न्यायपालिका की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी के बीच संतुलन कायम करने तथा प्रधान न्यायाधीश का पद को आरटीआई कानून के दायरे में शामिल करने जैसे सवालों पर संविधान पीठ का फैसला आयेगा.
राममंदिर आंदोलन के नेता के तौर पर अशोक सिंघल और आडवाणी का ही नाम दर्ज है. उनके अलावा मुख्य न्यायाधीश गोगोई और पांच जजों की बेंच को भी इतिहास याद रखेगा. लेकिन इन सब के बीच नरेंद्र मोदी कहां हैं?
एनजीटी ने सरकारों को या संस्था को डांटा यह बात सभी जानते हैं लेकिन अंतिम रूप से आदेश क्या दिया इस पर बात नहीं हो पाती, एनजीटी ने जुर्माना किया यह सभी जानते हैं लेकिन कितना जुर्माना वसूला गया इस पर बात नहीं हो पाती.
मौलाना यह तक कहने से नहीं हिचके थे कि उनके लिए राष्ट्र की एकता स्वतंत्रता से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है और वे उसका विभाजन टालने के लिए कुछ और दिनों की गुलामी भी बर्दाश्त कर सकते हैं.
भारत की अर्थव्यवस्था अपने ठहराव की जकड़ को तोड़कर आगे नहीं बढ़ती तो मोदी का कद छोटा हो सकता है. इस गिरावट को थामने के लिए उन्हें बड़े उपाय सोचने होंगे या फिर वे भावनाएं भड़काने के जोखिम की ओर मुड़ सकते हैं.
अब जब चीन को बड़े दांव वाले युद्ध पर नज़र रखने में व्यस्त किया जा रहा है, यह छोटा पड़ोसी संघर्ष पाकिस्तान को भू-रणनीतिक युद्ध का ज़रूरी सबक सिखा सकता है.