scorecardresearch
Friday, 28 August, 2026
होमThe FinePrintIIT के कोर्स से प्रॉम्प्ट वर्कशॉप और रिसर्च ट्रेनिंग तक: कैसे भारत में AI सीखने का बढ़ा क्रेज

IIT के कोर्स से प्रॉम्प्ट वर्कशॉप और रिसर्च ट्रेनिंग तक: कैसे भारत में AI सीखने का बढ़ा क्रेज

AI स्किल-बिल्डिंग के लिए बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है – इसमें हायर एजुकेशन से लेकर प्रोफ़ेशनल्स के लिए कोर्स तक शामिल हैं. 'लोगों को AI FOMO (कुछ छूट जाने का डर) होता है.'

Text Size:

नई दिल्ली: नोटपैड और अग्नि जेल पेन लेकर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के करीब 40 वकील रविवार सुबह आईआईटी दिल्ली के रिसर्च एंड इनोवेशन पार्क में जुटे. यहां पूरे दिन चलने वाली एक वर्कशॉप रखी गई थी, जिसका मकसद उन्हें एक नई दुनिया के लिए तैयार करना था — वकीलों के लिए एआई.

स्क्रीन पर एक पावरपॉइंट स्लाइड थी: “एक बेहतरीन प्रॉम्प्ट का ढांचा.” अदालत के फैसलों को पढ़ते हुए अपना करियर बिताने वाले इन वकीलों के लिए यह एक जरूरी बदलाव था. यह उनके लिए एक जरूरी नई स्किल सीखने का मौका था.

क्लासरूम में ज्यादातर पुरुष थे और कुछ लोगों के वाई-फाई से कनेक्ट न हो पाने से उनकी उम्र का अंदाजा लग रहा था. एआई की लहर ने वरिष्ठ वकीलों को भी छात्र बना दिया था. कुछ लोग अपना काम ज्यादा तेजी से और बेहतर तरीके से करने का तरीका खोज रहे थे, जबकि कुछ एआई का इस्तेमाल न्याय व्यवस्था का खुद विश्लेषण करने के लिए करना चाहते थे.

“हर फैसला एक डेटा है और हमारे पास 70 साल का वह डेटा है. इसका इस्तेमाल करके हम यह पता लगा सकते हैं कि कोई जज फैसले लेते समय किस तरह का पैटर्न अपनाता है. फिर जब वह पैटर्न अचानक बदलता है, तो हमें पता चल जाएगा कि क्या किसी तरह का हस्तक्षेप हुआ है,” 68 साल के सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रमथ नाथ मिश्रा ने कहा. उन्होंने करीब आधी सदी इन काले कपड़ों में बिताई है.

कुछ ही गलियों की दूरी पर आईआईटी दिल्ली के छात्र भी अपने लैपटॉप पर ChatGPT और Claude खोले हुए थे. और वे सिर्फ कंप्यूटर साइंस के छात्र नहीं थे. बायोलॉजी, केमिस्ट्री, मैनेजमेंट और सोशल साइंस के छात्र भी एआई का इस्तेमाल कर रहे थे. ह्यूमैनिटीज के लिए भी यह अलग नहीं है.

एआई को शॉर्टकट और नकल करने के साधन के तौर पर देखे जाने के दौर से आगे अब उच्च शिक्षा में एआई एक नए दौर में पहुंच गया है. अब यह अलग-अलग क्षेत्रों में खुद एक विशेषज्ञता का विषय बन गया है. इसे प्रोफेशनल्स के लिए होने वाली वर्कशॉप से लेकर यूनिवर्सिटी के सेमिनार तक हर जगह सिखाया जा रहा है.

आईआईटी दिल्ली के यार्डी स्कूल ऑफ एआई में एक टॉक में बताया गया कि एआई वैज्ञानिक रिसर्च में कैसे मदद कर सकता है, रिसर्च पेपर खोजने से लेकर नई खोज करने तक | फोटो: यार्डी ScAI वेबसाइट

आईआईटी मद्रास और आईआईटी कानपुर में शिक्षक छात्रों को बता रहे हैं कि एआई सिर्फ ChatGPT तक सीमित नहीं है. वे एआई पर केंद्रित नए कोर्स शुरू कर रहे हैं और पढ़ाई व रिसर्च में इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं. BITS पिलानी अब सभी विषयों के पहले साल के छात्रों को एआई के कोर्स ऑफर करता है. IISER पुणे में एआई को लेकर कोई एक जैसी नीति नहीं है, लेकिन एक प्रोफेसर ने युवा रिसर्चर्स को रिसर्च में एआई का इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग शुरू कर दी है.

“बड़ा लक्ष्य हर छात्र को एआई एक्सपर्ट बनाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हर ग्रेजुएट एआई को समझने और इस्तेमाल करने की क्षमता रखता हो. यहां तक कि सिविल इंजीनियर भी इसका इस्तेमाल इंफ्रास्ट्रक्चर की प्लानिंग में कर सकते हैं और ह्यूमैनिटीज के छात्र बड़े टेक्स्ट कलेक्शन का विश्लेषण कर सकते हैं,” आईआईटी दिल्ली के डायरेक्टर रंगन बनर्जी ने कहा.

उच्च शिक्षा में एआई को कैसे अपनाया जाना चाहिए, इसे लेकर अभी कोई राष्ट्रीय स्तर की योजना नहीं है. लेकिन कई संस्थानों में अब एआई को सिर्फ मशीन लर्निंग या कंप्यूटर साइंस के छात्रों तक सीमित नहीं माना जा रहा है. अलग-अलग विषयों के छात्रों और मिड-करियर प्रोफेशनल्स में एआई की बदलती ताकत के साथ खुद को अपडेट करने की एक साफ चिंता दिखाई दे रही है. वे इस दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहते.

एआई की शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ लोगों को प्रॉम्प्ट टाइप करना सिखाना नहीं होना चाहिए. लक्ष्य यह होना चाहिए कि लोगों को बेहतर सवाल पूछना, मिलने वाले जवाबों की जांच करना, गलतियों को पहचानना और एआई का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना सिखाया जाए. यहीं अकादमिक संस्थानों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है.

— सुतिर्थ डे, कंप्यूटेशनल बायोलॉजिस्ट, IISER पुणे

“लोगों को AI FOMO हो जाता है. वे इंस्टाग्राम पर लोगों को एआई की मदद से शानदार काम करते देखते हैं और उन्हें लगता है कि वे कुछ नहीं कर रहे. उनके लिए ऐसा है जैसे कोई पहाड़ चढ़ चुका है और उन्हें लगता है कि वे अभी पहाड़ के नीचे खड़े हैं,” आयलेंस के संस्थापक हेमंत बिंदल ने कहा. उनकी कंपनी वकीलों, डॉक्टरों, HR अधिकारियों और दूसरे प्रोफेशनल्स के लिए एआई वर्कशॉप आयोजित करती है.

अब एआई स्किल सीखने का बाजार तेजी से बढ़ रहा है. आईआईटी दिल्ली में कामकाजी प्रोफेशनल्स के लिए प्रोफेशनल्स के लिए कंटिन्यूइंग एजुकेशन प्रोग्राम (CEP), जेनरेटिव एआई और एप्लाइड डेटा साइंस में सर्टिफिकेट कोर्स ऑफर करता है, जिसकी फीस 1,95,000 रुपये है. IISER पुणे रिसर्च में एआई के इस्तेमाल पर तीन दिन की वर्कशॉप चलाता है. इसकी फीस मास्टर डिग्री के छात्रों के लिए 11,000 रुपये से लेकर फैकल्टी और प्रोफेशनल्स के लिए 23,000 रुपये तक है. कई छात्र Coursera के मॉड्यूल भी लेते हैं, जिनकी कीमत करीब 2,000 रुपये है. वहीं कई छात्र YouTube पर स्टैनफोर्ड, ऑक्सफोर्ड, येल और हार्वर्ड जैसी यूनिवर्सिटीज के मुफ्त लेक्चर देखने में घंटों बिताते हैं.

ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) के पूर्व चेयरमैन अनिल सहस्रबुद्धे के मुताबिक, अलग-अलग यूनिवर्सिटी एआई को अलग-अलग तरीके से अपनाएंगी.

“हर यूनिवर्सिटी अपनी जरूरत के हिसाब से अपना पाठ्यक्रम तैयार करेगी. हर जगह एक जैसा तरीका अपनाना न तो जरूरी है और न ही इसकी सलाह दी जाती है,” उन्होंने द प्रिंट से कहा. “दो-तीन साल पहले किसी ने सोचा भी नहीं था कि एआई का इतना असर होगा. आज दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों सहित पूरी दुनिया इसके बारे में जानती है. इसलिए यह मांग और सप्लाई का सीधा मामला है. छात्रों की मांग है और यूनिवर्सिटी इसका जवाब दे रही हैं.”

IIT की क्लास में AI का इस्तेमाल कैसे हो रहा है

आईआईटी दिल्ली के डायरेक्टर रंगन बनर्जी के पीएचडी के दिनों को काफी समय हो चुका है, लेकिन अकादमिक दुनिया ने यह सुनिश्चित किया है कि वह अभी भी सीखते रहें. नई पीढ़ी को सिर्फ एआई टूल्स का इस्तेमाल करते ही नहीं, बल्कि इस ‘ब्लैक बॉक्स’ के अंदर क्या होता है, इसे समझते हुए देखना उनके लिए दो नई प्राथमिकताएं लेकर आया. एक एआई एथिक्स कमेटी बनाना और छात्रों को उपलब्ध सबसे अच्छे एआई टूल्स देना.

संस्थान का यार्डी स्कूल ऑफ एआई 2020 में शुरू हुआ था. यह मशीन इंटेलिजेंस एंड डेटा साइंस (MINDS) में प्रमुख MTech कोर्स चलाता है. यह अलग-अलग विषयों के छात्रों के लिए ‘‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सिद्धांत’ और ‘स्पेशल मशीन लर्निंग मॉड्यूल’ जैसे वैकल्पिक कोर्स भी ऑफर करता है.

“अब हम OpenAI के साथ एक समझौता करने पर विचार कर रहे हैं. हम ChatGPT, Gemini और Sarvam AI के बारे में सोच रहे हैं. हम नए और बेहतर टूल्स के लिए पैसे देंगे, ताकि हमारे छात्रों और फैकल्टी के पास इनकी सुविधा हो,” बनर्जी ने कहा.

आईआईटी दिल्ली के यार्डी स्कूल ऑफ एआई में AI for Science and Engineering वर्कशॉप का पोस्टर | विशेष व्यवस्था

लेकिन आईआईटी दिल्ली में एआई सिर्फ काम को आसान बनाने तक सीमित नहीं है. जनजातीय मामलों के मंत्रालय के साथ मिलकर चलाया जा रहा एक प्रोजेक्ट Adi Vaani नाम के एआई प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करता है. इसका मकसद संथाली, भीली और मुंडारी जैसी जनजातीय भाषाओं को सुरक्षित रखना और उन्हें बढ़ावा देना है, ताकि डिजिटल दौर में वे पीछे न रह जाएं. एक अन्य हालिया प्रोजेक्ट में अलग-अलग क्षेत्रों के छात्रों की मदद के लिए एआई का इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि अंग्रेजी की कम जानकारी पढ़ाई में रुकावट न बने.

“अगर आपको भाषा की मदद चाहिए, तो हम पहले साल के सभी कोर्स रिकॉर्ड करते हैं और एआई टूल का इस्तेमाल करके उस कोर्स को अलग-अलग भाषाओं में ट्रांसलेट करते हैं. यह ऐसा है जैसे आप अंग्रेजी सबटाइटल के साथ फ्रेंच फिल्म देख रहे हों,” बनर्जी ने कहा. “आप रजिस्टर करते हैं और फिर आज का लेक्चर कल देख सकते हैं. हमने पिछले सेमेस्टर में एक कोर्स के लिए इसे ट्रायल के तौर पर किया था. इस साल हम इसे पहले साल के सभी कोर्स के लिए कर रहे हैं.”

बनर्जी के लिए भी यह सीखने की प्रक्रिया है, लेकिन उनका मानना है कि इंसान का दिमाग ही नियंत्रण में रहना चाहिए.

“आपको बदलाव के हिसाब से खुद को ढालना होगा. लेकिन आपको अपनी सोच और दिशा बनाए रखनी होगी. आप इसे पूरी तरह एआई और मशीन के भरोसे नहीं छोड़ सकते,” उन्होंने कहा.

बड़ा लक्ष्य हर छात्र को एआई एक्सपर्ट बनाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हर ग्रेजुएट एआई को समझने और इस्तेमाल करने की क्षमता रखता हो. यहां तक कि सिविल इंजीनियर भी इसका इस्तेमाल इंफ्रास्ट्रक्चर की प्लानिंग में कर सकते हैं और ह्यूमैनिटीज के छात्र बड़े टेक्स्ट कलेक्शन का विश्लेषण कर सकते हैं.

— रंगन बनर्जी, आईआईटी दिल्ली के डायरेक्टर

आईआईटी मद्रास में भी इसी तरह की सोच सामने आई है. संस्थान ने 2024 में वाधवानी स्कूल ऑफ डेटा साइंस एंड एआई की शुरुआत की थी और यह देश के उन प्रमुख संस्थानों में शामिल रहा है, जिन्होंने एआई को अपनाया है.

“हमारे पास एआई से जुड़े कोर्स हैं, लेकिन मेरा मानना है कि हर कोर्स में एआई का एक पहलू होना चाहिए, ताकि यह देखा जा सके कि एआई का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है,” आईआईटी मद्रास के Wadhwani School के प्रोफेसर कार्तिक रमन ने कहा. उनकी रिसर्च कंप्यूटेशनल सिस्टम्स बायोलॉजी, माइक्रोबायोम नेटवर्क्स और मेटाबोलिक इंजीनियरिंग पर केंद्रित है.

करीब 40 प्रतिशत पाठ्यक्रम में वैकल्पिक विषय हैं. इससे छात्रों को अपने मुख्य विषयों के साथ एआई और डेटा साइंस के कोर्स लेने की सुविधा मिलती है. अभी पाठ्यक्रम में बड़े बदलाव की तैयारी चल रही है.

“कोर्स में बदलाव की योजना है, लेकिन सच कहूं तो मुझे लगता है कि लोग इसे टाल रहे हैं,” उन्होंने कहा.

इस बीच, दूसरे संस्थानों में अलग-अलग एआई समर्थक आगे बढ़कर इसका रास्ता दिखा रहे हैं.

एआई और रिसर्च

IISER पुणे में कंप्यूटेशनल बायोलॉजिस्ट सुतिर्थ डे ‘एआई फॉर रिसर्च’ नाम से कई वर्कशॉप चलाते हैं. इनमें शामिल होने वाले रिसर्चर्स को सिर्फ बेहतर प्रॉम्प्ट लिखना नहीं सिखाया जाता. वे एआई का इस्तेमाल हजारों रिसर्च पेपर छांटने, बड़े डेटा सेट में पैटर्न खोजने और लैब में जाने से पहले नए आइडिया पर सोचने के लिए करना सीखते हैं.

“रिस्पॉन्स बहुत, बहुत अच्छा रहा है,” डे ने कहा. “एआई इतनी तेजी से बदल रहा है कि रिसर्चर्स के लिए यह समझना मुश्किल है कि इस समय स्थिति क्या है.”

मीडिया और कम्युनिकेशन के पाठ्यक्रम में AI को शामिल करने पर आयोजित वर्कशॉप में IISER पुणे के प्रोफ़ेसर सुतीर्थ डे (बीच में) | फ़ोटो: X

सैकड़ों पेपर एक-एक करके पढ़ने के बजाय, रिसर्चर्स बड़ी मात्रा में रिसर्च को एक एआई मॉडल में अपलोड कर सकते हैं और उससे बार-बार सामने आने वाले विषय, आपस में न मिलने वाली बातें या ऐसे सवाल पहचानने को कह सकते हैं, जिन पर अभी रिसर्च नहीं हुई है. जिस काम में पहले कई हफ्ते लगते थे, वह अब कुछ घंटों में पूरा हो सकता है. डे ने एआई का इस्तेमाल दवा के संभावित उम्मीदवारों की खोज में भी देखा है. ये ऐसे कंपाउंड होते हैं जो संभावित दवाओं के रूप में अच्छे लगते हैं.

“रिसर्चर्स एक दवा का संभावित उम्मीदवार खोज रहे थे, इसलिए उन्होंने कुछ एआई एजेंट्स शुरू किए. इन एजेंट्स ने बैकग्राउंड का पूरा काम किया और कुछ उम्मीदवार सामने रखे. इसके बाद इंसानों ने उन्हें देखा,” उन्होंने कहा.

IISER पुणे में डे के छात्रों में से एक, अनीश कोनेर ने 2021 में अपनी पीएचडी शुरू की थी. उस समय उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि आज की तरह वह एआई का इतना इस्तेमाल करेंगे. कोलकाता के रामकृष्ण मिशन विद्यालय में पढ़ चुके कोनेर को बंगाली उपन्यासों में काफी दिलचस्पी थी. अब वह एक एक्सपेरिमेंटल बायोलॉजिस्ट हैं.

“उस समय हम एआई के लिए सिर्फ इतना सोच सकते थे कि कोई रोबोट आएगा और हमारा कुछ काम कर देगा. लेकिन यह बहुत दूर की बात लगती थी. पिछले दो साल में चीजें बहुत तेजी से बदल गई हैं,” कोनेर ने कहा.

साथी या प्रतियोगी

कोनेर जैसे पीएचडी छात्रों के लिए एआई ने जिन चीजों को आसान बनाया है, उनमें से एक कोडिंग है. पहले जब उन्हें डेटा का गहराई से विश्लेषण करना होता था, तो वह वेबसाइटों पर यह उम्मीद करते हुए खोजते रहते थे कि किसी ने ऐसा कोड लिखा हो जिसे वह इस्तेमाल कर सकें. अब Claude उनके लिए यह काम कर देता है.

कई दूसरे लोगों के उलट, कोनेर एआई को खतरे के रूप में नहीं देखते. फल मक्खियों के व्यवहार पर रिसर्च करते समय लैब में एआई कोनेर का साथी है. यह डेटा, कीड़ों के वीडियो और वेबकैम की घंटों की फुटेज को छांटने में उनकी मदद करता है.

“लेकिन एआई वास्तव में फल मक्खियों को पकड़कर उन्हें एक्सपेरिमेंटल एरिना में नहीं रख सकता,” कोनेर ने हंसते हुए कहा.

IISER पुणे के पीएचडी छात्र अनीश कोनेर अपनी लैब में फल मक्खियों और एआई के साथ काम करते हैं | विशेष व्यवस्था
अनीश कोनेर की वर्कस्पेस में फिजिकल और कंप्यूटेशनल दुनिया एक साथ दिखाई देती हैं | विशेष व्यवस्था

सैद्धांतिक विषयों में रिसर्च करने वाले लोगों के लिए स्थिति थोड़ी ज्यादा मुश्किल है.

“सैद्धांतिक विषय एआई के खतरे के लिए सबसे ज्यादा कमजोर हैं. इनमें बहुत ज्यादा एक्सपेरिमेंटल डेटा नहीं होता,” चेन्नई केइंस्टीट्यूट ऑफ़ मैथमेटिकल साइंसेज़ (IMSc) में कॉम्बिनेटरियल रिप्रेजेंटेशन थ्योरी की पढ़ाई कर रहे तीसरे साल के पीएचडी छात्र टीआर हरिकृष्णन ने कहा. “आपको अपनी खुद की थ्योरी बनानी होती है या मौजूदा डेटा से कुछ साबित करना होता है. अभी एआई इसमें काफी अच्छा है.”

हरिकृष्णन याद करते हैं कि कुछ समय पहले तक AI मुश्किल से ही गणित की बुनियादी समस्याओं को हल कर पाता था, लेकिन हाल ही में OpenAI के एक रीज़निंग मॉडल ने गणितज्ञ पॉल एर्डोस की लंबे समय से चली आ रही एक परिकल्पना को गलत साबित कर दिया.

अपनी चिंताओं के बावजूद, हरिकृष्णन अपने काम में भी एआई का इस्तेमाल करते हैं.

“मैं मुख्य रूप से लिटरेचर रिव्यू और तकनीकी चीजों के लिए एआई टूल्स का इस्तेमाल करता हूं. पहले मेरे सवाल से जुड़े मौजूदा रिसर्च पेपर खोजने में कई दिन या हफ्ते लग जाते थे, लेकिन अब सिर्फ कुछ मिनट लगते हैं,” उन्होंने कहा.

एआई के दौर में नई पीढ़ी के लिए तैयारी

आईआईटी दिल्ली में प्रोडक्शन और इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग के चौथे साल के छात्र काव्या जैन के लिए एआई अब पढ़ाई का रोजमर्रा का हिस्सा बन गया है.

“एआई के साथ मेरा रोज का सबसे ज्यादा इस्तेमाल लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स का है: Claude, ChatGPT, Gemini. मैं ज्यादातर अपना काम आसान करने के लिए एआई का इस्तेमाल करता हूं… इसने पढ़ाई के पारंपरिक तरीके को बदल दिया है,” उन्होंने कहा.

जैसे-जैसे उनकी ग्रेजुएशन पूरी होने का समय करीब आ रहा है, जैन मानते हैं कि एआई अब करियर के लिए जरूरी हो गया है.

“अब डेटा एनालिस्ट की नौकरियों के ज्यादा मौके हैं. सीखने के नजरिए से देखें तो यह काफी अच्छी बात है कि इन कोर्स को पढ़ाई में शामिल किया गया है,” उन्होंने कहा.

Aylence की एक वर्कशॉप में अलग-अलग LLMs के फायदे और नुकसान समझाए जा रहे हैं | विशेष व्यवस्था

जैन और अलग-अलग कैंपस के कई दूसरे छात्रों के लिए एआई अभी भी बनाने वाली तकनीक से ज्यादा एक टूल है. लेकिन अनिल सहस्रबुद्धे का कहना है कि यह जल्द बदल सकता है. ज्यादा साल नहीं लगेंगे, जब एआई के साथ बड़े होने वाली अगली पीढ़ी कॉलेजों में दाखिला लेने लगेगी.

“कक्षा 3 से ही उम्र के हिसाब से एआई से जुड़ी चीजें कोर्स में शामिल की जा रही हैं. जब तक यह पीढ़ी 10वीं और 12वीं कक्षा में पहुंचेगी, तब तक उन्होंने बहुत कुछ सीख लिया होगा,” उन्होंने कहा. “अगर वे 10 साल बाद कॉलेज या यूनिवर्सिटी में आ रहे होंगे, तो आप सोच सकते हैं कि उनकी क्या इच्छाएं और उम्मीदें होंगी. हमें उनकी उम्मीदों को पूरा करना होगा.”

‘सोचने की जद्दोजहद’ को बनाए रखना

जैसे-जैसे यूनिवर्सिटी अपने पाठ्यक्रम में एआई के लिए जगह बना रही हैं, उन्हें यह भी सोचना पड़ रहा है कि पढ़ाने और सीखने का मतलब क्या है. और सच में, सोचने का मतलब क्या है.

2021 में आईआईटी दिल्ली ने करीब 10 साल में होने वाला एक बड़ा पाठ्यक्रम बदलाव शुरू किया. प्रशासन ने नए विचारों पर चर्चा करने और पूर्व छात्रों व मौजूदा छात्रों से सुझाव लेने के लिए Google Forms भेजे.

“हम सिर्फ एआई पढ़ाना शुरू करके मुख्य विषयों को नजरअंदाज नहीं कर सकते, लेकिन हमें समझ आया कि कुछ बदलाव जरूरी हैं. इसलिए सबसे पहले हमने यह जरूरी किया कि हर विभाग में ‘उभरते हुए ट्रेंड और टेक्नोलॉजी’ (emerging trends and technology) का एक कोर्स हो. इसका मकसद यह देखना है कि उस विभाग के लिए एआई किस तरह उपयोगी है,” आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर और करिकुलम के एसोसिएट डीन अभिजीत राज ने कहा.

राज, जो केमिकल इंजीनियर हैं, थर्मोडायनेमिक्स का उदाहरण देते हैं. पहले डिफरेंशियल इक्वेशन के जरिए रिएक्शन का विश्लेषण करने वाले छात्रों से उम्मीद की जाती थी कि वे खुद शुरुआत से कोड लिखें. अब उन्हें अपने समाधान को टेस्ट करने के लिए Claude Code जैसे टूल्स का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है.

संस्थान एक सेंटर फॉर लर्निंग एंड टीचिंग भी बना रहा है. इसमें एआई एक्सपर्ट्स को बुलाया जाएगा, जो फैकल्टी को अपनी पढ़ाई और कोर्स में एआई टूल्स को शामिल करने की ट्रेनिंग देंगे.

एआई ने दुनिया को हिला देने से पहले ही आईआईटी दिल्ली ने 2020 में यार्डी स्कूल ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शुरू कर दिया था. यहां एआई की पढ़ाई के लिए खास छात्र हैं, लेकिन सभी विषयों के दूसरे छात्रों को भी वैकल्पिक विषय लेने की अनुमति है. राज बताते हैं कि एआई का यह उछाल अचानक नहीं आया है.

दो-तीन साल पहले किसी ने सोचा भी नहीं था कि एआई का कितना असर होगा. आज दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों सहित पूरी दुनिया इसके बारे में जानती है. इसलिए यह मांग और सप्लाई का सीधा मामला है. छात्रों की मांग है और यूनिवर्सिटी इसका जवाब दे रही हैं.

—अनिल सहस्रबुद्धे, पूर्व चेयरमैन, AICTE

“अगर आप आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इतिहास देखें, तो 80 के दशक में भी इसकी पढ़ाई हो रही थी,” उन्होंने कहा. “बस प्रोसेसर अब ज्यादा तेज हो गए हैं.”

आईआईटी कानपुर में भी पाठ्यक्रम में बदलाव किया जा रहा है. लेकिन संस्थान के डायरेक्टर मनींद्र अग्रवाल का कहना है कि एआई जरूरी नहीं कि इसका मुख्य आधार हो.

“यह बदलाव एआई पर केंद्रित नहीं है, बल्कि सीखने पर केंद्रित है,” उन्होंने कहा.

इस बीच, BITS पिलानी ने अपने सभी कैंपस में एआई रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए अलग से फंड रखा है. लेकिन वाइस चांसलर रमा गोपाल राव का कहना है कि असली चुनौती पढ़ाने के तरीके से जुड़ी है.

“Generative AI ने यूनिवर्सिटी को पढ़ाई और मूल्यांकन को लेकर लंबे समय से चली आ रही कई धारणाओं पर फिर से सोचने के लिए मजबूर किया है,” उन्होंने कहा. “अगर किसी असाइनमेंट में सिर्फ जानकारी याद रखने की क्षमता जांची जाती है, तो एआई अब कुछ ही सेकंड में काफी अच्छा जवाब दे सकता है. इसका मतलब है कि यूनिवर्सिटी को ऐसे मूल्यांकन की तरफ बढ़ना होगा, जिसमें समझ, मौलिकता, सही फैसला लेने की क्षमता, प्रयोग, डिजाइन सोच और समस्या हल करने की क्षमता पर जोर हो.”

BITS पिलानी का कैंपस, जहां अलग-अलग विषयों के पहले साल के छात्र एआई कोर्स ले सकते हैं | फोटो: BITS पिलानी वेबसाइट

राव का कहना है कि यह सुनिश्चित करना ज्यादा जरूरी है कि छात्र विचारों पर खुद सोचने और उनसे जूझने की प्रक्रिया बंद न करें.

“यूनिवर्सिटी को उस सोचने की जद्दोजहद को बनाए रखना होगा,” उन्होंने कहा.

सुतिर्थ डे के लिए भी यह सोच सही नहीं है कि एआई की शिक्षा का मतलब सिर्फ लोगों को LLMs से बेहतर जवाब निकलवाना सिखाना है.

“एआई की शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ लोगों को प्रॉम्प्ट टाइप करना सिखाना नहीं होना चाहिए. लक्ष्य यह होना चाहिए कि लोगों को बेहतर सवाल पूछना, मिलने वाले जवाबों की जांच करना, गलतियों को पहचानना और एआई का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना सिखाया जाए,” उन्होंने कहा. “यहीं अकादमिक संस्थानों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है. यूनिवर्सिटी हमेशा ऐसी जगह रही हैं जहां हम लोगों को सिर्फ जानकारी नहीं, बल्कि सोचने का तरीका भी सिखाते हैं. एआई हमारे पास मौजूद टूल्स को बदलता है, लेकिन शिक्षा के मूल उद्देश्य को नहीं बदलता.”

जब डॉक्टर और वकील क्लास में शामिल होते हैं

एआई सीखने की होड़ सिर्फ छात्रों तक सीमित नहीं है. बड़ी उम्र के लोग और कामकाजी प्रोफेशनल्स भी खुद को पीछे छूटने से बचाने के लिए दोबारा क्लासरूम में लौट रहे हैं.

“स्कूल में पढ़ने वाले लोग इसके हिसाब से खुद को ढाल गए. लेकिन कामकाजी प्रोफेशनल्स ऐसा नहीं कर पाए क्योंकि उन्हें कोई ट्रेनिंग नहीं मिली,” Aylence के संस्थापक हेमंत बिंदल ने कहा. यह कंपनी अलग-अलग क्षेत्रों के प्रोफेशनल्स के लिए 2,000-3,000 रुपये की फीस में उनके काम के हिसाब से कोर्स कराती है.

कंपनी ने 2023 में डिजिटल मार्केटिंग से काम शुरू किया था, लेकिन एक साल बाद शिक्षा के क्षेत्र में आ गई. इसका रिस्पॉन्स तुरंत मिला. बिंदल को याद है कि आईआईटी दिल्ली में आयोजित उनकी पहली वर्कशॉप में करीब 1,100 लोग आए थे.

“जब हमने शुरुआत की थी, तब अमेरिकी कंपनियां काफी लोगों को नौकरी से निकाल रही थीं. इस बात का काफी डर था कि एआई आपकी नौकरी ले लेगा,” बिंदल ने कहा. उन्होंने बताया कि हर कोर्स को संबंधित इंडस्ट्री या क्षेत्र के एक्सपर्ट्स से सलाह लेने के बाद तैयार किया जाता है.

प्रोफेशनल्स के लिए Claude पर Aylence की एक वर्कशॉप | फोटो: Facebook

त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. दीपली भारद्वाज, जिन्होंने कुछ महीने पहले Aylence की एक वर्कशॉप में हिस्सा लिया था, कहती हैं कि मिड-करियर प्रोफेशनल्स अक्सर चिंता की वजह से इन कोर्स में शामिल होते हैं. हालांकि, उनके लिए रोज के काम का बोझ कम करना इसकी सबसे बड़ी वजह थी.

“एआई का इस्तेमाल मेरे पेशे में किया जा सकता है, जहां मैं एक डॉक्टर के तौर पर क्लिनिक चला रही हूं. एक छोटे स्तर की उद्यमी के तौर पर, मैं अपने स्टाफ की अटेंडेंस को ऑटोमेट कर सकती हूं, प्रोडक्ट के ऑर्डर ऑटोमेट कर सकती हूं, अपॉइंटमेंट ऑटोमेट कर सकती हूं और मरीजों के रिकॉर्ड को ऑटोमेट कर सकती हूं,” भारद्वाज ने कहा.

लेकिन जिस वर्कशॉप में उन्होंने हिस्सा लिया, उसमें प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग पर ध्यान दिया गया था. उन्हें यह काफी तकनीकी और कोडिंग पर ज्यादा आधारित लगा. वह अभी भी अपनी जरूरत के हिसाब से बेहतर एआई कोर्स की तलाश कर रही हैं.

उस रविवार आईआईटी दिल्ली के R&I Park में Aylence की वर्कशॉप में मौजूद वकीलों के बीच अपनी एक छोटी सी प्रतियोगिता भी थी: कमरे में सबसे उम्रदराज कौन है?

एआई का इस्तेमाल मेरे पेशे में किया जा सकता है, जहां मैं एक डॉक्टर के तौर पर क्लिनिक चला रही हूं. एक छोटे स्तर की उद्यमी के तौर पर, मैं अपने स्टाफ की अटेंडेंस को ऑटोमेट कर सकती हूं, प्रोडक्ट के ऑर्डर ऑटोमेट कर सकती हूं, अपॉइंटमेंट ऑटोमेट कर सकती हूं और मरीजों के रिकॉर्ड को ऑटोमेट कर सकती हूं.

-डॉ. दीपली भारद्वाज, त्वचा रोग विशेषज्ञ

जैसे-जैसे वर्कशॉप थ्योरी से प्रैक्टिकल की तरफ बढ़ी, उनमें से कई लोगों ने PPT को देखना छोड़ दिया और अपनी-अपनी स्क्रीन पर चले गए. वे प्रॉम्प्ट टाइप कर रहे थे और जवाबों की तुलना कर रहे थे.

कुछ वकील एआई को लेकर शिकायतों की लंबी लिस्ट के साथ वर्कशॉप में पहुंचे थे. एक ने कहा कि ChatGPT की हिंदी से अंग्रेजी में ट्रांसलेशन की क्षमता बहुत खराब है, जबकि दूसरे लोगों ने एआई के गलत जवाब देने और LLMs के “ओवरकॉन्फिडेंस” की शिकायत की.

“हम इस पर भरोसा नहीं कर सकते. मैंने एक बार इससे एक जजमेंट के बारे में पूछा था और इसने एक नकली केस बना दिया,” एक वकील ने नाम न बताने की शर्त पर कहा.

“इसका मोटिव बहुत आसान है. अगर आप हमें यकीन नहीं दिला सकते, तो हमें उलझा दो,” किसी ने जवाब दिया और पूरा ग्रुप हंस पड़ा.

लंच के समय तक वकील ChatGPT और Claude से अपनी जरूरत के मुताबिक काम करवाने में थोड़ा बेहतर हो चुके थे. उन्हें यह चेतावनी भी दी गई थी कि एआई के जवाबों पर पूरी तरह भरोसा न करें.

लेकिन प्रमथ नाथ मिश्रा संतुष्ट नहीं थे. उनके लिए एआई को सिर्फ काम आसान करने वाले टूल की तरह इस्तेमाल करना काफी नहीं है. वह जानना चाहते हैं कि फैसलों में छिपे पैटर्न को सामने लाने और मुश्किल कानूनी सवालों को हल करने के लिए इसका इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है. वह जानते हैं कि अभी उन्हें बहुत कुछ सीखना है.

“ये वर्कशॉप सिर्फ टूल्स के बारे में हैं. ये सिर्फ शुरुआत हैं. एक बार जब हम इन टूल्स को इस्तेमाल करना सीख जाएंगे, तो इनके साथ हम क्या करते हैं, असली चुनौती वह होगी,” मिश्रा ने कहा.

 

share & View comments