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Thursday, 5 February, 2026
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केंद्र सरकार की नीतियों का समर्थन क्यों कर रही हैं मायावती?

उपचुनाव में भाजपा किसी विधानसभा क्षेत्र में खुद को कमजोर पायेगी तो बसपा को फायदा पहुंचाने का प्रयास कर सकती है. इसलिए मायावती ने अगर कश्मीर पर केंद्र के फैसले का समर्थन किया है तो यह अनायास नहीं है.

आर्थिक मंदी की खबरों के बीच मोदी सरकार नई घोषणाएं कर स्थिति पर नियंत्रण दिखाना चाहती है

मोदी सरकार के दो कार्यकालों में ऐसा कोई दूसरा सप्ताह शायद ही रहा होगा जब आर्थिक नीति को लेकर इतनी सारी घोषणाएं की गई होंगी. लेकिन जब तक मांग नहीं बढ़ती, परिदृश्य में सचमुच बदलाव मुश्किल है.

भाजपा जब-जब राहुल को खलनायक बनाती है तो उनके राजनीतिक करिअर में फूंकती है जान

ये तो भाजपा को ही तय करना है कि वह उस जाल में फंसने से कैसे बचती है जिसमें कि आज कांग्रेस फंसी दिख रही है.

मोदी-शाह की जोड़ी बदले की राजनीति को एक नये स्तर तक ले गई है

भारतीय राजनीति इन दिनों प्रतिशोध के दुष्चक्र में उलझ गई है और भाजपा ने इसे एक नये स्तर पर पहुंचा दिया है— सबसे पहले तो तीन एजेंसियों को अपना त्रिशूल बनाते हुए इसके साथ कुछ टीवी चैनलों और सोशल मीडिया को भी जोड़ कर, दूसरे, बगल का अपना दरवाजा दलबदलुओं के लिए पूरा खोल कर.

बांग्लादेश ने जिस शादी के फॉर्म से ‘वर्जिन’ हटाया वो महिलाओं के खिलाफ बातों से भरा है

बांग्लादेश को समान नागरिक संहिता की ज़रूरत है. पुरुषवादी कानूनों में मामूली फेरबदल से महिलाओं को मामूली मानवाधिकार ही मिल पाएंगे.

मंदी से बचना है तो सरकारी नौकरियों के खाली पदों को भरे सरकार

देश का जो सबसे कमज़ोर तबक़ा है, उसकी क्रयशक्ति में इजाफा केवल मनरेगा जैसी में योजनाओं में ख़र्चा बढ़ाकर किया जा सकता है. शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च भी बढ़ाना होगा.

न्यायपालिका पर दलितों का बढ़ता अविश्वास लोकतंत्र के लिए बुरी खबर

प्रगतिशील कानून बनाने का जिम्मा विधायिका यानी लेजिस्लेचर का है. आखिर उसे ही तो वोट लेने के लिए जनता के बीच जाना होता है और जनता के हितों का ख्याल रखने की उम्मीद उससे ही है.

बसपा बड़े जनांदोलनों वाली पार्टी कभी नहीं रही, फिर मायावती भला रविदास आंदोलन से क्यों जुड़ें?

चंद्रशेखर आज़ाद बनाम मायावती का मीडिया का कथानक खोखला है. दलितों के एक से अधिक नेता हो सकते हैं.

मोदी आलोचकों की तीन ग़लतियां- और इसमे नर्म हिंदुत्व शामिल नहीं

जैसे अमेरिकी उदारवादी यह नहीं देख सकते कि कोई भी ट्रम्प को वोट क्यों देगा, मोदी आलोचक भी उसी जाल में फंस गए हैं. और समस्या की जड़ यही है.

न्यायपालिका को बीमारी से बचाना है तो रिटायर्मेंट के बाद मीलॉर्ड्स को नौकरी का झुनझुना न दें

क्या न्यायमूर्ति गौड़ की पीएमएलए न्यायाधिकरण के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठाती है.

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कोलकाता, चार फरवरी (भाषा) कोलकाता मेट्रो की ब्लू लाइन पर रबीन्द्र सरोबर स्टेशन पर बृहस्पतिवार शाम एक व्यक्ति ने ट्रेन आने के समय पटरी...

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सुप्रीम कोर्ट का सही फैसला और बिलकिस बानो की जीत

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