नई दिल्ली: न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCIL) ने गुरुवार को पुष्टि की कि कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट से जुड़ा डेटा रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर के सर्वर से लीक होकर ऑनलाइन पहुंच गया था. हालांकि, NPCIL ने साफ किया कि इससे परमाणु सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है क्योंकि यह जानकारी सीधे न्यूक्लियर पावर प्लांट के मुख्य हिस्से से नहीं, बल्कि उसकी सामान्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी है.
NPCIL ने प्रेस रिलीज में कहा, “NPCIL दोहराता है कि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने का दावा की गई जानकारी केवल प्लांट के बैलेंस ऑफ प्लांट से जुड़ी है और इसका परमाणु सुरक्षा से जुड़ी किसी भी जानकारी से कोई संबंध नहीं है.”
बुधवार को रॉयटर्स ने अपनी एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में बताया था कि भारत की सबसे बड़ी परमाणु परियोजना कुडनकुलम से जुड़ी 19,500 से ज्यादा फाइलें डार्क वेब पर उपलब्ध थीं. इन्हें World Leaks नाम के एक रैनसमवेयर ग्रुप ने पोस्ट किया था. ग्रुप का दावा था कि ये फाइलें रिलायंस ग्रुप से ली गई हैं और इनमें तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में स्थित कुडनकुलम संयंत्र के ड्रॉइंग और ब्लूप्रिंट शामिल हैं.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ये फाइलें 11 जून से ऑनलाइन उपलब्ध थीं. हालांकि, रॉयटर्स ने सभी दस्तावेज देखे, लेकिन उनकी असलियत की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सका.
हालांकि, गुरुवार को NPCIL के बयान में पुष्टि की गई कि ये दस्तावेज भारत के सबसे बड़े परमाणु बिजली संयंत्र से जुड़े हैं. NPCIL ने बताया कि 2018 में सार्वजनिक टेंडर के जरिए रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर को कुडनकुलम के बैलेंस ऑफ प्लांट पैकेज के निर्माण का ठेका दिया गया था.
NPCIL के बयान में कहा गया, “सार्वजनिक टेंडर प्रक्रिया के तहत NPCIL ने बोली लगाने वाली कंपनियों को शुरुआती ड्रॉइंग और तकनीकी जानकारी दी थी. इन्हीं के आधार पर ठेकेदार रिलायंस इंफ्रा ने OEM कंपनियों के साथ मिलकर विस्तृत इंजीनियरिंग ड्रॉइंग तैयार की थी.”
बैलेंस ऑफ प्लांट पैकेज में परमाणु संयंत्र के मुख्य परमाणु हिस्से को छोड़कर बाकी सभी सिस्टम शामिल होते हैं. इसमें पानी की सप्लाई, पाइपलाइन, पंप, सड़कें, ड्रेनेज और संयंत्र चलाने के लिए ज़रूरी दूसरी बुनियादी सुविधाएं शामिल होती हैं. इसमें मुख्य रिएक्टर, कूलेंट और दूसरे अहम परमाणु सिस्टम शामिल नहीं होते.
NPCIL के मुताबिक, ऐसी सुविधाएं थर्मल पावर प्लांट समेत कई औद्योगिक संयंत्रों में भी होती हैं. इसलिए इनकी जानकारी सार्वजनिक होने से सीधे परमाणु सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है.
डेटा लीक कैसे हुआ
रैनसमवेयर ग्रुप World Leaks एक वैश्विक “एक्सटॉर्शन-एज़-ए-सर्विस” प्लेटफॉर्म है. यानी यह चोरी की गई गोपनीय जानकारी के जरिए लोगों या कंपनियों से फिरौती वसूलने की कोशिश करता है. ज्यादातर रैनसमवेयर ग्रुप इसी तरीके से काम करते हैं. कुछ कंपनियों की फाइलें लॉक कर देते हैं और पैसे मिलने तक उन्हें खोलने नहीं देते, जबकि World Leaks जैसे ग्रुप संवेदनशील जानकारी ऑनलाइन सार्वजनिक करने की धमकी देकर पैसे मांगते हैं.
रिलायंस से जुड़े मामले के अलावा हाल में World Leaks ने ब्राजील की मैन्युफैक्चरिंग कंपनी Nuclebrás Equipamentos Pesados और कनाडा की निर्माण कंपनी आईटीसी ग्रुप पर भी साइबर हमला किया था.
यह पहली बार नहीं है जब कुडनकुलम परमाणु संयंत्र साइबर हमले का निशाना बना हो. 2019 में दक्षिण कोरिया से जुड़े मालवेयर ने कुडनकुलम संयंत्र के IT नेटवर्क को संक्रमित कर दिया था. हालांकि, NPCIL ने तब कहा था कि संक्रमित कंप्यूटर सिर्फ प्रशासनिक काम के लिए इस्तेमाल होता था और परमाणु सुरक्षा पर इसका कोई असर नहीं पड़ा. लेकिन इस घटना ने भारत की परमाणु परियोजनाओं की साइबर सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए थे.
दिसंबर 2019 में इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस (IDSA) की एक रिपोर्ट में परमाणु क्षेत्र की अहम बुनियादी सुविधाओं में सेंध लगने को लेकर चेतावनी दी गई थी. रिपोर्ट में कहा गया था कि बड़े डेटा लीक से संयंत्र का कामकाज धीमा पड़ सकता है या पूरी तरह बंद हो सकता है. यहां तक कि रेडियोधर्मी पदार्थ पर्यावरण में फैलने का खतरा भी पैदा हो सकता है.
रिपोर्ट में कहा गया, “परमाणु कार्यक्रम और शोध संस्थान रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होते हैं और उनकी कड़ी सुरक्षा की जाती है, चाहे वह भौतिक सुरक्षा हो या दूसरी तरह की. इसलिए हैरानी की बात नहीं है कि वे अक्सर जासूसी गतिविधियों का बड़ा निशाना बनते हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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