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Monday, 2 February, 2026
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दिल्ली के हिंदू-मुस्लिम दंगों की जड़ क्यों सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से जुड़ी हुई है

दिल्ली का दंगा भारत के लिए अंधेरे दौर की शुरुआत कर सकता है. इसीलिए इसके मूल कारणों पर विचार करने का वक़्त यही है. दुर्भाग्य की बात यह है कि यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा बोए एक विष बेल का फल है.

हथियार से ज्यादा खतरनाक हैं भड़काऊ भाषण, ये काल्पनिक दुश्मन खड़ा कर देते हैं

दिल्ली दंगों के दौरान तमाम ऐसी कहानियां आईं जिनमें हिंदुओं ने मुसलमानों को बचाया और मुसलमानों ने हिंदुओं को बचाया.

जब मोरारजी देसाई ने कहा था- ‘अभी तो मैंने नौजवानों जितने जन्मदिन ही मनाये हैं’

मोरारजी के आईने में देखें तो कह सकते हैं कि 29 फरवरी को जन्मे लोग कड़ी मेहनत करने वाले, अपनी धुन के धनी, मेधावी, दृढ़निश्चयी, देशसेवी और सच्चे तो साथ ही अपनी जिदों को लेकर अड़ियल भी होते हैं.

क्या नफरत पैदा करने वाले बयानवीरों से निबटना व्यवस्था के लिये बड़ी चुनौती है

विधि आयोग ने बयानबाजी घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिये कानून के प्रावधानों को पूरी तरह पुख्ता नहीं पाया था और भारतीय दंड संहिता की धारा 153 और धारा 505 में नयी उपधारा जोड़ने और इन अपराधों को संज्ञेय तथा गैर जमानती बनाने का सुझाव दिया था.

सांप्रदायिक हिंसा अपने आप नहीं होती, क्यों जल उठी दिल्ली इससे किसका फायदा

सांप्रदायिक हिंसा अपने आप नहीं होती. ये गुस्से का मासूम इजहार नहीं है. इसके पीछे हमेशा योजना होती है, साजिश होती है. इसलिए ये जानना जरूरी है कि दिल्ली में जो हुआ, वो क्यों हुआ?

विश्व की नंबर एक टेस्ट टीम के सामने अब है चुनौतियों का पहाड़

क्राइस्टचर्च में टीम इंडिया का भविष्य इसी बात पर निर्भर करेगा कि ये दोनों बल्लेबाज टीम को कैसी शुरुआत दिलाते हैं.

अमित शाह सरदार पटेल से सीख सकते हैं कि दंगों को कैसे रोका जाता है

सरदार पटेल 1947 की हिंसा को काबू करने में इसलिए सफल रहे क्योंकि जब कानून और व्यवस्था बहाल करने की बात आई तो वे पूरी तरह निष्पक्ष रहे. उन्होंने दंगाइयों के धर्म की परवाह किए बगैर उन पर सख्ती की.

ग्रामीण विकास का मॉडल देने वाले नानाजी देशमुख जिन्होंने सामाजिक कामों के लिए राजनीति छोड़ी थी

भारत की शिक्षा व्यवस्था के हालात को देखकर नानाजी बहुत चिंतित रहते थे. उनका मानना था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिसमें शिक्षा के साथ संस्कारों की भी बहुलता हो.

दिल्ली हिंसा न तो मोदी सरकार का डिजाइन है और न ही इस्लामिक साजिश, यह इससे अधिक खतरनाक है

प्रधानमंत्री मोदी को ये बात एक पल भी गवारा नहीं हो सकती कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के दौरे पर हों और उसी वक्त दिल्ली की सड़कों पर हिंसा का तांडव हो. जहां तक मोदी के विरोधियों का सवाल है, वे इस हालत मे थे ही नहीं कि हिंसा की कोई साजिश रचें और उसे अमली जामा पहनायें. लेकिन, हिंसा हुई तो फिर उसे सांयोगिक नहीं माना जा सकता.

‘राम तो सबके हैं’ फिर भी राम मंदिर ट्रस्ट में एक ही जाति की क्यों बोल रही है तूती

संघ के अयोध्या निवासी स्वयंसेवक कन्हैया मौर्य यह याद करते हुए अपनी निराशा छिपा नहीं पाते कि तब कहा गया था कि राम तो सबके हैं. किसी एक खास वर्ग, जाति या समुदाय के नहीं.

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चंबल अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का समापन

कोटा, एक फरवरी (भाषा) चंबल अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का नौंवां संस्करण रविवार को यहां संपन्न हुआ, जिसमें राजस्थान में फिल्म निर्माण को बढ़ावा देने...

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सुप्रीम कोर्ट का सही फैसला और बिलकिस बानो की जीत

दिप्रिंट के संपादकों द्वारा चुने गए दिन के सर्वश्रेष्ठ कार्टून.