भाजपा की सीएए वाली सियासी चाल बहुत कारगर नहीं रही क्योंकि इससे जिन लोगों को लाभ मिलता उन्हें पहले से मौजूद कानून के तहत भी आसानी से शामिल किया जा सकता है और नए प्रवासियों को अलग-थलग रखा जा सकता है.
सीएए न केवल भेदभावपूर्ण है, बल्कि इसका उद्देश्य भेदभावपूर्ण होना भी है. यदि सरकार मुसलमानों को शामिल करने के लिए अपना दायरा बढ़ाती है, तो अधिनियम राजनीतिक रूप से अलोकप्रिय हो जाता है और इसलिए निरर्थक हो जाएगा.
नेहरू-लियाकत समझौते के तहत यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई थी कि दोनों देशों में किसी भी हालत में अल्पसंख्यकों के साथ किसी तरह का भेदभाव न हो और उन्हें हर तरह से पूरी सुरक्षा सुनिश्चित कराई जाए.
टीएमसी के दो ग्लैमरस फिल्मस्टार सांसद, न तो नुसरत जहां और न ही मिमी चटर्जी को इस बार फिर से टिकट दिया गया है. यह दर्शाता है कि मतदाता कितने समझदार हैं.
सुप्रीम कोर्ट के लिए चुनावी बांड मामले में 30 जून तक की मोहलत देने की एसबीआई की याचिका पर सुनवाई करना अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए लोकतंत्र की भावना को पैरों तले रौंदने जैसा होगा.
मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने युवाओं के लिए नौकरी की गारंटी की घोषणा करके सत्ताधारी बीजेपी की राह मुश्किल कर दी है. बीजेपी को अब इससे बेहतर पेशकश करनी होगी. इस कश्मकश में चाहे जो भी जीते, लेकिन रोजगार के सवाल पर राजनीति हो ये अच्छा है.
लोकसभा चुनावों के पिछले दो दशकों में यूपीए का उत्थान और पतन, वामपंथ का पतन और भाजपा की पराजय देखी गई. अब चुनाव आयुक्तों को चुनने के लिए एक नया कानून आया है.
पीएम मोदी ने चुनावों का ज़िक्र नहीं किया, लेकिन उन्होंने बड़े पैमाने पर मुस्लिम समुदाय तक पहुंच बनाई और हज़रतबल परियोजना के उद्घाटन के जरिए विश्व को एक संकेत भेजा.
दरअसल बीजेपी जब तमिलनाडु में जमीन तलाशने की कोशिश करती है, तो उसके पास अपना बना कोई ऐसा मॉडल नहीं है जो द्रविड़ विचारधारा पर चलने वाले तमिलनाडु से ज्यादा चमकदार हो.
‘माइलेज’ वाले नेता मानते हैं कि वे उम्र आदि की सीमाओं से ऊपर हैं, मसलन शी जिनपिंग, बाइडन, ट्रंप, एर्दोगन या पुतिन को ही देख लीजिए. तो फिर मोदी 75 की उम्र के बाद भी प्रधानमंत्री क्यों नहीं बने रह सकते?
औपनिवेशिक खुफिया तंत्र क्रांतिकारियों को व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि खतरे के रूप में दर्ज करता था. ऐसा करके उसने कई ज़िंदगियों को इतिहास से निष्कासित कर दिया.