नई दिल्ली: जम्मू के आर.एस. पुरा में तैनात कांस्टेबल गोपीनाथ घोष का काम रसोइये का था. पिछले साल मई में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनकी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना थी कि पाकिस्तान के साथ सक्रिय सीमा पर तैनात कोई भी जवान भूखा न रहे. घोष ने अपना काम पूरी मेहनत से किया और ऑपरेशन खत्म होने पर सीमा सुरक्षा बल (BSF) के वरिष्ठ अधिकारियों ने उनके काम की तारीफ भी की.
फोर्स में भर्ती होने के एक साल के भीतर ही सबसे मुश्किल वक्त में से एक के दौरान ड्यूटी कर चुके 23 साल के घोष अब कुछ समय आराम करने के बारे में सोच रहे थे. तभी BSF ने उन्हें ट्रेनिंग के लिए इंदौर भेज दिया. चार महीने बीत गए. इस दौरान घोष ने साफ-सफाई और स्वास्थ्य से जुड़े कामों के साथ-साथ अपने काम के दूसरे स्किल्स भी और बेहतर कर लिए.
लेकिन इस साल मई में सब कुछ अचानक खत्म हो गया. घोष ने उस दिन को याद करते हुए बताया, “जब सब कुछ मेरे लिए अच्छा चल रहा था, तब मुझे ज़िंदगी का सबसे बड़ा झटका लगा.” उन्होंने बताया कि ट्रेनिंग सेंटर में उनके सुपरवाइजर ने उन्हें बताया कि उनके सर्टिफिकेट की जांच में पता चला है कि उनमें से एक ऐसे संस्थान ने जारी किया था, जिसे मान्यता नहीं मिली हुई थी.
BSF कांस्टेबल को कश्मीर में अपनी यूनिट में वापस भेज दिया गया. वहां उनसे जवाब मांगा गया कि उन्हें नौकरी से क्यों नहीं निकाला जाना चाहिए. आखिरकार जून में उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया.

घोष का मामला उन करीब 400 जवानों में से एक है, जिन्हें फर्जी सर्टिफिकेट जमा करने के आरोप में भारत के सीमा सुरक्षा बल से बर्खास्त किया गया है. इस मामले की गहराई से जांच करने और प्रभावित जवानों से मिली जानकारी से पता चलता है कि वे बेहद चालाकी से की गई साइबर ठगी का शिकार हुए. इस ठगी को BSF भी सर्टिफिकेट की जांच के दौरान पकड़ नहीं पाया.
बर्खास्त किए गए इन जवानों ने ऑल एक्स-पैरामिलिट्री फोर्सेज वेलफेयर एसोसिएशन के नेतृत्व में शुक्रवार को सीजीओ कॉम्प्लेक्स में BSF मुख्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल की.
इस हफ्ते की शुरुआत में संगठन के एक प्रतिनिधिमंडल ने BSF के महानिदेशक प्रवीण कुमार और बल के कार्मिक विभाग की जिम्मेदारी संभालने वाले महानिरीक्षक मकरंद देवस्कर से मुलाकात की. इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व संगठन के अध्यक्ष और रिटायर्ड अतिरिक्त महानिदेशक एच.आर. सिंह तथा संगठन के महासचिव रणबीर सिंह ने किया.
सिंह ने दिप्रिंट को बताया, “इन जवानों ने कोई फर्जीवाड़ा नहीं किया है. इसके बजाय वे एक अच्छी तरह से रची गई साजिश और साइबर अपराध के नेटवर्क का शिकार हुए हैं.” उन्होंने कहा कि उन्होंने BSF के वरिष्ठ अधिकारियों के सामने भी यही बात रखी.
उन्होंने कहा, “एक और अहम बात यह है कि सूचना के अधिकार (RTI) के तहत पूछे गए सवालों के जवाब से पता चला कि 2015 से 2023 के बीच देशभर में SIDH पोर्टल पर रसोइये और वाटर कैरियर के पदों के लिए NSDC लेवल-1 कोर्स उपलब्ध ही नहीं था. ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि इस कोर्स को भर्ती की योग्यता में शामिल कैसे किया गया.”
दिप्रिंट ने BSF के प्रवक्ता से फोन और संदेशों के जरिए संपर्क कर उनका पक्ष जानने की कोशिश की है. जवाब मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.
‘योग्यता की ऐसी शर्त पहले कभी नहीं थी’
यह पूरा विवाद फरवरी 2023 से जुड़ा है. उस समय गृह मंत्रालय (MHA) ने BSF में कांस्टेबल स्तर के पदों पर भर्ती के लिए अधिसूचना जारी की थी. इसमें कुल 1,284 पदों पर भर्ती होनी थी. इनमें पुरुषों के लिए 1,220 और महिलाओं के लिए 64 पद थे. इन पदों पर मोची, दर्जी, धोबी, नाई, सफाईकर्मी, रसोइये, वाटर कैरियर और वेटर के तौर पर भर्ती होनी थी.
शारीरिक योग्यता से जुड़ी शर्तें पिछले सालों जैसी ही थीं, लेकिन रसोइये, वाटर कैरियर और वेटर के पदों के लिए एक नई शर्त जोड़ दी गई थी.
इसके तहत उम्मीदवारों को नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NSDC) या उससे मान्यता प्राप्त संस्थानों से फूड प्रोडक्शन या किचन में नेशनल स्किल्स क्वालिफिकेशन फ्रेमवर्क (NSQF) लेवल-1 कोर्स का सर्टिफिकेट देना जरूरी था.
नौकरी से बर्खास्त किए गए जवानों का कहना है कि योग्यता की यही शर्त इस पूरी समस्या की मुख्य वजह है. बुलंदशहर के तरुण शर्मा ने कहा, “जवानों की भर्ती के इतिहास में पहली बार ऐसा सर्टिफिकेट मांगा गया था. इससे पहले भर्ती प्रक्रिया में ट्रे टेस्ट होता था. इसमें उम्मीदवारों से खाना बनवाकर देखा जाता था कि वे इस काम के योग्य हैं या नहीं और उन्हें सच में खाना बनाना आता है या नहीं.”
शर्मा जैसे उम्मीदवारों ने शारीरिक और लिखित परीक्षा दी. इसके बाद उनके दस्तावेज़ की जांच हुई, जिसमें उन्होंने NSDC के सभी जरूरी सर्टिफिकेट जमा किए.
सभी जांच पूरी होने के बाद सैकड़ों उम्मीदवारों को केंद्र सरकार की ओर से आयोजित राष्ट्रीय रोजगार मेले में बुलाया गया. यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन ट्रेड्समैन पदों के लिए 2,100 से ज्यादा उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र दिए.
शर्मा भी इनमें से एक थे. बुलंदशहर से कॉमर्स में ग्रेजुएट शर्मा ने कहा कि उन्होंने सरकारी नौकरी से मिलने वाली स्थिरता के कारण यह पद चुना था. शर्मा ने कहा, “आप जानते हैं कि आजकल नौकरियों की क्या स्थिति है. परिवार में अकेला कमाने वाला होने के कारण मुझे इस पद के लिए आवेदन करना पड़ा.” उन्होंने बताया कि उनके जैसे ट्रेड्समैन को एकमुश्त 40,000 रुपये दिए जा रहे थे.
यह सब पिछले साल मार्च में खत्म हो गया, जब छत्तीसगढ़ में उनकी तैनाती के दौरान उनके वरिष्ठ अधिकारी ने कारण बताओ नोटिस जारी करने के बाद उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया. शर्मा से पूछा गया कि उन्हें नौकरी से क्यों नहीं निकाला जाना चाहिए, क्योंकि उनके जमा किए गए स्किल से जुड़े सर्टिफिकेट को फर्जी पाया गया था.
कारण बताओ नोटिस के मुताबिक, शर्मा ने कोटा स्थित करियर पॉइंट इंस्टीट्यूट ऑफ स्किल डेवलपमेंट से जारी वाटर कैरियर का सर्टिफिकेट जमा किया था. जांच के दौरान BSF की ओर से भेजे गए नोटिस का संस्थान ने जवाब नहीं दिया था. इसके अलावा, BSF के वरिष्ठ अधिकारियों ने उम्मीदवारों की ओर से जमा किए गए सर्टिफिकेट की सच्चाई जांचने के लिए NSDC से भी संपर्क किया था.
सर्टिफिकेट की सच्चाई जांचने के लिए BSF की ओर से भेजे गए सवाल के जवाब में NSDC ने कहा, “उम्मीदवार के विवरण की अच्छी तरह जांच की गई और उसमें गड़बड़ी पाई गई. उम्मीदवार का विवरण हमारे संस्थान के रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता. हम पुष्टि करते हैं कि यह सर्टिफिकेट हमने जारी नहीं किया है और यह हमारे संस्थान का नहीं है. संबंधित उम्मीदवार ने हमारे संस्थान से ट्रेनिंग पूरी नहीं की है और यह सर्टिफिकेट अमान्य पाया गया है.”
हालांकि, प्रभावित उम्मीदवारों का कहना है कि समस्या इससे कहीं ज्यादा गहरी थी. इसका सबूत RTI के जरिए मिले जवाब में भी दिखाई देता है.
भर्ती शुरू होने के समय से जुड़े सवाल में NSDC से पूछा गया कि 2015 से 2023 के बीच ऐसे कितने सर्टिफिकेट जारी किए गए थे. NSDC ने जवाब दिया कि उसने करीब आठ साल तक ऐसा कोई सर्टिफिकेट जारी ही नहीं किया था. इससे प्रभावित उम्मीदवारों और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) के पूर्व जवानों ने पूरी भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठाए. उनका कहना है कि भर्ती में ऐसे सर्टिफिकेट जमा करना जरूरी किया गया था.
नौकरी से बर्खास्त एक जवान ने सवाल किया, “अगर NSDC ने पिछले आठ साल में ऐसा कोई सर्टिफिकेट जारी ही नहीं किया, तो फिर इन्हें भर्ती की योग्यता में किस आधार पर शामिल किया गया? भर्ती के इतिहास में पहली बार इस सर्टिफिकेट को जरूरी क्यों बनाया गया, जबकि सर्टिफिकेट जारी करने वाली संस्था खुद कह रही है कि उसने ऐसा कोई सर्टिफिकेट जारी ही नहीं किया? तो क्या इसका मतलब यह है कि भर्ती की अधिसूचना जारी होने की तारीख पर योग्यता के लिए मान्य ऐसा कोई सर्टिफिकेट था ही नहीं?”
पंजाब, असम और UP के बीच और एक YouTube ‘टीचर’
नौकरी से निकाले गए ट्रेड्समैन की लिस्ट में होने के अलावा, पंजाब के पठानकोट के शर्मा, अभिकाश और बोंगाईगांव जिले के जगरनाथ रॉय की तिकड़ी अपनी दुखद घटनाओं से एक कॉमन वजह से भी जुड़ी है—NSQF सर्टिफिकेट के बारे में उनकी जानकारी न होना और एक टीचर जो CAPF में ऐसी पोस्ट पर भर्ती के लिए यूट्यूब पर अपनी क्लास चलाता था.
अभिकाश ने इंटरनेशनल बॉर्डर पर अपने गांव से दिप्रिंट को बताया, “पठानकोट में ऐसा कोई कोर्स नहीं था, और हमें सर्टिफिकेट के बारे में जानकारी पाने के लिए गूगल पर निर्भर रहना पड़ता था.”
सरकारी नौकरी का लालच इतना ज़्यादा था कि सर्टिफिकेट के लिए बेताब होकर देखने की इच्छा को रोक नहीं सका. उन्होंने बताया, “मैंने यह खोजने की कोशिश की कि मैं उस सर्टिफिकेट के लिए कैसे क्वालिफ़ाई कर सकता हूं, लेकिन लोकल लेवल पर ऐसा कोई सेंटर नहीं मिला. मैंने गूगल और यूट्यूब पर सर्च किया और इस टीचर तक पहुंचा, जिसका CAPF में कांस्टेबल रैंक की परीक्षा के लिए कैंडिडेट्स को ऑनलाइन पढ़ाने का इतिहास रहा है.” इन गूगल सर्च से ‘डिफेंस 93’ नाम का यूट्यूब चैनल मिला, जिसके मालिक मुकेश यादव ने उन्हें क्लास और ट्रेनिंग के बाद सर्टिफिकेट देने का भरोसा दिलाया. अभिकाश ने कहा, “वे हमें सब्जियों को साफ करने के सही तरीकों और किसी खास डिश के लिए ज़रूरी नमक की मात्रा तय करने की ऑनलाइन बेसिक ट्रेनिंग दे रहे थे.”

एनरोल करने के बाद, उन्हें उनकी क्लास के लिए खास लिंक भी दिए गए और 50 सवालों के एग्जाम के बाद सर्टिफिकेट दिए गए. सर्टिफिकेट मिलने के बाद, अभिकाश ने कहा कि वह एग्जाम में क्वालिफाई हो गया और उसे रोज़गार मेले के लिए बुलाया गया, जहाँ उसने दावा किया कि उसे PM मोदी ने अपॉइंटमेंट लेटर दिया था.
हालांकि, एक साल में ही चीजें उलट गईं. “मैं अपने परिवार का गुज़ारा करने के लिए मुश्किल से 10,000 रुपये महीने कमा रहा हूं और मुझे कोई उम्मीद नहीं दिख रही है.”
रॉय ने असम में अपने गांव से बताया, “सर्टिफिकेट पर क्यूआर कोड सच में काम कर रहा था और हमारी डिटेल्स और पिता का नाम, और आधार नंबर दिखा रहा था, जिससे नकली सर्टिफिकेट होने का कोई इशारा नहीं मिल रहा था.” रॉय ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान बॉर्डर पर दुश्मनी के चरम पर बारामुल्ला में भी काम किया था.
उन सबकी ज़िंदगी ठीक चल रही थी, जब तक कि झारखंड के कोडरमा में दूर एक घटना ने उनकी ज़िंदगी और रोज़ी-रोटी को उलट-पुलट नहीं कर दिया. कोडरमा पुलिस को यादव के जालसाज़ी के जाल के बारे में एक टिप मिली जो उनकी नाक के नीचे चल रहा था.
झारखंड पुलिस के एक अधिकारी ने उस इनपुट को डॉक्यूमेंट किया, जो यादव के खिलाफ एफआईआर का आधार बना, “शिक्षा देने की आड़ में, वह कथित तौर पर ऑनलाइन वीडियो कॉल की साज़िश के ज़रिए आम जनता और छात्रों को धोखा दे रहा था. कथित तौर पर उसने यूट्यूब और दूसरे सोशल मीडिया जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके बड़ी रकम के बदले नौकरी का वादा किया, जबकि नकली सर्टिफिकेट और छेड़छाड़ किए गए दस्तावेज़ दिखाए.”
यादव पर क्रिमिनल साज़िश, धोखाधड़ी और क्रिमिनल ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट के साथ-साथ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2008 के उल्लंघन से जुड़ी धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया, और उसे उसके काम करने की जगह से गिरफ़्तार कर लिया गया.
पुलिस को उसके फ़ोन पर नकली सर्टिफिकेट, WhatsApp चैट और नौकरी पाने के बारे में बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग के सबूत मिले, साथ ही वीडियो में उसका मोबाइल नंबर नकली सर्टिफिकेट के साथ दिखाया गया और वह स्टूडेंट्स को ऐसे सर्टिफ़िकेट लेने के लिए उकसा रहा था.
गिरफ़्तारी 8 फरवरी को कोडरमा में हुई, और जिन व्यापारियों ने उसके ज़रिए सर्टिफिकेट हासिल किए थे, उन्हें लगभग उसी समय शो-कॉज़ नोटिस मिलने लगे. उदाहरण के लिए, बुलंदशहर के तरुण शर्मा को 12 फरवरी को नोटिस मिला.
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