नई दिल्ली: सरकार द्वारा करीब 100 साल पुराने ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड को खत्म करके उसके उत्पादन नेटवर्क को सात अलग-अलग डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (DPSUs) में बांटने के पांच साल बाद, नई कंपनियां मिलकर घाटे से निकलकर मुनाफे में आ गई हैं. इन कंपनियों ने राजस्व, मुनाफे और निर्यात में तेज बढ़ोतरी दर्ज की है.
ये सात कंपनियां हैं. म्यूनिशन्स इंडिया लिमिटेड, यंत्र इंडिया लिमिटेड, आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड, एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड, ट्रूप कम्फर्ट्स लिमिटेड, इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड और ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड.
2026 के रक्षा मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2025-26 में इनका कुल अस्थायी राजस्व बढ़कर 26,496 करोड़ रुपये हो गया, जो 2019-20 में 12,755 करोड़ रुपये था. 2019-20 वह आखिरी वित्त वर्ष था, जो ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के कॉरपोरेटाइजेशन से पहले था.
वित्तीय स्थिति में बड़ा बदलाव आया है. 2019-20 में इन सात कंपनियों को मिलाकर 2,844 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था. 2025-26 में इनका अस्थायी कुल मुनाफा 2,801 करोड़ रुपये रहा. 2019-20 में इनका निर्यात 81 करोड़ रुपये था, जो 2025 में बढ़कर 4,561 करोड़ रुपये हो गया. वहीं, इन कंपनियों के बनने के बाद से अब तक कुल निर्यात 10,169 करोड़ रुपये रहा.
इन सात कंपनियों में से चार कंपनियों, म्यूनिशन्स इंडिया, आर्मर्ड व्हीकल्स निगम, इंडिया ऑप्टेल और यंत्र इंडिया, को मिनी-रत्न कैटेगरी-I का दर्जा भी दिया गया है. यह भारत सरकार की ओर से मुनाफा कमाने वाले सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज (CPSEs) को दिया जाने वाला खास दर्जा है. इससे उन्हें ज्यादा वित्तीय स्वतंत्रता मिलती है और कुछ फैसलों के लिए पहले से सरकारी मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होती.

इस पुनर्गठन का मकसद फैक्ट्रियों को पुराने ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड की पाबंदियों से अलग करना और उन्हें कारोबारी कंपनियों की तरह काम करने का मौका देना था, जबकि वे सशस्त्र बलों की जरूरतें पूरी करती रहें.
इन कंपनियों ने गोला-बारूद, बख्तरबंद गाड़ियां, तोपें, ऑप्टिकल सिस्टम, सैन्य कपड़े और पैराशूट का उत्पादन बढ़ाया है.
हालांकि, सातों कंपनियों के आंकड़े एक जैसी तस्वीर नहीं दिखाते.
जहां MIL, यंत्र इंडिया, AVNL और इंडिया ऑप्टेल जैसी कंपनियां राजस्व और मुनाफे में बढ़ोतरी दिखा रही हैं, वहीं ट्रूप कम्फर्ट्स अभी भी घाटे से निकलने की कोशिश कर रही है. AWEIL कुल मिलाकर मुनाफे में है, लेकिन उसकी छोटे हथियार बनाने वाली यूनिट्स पर दबाव है. अगस्त में संसद के दोनों सदनों में पेश की गई पब्लिक अकाउंट्स कमेटी (PAC) की रिपोर्ट में भी इस बात का जिक्र किया गया है.
म्यूनिशन्स इंडिया: गोला-बारूद
पुणे में मुख्यालय वाली म्यूनिशन्स इंडिया की देश के गोला-बारूद उद्योग में शायद सबसे व्यापक भूमिका है.
2021 में बनाई गई यह कंपनी भारत के सशस्त्र बलों, विदेशी सेनाओं और नागरिक ग्राहकों के लिए गोला-बारूद, विस्फोटक, रॉकेट और बम बनाती है. इसके उत्पाद छोटे कैलिबर के गोला-बारूद से लेकर बड़े तोप के गोले और हवा से जमीन पर मार करने वाले हथियारों तक हैं.
सरकार ने उत्पादन क्षमता को आधुनिक बनाने और युद्ध के लिए भंडार तैयार करने की व्यापक कोशिश के तहत कंपनी में निवेश बढ़ाया है.
कंपनी के लिए बजट आवंटन 2023 में 577 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024 में 580 करोड़ रुपये और 2025 में 745.45 करोड़ रुपये हो गया. यह सात नई रक्षा PSUs में सबसे ज्यादा बजट आवंटन है.
इस पैसे का इस्तेमाल उपकरणों को आधुनिक बनाने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने और नई मैन्युफैक्चरिंग लाइनें शुरू करने के लिए किया गया है. इसमें 30 mm और 40 mm ग्रेनेड लॉन्चर के गोला-बारूद की लाइनें भी शामिल हैं.
इसके उत्पादों में पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चिंग सिस्टम, हैंड ग्रेनेड, हाई-स्पीड लो-ड्रैग बम, APFSDS गोला-बारूद, शिवालिक मल्टी-मोड हैंड ग्रेनेड, 155 mm हाई-एक्सप्लोसिव एक्सटेंडेड-रेंज शेल, नौसैनिक माइंस, 1,000 पाउंड के हवा से जमीन पर मार करने वाले बम, 68 mm रॉकेट और मोर्टार बम शामिल हैं.
आर्मर-पियर्सिंग फिन-स्टेबलाइज्ड डिस्कार्डिंग सैबोट (APFSDS) एक लंबा डार्ट जैसा पेनेट्रेटर होता है, या सीधे शब्दों में कहें तो डार्ट गोला-बारूद. यह एक तरह का काइनेटिक एनर्जी पेनेट्रेटर गोला-बारूद है, जिसका इस्तेमाल युद्धक टैंकों में किया जाता है.
इसके ज्यादा महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों में से एक 155 mm का तोप का गोला है, जिसमें रैमजेट प्रोपल्शन का इस्तेमाल किया जाता है. 2026 में चलाया गया यह प्रोजेक्ट IIT मद्रास और दूसरे रिसर्च संस्थानों के साथ मिलकर विकसित किया गया है. इसका मकसद घातक क्षमता कम किए बिना सामान्य तोप के गोलों की मारक दूरी बढ़ाना है.
इस तकनीक को सामान्य तोप के गोलों की रेंज 30 से 50 प्रतिशत तक बढ़ाने के लिए बनाया गया है और इसे मौजूदा 155 mm तोप के गोला-बारूद में भी लगाया जा सकता है. दिसंबर 2025 तक पोखरण और IIT मद्रास में किए गए विकास परीक्षणों के सफल होने की जानकारी दी गई थी.
कंपनी ने निर्यात का कारोबार भी खड़ा किया है. उनकी आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने 2017 और 2019 में कंपनी से 155 mm तोप का गोला-बारूद खरीदा था, जबकि आर्मेनिया को भी एक ग्राहक के तौर पर बताया गया है.
2024 में म्यूनिशन्स इंडिया और उसकी साझेदार कंपनी नद्राह कंपनी ने सऊदी अरब को तोप का गोला-बारूद सप्लाई करने के लिए 225 मिलियन डॉलर का समझौता किया.
मार्च 2024 तक कंपनी के पास करीब 6,000 करोड़ रुपये के निर्यात ऑर्डर थे, जिन्हें 2026-27 तक पूरा किया जाना था. UAE, वियतनाम और एक ऐसे यूरोपीय देश, जिसका नाम नहीं बताया गया, उसके प्रमुख ग्राहकों में शामिल थे.
कंपनी ने 2023 और 2024 की शुरुआत में जर्मनी की राइनमेटल को 500 टन विस्फोटक भी निर्यात किया. 2023-24 में निर्यात म्यूनिशन्स इंडिया के 7,000 करोड़ रुपये के कारोबार का करीब 2,000 करोड़ रुपये, यानी 28.5 प्रतिशत था.
म्यूनिशन्स इंडिया ने 2024-25 में 8,282 करोड़ रुपये का अस्थायी टर्नओवर दर्ज किया. इस दौरान निर्यात तेजी से बढ़कर अस्थायी तौर पर 3,081 करोड़ रुपये हो गया. इस दौरान किसी घाटे की जानकारी नहीं दी गई.
यंत्र इंडिया: उत्पादन
नागपुर में मुख्यालय वाली यंत्र इंडिया लिमिटेड ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड से मिली आठ रक्षा उत्पादन इकाइयां चलाती है. इसकी फैक्ट्रियां सशस्त्र बलों के लिए हथियार, विस्फोटक, तोप और गोला-बारूद सप्लाई करती हैं.
यह कंपनी पिनाका रॉकेट बनाने में भी शामिल है, जिसका इस्तेमाल पिनाका लॉन्च सिस्टम में किया जाता है.
2025-26 में यंत्र इंडिया ने ऑपरेशंस से अब तक का सबसे ज्यादा राजस्व दर्ज किया, जो कुल 3,522 करोड़ रुपये रहा. यह पिछले साल के मुकाबले 13.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी है. यह आंकड़ा अस्थायी और ऑडिट से पहले का है.
इसके विस्तार में लंबे समय की औद्योगिक साझेदारियां भी शामिल हैं. यंत्र इंडिया ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स के साथ 10 साल का समझौता किया है. इसमें 435 करोड़ रुपये की ब्याज-मुक्त एडवांस रकम और 17,420 टन सामान की सप्लाई शामिल है. इसके अलावा भारत डायनेमिक्स के साथ भी एक अलग समझौता किया गया है.
यंत्र इंडिया ने वित्त वर्ष 2024-25 में टैक्स से पहले 509 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया. यह पिछले साल के 425 करोड़ रुपये के मुकाबले 19.7 प्रतिशत ज्यादा था. इस दौरान कोई घाटा नहीं हुआ.
आर्मर्ड व्हीकल्स निगम: टैंक, तोपें और युद्ध की गाड़ियां
आर्मर्ड व्हीकल्स निगम (AVANI), जिसका मुख्यालय चेन्नई के पास अवडी में है, बख्तरबंद लड़ाकू गाड़ियां, मुख्य युद्धक टैंक, सैन्य गाड़ियां और उनके इंजन बनाने के लिए बनाया गया था.
इसके पोर्टफोलियो में अर्जुन टैंक, इसके कई वेरिएंट और सपोर्ट गाड़ियां, तोपों के सिस्टम और खास तरह के बख्तरबंद प्लेटफॉर्म शामिल हैं.
AVANI के अर्जुन पर आधारित दूसरे सिस्टम में अर्जुन कैटापल्ट, एक 130 mm सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर, ब्रिज-लेयर टैंक, अर्जुन बख्तरबंद रिकवरी और रिपेयर वाहन और प्रयोग के लिए बनाया गया Tank EX शामिल हैं. Tank EX में T-72 का चेसिस और अर्जुन का टर्रेट जोड़ा गया है.
जबलपुर में AVANI के काम में आदित्य माइन-प्रोटेक्टेड वाहन, शारंग 155 mm आर्टिलरी गन और सुपर स्टैलियन सैन्य ट्रक शामिल हैं. शारंग एक अपग्रेड की गई 130 mm गन है, जिसे 155 mm में बदला गया है. इससे इसकी मारक दूरी 27 km से बढ़कर 36 km से ज्यादा हो गई है.
मेडक में AVANI कई खास गाड़ियां बनाती है. इनमें बख्तरबंद एंबुलेंस ट्रैक्ड वाहन, बख्तरबंद इंजीनियरिंग रिकॉनिसेंस वाहन, कैरियर मोर्टार ट्रैक्ड वाहन, CRN-91 नेवल गन और NAMICA नाग मिसाइल कैरियर शामिल हैं.
कंपनी ने 2025-26 में अब तक का सबसे ज्यादा 6,093 करोड़ रुपये का राजस्व दर्ज किया. यह पिछले साल के मुकाबले करीब 22 प्रतिशत ज्यादा है. 2024-25 में इसका राजस्व 4,984 करोड़ रुपये था, जबकि इसका ऑर्डर बुक करीब 35,553 करोड़ रुपये से 36,662 करोड़ रुपये का था.
AVANI ने अवडी, चेन्नई और मेडक, तेलंगाना में डिजाइन और इनोवेशन सेंटर भी बनाए हैं. यह उत्पादन से आगे बढ़कर अपने स्तर पर इंजीनियरिंग और नए उत्पादों के विकास की दिशा में बदलाव को दिखाता है.
आर्मर्ड व्हीकल्स निगम ने वित्त वर्ष 2024-25 के लिए करीब 4,986 करोड़ रुपये का अस्थायी टर्नओवर दर्ज किया और किसी घाटे की जानकारी नहीं दी गई.
ट्रूप कम्फर्ट्स: सैनिकों के लिए कपड़े और सामान
नई कंपनियों में से सभी हथियार नहीं बनातीं. कानपुर में मुख्यालय वाली ट्रूप कम्फर्ट्स वह सामान बनाती है, जिसकी सैनिकों को मुश्किल माहौल में काम करने के लिए जरूरत होती है.
इसके उत्पादों में अलग-अलग मौसम और परिस्थितियों के लिए कपड़े, बहुत ठंडे मौसम के कपड़े, पर्वतारोहण का सामान, सामान गिराकर पहुंचाने वाले उपकरण, पानी रखने के उपकरण और टेंट शामिल हैं. ये सामान सशस्त्र बलों और आम ग्राहकों, दोनों के लिए बनाए जाते हैं.
कंपनी में ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड की चार पुरानी सुविधाएं शामिल हैं. इनमें कानपुर की ऑर्डनेंस इक्विपमेंट फैक्ट्री, शाहजहांपुर की ऑर्डनेंस क्लोदिंग फैक्ट्री, अवडी की ऑर्डनेंस क्लोदिंग फैक्ट्री और हजरतपुर की ऑर्डनेंस इक्विपमेंट फैक्ट्री शामिल हैं.
इसका ऑपरेटिंग राजस्व 100 करोड़ रुपये से 500 करोड़ रुपये के बीच बताया गया है. अलग-अलग वित्त वर्षों में कंपनी का मुनाफा अलग रहा है.
कंपनी ने आयात होने वाले सामान की जगह देश में बने सामान का इस्तेमाल बढ़ाने पर भी काम किया है. इसने ऊंचाई वाले इलाकों में इस्तेमाल होने वाले दस्ताने और रॉक पिटॉन बनाए, जिन्हें पहले सेना आयात करती थी. सेना मुख्यालय में हुए परीक्षणों में इसके सैंपल ही संतोषजनक पाए जाने की जानकारी दी गई.
ट्रूप कम्फर्ट्स ने 2024-25 में अपना घाटा काफी कम करके 132.96 करोड़ रुपये कर लिया, जबकि 2023-24 में घाटा 303.07 करोड़ रुपये था. 2024-25 में मुनाफा 19 करोड़ रुपये रहा.
घाटा कम होने की वजह लागत में कटौती नहीं, बल्कि राजस्व में तेज बढ़ोतरी थी. हालांकि, ऑपरेशंस से राजस्व करीब 97.5 प्रतिशत बढ़कर 280.37 करोड़ रुपये से 553.81 करोड़ रुपये हो गया. करीब 819 करोड़ रुपये का कुल खर्च करीब 633 करोड़ रुपये की कुल आय से ज्यादा था.
इंडिया ऑप्टेल: आंखें और सेंसर
देहरादून में मुख्यालय वाली इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड ऐसे ऑप्टिकल और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम पर ध्यान देती है, जो हथियारों और सैनिकों को टारगेट पहचानने और उन पर कार्रवाई करने में मदद करते हैं.
यह भारतीय सेना और विदेशी ग्राहकों के लिए इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर, हथियारों के साइट और कम्युनिकेशन उपकरण बनाती है. कंपनी में देहरादून और चंडीगढ़ की ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड की तीन पुरानी सुविधाएं शामिल हैं.
दिसंबर 2025 में इंडिया ऑप्टेल ने फ्रांस की सैफ्रन इलेक्ट्रॉनिक्स एंड डिफेंस के साथ मिलकर काम करने का समझौता किया. इसके तहत Sigma 30N डिजिटल रिंग-लेजर-गायरो इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और CM3-MR डायरेक्ट-फायरिंग साइट का उत्पादन किया जाना है.
इस समझौते के तहत उत्पादन, अंतिम असेंबली, टेस्टिंग, क्वालिटी कंट्रोल और पूरे जीवनकाल में सपोर्ट की जिम्मेदारी इंडिया ऑप्टेल की है. इन सिस्टम का इस्तेमाल तोपों, एयर डिफेंस सिस्टम, मिसाइलों, रडार और एंटी-ड्रोन सिस्टम में किया जाना है.
कंपनी की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, इंडिया ऑप्टेल ने वित्त वर्ष 2024-25 में अब तक का सबसे ज्यादा 1,541 करोड़ रुपये का टर्नओवर दर्ज किया और टैक्स के बाद 294 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाया. इसकी 2025-26 की रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने अब तक का सबसे अच्छा ऑपरेशनल प्रदर्शन किया और 2,010.70 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड टर्नओवर हासिल किया. यह पिछले वित्त वर्ष 2024-25 के मुकाबले टर्नओवर में 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी थी.
ग्लाइडर्स इंडिया: भारत की सेना के लिए पैराशूट
ग्लाइडर्स इंडिया का मुख्यालय कानपुर की ऑर्डनेंस पैराशूट फैक्ट्री में है. यह सैन्य पैराशूट, एयरोस्पेस और आपात स्थिति में इस्तेमाल होने वाले पैराशूट और दूसरे संबंधित उत्पाद बनाती है. कंपनी ने मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत कार्यक्रमों के तहत अपना अंतरराष्ट्रीय कारोबार बढ़ाने की कोशिश की है.
इस साल की शुरुआत में इसे वियतनाम से 30 करोड़ रुपये का निर्यात कॉन्ट्रैक्ट मिला. इसके तहत वियतनाम के Su-30 लड़ाकू विमानों के लिए ट्विन-कैनोपी ब्रेक पैराशूट और PSU-36 सीरीज के पायलट पैराशूट बनाए और सप्लाई किए जाने हैं.
यह सौदा 2023 में मिले 17 करोड़ रुपये के निर्यात ऑर्डर और उससे जुड़े 26 करोड़ रुपये के समझौते के बाद हुआ. इस समझौते में 274 लड़ाकू विमानों के पैराशूट शामिल थे.
कंपनी ने कहा है कि उसके उत्पाद पारंपरिक सप्लायरों के मुकाबले करीब 30 प्रतिशत कम कीमत पर मिलते हैं और इन्हें करीब दो महीने में डिलीवर किया जा सकता है. इसके मुकाबले कुछ रूसी सरकारी निर्यातकों से सामान आने में ज्यादा समय लगता है.
कंपनी को आगे और निर्यात के मौके तलाशने के लिए भी तैयार किया गया है. इसमें मिस्र के MiG-29 विमानों के बेड़े के लिए पैराशूट को लेकर चल रही बातचीत भी शामिल है. इसमें DRDO से मिले टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की मदद ली जा रही है.
ग्लाइडर्स इंडिया का शुद्ध मुनाफा 2022-23 में 6.86 करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-24 में 10.77 करोड़ रुपये और 2024-25 में 16.67 करोड़ रुपये हो गया. 2023-24 में निर्यात से राजस्व 21 करोड़ रुपये रहा, जो कुल टर्नओवर का करीब 12 प्रतिशत था. 2023-24 और 2024-25 के बीच कंपनी का मुनाफा 54 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा.
ग्लाइडर्स इंडिया खुद को भारत की एकमात्र ऐसी DPSU बताती है, जो पैराशूट, इन्फ्लेटेबल्स और तकनीकी टेक्सटाइल्स के लिए समर्पित है. इसने नॉर्दर्न कमांड के लिए उपकरण भी विकसित किए हैं और इंडस्ट्री-अकादमिक रिसर्च प्रोग्राम भी शुरू किया है.
AWEIL: असॉल्ट राइफलें
एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड (AWEIL) कई तरह के सैन्य सामान बनाती है. इसमें असॉल्ट राइफलें, लाइट मशीन गन, स्नाइपर और एंटी-मटेरियल राइफलें, पिस्तौल, धनुष 155 mm टो की जाने वाली आर्टिलरी गन, मोर्टार, नेवल गन सिस्टम और T-90, T-72 और अर्जुन प्लेटफॉर्म के लिए टैंक गन के हिस्से शामिल हैं.
यह मौजूदा गन सिस्टम की ओवरहॉलिंग भी करती है और अलग-अलग कैलिबर के लिए गोला-बारूद, हार्डवेयर और स्पेयर पार्ट्स सप्लाई करती है.
निर्यात के मामले में, AWEIL ने मध्य पूर्व, यूरोप और एशिया के खरीदारों से करीब 581 करोड़ रुपये के 14 ऑर्डर हासिल किए हैं. पुराने ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के ढांचे में लगभग न के बराबर निर्यात गतिविधि होती थी, उसके मुकाबले यह एक बड़ा बदलाव है.
कंपनी खुद को इंडियन ऑफसेट पार्टनर के तौर पर भी स्थापित कर रही है और रक्षा मंत्रालय के जरिए रक्षा सहयोग के मौकों पर काम कर रही है.
AWEIL ने 2024-25 में 82.74 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया. कुल मिलाकर मुनाफे में होने के बावजूद, PAC की रिपोर्ट में AWEIL की छोटे हथियार बनाने वाली तीन यूनिट्स पर काफी वित्तीय दबाव की बात कही गई है.
पैनल ने पाया कि इन फैक्ट्रियों को मिलाकर 2023-24 से 2025-26 के बीच 234 करोड़ रुपये का घाटा हुआ. इसके अनुसार, घाटे की मुख्य वजह ज्यादा ओवरहेड लागत थी, जिससे हर यूनिट के उत्पादन का खर्च बढ़ गया.
पुरानी DPSUs
सात नई कंपनियां सरकार के स्वामित्व वाले एक बहुत बड़े रक्षा-औद्योगिक नेटवर्क का हिस्सा हैं. अब ये हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL), भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, BEML, भारत डायनेमिक्स, गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स, गोवा शिपयार्ड, हिंदुस्तान शिपयार्ड, मझगांव डॉक और MIDHANI जैसी पहले से स्थापित रक्षा कंपनियों के साथ काम करती हैं.
पुरानी कंपनियों में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स सैन्य एयरोस्पेस के क्षेत्र में अब भी अहम है. HAL को 2024 में महारत्न का दर्जा मिला, जो CPSEs के लिए सबसे ऊंचा वित्तीय दर्जा है. यह सात राज्यों और 10 जगहों पर 20 डिवीजन और 10 रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर चलाती है.
सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, सशस्त्र बलों के कुछ खास हिस्सों में इसके विमान और हेलिकॉप्टर बेड़े की कुल संख्या का 60 से 100 प्रतिशत हिस्सा हैं, जबकि कंपनी पूरे बेड़े के करीब 75 प्रतिशत हिस्से को सपोर्ट करती है.
इसके स्वदेशी पोर्टफोलियो में तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट, HTT-40 ट्रेनर, प्रचंड लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टर, लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर और ध्रुव एडवांस्ड लाइट हेलिकॉप्टर शामिल हैं.
नासिक में तेजस Mk1A की तीसरी प्रोडक्शन लाइन शुरू होने से HAL की सालाना क्षमता बढ़कर 24 विमान हो गई है. इस सुविधा से पहला विमान अक्टूबर 2025 में रवाना किया गया.
वहीं भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) पारंपरिक इलेक्ट्रॉनिक्स से आगे बढ़कर ऑटोनॉमस सिस्टम और प्रिसिजन हथियारों के क्षेत्र में भी विस्तार कर रही है.
नौसेना के वेपन्स एंड इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स इंजीनियरिंग एस्टैब्लिशमेंट के साथ BEL ने ऑटोनॉमस अनमैन्ड सरफेस वेसल्स के लिए सॉफ्टवेयर विकसित किया और फ्रांस की Safran के साथ भारत में HAMMER, यानी Highly Agile Modular Munition Extended Range, प्रिसिजन-गाइडेड हवा से जमीन पर मार करने वाले हथियार के उत्पादन के लिए जॉइंट वेंचर पर हस्ताक्षर किए.
BEL 100 प्रतिशत रिन्यूएबल एनर्जी पर जाने के बाद RE100 स्टेटस हासिल करने वाली पहली DPSU भी बन गई है. यह उपलब्धि RE100 पहल के तहत कंपनी के नियमों का पालन करने को दिखाती है. RE100 एक वैश्विक कॉरपोरेट क्लाइमेट अभियान है, जिसे अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संस्थाएं क्लाइमेट ग्रुप और CDP चलाती हैं.
इसके अलावा, कंपनी ने इंदौर में एक सॉफ्टवेयर सेंटर बनाया है, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और वेब-आधारित क्वालिटी इंस्पेक्शन पर ध्यान देता है.
1964 में स्थापित BEML रक्षा, खनन, निर्माण, रेल, मेट्रो, समुद्री, एयरोस्पेस और अंतरिक्ष क्षेत्रों में काम करती है. इसने अपने कामकाज को 14 रणनीतिक बिजनेस यूनिट्स में दोबारा संगठित किया और IE3 मोटर्स, 770 LED लाइट्स और वेरिएबल-फ्रीक्वेंसी ड्राइव्स जैसे ऊर्जा-कुशल उपाय लागू किए.
भारत डायनेमिक्स लिमिटेड ने 1970 में SS11B1 एंटी-टैंक मिसाइल बनाकर काम शुरू किया था. अब यह Konkurs-M, Milan-2T और Invar मिसाइलों के साथ-साथ आकाश सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें बनाती है.
इसकी तीन यूनिट्स ने 100 प्रतिशत रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल हासिल किया. रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 में बड़े पैमाने पर उत्पादन की मंजूरी मिलने से पहले लेह में ज्यादा ऊंचाई पर Improved Akash सिस्टम के परीक्षण पूरे किए गए.
भारत के सरकारी शिपयार्डों ने भी उत्पादन बढ़ाया है. कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स ने 807 प्लेटफॉर्म बनाए हैं, जिनमें 118 युद्धपोत शामिल हैं, और वह नौ प्रोजेक्ट्स के तहत 39 जहाज बना रही थी. मार्च 2026 में इसका ऑर्डर बुक 15,324.13 करोड़ रुपये था.
गोवा शिपयार्ड ने 2025 में 230 से ज्यादा जहाज और 171 से ज्यादा नावें डिलीवर कीं. वित्तीय और ऑपरेशनल बदलाव से गुजर चुके हिंदुस्तान शिपयार्ड को मिनी-रत्न का दर्जा मिला और उसने INS निस्तार डिलीवर किया, जो देश में डिजाइन किया गया डाइविंग-सपोर्ट जहाज है. 2025 में इसने 55 जहाजों को डॉक में लिया और बाहर निकाला और 19 रिफिट तय समय से पहले या समय पर पूरे किए.
मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स भारत का एकमात्र ऐसा शिपयार्ड है, जिसके पास विध्वंसक और दो तरह की पारंपरिक पनडुब्बियां बनाने की स्थापित क्षमता है. जनवरी 2025 में इसने INS सूरत, INS नीलगिरी और INS वाघशीर को कमीशन किया. ये क्रमशः एक विध्वंसक, एक फ्रिगेट और एक पनडुब्बी हैं.
कंपनी ने लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक्स पर भी एक समझौता किया है. उसने पनडुब्बियों के रखरखाव को लेकर भारतीय और ब्राजील की नौसेनाओं के साथ तीन पक्षों वाले समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए और करीब 27 मिलियन डॉलर में श्रीलंका के कोलंबो डॉकयार्ड में 51 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी. यह उसका पहला अंतरराष्ट्रीय कारोबार है.
इस पूरे उत्पादन के पीछे MIDHANI की भी बड़ी भूमिका है. यह सुपरएलॉय, टाइटेनियम एलॉय और खास स्टील बनाती है. इसकी रोहतक फैक्ट्री आर्मर और सुरक्षा उपकरण बनाती है, जबकि HAL, भारत डायनेमिक्स, NSIL, आकांक्षा और DRDO के साथ उसका मेटल बैंक छह जरूरी कच्चे माल की सप्लाई सुरक्षित करने के लिए बनाया गया है.
MIDHANI ने HY-80 और HY-100 पनडुब्बी स्टील को भी देश में बनाना शुरू किया है. इन्हें पहले फ्रांस से आयात किया जाता था.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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