उत्तर और दक्षिण की बिलकुल ही अलग-अलग प्रकार की सामाजिक-राजनैतिक परिस्थितियां, अलग प्रकार की समस्याएं एवं चिंताएं हैं – इन सब मसलों को संतोषजनक रूप से हल करने की कोशिश होनी चाहिए.
ऐसा शायद कभी नहीं हुआ कि सवर्ण महिलाओं ने अपने परिवार के उन पुरुषों का बहिष्कार कर दिया हो, जिन्होंने दलित महिलाओं का यौन शोषण या बलात्कार किया हो बल्कि वो उनको बचाने की तमाम कोशिशें करती हैं.
वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा सरकारी गाड़ी के इस्तेमाल, जवानों से घरेलू नौकरों का काम लेने और बिजली बिलों में हेरफेर जैसे विशेषाधिकारों के दुरुपयोग के मामले बेकाबू हो चुके हैं.
झारखंड में इसी साल के आखिर में विधानसभा चुनाव होने हैं. लोकसभा चुनाव में भारी जीत हासिल करके बीजेपी ने बढ़त ले ली है. वह अपनी सरकार बचाने के लिए लड़ेगी, लेकिन क्या विपक्षी दल इस लड़ाई के लिए तैयार हैं?
भारत का संविधान सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है और उसमें दर्ज एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) एक्ट दलित-आदिवासियों को ब्राह्मणवाद के सामंती मानस से संरक्षण प्रदान करता है.
कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र के माध्यम से सही चाल चली थी, लेकिन वह मसले चुनावी प्रचार में पीछे छूट गए. रोजगार की योजना, किसानों को राहत, ओबीसी के लिए कार्यक्रम आदि के बारे में कांग्रेस मतदाताओं को बता ही नहीं पाई.