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Wednesday, 30 September, 2026
होमहेल्थजन औषधि स्टोर्स में आयुष की और दवाएं मिलेंगी, सालाना कारोबार में 200 करोड़ रुपये तक बढ़ोतरी की उम्मीद

जन औषधि स्टोर्स में आयुष की और दवाएं मिलेंगी, सालाना कारोबार में 200 करोड़ रुपये तक बढ़ोतरी की उम्मीद

दवाओं की सूची बढ़ाने का फैसला लिया जा चुका है. हालांकि, कौन-कौन से प्रोडक्ट्स जोड़े जाएंगे, यह अभी तय किया जा रहा है. आखिर में आयुष प्रोडक्ट्स की संख्या बढ़ाकर 100 तक करने का लक्ष्य है.

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नई दिल्ली: कम कीमत पर जेनेरिक दवाएं बेचने वाले सरकारी जन औषधि स्टोर्स अब आयुर्वेदिक दवाओं की अपनी सूची बढ़ाने जा रहे हैं. इनमें डॉक्टर की पर्ची पर मिलने वाली आयुर्वेदिक दवाएं भी रखी जाएंगी. एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि आगे चलकर इन स्टोर्स पर 100 तक आयुष प्रोडक्ट्स उपलब्ध कराने का लक्ष्य है.

यह कदम केंद्र सरकार की उस कोशिश का हिस्सा है, जिसके तहत आयुर्वेदिक दवाओं को अभी जन औषधि नेटवर्क पर मिलने वाले न्यूट्रास्यूटिकल्स और बिना डॉक्टर की पर्ची के मिलने वाले प्रोडक्ट्स से आगे बढ़ाया जा रहा है. न्यूट्रास्यूटिकल्स ऐसे प्रोडक्ट्स होते हैं, जिन्हें किसी खास बीमारी का इलाज करने के बजाय स्वास्थ्य लाभ के लिए लिया जाता है. यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब सरकार आयुर्वेद में रिसर्च, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा ध्यान दे रही है.

जन औषधि केंद्र सस्ती दवाएं बेचने वाली दुकानें हैं. इन्हें प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (PMBJP) के तहत बनाया गया है. यह योजना फार्मास्यूटिकल्स विभाग ने नवंबर 2008 में शुरू की थी, ताकि अच्छी क्वालिटी वाली जेनेरिक दवाएं कम कीमत पर उपलब्ध कराई जा सकें.

योजना की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, इस साल मार्च तक देशभर में 19,000 से ज्यादा जन औषधि केंद्र काम कर रहे थे. उक्त अधिकारी के मुताबिक, इस नेटवर्क में अभी आयुर्वेद से जुड़े करीब नौ न्यूट्रास्यूटिकल प्रोडक्ट बेचे जाते हैं. इनमें अश्वगंधा, त्रिफला, शिलाजीत और च्यवनप्राश शामिल हैं.

नाम नहीं बताने की शर्त पर अधिकारी ने कहा, “हम आयुर्वेद की कैटेगरी में कुछ और न्यूट्रास्यूटिकल प्रोडक्ट्स के साथ-साथ कुछ इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं भी शामिल करेंगे.”

प्रोडक्ट्स की लिस्ट बढ़ाने का फैसला पहले ही लिया जा चुका है. हालांकि, कौन-कौन से प्रोडक्ट्स शामिल किए जाएंगे, यह अभी तय किया जा रहा है. अधिकारी ने कहा, “आखिर में हमारा लक्ष्य आयुष प्रोडक्ट्स की संख्या बढ़ाकर 100 तक करना है. इन्हें अलग-अलग चरणों में जोड़ा जाएगा.”

दवाओं की पहचान

हालांकि, डॉक्टर की पर्ची पर मिलने वाली आयुर्वेदिक दवाओं का चयन आम तौर पर इस्तेमाल होने वाले हेल्थ प्रोडक्ट्स को जोड़ने से ज्यादा मुश्किल है.

अधिकारी ने कहा कि सरकार सूची को “तर्कसंगत” बनाने पर काम कर रही है, क्योंकि अलग-अलग राज्यों में आयुर्वेदिक दवाएं लिखने का तरीका और उनकी मांग अलग-अलग है.

ये अंतर आयुर्वेद के इस्तेमाल के क्षेत्रीय तरीकों को दिखाते हैं. इनमें आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली दवाओं और इलाज के तरीकों में अंतर के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर दवाओं की उपलब्धता और लोगों की पसंद भी शामिल है. रिसर्च में भारत के अलग-अलग हिस्सों में आयुर्वेद के इस्तेमाल में काफी अंतर दर्ज किया गया है.

दूसरे शब्दों में, सरकार ऐसी दवा को पूरे जन औषधि नेटवर्क में रखने से बचना चाहती है, जिसे मुख्य रूप से किसी खास क्षेत्र में ही लिखा जाता हो और बाकी जगहों पर जिसकी मांग कम हो. अधिकारी ने बताया कि केरल, तमिलनाडु या कर्नाटक में आम तौर पर लिखी जाने वाली किसी दवा को पूरे देश में एक जैसी मात्रा में रखना व्यावसायिक रूप से सही नहीं हो सकता.

उन्होंने कहा, “अगर हम ऐसी दवा रखते हैं, जिसे केरल, तमिलनाडु या कर्नाटक में डॉक्टर लिखते हैं, तो हम उसे आसानी से उपलब्ध करा सकते हैं, लेकिन इससे बाकी जगहों के लोगों को फायदा नहीं होगा.”

इसलिए चिंता इस बात को लेकर है कि कोई दवा किन जगहों पर आम तौर पर लिखी और खरीदी जाती है, न कि इस बात को लेकर कि देश के अलग-अलग हिस्सों में उस दवा का असर अलग होगा या नहीं.

उन्होंने कहा कि लक्ष्य ऐसी आयुर्वेदिक दवाओं की पहचान करना है, जिन्हें अलग-अलग राज्यों में ज्यादा डॉक्टर लिखते हों और जो वहां आसानी से उपलब्ध भी हों.

उन्होंने कहा कि कौन-कौन सी दवाएं सूची में जोड़ी जाएंगी, यह तय करने में बाजार की मांग भी एक वजह होगी.

अधिकारी ने कहा, “हम कम से कम उन प्रोडक्ट्स के साथ सूची बढ़ाएंगे, जिनका सालाना बाजार कारोबार ज्यादा है.”

जन औषधि स्टोर्स पहले ही जेनेरिक दवाओं से आगे बढ़ चुके हैं. इन दुकानों पर एलोवेरा जेल, सनस्क्रीन और जिनसेंग जैसे बिना डॉक्टर की पर्ची के मिलने वाले उत्पाद भी बेचे जाते हैं.

अधिकारी के अनुमान के मुताबिक, आयुर्वेदिक प्रोडक्ट्स के जुड़ने से पहले साल में 100-200 करोड़ रुपये का कारोबार हो सकता है. उन्होंने बताया कि पिछले साल नेटवर्क का कारोबार करीब 2,250 करोड़ रुपये था और इस साल 2,400 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा गया है.

यह विस्तार ऐसे समय में हो रहा है, जब पिछले एक दशक में आयुर्वेद और आयुष की दूसरी पद्धतियों को सरकार से ज्यादा फंडिंग और संस्थागत समर्थन मिला है.

आयुष मंत्रालय की स्थापना 2014 में हुई थी. इसके बाद से सरकार ने रिसर्च प्रोग्राम के लिए फंड दिया है, आयुष की पढ़ाई और क्लीनिकल संस्थानों का विस्तार किया है और कुछ सरकारी अस्पतालों में आयुष सेवाओं को शामिल करना शुरू किया है.

2026-27 के केंद्रीय बजट में आयुष मंत्रालय के लिए 4,408 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया और आयुर्वेद के तीन नए अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान बनाने की घोषणा की गई. इसमें आयुष फार्मेसी और दवाओं की जांच करने वाली लैब को मजबूत करने और जामनगर में WHO Global Traditional Medicine Centre के लिए भी प्रावधान किया गया.

सरकार की ओर से फंड मिलने वाली रिसर्च भी बढ़ी है. आयुर्ज्ञान योजना के तहत आयुष की अलग-अलग पद्धतियों में रिसर्च प्रोजेक्ट्स को समर्थन दिया गया है. वहीं AIIMS, IIT दिल्ली, NIMHANS और Tata Memorial Centre जैसे संस्थानों को आयुष और आधुनिक चिकित्सा से जुड़ी रिसर्च के लिए सहायता मिली है.

सरकार ने कुछ सरकारी अस्पतालों में आयुष विभाग भी बनाए हैं और पारंपरिक चिकित्सा को लेकर अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी समर्थन दिया है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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