अंग्रेज जासूस के घर की रखवाली एबिसिनियन बबून बंदरों की एक पूरी फौज करती थी. राजा ने उसे एक किशोर सेक्स-गुलाम तक तोहफे में दिया था. एक बार वह गधे पर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करते हुए सऊदी अरब की दक्षिणी सीमा के साथ-साथ अल-लिथ तक गया, जहां राजा की रोल्स-रॉयस उसका इंतिजार कर रही थी. लंदन के एथेनियम क्लब में उसके दोस्त उसे ‘जैक’ कहते थे. सऊदी दरबार में उसके आसपास घूमने वाले लोग उसे शेख अब्दुल्ला के नाम से जानते थे. हर असली आत्ममुग्ध इंसान की तरह, वह कई चीजों से प्यार करने का दावा करता था. साम्राज्यवाद, समाजवाद, फासीवाद, इस्लाम, और महिलाओं की एक लंबी सूची. लेकिन अपनी खुद में डूबी हुई सोच के कारण वह किसी भी चीज को ज्यादा समय तक नहीं निभा पाया. बेरूत के एक अस्पताल के बिस्तर पर जब वह मर रहा था, हैरी सेंट जॉन ब्रिजर फिल्बी को अपनी आखिरी सच्चाई का एहसास हुआ: “भगवान, मैं बोर हो गया हूं.”
पिछले हफ्ते जिंदगी ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, जिन्हें आम तौर पर उनके शुरुआती अक्षरों MbS से जाना जाता है, को एक कड़वा सबक दिया. जैसे ही यमन के अंसारुल्लाह विद्रोहियों ने लाल सागर के मुहाने के सामने वाले पहाड़ों पर कब्जा कर लिया, क्राउन प्रिंस की मदद की गुहार को अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने नजरअंदाज कर दिया. अपनी ही पार्टी की ओर से ईरान के साथ युद्ध खत्म करने के लिए भारी दबाव का सामना कर रहे ट्रंप ने MbS की अपील के बजाय अमेरिकी जहाजों के लिए सुरक्षित रास्ते को चुना.
प्रभावशाली लोगों, निवेश बैंकरों और मैनेजमेंट कंसल्टेंट्स की तारीफों से खुश होकर MbS को लगा कि अब महानता उसकी पहुंच में है. यमन में 10 साल चले युद्ध के बाद उसने ईरान में शासन परिवर्तन की कोशिश की और इलाके के छोटे देशों से उसकी बात मानने की मांग की. क्राउन प्रिंस ने बहुध्रुवीय दुनिया के बारे में कॉन्फ्रेंस रूम में होने वाली बातों पर भरोसा कर लिया था. उसे लगा कि सऊदी अरब की दौलत इतनी बड़ी है कि बड़ी ताकतें खुद उसके पीछे आएंगी.
ट्रंप ने मजाक में कहा, “He didn’t think he’d be kissing my ass.” (उसे नहीं लगा था कि उसे मेरी चापलूसी करनी पड़ेगी.)
करीब एक सदी पहले राजा की सबसे अंदरूनी सलाहकार परिषद में बैठे फिल्बी ने राजा अब्दुलअजीज इब्न सऊद के मन में तेल के जरिए एक साम्राज्य बनाने का सपना और मजबूत किया था. यही सपना बाद में MbS पर भी हावी हुआ. मई 1939 में जब वह दम्माम के तेल क्षेत्रों में गया, तो राजा ने एक ब्रिटिश राजनयिक से मजाक में कहा: “या इब्नी [ओ मेरे बेटे], यह सब तुम्हारा होना चाहिए था.” छह साल बाद, जब अब्दुलअजीज राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डेलानो रूजवेल्ट से मिला, तो उसने एक ऐसे अनलिखे समझौते को स्वीकार किया जिसमें सऊदी तेल के बदले अमेरिकी सुरक्षा दी गई. हालांकि बाद में उनका रक्षा बजट इलाके के बाकी सभी देशों के रक्षा बजट से बहुत ज्यादा हो गया, फिर भी सऊदी शासक ब्रिटिश साम्राज्यवाद की बेड़ियों को अमेरिकी बेड़ियों से बदलने के लिए तैयार थे. क्योंकि बाकी सभी विकल्प इससे भी खराब थे.
सभी खातून के राजा
अंधेरे के बीच डर करीब आता जा रहा था. ऊंट चलाने वाले धीमी आवाज में फुसफुसा रहे थे, जैसे डर कोई जिंदा चीज हो. पिछली रात गोली से मारे गए डाकू का शव चांदनी में रेत पर पड़ा था. खाली तंबू हवा में फड़फड़ा रहे थे. उनके रहने वाले बदला लेने वालों के पहुंचने से पहले ही भाग गए थे. गर्ट्रूड बेल की आंखों में आंसू भर आए. यह आंसू “डर के साथ-साथ थकान और भ्रम” से भी निकल रहे थे. 45 साल की बेल दिसंबर 1913 में रेगिस्तान के रास्ते ऊंट पर दमिश्क से हैइल के किले तक जाने के लिए निकली थीं. उन्होंने लिखा, “इस जगह से खून की गंध आती है, यहां हत्या दूध गिराने जैसी आम बात है.”
ऑक्सफोर्ड के लेडी मार्गरेट हॉल में पढ़ी बेल ने 1888 में आधुनिक इतिहास में प्रथम श्रेणी के सम्मान के साथ पढ़ाई पूरी की. हालांकि यूनिवर्सिटी ने अगले तीन दशकों तक महिलाओं की डिग्री को आधिकारिक मान्यता देने से इनकार किया. लेफ्टिनेंट-कर्नल पर्सी कॉक्स ने इस यात्रा को प्रोत्साहित किया. उनका मानना था कि बेल की काबिलियत हैइल अमीरात में बदलती वफादारियों का नक्शा बनाने में मदद करेगी.
भाई-भाई के बीच की हिंसा ने अल-रशीद राजवंश को अंदर से खोखला कर दिया था, बेल ने रिपोर्ट किया. सत्ता अमीर की शक करने वाली दादी फातिमा, उसके चालाक नपुंसक मुख्य सेवक और कुछ किशोर राजघराने के लोगों के हाथ में चली गई थी. हालांकि हैइल उस समय ओटोमन साम्राज्य के प्रति वफादार था, लेकिन उसका खत्म होना बस समय की बात थी.
इस मिशन के बाद बेल को अरब ब्यूरो में भर्ती किया गया. यह एक छोटी सैन्य खुफिया इकाई थी, जो 1916 से 1918 के बीच लेफ्टिनेंट-कर्नल टीई लॉरेंस के ओटोमन साम्राज्य के खिलाफ गुप्त युद्ध में मदद करती थी. जीत की खुशी ज्यादा समय तक नहीं रही. अपने देश पर कब्जे का खर्च खुद देने के लिए मजबूर किए जाने से नाराज कबीलों ने इराक में ब्रिटिश सेना के खिलाफ विद्रोह कर दिया. इस विद्रोह को बहुत बेरहमी से दबाया गया. रॉयल एयर फोर्स के पायलटों ने आम लोगों का कत्ल-ए-आम किया, फसलों को जलाया और जानवरों पर गोलियां चलाईं. लंदन को समझ आया कि साम्राज्यवादी शासन चलाने के लिए उसे एक स्थानीय चेहरा चाहिए.
अपने साथियों की तरह बेल का मानना था कि रेगिस्तान के अमीर ही अरब पहचान के असली केंद्र हैं, न कि पढ़े-लिखे शहरी राष्ट्रवादी. फैसल इब्न हुसैन, वह करिश्माई राजकुमार जिसने लॉरेंस के साथ लड़ाई की थी, को इराक का राजा बनाया गया. खातून ने फैसल को, जो इराक के लिए एक बाहरी व्यक्ति था, स्थानीय राजनीति की जानकारी दी, उसकी गुप्त सेवाओं को चलाया और उसके आलोचकों को साम्राज्य के दूर-दराज के इलाकों में निर्वासित कर दिया. उनका मानना था कि इराक के शिया बहुमत को सत्ता में हिस्सा देने से धर्मतंत्र का रास्ता खुल जाएगा. बेल ने नजफ के धर्मगुरुओं से मिलने के लिए घूंघट पहनने से इनकार कर दिया, जिससे इस मुद्दे पर कोई बातचीत ही नहीं हो सकी.
लेकिन एक अनपेक्षित समस्या थी. जिस समय बगदाद की खातून इराकी राष्ट्रवाद को खत्म करने में लगी हुई थीं, उसी समय अंग्रेज जासूस उसे बढ़ावा दे रहा था.
एक नाराज साम्राज्यवादी
500 मिस्री सिगरेट, 300 चेरूट, 1,000 राइफलें, सोने और चांदी की घड़ियां. अंग्रेज जासूस अरब में लोगों को अपने पक्ष में करने के सामान से लैस होकर गया था. अरबी जानने वाले कुछ साथियों के साथ भारतीय सिविल सेवा के इस अधिकारी को 1915 में पंजाब से मध्य पूर्व भेजा गया था. मिशन आसान था. नज्द के अमीर को रिश्वत देकर ब्रिटेन के उस मकसद में सहयोग करने के लिए तैयार करना था, जिसमें ओटोमन साम्राज्य के जहाजों और अरब जाने वाली रेल लाइनों को रोकना शामिल था. 1917 से 1923 के बीच अब्दुलअजीज को साम्राज्य की तरफ से 5,42,000 पाउंड मिले. कुवैत, बहरीन, इराक और ट्रांसजॉर्डन के दूसरे शासकों को इससे छोटी रकम मिली. हेजाज को ज्यादा रकम मिली, क्योंकि वह लॉरेंस के लिए अनियमित सैनिक तैयार कर रहा था.
हालांकि फिल्बी की अब्दुलअजीज को लेकर योजनाएं पूरी होने से पहले ही प्रथम विश्व युद्ध खत्म हो गया, लेकिन उसके पास महानता हासिल करने का एक और मौका था. 1920 में उसे इराक में काम करने के लिए भर्ती किया गया. इस बार उसका अपने अधिकारियों से ही झगड़ा हो गया. उसने उस धांधली वाले जनमत संग्रह का विरोध किया, जिसे बेल फैसल को राजा बनाने के लिए आयोजित कर रही थीं. अपनी अवज्ञा के कारण उसे बगदाद से निकाल दिया गया और अम्मान में तैनात कर दिया गया. हालांकि दो साल बाद उसे सिविल सेवा से निकाल दिया गया. उस पर आरोप था कि उसने अब्दुलअजीज को खुफिया जानकारी लीक की थी.
1921 की गर्मियों में खातून ने अपने पिता को लिखा: “मैं फिर कभी राजा बनाने के काम में शामिल नहीं होऊंगी. यह बहुत ज्यादा तनाव वाला काम है.” लेकिन फिल्बी अभी रुका नहीं था.
1930 की एक सुबह घर से निकलते समय फिल्बी ने शिकार पर जाने वाले कपड़े पहन रखे थे. लेकिन मक्का के बाहर एक तंबू में उसने चुपचाप कपड़े बदले और तीर्थयात्री की सफेद पोशाक पहन ली और इस्लाम कबूल कर लिया. इसके बाद वह राजा की निजी मजलिस में शामिल हो गया, ऐसा ब्रिटिश चार्जे द’अफेयर्स जीसी होप-गिल ने दर्ज किया. होप-गिल ने लिखा कि इस खास सलाहकार परिषद में बातचीत “आमतौर पर आखिर में महिलाओं तक पहुंच जाती थी.” बाद में फिल्बी ने इसका ज्यादा विस्तार से वर्णन किया: “राजा ने तब बताया कि उसने कम से कम 135 कुंवारी लड़कियों से शादी की थी, इसके अलावा करीब सौ और थीं.”
हालांकि बहुविवाह आम था, लेकिन इतनी ज्यादा संख्या से बहुत से लोग हैरान थे.
तब तक अब्दुलअजीज राजा बन चुका था. हालांकि वह 1932 में ही अपने राज्य का नाम बदलकर किंगडम ऑफ सऊदी अरब रखेगा. तुर्किये ने 1924 में खिलाफत खत्म कर दी थी और राजा हुसैन ने उसकी जगह लेने के लिए तुरंत कदम बढ़ाया. नज्द के अमीर ने युद्ध की तैयारी शुरू कर दी. आर्थिक तंगी से जूझ रहे ब्रिटिश, जिन्होंने 1923 में दोनों शासकों को दी जाने वाली अपनी आर्थिक मदद बंद कर दी थी, इस बात में दिलचस्पी नहीं रखते थे कि कौन जीतेगा. लड़ाई शुरू होने के तीन महीने बाद इखवान ने मक्का पर कब्जा कर लिया.
दोस्त और दुश्मन
लेकिन जब इखवान ने और ज्यादा इलाके पर कब्जा करने की कोशिश की, तो खून के साथ रिश्ते भी बदलने लगे. 1924 में ट्रांसजॉर्डन पर हमला करने वाले 5,000 इखवान लड़ाकों को RAF ने निशाना बनाया. RAF ने सैकड़ों लोगों को मार डाला और हेजाज तक जाने वाले पूरे रास्ते में सूजी हुई लाशों का निशान छोड़ दिया. इखवान के इराक में सीमा पर बने ठिकानों पर हमलों के बाद RAF ने सऊदी इलाके के अंदर तक हवाई हमले किए. 1927 से 1929 के बीच राजा अब्दुलअजीज को इखवान के खिलाफ लड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा और उन्होंने इस खतरनाक युद्ध को उन पर थोपने के लिए ब्रिटिशों को जिम्मेदार ठहराया. अंग्रेज जासूस 1922 से ही अब्दुलअजीज को इंग्लैंड से रिश्ता तोड़ने के लिए उकसा रहा था और अब राजा उसकी बात सुनने को तैयार था.
1933 में सऊदी अरब ने तेल की खोज के लिए अमेरिकी कंपनी SoCal को ठेका दिया और ब्रिटिश मालिकों वाली एक कंपनी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया. अगले साल अब्दुलअजीज यमन के साथ युद्ध में चला गया, लेकिन उत्तर में जाकर फंस गया. 1936 में फिल्बी हथियारबंद सऊदी सुरक्षा दल के साथ ब्रिटिश शासन वाले अदन में उकसावे वाली घुसपैठ करेगा. 1939 में अब्दुलअजीज ने अमेरिकी तेल रियायत का दायरा बढ़ा दिया. इसके एक साल बाद अबकैक में बहुत बड़ी मात्रा में तेल मिला.
संभव है कि सऊदी अरब का धुरी शक्तियों के साथ संबंध शुरू करने का फैसला भी फिल्बी के दबाव में हुआ हो. राजा के दूत खालिद अल-गारगानी ने 1939 में एडोल्फ हिटलर से मुलाकात की. इससे पहले राजा इथियोपिया में फासीवादी इटली की सेना को भेड़ और ऊंट देने पर सहमत हो चुका था.
नाजी सैनिकों के पोलैंड पर हमला करने से छह हफ्ते पहले फिल्बी ने फासीवाद समर्थक ब्रिटिश पीपुल्स पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर उपचुनाव लड़ने की कोशिश की, लेकिन हार गया. वह यह कहना शुरू कर चुका था कि नाजियों की जीत होने वाली है और उसने भारत और अमेरिका में भाषणों का दौरा करने की योजना बनाई.
राजा अब्दुलअजीज को समझ आ गया कि उसका दोस्त हद से आगे निकल गया है और उसने चुपचाप सुझाव दिया कि फिल्बी के साथ “मानसिक रोगी की तरह व्यवहार किया जाए”. अंग्रेज जासूस को अगस्त 1940 में कराची में गिरफ्तार कर लिया गया और फिर देश से बाहर भेज दिया गया. 1945 में राजा अब्दुलअजीज रूजवेल्ट के साथ एक समझौता करेगा. इस बार फिल्बी वहां मौजूद नहीं था.
ज्यादातर लोगों ने फिल्बी के इस्लाम और फासीवाद को अपनाने की बात को माफ कर दिया. अंग्रेज जासूस की मौत उसके पहले बेटे किम से पहले हो गई. बाद में किम, सीक्रेट इंटेलिजेंस सर्विस की सोवियत विरोधी शाखा का प्रमुख रहते हुए, डबल एजेंट निकला और उसने शीत युद्ध के दौरान दर्जनों खुफिया एजेंटों को मौत के मुंह में भेज दिया था.
अब्दुलअजीज के बाद आने वाले शासक व्यवहारिक सोच रखने वाले थे. राजा सऊद बिन अब्दुलअजीज अल-सऊद ने 1961 में अपने देश को गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल किया, लेकिन साथ ही अमेरिका को धहरान में बने बड़े सैन्य अड्डे को चलाने का अधिकार भी दिया. उनके छोटे भाई और उत्तराधिकारी फैसल अल-सऊद ने 1973 में इजरायल के खिलाफ लड़ने के लिए एक ब्रिगेड भेजी, लेकिन यह सुनिश्चित किया कि वह लड़ाई खत्म होने के बाद ही वहां पहुंचे. तख्तापलट और विदेशी साजिशों के डर से सऊदी शासकों ने अपनी सेना को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर कमजोर रखा और अमेरिका को देश की सीमाओं की सुरक्षा करने दी. MbS ने इस सावधानी को छोड़ दिया.
अब्दुलअजीज शायद अपने पोते से कह सकता था कि सभी महान कहानीकारों की तरह अंग्रेज जासूस ने भी यह दिखाया कि महानता बस थोड़ी दूर है. लेकिन वहां पहुंचने से पहले एक बहुत बड़ी खाई पार करनी थी, जो नीचे तक तबाही की गहराइयों में जाती थी.
प्रवीण स्वामी ‘दिप्रिंट’ में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका X हैंडल @praveenswami है. विचार निजी हैं.
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