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Tuesday, 7 July, 2026
होमफीचरASI ने आंध्र और तेलंगाना में दो साइट्स को सेंट्रली प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट्स घोषित किया

ASI ने आंध्र और तेलंगाना में दो साइट्स को सेंट्रली प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट्स घोषित किया

तेलंगाना के मुलुगु जिले में 13वीं सदी का यह शिव मंदिर 0.275 एकड़ में फैला है. इसका निर्माण काकतीय काल में हुआ था और फिलहाल यह जर्जर हालत में है.

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नई दिल्ली: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने मंगलवार को दो स्थलों—तेलंगाना के एक शिव मंदिर और आंध्र प्रदेश के एक प्राचीन टीले को केंद्रीय संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया.

एएसआई ने पहले इन दोनों स्थलों के लिए प्रारंभिक नोटिफिकेशन जारी की थी. इसके बाद दो महीने तक आपत्तियां मांगी गईं. तय समय पूरा होने के बाद इन दोनों स्थलों को केंद्रीय संरक्षित स्मारकों की सूची में शामिल कर लिया गया.

2 जुलाई की राजपत्र (गजट) अधिसूचना, जिसे दिप्रिंट ने देखा, में कहा गया है, “नोटिफिकेशन जारी होने की तारीख से दो महीने की तय अवधि के भीतर मिली आपत्तियों पर विचार करने के बाद केंद्र सरकार को ऐसा कोई पर्याप्त कारण नहीं मिला, जिसके आधार पर प्रस्तावित घोषणा को रोका जाए या उसमें बदलाव किया जाए.”

तेलंगाना के मुलुगु जिले में स्थित 13वीं सदी का यह शिव मंदिर 0.275 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है. फिलहाल यह मंदिर जर्जर हालत में है. ज़मीन एएसआई के पास थी, लेकिन अब तक यह स्थल उसकी संरक्षित स्मारकों की सूची में शामिल नहीं था.

इस मंदिर का निर्माण काकतीय राजवंश के दौरान शासकों रुद्रदेव और रेचारला देव के शासनकाल में हुआ था. साइट प्लान के अनुसार शिव मंदिर के पास एक नहर भी है.

दूसरा स्थल आंध्र प्रदेश के तिरुपति जिले में स्थित एक प्राचीन टीला है. यह कोटाडीब्बा गांव में मिला खुदाई वाला पुरातात्विक स्थल है, जो 24.22 एकड़ में फैला हुआ है.

करीब 2,000 साल पुराने इस स्थल को कभी दक्षिण भारत का एक किलेबंद व्यापारिक केंद्र माना जाता था. यह सातवाहन साम्राज्य के शासनकाल में काफी समृद्ध था.

यहां हुई खुदाई में 130 मीटर लंबी अंडाकार ईंटों की किलेबंदी, प्राचीन जल प्रबंधन प्रणाली और अच्छी तरह से योजनाबद्ध नगर बसावट के अवशेष मिले हैं.

यह पुरातात्विक टीला कोटाडीब्बा के नाम से जाना जाता है और स्वर्णमुखी नदी की एक शाखा के दाहिने किनारे पर स्थित है.

के. पी. राव, जो हैदराबाद विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर हैं, ने 2019 में कहा था, “करीब 6 फीट चौड़ी ईंटों की दीवारें, संरचनाएं और सुरक्षा व्यवस्था वाले इस स्थल से आंध्र क्षेत्र के इतिहास के बारे में नई जानकारी मिल रही है. दक्षिण भारत में पहले जिन स्थलों की खुदाई हुई थी, वहां इस तरह की संरचनाओं के सबूत नहीं मिले थे. इसलिए यह खोज बेहद दिलचस्प है.”

संरक्षित स्मारक कैसे घोषित किया जाता है?

तेलंगाना के स्मारक एएसआई के हैदराबाद सर्कल के तहत आते हैं. यहां फिलहाल आठ केंद्रीय संरक्षित स्मारक हैं. वहीं आंध्र प्रदेश अमरावती सर्कल के अंतर्गत आता है, जहां 135 केंद्रीय संरक्षित स्मारक हैं.

किसी भी स्थल को संरक्षित स्मारकों की सूची में शामिल करना आसान नहीं होता. ASI के विस्तृत नियमों के कारण पिछले 10 वर्षों में बहुत कम स्मारकों को इस सूची में जोड़ा गया है.

किसी भी स्थल को एएसआई की संरक्षित सूची में शामिल करने की प्रक्रिया पांच चरणों में पूरी होती है—आकलन और प्रस्ताव, प्रारंभिक अधिसूचना, जनता से आपत्तियां, मूल्यांकन और समीक्षा, तथा अंतिम अधिसूचना जारी करना.

जून में एएसआई ने रनिवास टीला को राष्ट्रीय महत्व का स्थल घोषित करने के लिए प्रारंभिक अधिसूचना जारी की थी. यह स्थल चंपारण जिले में दुनिया के सबसे बड़े बौद्ध स्तूप के पास स्थित है.

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने अपनी 2013 और 2022 की रिपोर्ट में कहा था कि राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों की पहचान के लिए एएसआई ने कोई व्यापक सर्वेक्षण नहीं किया है.

साल 2024 में एएसआई ने 18 केंद्रीय संरक्षित स्मारकों को अपनी राष्ट्रीय सूची से हटा दिया था. पिछले दो साल में एएसआई अपने अधिकार क्षेत्र में अधिक से अधिक पुरातात्विक स्थलों को शामिल करने पर ध्यान दे रहा है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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