इन चार मामलों से साफ हो जाएगा कि सर्वोच्च अदालत के फैसले संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर किए जाते हैं या उनमें लोकप्रिय जनभावनाओं का ख्याल रखा जाता है.
नवंबर का महीना सेक्युलर राजनीति के लिए परीक्षा का महीना साबित होने जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट का अयोध्या पर बहु-प्रतीक्षित फैसला, एनआरसी का विस्तार और कई कानून आएंगे सामने.
बिहार और हरियाणा की राजनीतिक परंपराएं और आबादी की संरचनाएं अलग हैं. इसलिए तेजस्वी यादव के सामने बीजेपी से हाथ मिलाने का विकल्प ही नहीं है. बीजेपी के लिए भी आरडेजी को साथ लेने का विकल्प नहीं है
कांग्रेस को राष्ट्रीय नेतृत्व की दुविधा से निकलना होगा और जनता के बदलते मूड का फायदा उठाने के लिए अपने को तैयार करना होगा. जनता का सरकार से नाराज होना काफी नहीं है. सिर्फ इस वजह से परिवर्तन नहीं होते
इतिहास को खंगालें तो पता चलेगा कि परंपरा की नींव कांग्रेस ने ही डाली और उसने इंडियन एयरलाइंस के विमान का 1978 में अपहरण करने वाले दो नेताओं को भरपूर सम्मान भी दिया.
लोग स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की दिशा में आगे बढ़ना नहीं चाहते, क्योंकि शायद इन मूल्यों की गारंटी देने वाले नए आधुनिक भारत को लेकर उनके मन में संदेह है. वे अराजकता की ओर नहीं जाना चाहते.
एआईएमआईएम की उपस्थिति अब प्रतीकात्मक मात्र नहीं रह गई है, बल्कि यह पश्चिम से पूरब तक के राज्यों के चुनावों में धर्मनिरपेक्ष दलों द्वारा मुस्लिम मतदाताओं को ब्लैकमेल किए जाने को चुनौती दे रही है.