जब सभी लोग नए साल का स्वागत कर रहे थे, तब बांग्लादेश में 50-वर्षीय एक हिंदू व्यक्ति को ज़िंदा जला दिया गया, दो हफ्तों में यह चौथा ऐसा हमला था. देश में फॉर-राइट के अपने संस्करण की पकड़ मजबूत होती जा रही है.
आप कहेंगे कि 1985-95 का दशक तो कब का बीत चुका लेकिन ऐसा है नहीं, क्योंकि उस दशक में जो मसले उभरे वे आज भी हमारे लोकतंत्र और सार्वजनिक विमर्शों पर हावी हैं.
अगर महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है, लेकिन राजनीतिक दलों का माहौल लागू होने वाले यौन उत्पीड़न विरोधी नियमों से बाहर रहता है, तो हम नई महिलाओं को असुरक्षित जगहों में भेज रहे होंगे.
भारतीय परंपरा हमारे जीवन में अनुशासन और नैतिक जिम्मेदारी बनाए रखती है. यह एक ऐसे संतुलित समाज की कल्पना करती है, जहां आध्यात्मिकता और आर्थिक समृद्धि एक साथ मौजूद हों और मानवता को उज्ज्वल व सामंजस्यपूर्ण भविष्य की ओर ले जाएं.
छात्रों के आंदोलन से निकली नेशनल सिटिज़न्स पार्टी अब पूरी तरह कलंकित हो चुकी है. उसने अब बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामवादी पार्टी जमात-ए-इस्लामी से हाथ मिला लिया है.
वही पुराना पैटर्न है: सनसनीखेज लीक से उन्मादी कवरेज होती है, मामले अदालत में गिर जाते हैं, लेकिन जनता की अदालत में आरोपियों को पहले ही दोषी ठहरा दिया जाता है.
हिंसा करने वाले लोग पुलिस से नहीं डरते. उन्हें पता है कि वे दूसरों को परेशान कर सकते हैं, दुकानों पर हमला कर सकते हैं या यहां तक कि हत्या भी कर सकते हैं और पकड़े नहीं जाएंगे.
दीन दयाल उपाध्याय की हत्या और माधवराव सिंधिया के प्लेन क्रैश से लेकर गांधी परिवार की हत्याओं तक, राजनीति में जो कुछ भी होता है, उसका हिसाब-किताब से कम और किस्मत से ज़्यादा लेना-देना होता है.