भाजपा की सत्ता अब भले ही केवल कुछ बड़े और महत्वपूर्ण राज्यों तक सीमित हो गई है लेकिन उसकी हिंदुत्ववादी विचारधारा ने अपना वर्चस्व कायम कर लिया है और देशभर में इसका कोई बड़ा विरोध नहीं हो रहा है.
भारत में शैक्षणिक संस्थानों के कैंपस को लगातार अस्थिर करने की कोशिश की जा रही है. इसके लिए रोहित वेमुला, पायल तड़वी, फातिमा लतीफ की आत्महत्या और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हुए विरोध-प्रदर्शन को देखा जा सकता है.
खास लोगों को मिलने वाला ब्लू टिक मेरे विचार में संवाद के मामले में एक किस्म का नस्लभेद है या इसे आप डिजिटल वर्ण व्यवस्था भी कह सकते हैं. ये लोकतंत्र के लिए हानिकारक है.
अयोध्या के कई भाजपाई संत गाय को पशु कहने पर चिढ़ जाते हैं और उपदेश देने लगते हैं कि ‘वह पशु नहीं माता है’. यह बात और है कि ये उपदेश-कुशल संत इस माता के लिए खुद कुछ नहीं करते और करदाताओं के पैसे से ही उसको पालना चाहते हैं.
पवार के राजनीतिक दांव-पेंचों की सूची बड़ी लंबी है. एक समय उनके संबंध शिवसेना से ठीक-ठाक थे, लेकिन बाद में उसी शिवसेना को किनारे करने की जिम्मेदारी भी उन्होंने निभाई. इस बार उन्होंने एक और बड़ा खेल कर दिया.
वसीम अकरम और ब्रिगेडियर राजा रिज़वान, जिन्हें पाकिस्तान की सेना ने पिछले हफ्ते जासूसी के आरोप में फांसी दी थी, जिनको पकड़े नहीं गए होंगे लेकिन दो चीजें गलत हो गईं.
अब जब चीन को बड़े दांव वाले युद्ध पर नज़र रखने में व्यस्त किया जा रहा है, यह छोटा पड़ोसी संघर्ष पाकिस्तान को भू-रणनीतिक युद्ध का ज़रूरी सबक सिखा सकता है.