राज्य और पार्टी का घाल-मेल कम्युनिस्ट तानाशाहियों की विशेषता रही है. पश्चिमी लोकतंत्र में कहीं ऐसा नहीं, पर भारत में वही कर डाला गया, जो संविधान को व्यवहार में तहस-नहस करके हुआ.
संविधान सिर्फ किसी समुदाय की धार्मिक स्वायत्तता या सामूहिक धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए ही नहीं है, बल्कि यह हर व्यक्ति के मूल अधिकारों की भी सुरक्षा करता है, चाहे वह किसी भी धर्म या पृष्ठभूमि से हो.
आधार, राशन कार्ड, वोटर ID और मनरेगा जॉब कार्ड जिन दस्तावेज़ को गरीब वोटर असल में रखते हैं, उन्हें बिहार में पहचान और निवास साबित करने वाले ECI के दस्तावेज़ की लिस्ट में शामिल ही नहीं किया गया है.
एर्दोआन की सोच अब तुर्की की सीमाओं से बाहर भी साफ़ तौर पर दिखने लगी है. सीरिया की नई सरकार ने शरिया को अपने क़ानूनों की बुनियाद बना लिया है, ठीक वैसे ही जैसे एर्दोआन अपने देश में चाहते हैं.
आरएसएस इंदिरा गांधी की सरकार को किसी भी तरह गिराना चाहता था, लेकिन बाद में उसी “तानाशाह” इंदिरा गांधी से मेल-मुलाकात करने और तारीफें करने में उसे कोई नैतिक दुविधा नहीं हुई, जिन्होंने संघ के नेताओं को जेल में डाला था.
एमएसपी लागू किए जाने के पांच साल के अंदर भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक खामोश बदलाव आया. खुद अपना पेट भरने की भारत की क्षमता पर सभी संदेहों को शांत कर दिया गया.
ये बात और ज़्यादा गुस्सा दिलाने वाली है जब आप जानते हैं कि पंजाब ने बॉलीवुड को दशकों तक ‘कंटेंट’ दिया है—कभी फिल्मों के सपनों की दुनिया के लिए सुंदर पृष्ठभूमि बनकर, तो कभी ऊंची आवाज़ में बोलने वाले मज़ाकिया साइड किरदारों के रूप में.
आसिम मुनीर से पहले जितने जनरल हुए, उन सबको यही सबक मिला कि पाकिस्तानी जिहादवाद को अपनाना खतरनाक ही साबित हुआ है, और यह ज़्यादातर समय बस थोड़े वक्त का ही प्रयास रहा.
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण चुनाव जीतने की संभावना बढ़ाने के लिए किया गया लगता है, लेकिन एक बड़ा कानूनी सवाल है: क्या इससे उन पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है?