जेएनयू के छात्र जहां फीस वृद्धि के खिलाफ सड़कों पर उतरकर सरकार का दम फुला देते हैं, वहीं बीएचयू के ज्यादातर छात्र अपनी धार्मिक-साम्प्रदायिक ग्रंथियों तक से आजाद नहीं.
क्या पाकिस्तान खालिस्तान के मुद्दे को फिर से सुलगाना चाहता है या वह एक भू-राजनीतिक औजार के रूप में करतारपुर गलियारे का उपयोग करना चाहता है? दोनों का ही उत्तर ‘हां’ है.
दोनों नेता बड़बोले दावे करने में माहिर हैं, दोनों जो पैकेज पेश कर रहे हैं उनमें कोई फर्क नहीं है, दोनों की कार्यशैली व्यक्तिपूजा को बढ़ावा देने वाली है. लेकिन दोनों में अहम एक अंतर है. ‘आप’ में वह तीखी सांप्रदायिकता नहीं है जो भाजपा में है.
जेएनयू किसी कन्हैया या शेहला से बढ़कर है. लेकिन कभी विविधता और लोकतंत्र का प्रतीक रहा विश्वविद्यालय टीवी बहसों, जहरीले ट्वीटों और अगंभीर बहसों में बदनाम हो रहा है.