पुरातत्वविदों ने कई अवसरों पर अयोध्या में उत्खनन किया है, लेकिन राम के जन्मस्थान को चिन्हित करने के लिए नहीं, बल्कि परंपरागत पुरातत्वशास्त्र के अभ्यास के लिए.
कमलेश तिवारी की हत्या के बाद भारत में एक नए तरह का नफ़रत का खेल शुरू हो गया है जहां मुस्लिमों को खुलेआम गरियाया जाता है भले ही वह पांच बार के नमाजी हों या न हों.
जनता ने समतामूलक समाज बनाने की उम्मीद के साथ समाजवादी, बहुजनवादी और कम्युनिस्ट पार्टियों के हाथ में सत्ता दी. लेकिन उन्होंने ये मौका गंवा दिया. बीजेपी उसी शून्य का फायदा उठा रही है.
हिंदू पक्षों ने जहां विवादित स्थल पर नया निर्माण होने से पहले भव्य मंदिर होने का दावा किया वहीं मुस्लिम पक्षकारों ने खुदाई में मिली संरचना की तुलना ईदगाह से की.
मोदी शायद ही कभी ‘अच्छे दिन’ के अपने वादे का जिक्र करते हैं, पर जनता अब भी उसे याद करती है. हालांकि, जनता की आवाज के शीघ्र ही जीत के जश्न में दब जाने की संभावना है.
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की इस घड़ी में हमारे सामने अपने भावी इतिहास की फिक्र करने का वक्त आ खड़ा हुआ है. यह जताने का भी कि तमाम असहमतियों के बावजूद हम अपनी संवैधानिक संस्थाओं और उनके फैसलों का कितना सम्मान करते हैं.
जिन छोटे लड़कों को स्कूल के काम की चिंता करनी चाहिए, वे महिलाओं को परेशान करना सीख रहे हैं. क्या अब हमें उन लोगों की लिस्ट में बच्चों को भी शामिल करना होगा जिनसे हमें खुद को बचाना है?