कोरोना-मुक्त सीमित दायरे में प्रमुख खेल प्रतियोगिताओं के रोमांच और आनंद का अनुभव कर सकते हैं. हर खेल को ऐसा इलाका चुनना पड़ेगा जहां प्रतियोगी लीग या टूर्नामेंट कराने के लिए पर्याप्त संख्या में स्टेडियम और मैदान हों.
उद्योगों का कहना है कि अगर लॉकडाउन खत्म हो जाता है, तब भी तत्काल काम शुरू करना बहुत मुश्किल है क्योंकि मजदूर बड़ी संख्या में अपने घरों की ओर लौट गए हैं.
यह बिल्कुल स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री को सिर्फ एकालाप करना भाता है. पर ये वक्त चुनाव या विरोधियों पर कीचड़ उछालने का नहीं है, बल्कि इस समय भारत महामारी का सामना कर रहा है.
कांग्रेस अध्यक्ष के ओहदे पर राहुल गांधी की वापसी तय दिख रही है, और इससे पहले सोनिया गांधी जो टीम बनाने में जुटी हैं उसमें लगता है उन्हीं लोगों को चुना जा रहा है जो पहली नज़र में पसंद आ गए.
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद की यह सबसे बड़ी त्रासदी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हमेशा के लिए तोड़ देगी. करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी छिन जाएगी और इससे जो सामाजिक तनाव पैदा होगा वह संभाले नहीं संभलेगा.
केन्द्र सरकार और राज्य सरकारें अगर वास्तव में इस महामारी पर प्रभावी तरीके से अंकुश लगाने के लिये गभीर हैं तो उन्हें उन लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी होगी जो सत्ता या फिर अपने समुदाय, संप्रदाय या जाति विशेष वर्ग में अपना दबदबा दिखाने के लिये दूसरे लोगों की जान जोखिम में डाल रहे हैं.
महीने में दो दिन भी पर्यावरणीय लॉकडाउन को लागू किया जाता है तो यह नदी और मानवजाति दोनों के हित में होगा. इसके लिए नमामि गंगे और उसके भारीभरकम बजट दोनों की आवश्यकता नहीं होगी.
शुरुआत में मध्य प्रदेश में कोविड-19 की जो जांच हो रही थी वो काफी धीमी गति से चल रही थी लेकिन अब इसमें तेजी आई है. राज्य में अब तक संक्रमित लोगों की संख्या 1407 हो चुकी है.
कम आय वाली अर्थव्यवस्था जब उथलपुथल से रू-ब-रू होती है तो उसे इसकी कीमत चुकानी ही पड़ती है और सबसे ज्यादा बोझ उन पर पड़ता है जो हाशिये पर होते हैं, जिनके पास कोई जमा-पूंजी नहीं होती. इससे बचने का शायद ही कोई उपाय है.
किसी भी युद्ध को जीतने तो क्या, शुरू करने की कुंजी यह होती है कि उसका लक्ष्य स्पष्ट हो. यह पूरी तरह से राजनीतिक विषय होता है. यह न तो भावनात्मक मामला होता है, और न ही शुद्ध रूप से सैन्य मामला.