज़ में बात कर रही हैं, लेकिन फिर भी वे अपना संदेश पहुंचाना चाहती हैं और वे चाहती हैं कि यह संदेश साफ और ज़ोरदार हो.”
कोडाजी ने एक ऐसी बात बताई जो टकराव की आम धारणा से अलग थी: उन्होंने कहा कि कई महिला पुलिस अधिकारियों ने विरोध प्रदर्शन करने के लिए उन्हें और उनके दोस्तों को चुपके से धन्यवाद दिया, क्योंकि वे खुद ऐसा नहीं कर सकती थीं.
निगरानी में
देश भर में विरोध प्रदर्शनों में शामिल महिलाएं इस बात पर सोच रही थीं कि उन पर कौन और क्यों नज़र रख रहा है.
‘फेमिनिज़्म इन इंडिया’ की जंतर-मंतर से की गई रिपोर्ट में जेएनयू की एक छात्रा, अमीषा का ज़िक्र है, जिन्होंने 20 जुलाई के विरोध प्रदर्शन के शुरुआती कुछ घंटे फोन कैमरों से बचने की कोशिश में बिताए. उन्हें चिंता थी कि कहीं उनका राजनीतिक रूप से रूढ़िवादी परिवार उन्हें ऑनलाइन न देख ले. आईआईटी दिल्ली की एक ग्रेजुएट ने भी कहा कि कैमरों की लगातार मौजूदगी की वजह से विरोध प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो रहा था. उसी रिपोर्ट में, आईआईटी मद्रास की एक छात्रा को चिंता थी कि उस फुटेज का इस्तेमाल कभी उनके खिलाफ किया जा सकता है. उन्होंने देखा कि कुछ पुलिस अधिकारी चेहरे की पहचान करने की क्षमता वाले कैमरे लगे स्मार्ट चश्मे पहने हुए थे.
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी छात्र संघ की पूर्व अध्यक्ष आइशी घोष ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि पुलिस ने जंतर-मंतर विरोध स्थल पर एक स्थायी निगरानी टावर लगाया और प्रदर्शनकारियों की लगातार फिल्मिंग की. याचिका में दावा किया गया है कि बारिश के दौरान गीले कपड़ों में महिलाओं की फुटेज ली जा रही थी. यह उनकी शारीरिक निजता का उल्लंघन था. याचिका में यह भी दावा किया गया है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिस्सा लेने से रोकने के लिए उनकी तस्वीरें उनके माता-पिता और कॉलेजों को भेजने की धमकी दी. आउटलुक इंडिया ने 23 जुलाई को रिपोर्ट दी कि दिल्ली पुलिस ने एआई-इनेबल्ड सर्विलांस गाड़ियां तैनात कीं, जिनमें चेहरे की पहचान करने वाली क्षमता वाली वैन भी शामिल थी. अधिकारियों का दावा था कि इसका मकसद उन लोगों की पहचान करना था जो पहले से ही क्रिमिनल डेटाबेस में चिह्नित हैं. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाई कोर्ट को बताया कि यह फिल्मांकन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए था, न कि निगरानी के लिए.
महिलाओं के लिए, इस पूरी प्रक्रिया की कानूनी वैधता मायने नहीं रखती थी. उनकी फौरन चिंता यह थी कि फुटेज का क्या होगा और आखिरकार इसे कौन देखेगा.
डॉक्सर और उनका टूलकिट
दक्षिणपंथी झुकाव वाले एक प्रमुख अकाउंट, ‘द जयपुर डायलॉग्स’ (जिसके लगभग 7,000 फॉलोअर्स हैं), ने पीएम मोदी के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने के लिए महिला प्रदर्शनकारियों की आलोचना की. महिलाओं के खिलाफ सभी पोस्ट इस तरह से तैयार किए जाते हैं ताकि इन महिलाओं को भारतीय ‘संस्कारी’ मूल्यों का सम्मान न करने वाली के तौर पर दिखाया जा सके. एक और बड़े अकाउंट, @Being_Humor (जिसके कई लाख फॉलोअर्स हैं), ने महिला प्रदर्शनकारियों को ही विरोध प्रदर्शन के दौरान इस्तेमाल की गई सबसे भद्दी भाषा के लिए जिम्मेदार ठहराया. दिल्ली से लेकर मुंबई तक, सभी लिंग और उम्र के लोगों ने एक जैसे नारे लगाए थे.
ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद ज़ुबैर ने दिप्रिंट को बताया कि यह एक जाना-पहचाना नैरेटिव है. उन्होंने कहा कि शाहीन बाग और किसान आंदोलन के बाद भी यही तरीके अपनाए गए थे. प्रदर्शनकारियों को बदनाम करने के मकसद से मॉर्फ्ड तस्वीरें, गुमराह करने वाले वीडियो और व्यक्तिगत हमले किए गए. महिलाओं के चरित्र पर सवाल उठाए गए.
दिल्ली पुलिस ने वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं के खिलाफ अभद्र भाषा वाले सोशल मीडिया पोस्ट हटाने के लिए अलग से नोटिस जारी किए हैं. महिला प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाने का सिलसिला काफी हद तक बिना किसी रोक-टोक के जारी है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: Gen Z का वोट भारत के चुनावी भविष्य पर असर डाल सकता है, तमिलनाडु को ही देख लीजिए