इतिहास की पुस्तकों में यह शक्तिप्रदर्शन अयोध्या कांफ्रेंस के नाम से दर्ज है, जिसमें कोई एक लाख किसानों ने भाग लिया था. उस वक्त के लिहाज से यह संख्या बहुत बड़ी थी.
मुस्लिम समाज के सवालों की गहराई में कहीं न कहीं मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था में उचित प्रतिनिधित्व का न होना ही समझ आता है. समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं हुआ तो यह संकट कई रूपों में सामने आएगा.
भाजपा की गौरव गाथा में मोदी ही मुख्य कारक रहे हैं, भले ही अमित शाह को चाणक्य बताया जाता हो. ऐसा लगता है कि इस बार चंद्रगुप्त की वजह से ही चाणक्य का नाम हुआ है.
आपको गौरवान्वित करने वाले और अपने ट्वीटों से आपकी रक्षा करने वाले डीजी आईएसपीआर को जनरल बाबर इफ़्तिखार के लिए पद छोड़ने को बाध्य होना पड़ा. पर नो इश्यू, ले लो टिश्यू.
महबूबा मुफ्ती और उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदी उमर अब्दुल्ला ने लगभग एक साथ ही राजनीति में प्रवेश किया था. अगर दोनों के राजनीतिक सफ़र पर नज़र दौड़ाई जाए तो साफ पता चलता है कि महबूबा का राजनीति में उमर के मुक़ाबले पांव जमाना काफी मुश्किल रहा है.
कई नामी-गिरामी अखबार इस सरकार की नीतियों का विश्लेषण प्रताप भानु मेहता और रामचंद्र गुहा जैसे राजनीतिशास्त्र के जानकारों से करवाते हैं. यह अनुपयोगी है. अगर इस सरकार की नीतियों को समझना चाहते हैं तो इस पर करण जौहर से लेख लिखवाइए.
किसी राजनीतिक दल की मदद के बगैर सीएए का विरोध कर रहे भारत के मुसलमानों ने एक नई राजनीतिक पहचान कायम की है और उन्होंने नुमाइंदगी के सवाल को भी सुलझा लिया है.
भाजपा जिस तरह संरक्षणवाद का सहारा लेते हुए बहुराष्ट्रीय कंपनियों का निषेध कर रही है और तकनीक विरोधी पुरातनपंथी धारणाओं की ओर मुड़ रही है उससे यही जाहिर होता है कि मजबूत सरकारें भी जोखिम लेने से कतराती हैं.
नेपाल में Gen-Z मूवमेंट के बाद से चीन थोड़ा शांत रहा है क्योंकि बीजिंग की अपनी रेड लाइन्स हैं, खासकर 1989 के तियानआनमेन स्क्वायर प्रोटेस्ट्स के बाद, जो लोकतंत्र के समर्थन में एक बड़ा आंदोलन था.