भारत को क्षेत्रीय मसलों के सैन्य समाधान के लालच से बचना ही होगा. अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए इसकी जगह उसे आर्थिक समझौतों, कूटनीतिक प्रयासों और अपने ‘सॉफ्ट पावर’ का उपयोग करना चाहिए.
कश्मीर ने 2019 में अपना विशेष दर्जा खो दिया, उसके बाद से अब तक अवामी एक्शन कमिटी और इत्तिहादुल मुसलमीन प्रतिबंध से बचा हुआ था क्योंकि नई दिल्ली इस उम्मीद में थी कि इसके नेता अपने समर्थकों को लोकतांत्रिक राजनीति की ओर मोड़ लेंगे.
ट्रंप जबकि गोली दागने की धमकी दे रहे हैं, अपनी पीठ खुद ठोकने में व्यस्त भारतीय सत्ता-तंत्र को सुर्खियां बनवाने के मोह से छुड़ाने के लिए ऐसी ही धमकी की जरूरत थी.
अलग उत्तराखंड राज्य की मांग के आंदोलन में भी चिपको आंदोलन के तरीकों का प्रयोग शुरू हो गया और शांतिपूर्ण प्रदर्शन, सत्याग्रह, जन जागृति, आदि रोज होने लगी.
विडंबना यह है कि लोगों के अपने स्थानीय पारिस्थितिकी के प्रति लगाव के प्रदर्शन का इस्तेमाल केंद्रीकृत निर्णयकर्ताओं द्वारा उन्हें इससे अलग करने के लिए किया गया.
आम धारणा यह है कि चिपको आंदोलन ‘पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए महिलाओं का आंदोलन’ था, जो 26 मार्च 1974 को शुरू हुआ था, लेकिन यह धारणा कुछ हद तक ही सही है.
भारत विरोधी बगावत ने मैतेई समुदाय में हिंदू शासन के दौर से पहले की सांस्कृतिक परंपराओं और आस्थाओं को पुनर्जीवित करने पर ही ज़ोर दिया और कुकी और नगा समूहों की उपेक्षा की.
घोस्ट वोटर्स मतदाता सूची में कैसे घुस जाते हैं? यह वाकई डरावना है. यह भी डरावना है कि केवल पश्चिम बंगाल में ही घोस्ट वोटर्स को राजनीतिक हथियार में बदल दिया गया है.
मोपा, गोवा से ज़्यादा महाराष्ट्र के लिए काम आता है. साउथ गोवा के MP कैप्टन विरियाटो फर्नांडिस ने कहा, 'मोपा एक इकॉनमी इंजन है, लेकिन वहां आने वाले 75% टूरिस्ट सिंधुदुर्ग जाते हैं.'